'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

लालच की सजा / बलराम अग्रवाल

बलराम अग्रवाल 
पात्र
  • पात्र 1 - साधु महाराज व धनीराम
  • पात्र 2 - एक किशोरी-गायिका व मिसरी की माँ
  • पात्र 3 - एक किशोर-गायक व मिसरी
  • किशोर 1
  • किशोर 2
  • किशोर 3
  • किशोर 4

पहला दृश्य


मंच पर अंधकार है। नेपथ्य से संगीत का स्वर उभरना शुरू होता है। उसके साथ धीरे-धीरे प्रकाश फैलना प्रारम्भ होता है और एक साधु महाराज के पीछे गाते-बजाते चलते एक स्त्री और एक युवक गायक का प्रवेश होता है। गीत गाते हुए वे तीनों मंच पर घूमने लगते हैं। इन तीन पात्रों से ही निर्देशक को धनीराम , मिसरी व उसकी माँ का अभिनय भी कराना है। वे डफली, मंजीरा आदि बजा-बजाकर गीत गा रहे हैं -

लालच बुरी बलाय रे भैया लालच बुरी बलाय।

लालच मन को खाय रे भैया लालच तन को खाय।।

लालच खाए दीन-धरम को

लालच खाए किए करम को

लालच नाम डुबाय रे भैया जग में हँसी कराय।

लालच बुरी बलाय रे भैया लालच बुरी बलाय।

लालच मन को खाय रे भैया लालच तन को खाय।।

एकांकी के किशोर 1, 2, 3 व 4 पात्र दर्शकों के बीच इधर-उधर अलग-अलग जगहों पर बैठाए जाएँगे। इस गीत के समाप्त होते-होते दर्शकों के बीच बैठे ये पात्र खड़े होकर बोलते हैं -

किशोर 1 - अजी गीत ही गाते रहोगे महाराज या नाटक को कुछ आगे भी बढ़ाओगे?

महाराज - यह गीत भी नाटक का ही हिस्सा है भाई। बीच में खड़े होकर टोका-टाकी मत करो। बैठकर चुपचाप देखते रहो।

किशोर 2 - लालच-वालच से हटकर कुछ बातें अकल की भी सुना दो महाराज।

किशोर 3 - दुनिया में सब के सब लालची नहीं हैं महाराज। बहुत-से लोग अक्लमंद भी हैं।

महाराज - ठीक है भाई। अक्ल से जुड़ी चीज भी आपको सुनाते हैं। (गायकों से) ...शुरू करो भाई।

महाराज के साथ वाले किशोर-किशोरी अपनी-अपनी डफली और मँजीरा बजाना शुरू करते हैं।

किशोर 4 - ये डफली मँजीरा छोड़ो पण्डित जी। हम लोग भजन-कीर्तन सुनने के लिए यहाँ नहीं आए। नाटक देखने आए हैं, नाटक दिखाओ।

महाराज - गीत-संगीत भी नाटक का जरूरी हिस्सा होते हैं भाई। इनसे इतना मुँह न मोड़ो।

किशोर 1 - निरे गीत-संगीत ने मंच को कितना छिछोरा बना डाला है, यह हम अपने घर के टी. वी. में रोजाना नहीं देखते हैं क्या?

महाराज - कहते तो ठीक हो। मैं तुम्हारी बात समझ गया। लेकिन मेरा यह गीत-संगीत तो एक भूमिका थी उस कथा की जिसे मैं आपको सुनाने जा रहा हूँ। लेकिन आप सब कथा-कहानी सुनने तो आए नहीं हैं। आप तो नाटक देखने आए हैं। इसलिए सिर्फ सुनाऊँगा नहीं, घटित होता दिखाऊँगा। एक गाँव में मिसरी नाम का एक गरीब और भोला-भाला लड़का अपनी विधवा माँ के साथ रहता था। उसी गाँव में धनीराम नाम का एक लालची और बेईमान ठाकुर भी रहता था।

यह संवाद बोलते-बोलते मंच पर प्रकाश धीमा होता जाता है और दृश्य परिवर्तन होता है। कथावाचक धनीराम का रूप धारण कर लेता है और उसके साथ वाले किशोर गायक व गायिका गरीब लड़के मिसरी और उसकी माँ धनिया की भूमिका में आ जाते हैं । धनीराम मिसरी की माँ से बातें कर रहा है।

दूसरा दृश्य


धनीराम - देख धनिया, गाँव का मुखिया हूँ तो गाँव वालों के सुख-दुरूख की जिम्मेदारी भी मेरी ही है। तेरा बेटा, ये मिसरी, माना कि अभी छोटा है लेकिन इतना छोटा भी नहीं है कि कुछ कर ही ना सके।

धनिया - क्या काम करवाओगे इस भोले-भाले बालक से?

मिसरी (धीरे से) - अम्मा, असलियत में तो मुझे स्कूल जाने से रोकना चाहता है यह।

धनीराम - क्या कह रहा है बेटा?

धनिया - तुम्हारे बारे में नहीं बोल रहा। तुम काम क्या करवाओगे, यह बताओ।

धनीराम - भई, काम क्या पत्थर उठवाऐंगे इससे? हल्का-फुल्का ही बताएँगे कुछ।

धनिया - बताओ फिर।

धनीराम - भई, बात ये है कि बिना काम कराए तेरी कुछ मदद करूँगा तो ना तो तेरा मन उस मदद को मानेगा न मेरा। बिना मेहनत की कमाई का भोग लगाओ तो भगवान भी बुरा मानते हैं, है न।

धनिया - सो तो है।

धनीराम - वो सामने देख। मेरे घर में पाँच भैंसें हैं। मिसरी सुबह-सुबह इन्हें जंगल में चराने को ले जाए और शाम को वापस यहाँ लाकर बाँध दे। रात को इनके खाने के लिए चारा-पानी इनके सामने रख जाय, अपने घर जाकर सो जाय, बस।

धनिया - मजदूरी क्या दोगे?

धनीराम - मजदूरी? भई मजदूरी भी देंगे। मुफ्त में तो किसी से सड़क पर गिरा रुपया भी ना उठवाऊँ मैं।

मिसरी - रुपया क्या, तुम तो दस पैसे का एक सिक्का भी ना गिरने दो सड़क पर।

धनीराम (मिसरी की बात को अनसुना करते हुए) - हँ-हँ... कुछ कहा बेटे ने?

धनिया - कुछ नहीं। इसकी तो आदत है बैठे-बैठे कुछ बोलते रहने की।

धनीराम - तो बात पक्की?

धनिया - मजदूरी नहीं बताई आपने?

धनीराम - भई, ऐसा करते हैं कि पाँच में से उस बड़े कद वाली एक भैंस का दूध सुबह-सुबह तेरा। मंजूर है?

धनिया - नहीं।

धनीराम - तो?

धनिया - किसान की बेटी हूँ ठाकुर। इतना तो जानती ही हूँ कि ज्यादा उम्र की भैंस ज्यादा दूध नहीं देगी।

धनीराम - अरे भई, मैंने बड़े कद वाली भैंस कहा था, बड़ी उम्र वाली भैंस नहीं कहा।

धनिया - जो भी कहा हो। मुझे उस छोटे कद वाली भैंस का दूध चाहिए मजदूरी के बदले में।

धनीराम (हिचकते हुए) - उसका ले लेना।

धनिया - एक बात और।

धनीराम - क्या?

धनिया - सुबह-शाम दोनों वक्त का दूध चाहिए।

धनीराम - भई, ये तो उँगली पकड़ते-पकड़ते पौंहचा जकड़ने वाली बात हुई। काम कर या मत कर। दूध तो बस एक ही वक्त का मिलेगा, वो भी सुबह का।

धनिया - सोच लो।

धनीराम (दबे हुए स्वर में) - सोचना क्या? अब तू जिद ही पकड़ रही है तो भई, चाहे नुकसान हो जाए, लेकिन मदद तो तुझ गरीब की करनी ही है। लेकिन उस एक ही भैंस का दूध देना तय है, सोच ले। वह कम दे, ज्यादा दे, ना दे - सब तेरे भाग्य पर निर्भर है।

धनिया - ठीक है। कल सुबह से मिसरी अपना काम शुरू कर देगा।

मिसरी - अम्मा, सुबह से दोपहर तक तो मैं स्कूल में रहता हूँ।

धनिया - तू सुबह-सुबह इसकी भैंसों को जंगल में छोड़कर स्कूल चले जाया करना। दोपहर तक उनकी देखभाल मैं कर लिया करूँगी।

मिसरी - तब ठीक है।

धनीराम - तो कल सुबह से तय रहा। लेकिन दूध परसों सुबह से मिलना शुरू होगा। भई, इन भैंसों की चराई के बाद ही तो दूध पर तुम्हारा हक बनेगा?

धनीराम के इस संवाद के साथ ही प्रकाश के धीमा होते हुए दृश्य का लोप हो जाता है। बढ़ते प्रकाश के साथ ही मंच पर धनीराम , धनिया और मिसरी बैठे दिखाई देते हैं।

तीसरा दृश्य


धनिया - ठाकुर साहब, एक बात समझ में नहीं आ रही।

धनीराम - कौन-सी बात?

धनिया - मिसरी का बापू जब जिन्दा था तो बताता था कि ये पाँचों भैंसें सुबह-शाम दस-दस किलो दूध देवें थीं। जंगल में इन्हें चराकर लाने का जिम्मा मिसरी को मैंने इसी उम्मीद में दिलाया था कि खुली घास खाके इनके दूध में बढ़ोत्तरी होवेगी। कुछ दूध हम माँ-बेटे पी लेंगे, कुछ बाजार में बेचकर पैसे कमा लेंगे।

धनीराम - तो?

धनिया - तो यह कि दूध में बढ़ोत्तरी तो हुई लेकिन केवल आपके हिस्से की भैंसों के। मेरे हिस्से वाली भैंस शाम को तो ठीक-ठीक दूध देती है लेकिन सुबह का इसका दूध घट रहा है !!

धनीराम - भई, पाँचों भैंसों को एक ही जंगल में तेरा बेटा खुद ले जावे है। रात को चारा भी खुद डालकर जावे है। अब कौन-सी भैंस कितनी घास चर रही है और कौन-सी मटरगस्ती में और सोने टैम बिता रही है, मैं क्या जानूँ। मैं तो कभी उनके पीछे-पीछे जाता नहीं हूँ।

धनिया - कुछ न कुछ गड़बड़ तो है।

धनीराम - भई, जंगल में तो तेरा बेटा रहता ही है इनके साथ। रात में ये मेरे घर में रहती हैं। तुझे मेरी नीयत पर शक है तो किसी दिन खुद आकर देख ले मेरे घर में।

धनिया - वो तो मैं देखूँगी ही। और कान खोलकर सुन लो ठाकुर, अगर कोई गड़बड़ मैंने पकड़ ली तो तुम्हारे खिलाफ पंचायत बैठाकर अपने हिस्से की भैंस अपने घर में बाँध लेने की फरियाद करूँगी मैं।

मिसरी - वह भी हमेशा के लिए।

धनीराम - तो तुम दोनों को वाकई शक है मुझ पर?

धनिया - नहीं जी, आप तो अन्नदाता हैं हमारे। आप पर शक करूँगी मैं? मैं तो अपने मन की बात आपको बता रही थी। लगता है, मेरे भाग्य में ही कुछ खोट है जो इतनी अच्छी भैंस कम दूध दे रही है। मिसरी, बेटा ले जा इन भैंसों को जंगल में चराने।

मिसरी बिना कुछ कहे उठता है और भैसों को खूँटों से खोलकर जंगल के लिए हाँक ले जाने का अभिनय करता हुआ मंच के दाएँ भाग की ओर से चला जाता है। धनिया भी उठकर चली जाती है।

धनीराम (अपने आप से) - माँ-बेटा गरीब हैं लेकिन हैं तेज-तर्रार। मुझे लगता है कि आज से मेरी जासूसी जरूर करने लगेंगे ये लोग। ( यह बोलता हुआ वह अपनी जगह से उठता है और आगे बोलता है) लेकिन मेरी चालाकी को पकड़ना इनके वश की बात नहीं है। रात को उसके हिस्से की भैंस को इतना पानी पिला देता हूँ कि घास वह बेचारी खा ही नहीं पाती। इसीलिए तो सुबह को दूध कम देने लगी है। ही...ही...ही...।

यों बोलता हुआ अपनी चालाकी पर वह ही-ही करके हँसता है और जिस दिशा में मिसरी और उसकी माँ निकले थे उसी ओर निकल जाता है। मंच की दूसरी दिशा से भैंसों को हाँककर लाते हुए मिसरी प्रवेश करता है।

मिसरी (दर्शकों की ओर) - बड़ा चालू बनता है ठाकुर। हमारे घर की मदद करने के बहाने स्कूल जाना छुड़वा देना चाहता था मेरा। दूसरी चालाकी वह क्या कर रहा है, वह भी माँ ने मुझको समझा दिया है। आज से उसकी भैंसों का भी वही इलाज शुरू। इनको इस तालाब में छोड़ देता हूँ। शाम तक ये इसी में लेटेंगी, बैठेंगी और डटकर पानी पिएँगी। आज से दिन में मिलने वाली इनकी घास बन्द। केवल मेरे हिस्से वाली भैंस खाएगी घास। ( यों कहकर वह चार भैंसों को तालाब के पानी में उतार देता है) चलो-चलो, ठाकुर के हिस्से वाली तुम चारों भैंसें चलो पानी में। चलो-चलो।

उसी दौरान धनिया भी वहाँ पहुँच जाती है।

धनिया - बिल्कुल ठीक। दो-चार दिन में जब ये भैंसें भी कम दूध देना शुरू कर देंगी, तब आएगी उसे अकल। अब तू स्कूल जा बेटा। इनकी देखभाल मैं कर लूँगी।

मिसरी चला जाता है। धनिया भैंसों की देखभाल के लिए वहीं रुक जाती है और बीच-बीच में भैंसों को पानी से बाहर आने से रोकती भी जाती है।

धनिया - चलो-चलो...तालाब में ही रहो तुम चारों। चलो-चलो।

इस दृश्य को प्रकाश व्यवस्था के द्वारा तीन-चार बार दोहराकर यह दर्शाया जाता है कि ऐसा करते हुए तीन-चार दिन बीत गए हैं। अन्तत : प्रकाश धीमा होते-होते मंच पर अंधकार व पुन : प्रकाश के साथ ही दृश्य बदलता है।

चौथा दृश्य


धनीराम , धनिया और मिसरी बैठे हैं।

धनीराम - भई, मैंने यह बताने के लिए तुम दोनों को बुलाया है कि तीन-चार दिनों से भैंसें दूध बहुत कम देने लगी हैं। मुझे सच-सच बताओ कि इसमें तुम लोगों की तो कोई चाल नहीं है?

धनिया - अगर हमारे हिस्से की भैंस का दूध कम होने में आपकी कोई चाल नहीं थी, तो आपके हिस्से की भैसों का दूध कम होने में हमारी चाल कैसे हो सकती है ठाकुर?

धनीराम - और अगर मैंने कोई चाल चली हो तो?

मिसरी - तो हमने भी चाल चली है।

धनीराम - कौन-सी चाल चली है?

धनिया - वही, जो तुमने चली है।

धनीराम - भैंस का पेट पानी से भर देने वाली? (यह कहते ही अपने मुँह को अपनी हथेली से बन्द करता है) अरे बाप रे, यह मेरे मुँह से क्या निकल गया?

धनिया - जो सही था, वही निकला है। तुमने शर्त तोड़ दी ठाकुर। आज से अपने हिस्से की भैंस को मैं अपने दरवाजे पर बाँधूँगी। नहीं मानोगे तो पंचायत में जाऊँगी।

धनीराम - ठीक है बाबा, अपने हिस्से की भैंस को तुम अपने साथ ले जाओ। हे भगवान, बैठे-बिठाए गाँव के एक परिवार का भरोसा खो दिया मैंने। ( यों कहकर धनिया के हिस्से की भैंस की रस्सी खोलकर उसके हाथ में थमा देने का अभिनय करता है) ये ले धनिया, यह भैंस आज से तेरे दरवाजे पर बँधेगी।

धनिया - नहीं ठाकुर। तुम्हें अपनी करनी पर पछतावा है तो इसे यहीं बँधी रहने दो। लेकिन तुमने अगर फिर से...

धनीराम - तौबा-तौबा।

धनिया - तब ठीक है।


धनिया की बात के साथ ही धीरे-धीरे मंच पर अँधेरा छाने लगता है और नेपथ्य से पुनः शुरुआत वाला गीत उभरने लगता है। मंच पर पूर्ण अंधकार के बाद पुनः प्रकाश होने लगता है। दर्शक देखते हैं कि गायक-मंडली पहले की तरह ही गीत गाती हुई मंच पर विचर रही है -

लालच खाए दीन-धरम को

लालच खाए किए करम को

लालच नाम डुबाय रे भैया जग में हँसी कराय।

दृश्य लोप

[ श्रेणी : नाटक । लेखक : बलराम अग्रवाल ]