'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

दिन खनकता है / ओम निश्चल

दिन खनकता है
सुबह से शाम कंगन-सा।


खुल रहा मौसम
हवा में गुनगुनाहट और नरमी
धूप हल्के पॉंव करती
खिड़कियों पर चहलकदमी
खुशबुओं-सी याद
ऑंखों में उतरती है
तन महकता है
सुबह से शाम चंदन-सा।

मुँह अँधेरे छोड़ कर
अपने बसेरे
अब यहॉं तब वहॉं चिड़ियॉं
टहलती हैं दीठ फेरे
तितलियों-से क्षण
पकड़ में पर नहीं आते
मन फुदकता है
सुबह से शाम खंजन-सा।

चुस्कियों में चाय-सा
दिन भी गया है बँट
दोपहर के बाद होती
खतों की आहट
रंग मौसम के सुहाने
लौट आए हैं
लौटता अहसास फिर-फिर
शोख बचपन-सा।
दिन खनकता है
सुबह से शाम कंगन-सा।



[ श्रेणी : नवगीत । ओम निश्चल ]