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वर्चस्वशाली सत्ताओं के विरुद्ध / मनोज कुमार पांडेय

मनोज कुमार पांडेय 
अखिलेश मेरे प्रिय कथाकार हैं पर संयोग से उनकी जो पहली किताब मैंने पढ़ी थी वह कहानियों की किताब नहीं थी। वह एक अद्भुत संस्मरण पुस्तक थी। जिसका नाम है 'वह जो यथार्थ था'। कहने को तो वह संस्मरणों की किताब है पर रसूल हमजातोव की अमर कृति 'मेरा दागिस्तान' की तरह उसमें दुनिया भर की तमाम बातें समायी थीं। उसमें बचपन पर, धर्म और समाज पर, राजनीति पर, कस्बों की बनावट-बुनावट पर, स्मृतियों पर, रचना प्रक्रिया पर और न जाने किन-किन चीजों पर बेहतरीन टीपें थीं। उसके बाद उनकी 'शापग्रस्त' की कहानियाँ पढ़ीं। सब एक से बढ़कर एक - बेहतरीन कहानियाँ। इसके बाद 'मुक्ति' फिर 'अँधेरा'। अखिलेश ने एक प्रिय अग्रज कथाकार के रूप में कभी भी मुझे निराश नहीं किया। उनकी रचनात्मकता नए नए सिरे से प्रकट होती रही। पर जाहिर है कि मुझे यह भी बताना होगा कि जब मैं उनकी कहानियों को बेहतरीन कह रहा हूँ तो इससे मेरा क्या आशय है या क्यों प्रिय हैं मुझे अखिलेश की कहानियाँ!

पहली वजह तो यही है कि अखिलेश की कहानियाँ बातूनी कहानियाँ हैं... गजब का बतरस है उनमें। वे अपने पाठकों से जमकर बातें करती हैं उसके अपने सबसे प्यारे दोस्त की तरह गलबहियाँ लेकर वे आपको आगे और आगे ले जाती हैं और उनमें उस हर तरह की बात होती है जो दो दोस्तों के बीच घट सकती हैं। (कोई चाहे तो इसे कहानीपन भी कह सकता है।) यही वजह है कि बेहद गंभीर विषयों पर लिखते हुए भी अखिलेश की कहानियाँ जबरदस्ती की गंभीरता कभी नहीं ओढ़ती हैं। पढ़ते हुए कई बार एक मुस्कान-सी ओठों पर आने को ही होती है। क्योंकि उनके यहाँ उनके यहाँ कोई बौद्धिक आतंक, सूचना का कोई घटाटोप या किसी और तरह का बेमतलब का जंजाल चक्कर नहीं काटता कि पाठक कहीं और ही फँसकर रह जाय...

इन कहानियों की एक और खूबी यह भी है कि यह कहानियाँ पाठकों से ही नहीं बात करती चलतीं बल्कि खुद उनके भीतर भी कई तरह के समानांतर संवाद चलते रहते हैं। वे खुद भी अपने चरित्रों से बतियाते चलते हैं, उनके भीतर चल रही उठापटक को अपने अखिलेशियन अंदाज में सामने लाते हुए। क्या है ये अखिलेशियन अंदाज! उसकी पहली पहचान यह है कि वह बिना मतलब गंभीरता का ढोंग नहीं करते बल्कि उनकी कहानियाँ अपने पाठकों को भी थोपी हुई गंभीरता से दूर ले जानेवाली कहानियाँ हैं। उनकी कहानियों का गद्य मासूमियतवाले अर्थों में हँसमुख नहीं है बल्कि चुहल भरा, शरारती पर साथ ही बेधनेवाला गद्य है। उनके गद्य में परसाई जी के आगे की विदग्धता है। उनकी भाषा में एक साथ चुहल और विडंबना का प्रयोग देखने को मिलता है। इस नित नई होती भाषा में जब जब उनके गतिशील चरित्र प्रकट होते हैं जो बाहर की दुनिया में तो गतिशील होते ही हैं उनके भीतर भी अनेक रसायनिक अंतर्कियाएँ एक साथ चलती रहती हैं। यही वजह है कि उनकी कहानियों में सारे बदलाव वर्णन या कथाकार के नैरेशन में नहीं प्रकट होते बल्कि चरित्रों के रोजमर्रा के जीवन में प्रकट होते हैं। जहाँ हार जीत या टूटने या समृद्ध होते जाने की प्रचलित आसानियों से अलग कहानियों की दुनिया सामने आती है जिनमें अवध का ही नहीं समूचे हिंदी प्रदेश का लोकवृत्त भी है, परंपरा भी है, उसका प्रत्याख्यान भी है, संघर्ष और उत्पीड़न की जातीय स्मृतियाँ हैं, भीतर और बाहर की बहुरंगी मायावी सत्ताएँ हैं और उनसे परत दर परत आमना-सामना है। उनकी कहानियों में कुछ भी एकरैखिक या आसान नहीं है पर जादू यह है कि ये कहानियाँ पाठकों को अपने साथ लेकर चलनेवाली भी हैं। देर और दूर तक।

अखिलेश की कहानियों की ही बात करें तो हम पाते हैं कि वे अपनी संरचना और विषयवस्तु दोनों ही स्तरों पर मानीखेज और कई-कई स्तरों और परतों में अर्थ देनेवाली कहानियाँ हैं। पहले पाठ के समय उनकी ज्यादातर कहानियाँ गहरे अर्थों में राजनीतिक कहानियाँ लगती हैं। जो कि वे हैं भी। अपनी इस भूमिका में उनकी कहानियाँ सत्ता संरचना और उसके तमाम मनुष्यता विरोधी चेहरों को हमारे सामने ले आती हैं। जाहिर है कि ऐसा करते हुए वह सिर्फ राजनीतिक सत्ता के सतही स्तर पर ही नहीं रुक जाते बल्कि सभी वर्चस्वशाली सत्ताओं के विरुद्ध खड़े होते हैं। जाति, वर्ग, पितृसत्ता, वर्ण सहित सभी तरह की सत्ताएँ उनकी कहानियों का विषय बनती हैं। और वे इन सभी असुविधाजनक माने जानेवाले घेरों में घुसकर वहीं से प्रतिरोध का सौंदर्य रचते हैं। इन कहानियों में बदलाव का सपना देखनेवाले कहीं बाहर से नहीं आते बल्कि कहानी के भीतर से ही प्रकट होते हैं। उनके यहाँ प्रतिरोध अकस्मात या अचानक ही नहीं प्रकट होता बल्कि धीरे-धीरे सीझता रहता है... तमाम डरों के बीच चुप्पे प्रतिरोधों का भी एक इतिहास होता है, उनकी स्मृतियाँ होती हैं जो मुक्तिबोध के शब्दों में कहें तो प्रकट होकर विकट हो जाती हैं। जाहिर है कि श्रृंखला, अँधेरा, यक्षगान, ग्रहण और ऊसर या बायोडाटा जैसी कहानियाँ ही राजनीतिक कहानियाँ नहीं हैं बल्कि चिट्ठी, शापग्रस्त, वजूद, जलडमरूमध्य, बड़ी अम्मा, मुक्ति या हाकिम कथा जैसी अनेक कहानियाँ भी उन्हीं अर्थों में राजनीतिक हैं जिन अर्थों में ऊपर की कहानियाँ हैं और हमारे समय की राजनीति के बहुरुपिया चेहरे को सामने लाती हैं। पर राजनीतिक कहानियाँ लिखते हुए अखिलेश अपनी पक्षधरता का कोई शोर नहीं मचाते। इसके बरक्स अखिलेश भीतर धँसते हैं अपने समय में, अपने चरित्रों में, उनकी स्मृतियों में... उनके घात प्रतिघात में, घात प्रतिघात को बढ़ावा देनेवाली और कई बार तो रचनेवाली समय की हिंसक सत्ता संरचनाओं में - तमाम नई-पुरानी सत्ता संरचनाओं में - तब कहीं वजूद या ग्रहण जैसी कहानियाँ मुमकिन हो पाती हैं जिन्हें लिखते हुए अखिलेश जैसे अपने पूरे समय को - उसके भूत और भविष्य सहित - अपनी रचनाशीलता के घेरे में समेट लेते हैं। इनकी कहानियाँ एक तरफ तो पतन की बार-बार कही जानेवाली कहानियाँ कहती हैं तो दूसरी तरफ प्रतिरोध के भी नए नए रास्ते खोजती हैं। 'यक्षगान' की सरोज से ज्यादा उत्पीड़ित कौन होगा, पर वह भी अपना प्रतिरोध दर्ज ही करती है, उस शैली और रूप में नहीं जैसा कि अनेक छिछली राजनीतिक कहानियों में होता है जहाँ कोई चरित्र अचानक हथियार उठा लेने का निश्चय करता है और पूरब पश्चिम उत्तर दक्षिण जहाँ भी सूर्य होता है वह वहीं निकल आता है।

यक्षगान में यह प्रतिरोध सबसे पहले लेखक से ही दर्ज होता है। जनसामान्य का अपने बुद्धिजीवी से प्रतिरोध जिनकी तरफ वह आँखें उठाकर देखता और हताश होता है कि कैसे लेखक विचारक हैं आप... बार-बार जनता की बात करते हैं और जनता का आपको पता ही नहीं है! ये ऐसे ही नहीं हो जाता है। इसलिए हो पाता है क्योंकि अखिलेश अपने चरित्रों का पीछा करते हैं, हाथ पकड़कर उनके साथ-साथ चलते हैं, उनके आगे दौड़ते हैं, हर तरह से धँस जाते हैं अपने चरित्रों के भीतर... पर उनका लेखक उनसे एक दूरी भी बनाए रखता है - उनकी स्वाभाविकता को नष्ट किए बिना उनकी स्मृतियों में, उनकी रोजमर्रा में, उनके सुख-दुख में - तभी वे किसी प्यार करते हुए युवा के भीतर बिजली के तारों के लड़ने की सनसनाहट देख पाते हैं तो वहीं दूसरी तरफ किसी दुखिया की चमड़ी के भीतर के वे निशान भी देख लेते हैं जो खुली आँखों से देख पाना अच्छे-अच्छे दीदावरों के लिए भी मुमकिन नहीं होता। सुखद है कि अखिलेश की कहानियाँ ऐसा किसी भविष्यद्रष्टा होने या किसी तीसरी आँख का शोर मचाए बिना करती हैं।

सत्ता का घातक तंत्र अखिलेश की कहानियों में सदा से मुद्दा बनता रहा है। उनकी एक बेहद चर्चित कहानी चिट्ठी की बात करें तो जब उनकी इस कहानी का एक पात्र बार बार मार साले को चिल्लाता है तो वह व्यवस्था की जघन्यता को ही लक्ष्य कर रहा होता है। श्रृंखला में तो वह सीधे सीधे सत्ता के अबूझ तंत्र को डिकोड करने की तरफ बढ़ते हैं। यहीं पर यह भी चिह्नित किया जाना चाहिए की यथार्थ के अन्वेषण का उनका अपना तरीका है। राजनीतिक कहानियों के प्रचलित लोकप्रिय फार्मूले से नितांत अलग वह अपने लिए खासे देसी शिल्प और कहन की खोज करते हैं। उनके शिल्प में एक उलटबाँसी है जो उन्हें कबीर की परंपरा से जोड़ती है। तभी चीजों के संक्षिप्तीकरण के इस समय में वह उन्हें उनके पूरे नाम से पुकारने की बात कर पाते हैं। सूचना क्रांति और सब कुछ सूचनाओं तक सिमट जाने के इस युग में वह ज्ञान का सवाल उठाते हैं। और इस तरह बहुत सारी नकली, पर घातक और फरेबी सत्ता-संरचनाओं को तार तार करते हैं और यह काम भी अखिलेश के ही बूते का है कि इसके लिए वह किसी भांडाफोड़ शैली का सहारा नहीं लेते। तभी घूसखोरी और कमाऊ कुर्सी पर जमे रहने के इस युग में उनका नायक सायास तरीके से सस्पेंट होने की तरफ बढ़ता है तो वजूद का नायक इस दारुण समय में सुखी होने की सबसे जरूरी शर्त मनचाहे पैसे को लात मारता है और उसका ये लात मुखिया को जा लगता है। यहीं पर अखिलेश की कहानियों के संदर्भ में एक और महत्वपूर्ण बात रेखांकित की जा सकती है कि तब क्या होता है जब वह अपने समय के कुछ जरूरी और बहस-तलब सवालों को उठाते हैं। वजूद की ही बात करें तो वह पेटेंट जैसे मसले को भी उठाती है, इस रूप में भी कि जब बाजारवाद नहीं था तब इस सवाल की क्या स्थिति थी? कि जो रामबदल किसी वैद जी के लिए जड़ियाँ-बूटियाँ खोजकर लाता है उनसे वह खुद अपना या अपने परिवारवालों का इलाज नहीं कर सकता। वैद जी को ये मनमाना पेटेंट हमारी सामाजिक व्यवस्था ने दिया था। पर इस इतने बड़े सवाल को अपनी कहानी में रचते हुए वह सहज ही बने रहते हैं। वह अपने किस्सागो की ताकत पर से भरोसा नहीं खोते।

किसी बड़े लेखक की पहचान आखिर कैसे की जा सकती है! क्या यह मानक ठीक है कि उसकी रचनाओं में से उसके समय को पढ़ा जा सकता है या नहीं। इस लिहाज से भी अखिलेश की कहानियों का पाठ किया जा सकता है। अखिलेश की कहानियों में देखें तो आपातकाल के बाद का समाज उनमें बहुत आसानी से लक्षित किया जा सकता है। खासतौर पर उनके कहानी संग्रह 'मुक्ति' में। जब विकल्प सत्ता से भी बड़ा प्रहसन सिद्ध हुआ था, और इसी प्रहसन ने सांप्रदायिकता और क्षेत्रीयता को पैर पसारने की जगह दी थी। अखिलेश की उन कहानियों में मध्यवर्ग की एक गहरी रचनात्मक आलोचना दिखती है बल्कि कई बार तो उनका चरित्र चित्रण अतिरेकी स्थितियों की तरफ बढ़ता दिखता था। पहली बार जब मैंने ये कहानियाँ पढ़ी थीं तो लगा था कि अखिलेश मार्क्सवादी रुझान के दबाव में मध्यवर्ग की एक विकृत तस्वीर पेश कर रहे हैं। उनकी इस तरह की कहानियों की आखिरी कड़ी के रूप में 'अगली शताब्दी के प्यार का रिहर्सल' जैसी कहानी को देखा जा सकता है। पर नब्बे के बाद देश और दुनिया में जो परिवर्तन हुए और तथाकथित उदारीकरण की जो आँधी आई उसमें ये कहानियाँ नए सिरे से अर्थवान होने लगीं। बाजारवाद मध्यवर्ग के पारिवारिक जीवन का क्या हाल करनेवाला है यह अखिलेश एकदम शुरुआती समय में ही देख पा रहे थे। और इसे अपनी कहानियों में ला भी रहे थे।

यह आश्चर्यजनक नहीं है कि मध्यवर्गीय विडंबना और बदलाव की हिंदी की दो बेहतरीन कहानियाँ 'शापग्रस्त' और 'जलडमरूमध्य' अखिलेश की कलम से निकली हैं। जो प्रस्तुत संग्रह में संकलित भी हैं। शापग्रस्त का नायक या प्रतिनायक प्रमोद वर्मा अपने भीतर के घनघोर आत्मसंघर्ष में मुक्तिबोध की क्लासिक कविताओं के नजदीक जा खड़ा होता है तो 'जलडमरूमध्य' उत्तर-उदारीकरणवाले युग की दिशाहीनता और सब कुछ अर्थवाले समय का दहलानेवाला वृत्तांत है। जहाँ हर तरह के रिश्ते-नाते, उम्र, भावनाएँ और सभी कुछ का संबंध स्वार्थ की कसौटी पर चढ़ा दिए गए है। अखिलेश की कहानियाँ पढ़ते हुए हम पाते हैं कि भारतीय समाज का नब्बे के बाद जो स्वरूप बदला है जो उसमें नए परिवर्तन हुए हैं या हो रहे हैं, अखिलेश की कहानियाँ उसका एक विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत करती हैं। उनके तीसरे कहानी संग्रह 'शापग्रस्त' से गुजरें तो उसकी अनेक कहानियों में एक तरफ तो मध्यवर्ग की लिप्सा या स्वार्थपरता के सच्चे दृश्य हैं। एक हद तक ये कहानियाँ मध्यवर्ग से नाउम्मीदी की कहानियाँ हैं। पर एक हद तक ही - बाकी जब तक शापग्रस्त के प्रमोद वर्मा का भीषण आत्मसंघर्ष है तब तक मध्यवर्ग से पूरी तरह से नाउम्मीद कैसे हुआ जा सकता है! पर इस आत्मसंघर्ष की सीमाएँ हैं जो अखिलेश को अँधेरा या उसके बाद की कहानियों की तरफ ले जाती हैं, जहाँ अन्याय है तो उसके बरक्स रचा जानेवाला प्रतिरोध भी। इसीलिए अखिलेश की कहानियों में कलात्मक न्याय जैसी चीजें न के बराबर ही मिलती हैं। उनका प्रतिरोध एक तरफ तो उत्पीड़न और प्रतिरोध की जातीय स्मृतियों से जुड़ता है तो दूसरी तरफ व्यक्तिगत स्मृति में भी उसकी एक सघन जमीन मिलती है। इसी लिए उनकी कहानियाँ अपने चरित्रों के व्यक्तित्व की गरिमा का हनन किए बिना सामूहिकता की कसौटी पर भी खड़ी मिलती हैं। तभी वजूद का नायक समय के सारे दबावों को ठुकराता हुआ अपनी स्मृतियों के साथ न्याय करने का फैसला कर पाता है

और भी कई वजहें हैं जो इन कहानियों को खास बनाती हैं। जैसे युवाओं की एक पूरी दुनिया है उनकी कहानियों में। उनकी ऐसी कहानियाँ ढूँढ़ने पर भी नहीं मिलतीं जिनमें युवा चरित्रों की सशक्त उपस्थिति न हो। यह भी देखना सुखद है कि ये युवा किसी खास साँचे में ढले नहीं मिलते। वे बाजारवाद के शिकार के रूप में भी है तो उससे लड़ते और हारते-जीतते भी। राजनीति में घुसने को बेताब और उसके लिए हर तरह के छल-छद्म को तत्पर ऊसर या बायोडाटा के युवाओं को देखकर गुस्सा नहीं आता, छोभ होता है। अपनी इस घृणित परिणति के लिए ये युवा कतई जिम्मेदार नहीं हैं। तो कौन है जिम्मेदार? कौन है जिसे चिट्ठी का एक तेजस्वी युवा कहता है कि मार साले को...। यह भी सुखद है कि आखिलेश की कहानियों में निम्नवर्गीय चरित्रों की नए सिरे से वापसी हो रही है। इसी के साथ साथ उनके मुख्य चरित्र हाशिए की अस्मिताओं से आ रहे हैं। इस लिहाज से उनके चौथे कहानी संग्रह 'अँधेरा' की सभी कहानियों को महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। जहाँ दलित, मुसलमान या स्त्रियाँ उनकी कहानियों में केंद्रीय जगह पाती हैं। जाहिर है कि ये कहानियाँ समूची हिंदी कहानी को एक लोकतांत्रिक विस्तार दे रही हैं। सिर्फ चरित्रों की उपस्थिति के ही नजरिए से नहीं बल्कि अपनी प्रतिरोधी चेतना की वजह से भी, बल्कि कहानियों में पाठकों और चरित्रों के लिए एक अवकाश की वजह से भी और सत्ता के रहस्य को तार तार करने कि लिहाज से भी, जैसा कि श्रृंखला का नायक ही नहीं करता, चिट्ठी के वह चरित्र भी करता है जो ऐसे ही हवा में किसी अदृश्य दुश्मन को सूँघता है और कहता है कि मार साले को... बार-बार।

पर ऊपर की बातों से इतर भी अखिलेश के कथाकार का एक चेहरा है। वह भाषा के भीतर प्रेम और प्रतिरोध के सौंदर्य की खोज के कहानीकार हैं। इस खोज में वह बहुत पीछे तक भी जाते हैं... मनुष्यता के आदिम इतिहास तक। अँधेरा की रुलाई या वजूद की सम्मोहक खुशबू कोई आज की नहीं है। न ही मनुष्यता के श्रम का इतिहास नया है। वह वहीं से अनेक ताजे-टटके बिंबों की रचना करते हैं। उनकी कहानियाँ अपनी संरचना में जटिल होने के बावजूद भी इसीलिए इतनी अपनी और आसान लगती हैं क्योंकि वह मनुष्यता के समूचे इतिहास से अपनी रसद लेती हैं। इस इतिहास के सच और झूठ दोनों उनके यहाँ आते हैं। वह उस लोक को भी पहचानते हैं जो मिथक गढ़ता है... डरवश, मक्कारीवश या फिर ऐसे ही अपने आनंद के लिए। पर उनकी ताकत यह है कि वह लोक के प्राचीन मिथकों को ही नहीं, मनुष्यविरोधी सत्ताओं द्वारा गढ़े जा रहे आधुनिक मिथकों को भी बखूबी पहचानते हैं और उनका तोड़ रचते हैं। वह हवा और पानी का आदिम स्पर्श पहचानते हैं। इसीलिए वह उन्हें अपने चरित्रों के भीतर देख पाते हैं, रच पाते हैं - कई बार वह यथार्थ भी जो अभी घटित होनेवाला है। वह भावी यथार्थ को रचनेवाले कथाकार हैं।

[श्रेणी : आलोचना। लेखक : मनोज कुमार पांडेय ]