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नवगीत का संक्षिप्त इतिहास और उसकी मौजूदा समस्याएँ / वीरेन्द्र आस्तिक



आज नवगीत एक समृद्ध विधा है। बल्कि मुझे तो ऐसा लगता है कि भविष्य में नवगीत का स्वर्ण युग आने वाला है। इस परिपे्रक्ष्य में बात करने के लिए हमें नवगीत के इतिहास को भी जाँच-परख लेना चाहिए। यों तो नवगीत का इतिहास व्यापक है, किन्तु यहाँ पर हम कुछ मुख्य बिन्दुओं पर आप सभी का ध्यान चाहेंगे। तभी मौजूदा परिस्थितियों और समस्याओं पर विचार करना तर्कसंगत होगा। यहाँ पर हम नवगीत के इतिहास को प्रमुखतः चार खण्डों में विभाजित करके देख सकते हैं। यहाँ हम बहुत विस्तार में न जाकर इन चार खण्डों के संक्षिप्ततम रूप को अर्थात् एक संकेत के रूप में प्रस्तुत करने का प्रयास करेंगे।

नवगीत का पहला कालखण्ड है उसके जन्म का। उद्भव का। हम सभी नवगीतकार जानते हैं कि नवगीत एक तत्व के रूप में हमें महाप्राण निराला की रचनात्मकता से प्राप्त हुआ। आधुनिकता के प्रथम चरण में निराला उस टर्निंग प्वाइंट पर खड़े थे जहां से कविता समाज के यथार्थ और उसके सापेक्ष मूल्यों से प्रभावित होती है, और वह प्रभाव हमें बाद के रचनाकारों में दिखाई देने लगता है। केदारनाथ अग्रवाल, नागार्जुन, वीरेन्द्र मिश्र, डॉ0 रवीन्द्र भ्रमर और राम दरश मिश्र आदि एक प्रेरणा स्रोत के रूप में दिखाई देते हैं। 1948 में अज्ञेय के संपादन में प्रतीक का शरद अंक आया जिसमें अघोषित रूप से नवगीत विद्यमान थे। तदोपरान्त एक श्रृंखला के रूप में कविताएं - 52-53 और 54 आदि का प्रकाशन हुआ। इन अंकों में भी नवगीत का तत्व था। उस समय जो नए गीत आ रहे थे, वे पारम्परिक गीतों से अलग हट कर आ रहे थे। 1958 में राजेन्द्र प्रसाद सिंह के संपादन में गीतांगिनी आई। गीतांगिनी में नवगीत का नामकरण ही नहीं बल्कि उसका तात्विक विवेचन भी किया गया। उस दौर का यही सब नवगीत के उद्भव काल का संक्षिप्त इतिहास है। उद्भव कैसा भी हो, वह हमें आल्हादित करता है। वहाँ आलोचना की गंुजाइश कम होती है, आलोचना की संभावनाएं उसके विकास में हुआ करती हैं।

नवगीत का दूसरा कालखण्ड आता है उसकी स्थापना का जो सन् 1960 से माना जाना चाहिए स्थापना काल में भी अनेक समवेत संकलन आए। गीत की इस नई अवधारणा की एक प्रकार से आंधी-सी चल पड़ी। बड़े-बड़े रचनाकार नई कविता को छोड़कर नवगीत के क्षेत्र में आ गए। नई कविता 1952-53 में स्थापित हो चुकी थी। सन् 1960 से नवगीत को लेकर बहसों और विमर्श का दौर शुरू हुआ। ओम प्रभाकर की कविता-64 जैसी पत्रिकाओं से नवगीत की जमीन तैयार होने लगी। भाषा के सारे बोझिल अंलकरणों को निरस्त करते हुए और लोक तत्वों से ऊर्जा ग्रहण करते हुए, ठाकुर प्रसाद सिंह की संथाली गीतों की ‘वंशी और मादल’ आई। 1969 में चंद्रदेव सिंह ‘पॉच जोड़ बाँसुरी’ लाए। गीतांगिनी की तरह इस समवेत संकलन में भी पाँच पीढ़ियों के उन गीतों को चयनित किया गया जिनमें कम या ज्यादा नवगीत के तत्व विद्यमान थे। सन् 1980 तक नवगीत पूरी तरह से स्थापित हो चुका था। 

नवगीत का तीसरा चरण आता है, उसके विकासात्मक काल का। 9वें दशक के प्रारम्भ से ही एक ऐसा विकास देखने में आता है जिसमें अनेक प्रकार की भाषा शैली के प्रयोग देखने को मिलते हैं। यों नवगीत अपने आरम्भिक काल से ही नए कथ्य के स्तर पर प्रयोगपरक ही रहा। यह काल भी अनेक समवेत संकलनों और नवगीत की पत्रिकाओं आदि से समद्ध हुआ। अब तक सैकड़ों नवगीतकार स्थापित हो चुके थे- उमाकांत मालवीय, शिव बहादुर सिंह भदौरिया, छविनाथ मिश्र, विश्वरंजन, वीरेन्द्र मिश्र, रवीन्द्र भ्रमर, शांति सुमन, मधु सूदन साहा, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, सत्यनारायण, शम्भू नाथ सिंह, देवेन्द्र शर्मा इन्द्र, रमेश रंजक, श्रीराम सिंह शलभ, कुमार रवीन्द्र, माहेश्वर तिवारी, दिनेश सिंह आदि अनेकानेक नवगीतकार प्रतिष्ठित हो चुके थे। इन्हीं के साथ उस दौर के नयी पीढ़ी के नवगीतकार डॉ0 राजेन्द्र गौतम व विजय किशोर मानव आदि भी चर्चित हो रहे थे। इन सारे नवगीतकारों में से, आयु के स्तर पर 10-10 रचनाकारों का चयन करके डॉ0 शंभुनाथ सिंह ने नवगीत दशक-एक, दो और तीन निकाले। सर्वविदित है कि नवगीत के विकास में इन नवगीत दशकों का ऐतिहासिक महत्व रहा है। नवगीत के विकास की यात्रा भी थमी नहीं। डॉ0 सिंह के संपादन में ही नवगीत अद्र्धशती (1986) भी आई। डॉ0 राजेन्द्र गौतम कृत नवगीतः उद्भव और विकास जैसा शोध ग्रन्थ भी आया। 1997 में डॉ0 सुरेश गौतम के संपादन में गीत परिदृश्य अद्र्धशती भाग एक और भाग दो आए। दोनों ग्रन्थों में लगभग 700 गीत-नवगीत के रचनाकारों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर सविस्तार विवेचन मिलता है। 1998 में गद्य कविता को चुनौती देता हुआ ‘धार पर हम’ प्रकाशित हुआ। इस ग्रन्थ की लम्बी भूमिका में अनेक पूर्वाग्रहों और भ्रान्तिओं का निवारण हुआ। बीच-बीच में ‘नवगीत एकादश’ जैसे समवेत संकलन भी आए। सन् 2000 में साहित्य अकादमी द्वारा ‘श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन’ आया। नवगीत की विकास-यात्रा में हमें कथ्य-भाषा-शैली के स्तर पर नवगीत के अनेक रंग, अनेक प्रकार के भाषाई मुहावरे देखने को मिलते हैं। 

21वीं सदी के प्रारम्भ से ही नवगीत का चैथा चरण माना जा सकता है जो अपनी सारी ऐतिहासिक विशेषताओं को उजागर करता है। आज नवगीत अपने पूरे इतिहास बोध को साथ लेकर प्रगति-पथ पर अग्रसर है। इस अवधि में मधुकर गौड़ के संपादन में नवगीत के गीत नवांतर के रूप में कई अंक आए। 2010 में नवगीत-इतिहास को समृद्ध करने वाले दो समवेत संकलन आये, नवगीत और उसका युग बोध तथा ‘धार पर हम’ (दो), नवगीत सप्तपदी और अभी हाल में नवगीत ‘शब्दायन’ जैसे संदर्भ ग्रन्थ भी निकले। 

मौजूदा दौर में भी अन्य छोटे-छोटे समवेत संकलन प्रकाश मेंे आते जा रहे हैं। इस तरह हिन्दी काव्य साहित्य के इतिहास में नवगीत का एक समद्ध इतिहास विद्यमान है। नवगीत के उपर्युक्त विकास को देखते हुए इस संभावना से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भविष्य में नवगीत का स्वर्ण युग आने वाला है जो नवगीत का चैथा काल खण्ड होगा। 

आज नवगीत एक समृद्ध विधा के रूप में जरूर है लेकिन उसके साथ यह बिडम्बना भी है कि वह साहित्य की मुख्य धारा में नहीं है। एक नकारात्मक बोध का इतिहास नवगीत की विकास यात्रा के साथ-साथ बराबर चलता रहा है और वह इतिहास आज भी मौजूद है। नवगीत हमेशा अपनी प्रगति के बावजूद षडयंत्रों और खेमीब़ाजी का शिकार रहा। इन षडयंत्रों और खेमेबाजी में किसी सीमा तक, नवगीत के अगुआ भी शामिल रहे हैं। उन लोगों के अपने-अपने पूर्वाग्रह रहे हैं और ये पूर्वाग्रह हमारी एक जुटता में बाधक रहे हैं। अब हमें ऐसे फतवेबाजी के माहौल से उबरना होगा। हमें पूर्वाग्रहों से मुक्त होना होगा। मेरे विचार से दो प्रकार के ये पूर्वाग्रह हैं जो देखने में आए हैं। ऐतिहासिक और रचनात्मक। ऐतिहासिक अर्थात हम फलां-फलां गुट के हैं। गुट परस्ती हमें विरासत में मिली हुई है। यानी एक तरह से ये पूर्वाग्रह हम रचनाकारों के संस्कार बन चुके हैं। इसी तरह रचनात्मक स्तर पर पूर्वाग्रह हैं-अर्थात् फलाने का नवगीत, नवगीत नहीं है या अमुक नवगीत साधारण-सा है। अब हमें इस प्रकार की मानसिक ग्रन्थियों से उबरना होगा। हमें सभी रचनाकारों के रचनात्मक अवदान को आत्मसात करना चाहिए। तभी हम सब अपनी अंर्तआत्मा से एकजुट हो पाएंगे। यहाँ उदाहरण के लिए गद्य कविता के क्षेत्र की एक जुटता को देखा जा सकता है जो एक आदर्श के रूप में हमारे सामने हैं। 

अक्सर अलग-अलग मोर्चों की लड़ाईयां निजी स्वार्थों में बदल जाया करती हैं। इस तथ्य को समझना होगा। विकल्प के रूप में अन्ततः हमें एक मंच पर आना ही होगा। 

अन्तिम बात मैं हिन्दी आलोचना के सन्दर्भ में कहना चाहँूगा। अर्थात्मक दृष्टि से आज नवगीत गद्य कविता से किसी मायने में कम नहीं है। मैं हमेशा कहता रहा हूँ। यहाँ पर पुनः कह रहा हूॅू कि सभी विधाओं के केन्द्र में मनुष्य और उसकी मनुष्यता है अर्थात् सभी विधाओं में संरचनात्मक स्तर पर भिन्नता होते हुए भी कथ्यात्मक स्तर पर एकात्मकता है। समानता है। रचना प्रक्रिया की दृष्टि से रचना की प्रभावोत्पादकता में फर्क आ सकता है, बल्कि आता भी है, किन्तु ऐसा कभी देखने में नहीं आया कि नवगीत जटिल कथ्य को सहज रूप में कह न पाया हो। नवगीत ने भी आम और खास की लड़ाइयां लड़ी हैं। 

पिछले 60 वर्षों में नवगीत ने अनेक रचनात्मक मूल्य स्थापित किए हैं, लेकिन उन पर विचार मुख्यधारा के आलोचकों द्वारा नहीं किया गया। तथ्य साफ है कि मुख्य धारा में हमारे नवगीत के आलोचक नहीं हैं। अर्थात् पिछले 60 वर्षों में हम ऐसा आलोचक, ऐसा इतिहसकार पैदा नहीं कर पाये, जो गद्य कविता के आलोचकों पर भारी पड़े। हम जिस प्रकार की आलोचना करते हैं वह भी अंशतः खेमेबाजी से प्रभावित रहती रही है, उसमें विवेचना तो होती रही है लेकिन मूल्यांकन की दृष्टि अपेक्षाकृत कम ही रही है। इसका प्रमुख कारण जो मेरी समझ में आ रहा है वह यह कि हम सारी विधाओं के अध्येता नहीं होते हैं, कविता-कहानी आदि की आलोचना पद्धतियों से हम अनजान रहे हैं और शायद हम अनजान रहना चाहते भी हैं। यही सब कारण हो सकते हैं जिनकी वजहों से हम बड़े आलोचक पैदा करने में असमर्थ रहे। यही कारण है कि शैक्षिक और अकादमिक जगत में हमारी भागीदारी नगण्य हो जाती है। 

यहाँ यह भी बताता चलूँ कि मैं आलोचना पर जोर क्यों दे रहा हूँ। विगत में डॉ0 नामवर सिंह जैसे गद्य कविता के आलोचक यह कहते आए हैं कि ‘गीत आलोचना की वस्तु नहीं है।’ यह कहकर वे एक तीर से दो निशाने साधते रहे हैं। एक-गीत इस लायक नहीं कि उसकी आलोचना हो और दो-शैक्षिक जगत में, गद्य कविता का एकाधिकार बरकरार रहे। 

मेरा मानना हे कि यदि गीत पर विमर्श नहीं होगा तो वह मूल्यांकित भी नहीं होगा और यदि उसका मूल्यांकन नहीं होगा तो पाठ्यक्रमों आदि में प्रवेश का रास्ता भी नहीं बन पाएगा। यहाँ पर मैं बड़े आदर के साथ उन सभी आलोचकों-समीक्षकों को याद करता हूँ जिनकी महती भूमिका से नवगीत समृद्ध हुआ। लेकिन बात वहीं की वहीं है कि नवगीत आज साहित्य की मुख्य धारा में नहीं है जिसका वह हकदार है। क्योंेकि उसकी वकालत के लिए हमारे पास बड़े आलोचक नहीं है। 

मित्रों! हमारी वरिष्ठ पीढ़ी ने, हमारे वरिष्ठ आलोचकों-रचनाकारों ने नवगीत को स्थापित किया, उसको विकसित किया, उसका इतिहास रचा और यह सब करते-करते वह अब अवसान की ओर जा रही है। समय के ऐसे मोड़ पर हमारी दृष्टि अब अपनी युवा पीढ़ी पर टिकी हुई है। मेरा अनुरोध है युवा पीढ़ी से कि वह नवगीत लेखन के साथ-साथ आलोचना के क्षेत्र में भी प्रवेश करें। हमारी युवा पीढ़ी बड़ी-बड़ी डिग्रियां लेकर नवगीत के क्षेत्र में अवतरित हुई है। मेरा संकेत श्री अवनीश सिंह चौहान, डॉ0 जय शंकर शुक्ल और मनोज जैन मधुर जैसे नवगीतकारों की ओर है। डॉ0 राजेन्द्र गौतम और नचिकेता जी एक आलोचक के रूप में जाने जाते है और डॉ0 सुरेश गौतम को कौन नहीं जानता। नचिकेता जी से अभी बड़े-बड़े निर्णयात्मक शोध कार्य होने की संभावनाएं हैं। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि चुनौतियों का सामना एकजुट होकर ही किया जा सकता है। छोटी-छोटी प्रतिक्रियात्मक बातों को भूल कर अब हमें गम्भीर हो जाना चाहिए।



[ श्रेणी : आलेख । वीरेंद्र आस्तिक ]