'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

एकलव्य से संवाद-2 / अनुज लुगुन

हाँ, एकलव्य !
ऐसा ही हुनर था ।

ऐसा ही हुनर था
जैसे तुम तीर चलाते रहे होगे
द्रोण को अपना अँगूठा दान करने के बाद
दो अँगुलियों
तर्जनी और मध्यमिका के बीच
कमान में तीर फँसाकर ।

एकलव्य मैं तुम्हें नहीं जानता
तुम कौन हो
न मैं जानता हूँ तुम्हारा कुर्सीनामा[1]
और न ही तुम्हारा नाम अंकित है
मेरे गाँव की पत्थल गड़ी[2] पर
जिससे होकर मैं
अपने परदादा तक पहुँच जाता हूँ ।

लेकिन एकलव्य मैंने तुम्हें देखा है।

मैंने तुम्हें देखा है
अपने परदादा और दादा की तीरंदाज़ी में
भाई और पिता की तीरंदाज़ी में
अपनी माँ और बहनों की तीरंदाज़ी में
हाँ एकलव्य मैंने तुम्हें देखा है
वहाँ से आगे
जहाँ महाभारत में तुम्हारी कथा समाप्त होती है

शब्दार्थ:
↑ वंशावली
↑ मुण्डा लोग अपने पूर्वजों के नाम पत्थर पर खोदते हैं

[ श्रेणी : कविता। लेखक : अनुज लगुन ]