'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

एकांत श्रीवास्तव की कविताओं का ओडि़या में अनुवाद



मूल हिंदी
अनुवाद  ओडि़या
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दु:ख जब तक हृदय में था
था बर्फ़ की तरह
पिघला तो उमड़ा आँसू बनकर
गिरा तो जल की तरह मिट्टी में
रिस गया भीतर बीज तक
बीज से फूल तक
यह जो फूल खिला है टहनी पर
इसे देखकर क्या तुम कह सकते हो
कि इसके जन्म का कारण 
एक दु:ख था?
दुःखो जोऊ परयन्तो हृदयोरे थीला
थीला हिमखंडों परीखा
पिघलीला तो झोडिपोडिला झाड़ परीखा
पोडिला तो पाणी परीखा माटी रे
पहुँची गला बीज परयन्तो
बीज रु फुल्लो परयन्तो
ये जे फुल्लो फूटिच्छि डालीरे
एहाकु देखी कोण कही पारिबे तुमे
एहआर जन्मोंर कारणों
थीला गोटीए दुःखो।

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नहीं आने के लिए कह कर जाऊंगा
और फिर आ जाऊंगा

पवन से, पानी से, पहाड़ से
कहूंगा-- नहीं आऊंगा
दोस्तों से कहूंगा और ऎसे हाथ मिलाऊंगा
जैसे आख़िरी बार
कविता से कहूंगा-- विदा
और उसका शब्द बन जाऊंगा
आकाश से कहूंगा और मेघ बन जाऊंगा
तारा टूटकर नहीं जुड़ता
मैं जुड़ जाऊंगा
फूल मुरझा कर नहीं खिलता
मैं खिल जाऊंगा

हर समय 'दुखता रहता है यह जो जीवन'
हर समय टूटता रहता है यह जो मन
अपने ही मन से
जीवन से
संसार से
रूठ कर दूर चला जाऊंगा
नहीं आने के लिए कहकर
और फिर आ जाऊंगा 

आसिबा पाईं कोहिकी की जीबी
आउ पुनि आसि जीबी

पवन रु, पाणि रु पहाड़ रु
कहबी--आसिबी नाहिं
सांगो माननकू कहिबी आउ एमितिया हाथ मिलेबी
जेमितिया अंतिम बार
कविता कू कहिबी--विदाई
आउ तहार शब्दों हेई जीबी
आकाश कू कहिबी आउ मेघोअ हेई जीबी
तारा टुटिला पअरे जुड़े ना
मूँ जुडी जीबी
फुल्लो बुझिला पअरे फूटे ना
आउ मूँ फूटि जीबी

सबू बेड़े दुखु थाए ये जे जीवनों
सबू बेड़े टुटू थाए ये जे मनओ
निज मन रु
जीवन रु
संसार रु
बिमुख हेई दूर चालि जीबी
न आसीबा पाईं कहिकी
आउ फेरि आसिबी आउ थरे।
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बिजली गिरती है
और एक हरा पेड़ काला पड़ जाता है
फिर उस पर न पक्षी उतरते हैं
न वसंत
एक दिन एक बढ़ई उसे काटता है
और बैलगाड़ी के पहिये में
बदल देता है
दुख जब बिजली की तरह गिरता है
तब राख कर देता है
या देता है नया एक जन्म।

बिजुड़ी गिरे
आउ गोटीए सबुज गछ हेई जाए कड़ा
तहापरे ता उपरे न पाखी नाभे
न बसंत
दिने कष्टकार जणे काटे तहाकु
आउ बलदगाड़ी र चकरे
परिवर्तित करि दिए
 दुःख जेबे बिजुड़ी परिखा पड़े
तेबे पाउंस करि दिए
किंबा दिए ताकू गोटिए नूतन जन्मों।
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भाई जब काम पर निकलते हैं
तब उनका रास्ता काटती हैं बहनें
बेटियाँ रास्ता काटती हैं
काम पर जाते पिताओं का
शुभ होता है स्त्रियों का यों रास्ता काटना
सूर्य जब पूरब से निकलता होगा
तो नीहारिकाएँ काटती होंगी उसका रास्ता
ऋतुएँ बार-बार काटती हैं
इस धरती का रास्ता
कि वह सदाबहार रहे
पानी गिरता है मूसलाधार
अगर घटाएँ काट लें सूखे प्रदेश का रास्ता
जिनका कोई नहीं है
इस दुनिया में
हवाएँ उनका रास्ता काटती हैं
शुभ हो उन सबकी यात्राएँ भी
जिनका रास्ता किसी ने नहीं काटा।

भाई जेबे काम्मओ पाईं जाअन्ते
तांको रास्ता काटंति भउनीमानें
झिअमानें काटंति रास्ता
 काम्म पाईं जाअन्ता बाप्पानकंरअ
शुभ मनाजाये स्त्रिमानेकरअ
एमितिआ रास्ता काटिबा सुर्जो
जेबे पूर्वरु उदित होउथिबो
तेबे नीहारिकामनें कटु थिबे तहारअ रास्ता
ऋतुमानें बारंबार काटंते एई धरा र रास्ता
से रोहू सदाबहार सबुबेडे
पाणी गिरंता मूसलाधार
जोदी घटागुडाय काटि दिआंते सूखा प्रदेशोर रास्ता
जांकरो केइ नाहीं एई दुनियां रे
पवनो तंकरो रास्ता काटे
शुभ हुए से सबंकर जात्रा भी
जांकरो रास्ता केई काटि नाहन्ति। -


[ श्रेणी : कविता । एकांत श्रीवास्तव अनुवादक : विजेंद्र प्रताप सिंह ]