'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

बल्लू हाथी का बालघर / दिविक रमेश

दिविक रमेश 
पात्र
  • शेर : जंगलपति
  • खरगोश : मंत्री
  • बल्लू हाथी : एक बूढ़ा हाथी
  • भालू, बंदर, लोमड़ी, चील आदि : सामान्य जानवर
  • भालिन :  भालू की पत्नी
  • जानवरों के बच्चे : लोमड़ी, गधा, बंदर आदि

दृश्य एक

जंगल का दृश्य। जानवरों की सभा। चील, चूहे और मक्खियों जैसे प्राणी भी मौजूद। शेर जंगलपति के आसन पर। खरगोश मंत्री के स्थान पर। कुत्ते रक्षकों के रूप में खड़े हैं। जानवर मुंह हिला-हिलाकर बातचीत करने की मुद्रा में लीन। विचार-मग्न भी। इसी दौरान एक थका-हारा बूढ़ा हाथी वहां पहुंचता है और चुपचाप सबसे पीछे बैठ जाता है। हर जानवर के बोलने के लहजे में उस जानवर की आवाज का हल्का-सा अभिनय।

शेर : तो आज हमने बहुत सी समस्याएं सुलझा ली हैं। मुझे आशा है कि मिलजुलकर जो भी निर्णय यहां लिए गए हैं उनका सभी जानवर पालन करेंगे। प्रजातंत्र का सच्चा संदेश यही है।

जानवर : हम पालन करेंगे। हम पालन करेंगे।

शेर : पालन न करने वाले को कड़ी से कड़ी सजा दी जाएगी!

जानवर : ठीक है। ठीक है।

शेर : और हां, हमें शिकारी आदमियों का हर तरह से मुकाबला करना होगा। उनके

चंगुल से अपने को बचाए रखना होगा। हमारे दुश्मन लोभी शिकारियों ने हममें

से कितनों ही की तो नस्ल ही खतरे में डाल दी है।

बंदर : आप ठीक कह रहे हैं। चीतल जैसे हमारे कितने ही दूसरे जंगलवासी गिनती के रह गए हैं। चीता तो खत्म ही हो गया है।

शेर : खुद हम शेर भी खतरे में हैं। इसीलिए मेरा फैसला है कि यदि कोई भी जानवर ऐसे

लोभी शिकारियों का साथ देता पाया गया तो उसे मौत की सजा दी जाएगी। बोलो

मंजूर है।

जानवर : मंजूर है। मंजूर है।

लोमड़ी : (मुंह बनाकर ) जरा कुत्तों और हाथियों से तो पूछ लो। मैंने तो उन्हीं को मदद करते पाया है, शिकारियों की। मुझे तो इनकी जात पर जरा भी विश्वास नहीं है।

खरगोश : मुझे यही बात पसंद नहीं है तुम्हारी। किसी कुत्ते या हाथी ने साथ दे दिया तो कोस दिया उनकी पूरी जात को ही। और फिर यह भी देखना चाहिए कि कहीं उनसे डरा- धमका कर या चालाकी से तो काम नहीं लिया गया है। याद रखो किसी एक या कुछ के द्वारा गलत काम करने या हो जाने से पूरी जाति या वर्ग गलत नहीं हो जाता। यदि हम ऐसा सोचेंगे तो हमारी एकता की ताकत को धक्का लगेगा। क्या हमारे ज्यादातर हाथी और कुत्ते अच्छे नहीं हैं ?

बंदर : मंत्री जी जी ठीक कह रहे है। क्यों लोमड़ी, अब भी कुछ कहना है तुम्हें?

लोमड़ी : मैं माफी़ मांगती हूं।

शेर : गलती को मान लेना ही सबसे बड़ी माफी है। हमें खरगोश जी की बुद्धि पर गर्व है। क्यों?

जानवर : हमें खरगोश जी की बुद्धि पर गर्व है।

शेर : ठीक है। कोई और समस्या?... नहीं तो सभा समाप्त की जाएगी। समय भी तो काफी हो गया है।

भालू : एक समस्या है महाराज! आज्ञा हो तो कहूं।

शेर : ( दुःखभरी नाराजगी दिखाते हुए ) ठहरिए भालू भैया। आपको मालूम है कि अब जंगल में राजा की प्रथा खत्म हो चुकी है। तब आप मुझे महाराज क्यों पुकारते हैं? महोदय

कहिए, महामहिम या जंगलपति कहिए। (हंसकर) मुझमें क्यों मेरा राजापन जगाते हो भाई। कहीं जाग गया तो (मजाक में हल्की सी दहाड़)... खैर, आप अपनी समस्या कहिए।

भालू : (विनम्र होकर) समस्या, असल में हम सबकी है, जंगलपति। (रुक कर सबकी ओर देखता है। जानवर जिज्ञासु नजर आते हैं।) हम जब काम पर जाते हैं तो कई बार अपने छोटे बच्चों को छोड़ना पड़ता है। डर लगता है कि कहीं शिकारी उन्हें बहला-फुसला या डरा-धमका कर पकड़ न ले जाएं। यूं भी हमारे बच्चों का यह जन्मसिद्ध अधिकार है कि माता-पिता उनकी अच्छी देखभाल करें।

शेर : हूं। यह समस्या तो मेरी और मेरी शेरनी की भी है।

जानवर : हां, यह समस्या हम सबकी है। घर पर अकेले बच्चे ऊब भी तो जाते हैं। कभी-कभी लड़ाई भी कर बैठते हैं। बच्चे जो ठहरे। कोई देखने-टोकने वाला तो होता नहीं।

खरगोश : महामहिम! मैं तो इस समस्या पर खूब सोचता हूं। मेरे पास एक तरकीब है। पर

डरता हूं कि उसे अमल में लाने के लिए कोई सहयोग नहीं देगा।

शेर : तरकीब तो बताओ!

जानवर : हां हां ! पहले तरकीब तो बताइए।

खरगोश : तरकीब यह है कि एक सुरक्षित स्थान ढूंढ़ा जाए। फिर वहां सब बच्चों को छोड़ा जाए। देखरेख के लिए हम जानवरों में से कोई आगे आए।

शेर : लेकिन क्या सब बच्चे एक साथ रह सकेंगे, लड़ेंगे नहीं? मुझे तो डर है... कहीं एक दूसरे को मार कर खा ही न जाएं। सभाओं की बात दूसरी है... वरना।

खरगोश : यहीं तो हम बड़े मात खा जाते हैं। बच्चों और बड़ों में फर्क होता है। बच्चे मिल-

जुलकर रहना पसन्द करते हैं। लड़ना उन्हें सिखाया जाता है। यूं भी हम जानवर अपनी

ओर से किसी को कुछ नहीं कहते जब तक हमारी जान को ही खतरा न हो।

शेर : यह तो आपने ठीक कहा खरगोश जी। (जानवरों की ओर देखकर) क्या आपको यह तरकीब पसंद है? क्या बच्चों के पास रहकर उनकी देखरेख की जिम्मेदारी लेने को कोई तैयार है? (जानवर एक-दूसरे को देखते हैं पर चुप रहते हैं।) तो क्या मैं समझूं कि खरगोश जी की तरकीब कामयाब नहीं रही। (शेर फिर जानवरों की ओर देखता है। तभी उसकी नजर सबसे पीछे बैठे बूढ़े हाथी पर पड़ती है। शेर आशंका के साथ पूछता है।)

आप कोन हैं? पहले तो कभी आपको देखा नहीं। (सब जानवर पीछे मुड़-मुड़ कर देखते

हैं। हाथी खड़ा हो जाता है।)

बूढ़ा हाथी : हां महोदय! मैं एक दुःखियारा हाथी हूं। बूढ़ा हूं। जंगल में जानवरों की यह सभा

देखी तो मैं भी पीछे बैठ गया। मुझे खरगोश जी की तरकीब ठीक लगी।

शेर : (हैरानी से) लेकिन आप इस जंगल के तो नहीं लगते।

बूढ़ा हाथी : जी। मैं इस जंगल का हूं भी और नहीं भी। मेरी एक लम्बी कहानी है।

शेर : तो पहले हम आपका परिचय चाहेंगे। हम जानते हैं कि बहुत से शिकारी-आदमी हमें पकड़ने के लिए चालाकियां बरतते हैं। हमें उनके जासूसों से सावधान रहना पड़ता है। कहीं...

बूढ़ा हाथी : नहीं महोदय! मैं उन मजबूर हाथियों में से नहीं हूं। मेरा यकीन कीजिए। आज ही

दूर की एक बस्ती से दुःखी होकर किसी तरह बचता बचाता जंगल में आया हूं। मेरा

शिकारियों से कोई वास्ता नहीं है। यहां जंगल में तो बहुत कुछ बदल गया है।

शेर : क्या आप इस जंगल में पहले भी आ चुके हैं?

बूढ़ा हाथी : मैं पैदा ही इस जंगल में हुआ था। बहुत धुंधला-धुंधला याद है। तब मैं बहुत छोटा था। जंगल में शिकारी आदमी आए। मां-बाप ने तो अपनी जान बचा ली। मैं पकड़

लिया गया। वे मुझे पकड़ कर जंगल से दूर ले गए। एक गांव के बड़े से अहाते में

ले जाकर मुझे बांध दिया गया। मुझे अपने मां-बाप और साथी जंगलवासियों की बहुत

याद आई। खाना अच्छा ही नहीं लगता था। मुझे खूब रोना आया। लेकिन आखिर

समझौता करना पड़ा।

शेर : समझौता ?

बूढ़ा हाथी : जी, कब तक भूखा रहता। मुझे प्यार भी दिखाया जाता था और मार भी खानी पड़ती थी। मेरी गर्दन देखिए। (सब जानवर देखते हैं।) ये गड्ढे लोहे की एक चीज के हैं, जिसे आदमी अंकुश कहता है। मैंने अपनी पूरी जवानी अपने मालिक आदमी की सेवा में खपा दी। कभी कोई शिकायत नहीं की। जो मिला खा लिया।

शेर : तब ?

बूढ़ा हाथी : लेकिन अब जब मैं बूढ़ा हो गया और पहले जितना काम करने लायक नहीं रह गया तो मुझे ज्यादा सताया जाने लगा।

शेर : वह कैसे?

बूढ़ा हाथी : एक से एक जुल्म किए गए मुझ पर। आप पूछते हैं तो बताता हूं। यूं सोच कर भी कांप उठता हूं। एक बार मुझ पर जरूरत से भीं ज्यादा लकड़ियां लाद दी गईं। मुझसे चला नहीं जा रहा था। कमर टूटी जा रही थी। लेकिन महावत था कि जब देखो तब मेरी गर्दन में अंकुश गाड़ देता। मैं दर्द के मारे भीतर ही भीतर कराह कर रह जाता। जानते हैं न कि महावत भी एक आदमी होता है जो प्यार भी जताता है लेकिन अपना काम निकालने के लिए बेरहम भी हो जाता है। अब क्या क्या बताऊं।

शेर : यह तो आदमी की ज्यादती है। बुढ़ापे का ख्याल तो करना चाहिए था न उसे।

बूढ़ा हाथी : आदमी बहुत स्वार्थी होता है, महोदय। वह केवल अपनी सोचता है। हद तो यह है कि मैंने आदमियों के जंगल में ऐसा भी कुछ देखा जिसे सुनकर आप हैरान होंगे।

शेर : वह क्या?

बूढ़ा हाथी : कुछ आदमी तो अपने ही बड़े-बूढ़ों तक का ध्यान नहीं रखते। उनका अपमान करते है। कभी- कभी तो मारते-पीटते भी हैं। उनके कमजोर शरीर का भी ध्यान नहीं करते। ऐसे आदमियों से भला मैं जानवर क्या उम्मीद करता।

शेर : बड़े बेशर्म हैं ये आदमी। (गुस्से में) आपने ऐसे दुष्टों को रोंद क्यों न डाला।?

बूढ़ा हाथी : क्या करता। मजबूर था। फिर उनका नमक भी खाया था। जिस थाली में खाया

उसी में छेद तो नहीं कर सकता था न? हम जानवरों में एहसान की क्या कीमत

होती है यह तो आप जानते ही हैं। आदमी तो अपने स्वार्थ के आगे अपने सगे तक का एहसान भुला दे।

शेर : यह तो आपने ठीक कहा।

बूढ़ा हाथी : और फिर आदमी चालाक भी बहुत होता है। काम निकालना हो तो चापलूसी भी

खूब कर सकता है। हम जैसे भोले जानवरों के लिए तो थोड़ा सा प्यार ही बहुत

होता है। हम तो प्यार के आगे अपने पर किए जुल्मों को भी माफ कर देते हैं।

मेरे साथ भी ऐसा ही हुआ। कई बार मैं आदमी की चाल में आकर उसे माफ

करता रहा। सताया जाकर भी उसके लिए पेड़ ढोता रहा...

शेर : (घृणा से) धूर्त, स्वार्थी। नासमझ कहीं का। जंगल के पेड़ों तक को बेरहमी से काट डालता है। पेड़ खुद उसके लिए कितने जरूरी हैं, इस बात की भी परवाह नहीं करता।

बूढ़ा हाथी : हां, बस उस आदमी का वह बच्चा बहुत अच्छा था। उसकी बहुत याद आ रही है। कितना प्यार करता था। मैं तो चाहता हूं कि सब आदमी बस बच्चे ही हो जाएं। कितने अच्छे होते हैं बच्चे! चाहे हमारे हों या आदमियों के। वह बच्चा तो बूढ़े आदमी को भी बहुत प्यार करता था। मुझे जब मार पड़ती तो उसे बहुत दुःख होता। मार के बाद वह मेरे पास आता। मेरे सूंड को सहलाता। लिपटता। चूमता। चोरी से लाया चूरमा खिलाता और कहता, 'मैं बहुत छोटा हूं न? इसीलिए तुम्हारी कोई मदद नहीं कर सकता।' किसी के आने की आहट आते ही बेचारा चला जाता।

शेर : आपकी कहानी तो बहुत दुःखभरी है।

(जानवर भी दुःखी हैं।)

बूढ़ा हाथी : दुःख से छुटकारे के लिए ही तो मैंने आदमी का घर छोड़ दिया। (आह भरते हुए)

और किसी तरह जंगल की राह ली। यही सोचा कि आखिरी सांस तो अपनी

शेर : नहीं, आप ऐसा क्यों कह रहे हैं। यह जंगल आपका है। हम सब आपके हैं।

आप हमारे बुजुर्ग हैं। हम आपकी मदद करेंगे। (जानवरों की ओर देखकर)

क्या कहते हैं आप सब?

खरगोश : हां, हम सब मदद करेंगे।

बंदर : मैं भी। मैं हाथी दादा की जूं निकालूंगा।

चील : अरे बुद्धू, जूं तो तुम्हारे शरीर में होती हैं। कभी नहाते भी हो?

(सब जानवर हंसते हैं)

बूढ़ा हाथी : (आंखें खुशी से गीली) चील, तुम बहुत शरारती हो। पर बंदर जी ने ही आप

सबको हंसाया है। उनका शुक्रिया करना चाहिए। मैं तो आप सभी का आभारी हूं।

पर यह भी बता दूं कि मैंने आदमी की कुछ खूबियों को भी जाना है। मैंने वहां

मेहनत करना सीखा है। भिखारियों की, आदमियों के जंगल में भी इज्जत नहीं।

सो मैं मुफ्त की रोटी नहीं तोड़ना चाहता।

शेर : रोटी?

एक जानवर : यह रोटी क्या है हाथी दादा?

बूढ़ा हाथी : बहुत प्यारी चीज है। आदमी इसे अपने हाथ से बनाते हैं। आग में। बस यूं समझो

कि रोटी माने खाना।

बंदर : तो आज से मैं भी खाने को रोटी कहूंगा। (हंसता है) रोटी...रोटी...रोटी

(सब हंसते हैं)

बूढ़ा हाथी : मेरी आपसे यही विनती है कि आप मुझे एक खास काम करने की आज्ञा दें ताकि मैं इज्जत का खाना खा सकूं।

शेर : आप नहीं ही मानते तो हमें मंजूर है। पर वह खास काम है क्या? आपके योग्य भी है कि नहीं?

बूढ़ा हाथी : वही। खरगोश जी की तरकीब वाला। बच्चे मुझे बहुत प्यारे हैं। और बच्चे भी तो

मुझे बहुत प्यार करते हैं। मैं न केवल उनकी देखभाल करूँगा बल्कि उन्हें अच्छी-अच्छी

कहानियां भी सुनाऊंगा। उन्हें अच्छे-अच्छे खेल भी सिखाऊंगा।

शेर : अच्छा!

बूढ़ा हाथी : जब मैं आदमियों के जंगल में था तो मेरा कुछ समय उस स्थान पर भी बीता था वहां जिसे आदमी शहर कहते हैं। मां-बाप काम पर जाने से पहले अपने बच्चों को एक खास स्थान पर छोड़ते थे। क्या नाम था... हां, क्रेश याने बालघर। आपकी आज्ञा हो तो मैं भी कोई सुरक्षित स्थान देखकर बालघर बनाना चाहूंगा। उसमें छोटे ही नहीं, बड़े बच्चे भी आ सकेंगे।

शेर : यह तो बड़ी अच्छी बात है। (खरगोश को देखकर) क्यों मंत्री जी?

खरगोश : हमारी तो समस्या ही हल हो गई, महामहिम! (बूढ़े हाथी को देखकर) हम आपके

आभारी हैं।

जानवर : हम हाथी दादा के आभारी हैं।

शेर : (बूढ़े हाथी से) खरगोश जी कोई अच्छी सी जगह खोजने में आपकी मदद करेंगे। आप जल्दी से जल्दी... वो क्या कहते हैं... हां बालघर... शुरू करने की तैयारी कीजिए। कोई भी कठिनाई हो तो कहिएगा।

जानवर : हम सब आपक साथ हैं।

बूढ़ा हाथी : आप नहीं जानते कि आपने मेरा कितना भला किया है। अब बच्चों के बीच इस बूढ़े का समय खुशी-खुशी कट जाएगा। अपने आदमी मालिक के बच्चे से बिछुड़ने का दुःख भी बंट जाएगा। मैं आपका दिल से आभारी हूं।

खरगोश : नहीं दादा, ऐसा मत कहिए। आप बड़े हैं। आप महान हैं।

बंदर : हाथी दादा, आप अपने बल के लिए मशहूर हैं। तो क्या हम सब आपको बल्लू दादा

कह कर पुकारें?

जानवर : हां हां, आपको हम बल्लू दादा कहेंगे।

बूढ़ा हाथी : क्यों नहीं? क्यों नहीं?

शेर : बोलो बल्लू दादा की जय !

जानवर : जय। बल्लू दादा की जय।

बूढ़ा हाथी : (सूंड उठा उठाकर जय जयकार को रोकने का संकेत करते हुए) लेकिन मेरी एक शर्त भी है। शर्त नहीं बल्कि प्रार्थना ही समझें।

शेर : शर्त? प्रार्थना?

(सब जानवर चौंककर देखते हुए)

बूढ़ा हाथी : प्रार्थना यह है कि आप बड़े अपने झगड़ों को अपने तक ही सीमित रखेंगे। उनमें

बच्चों को नहीं उलझाएंगे।

लोमड़ी : यह कैसे संभव होगा? बच्चे कोई अलग हैं हमसे? हमारी लड़ाई उनकी भी लड़ाई होगी और हमारा प्यार उनका भी प्यार होगा।

बूढ़ा हाथी : यही तो समझने की बात है। बच्चों के दिमाग कोमल होते हैं। उन पर गलत बातों का बहुत जल्दी और बुरा असर पड़ता है। वे सीधे-सच्चे होते हैं। उनकी अपनी दुनिया

होती है।

शेर : आप से क्या बहस की जाए। आप तो ज्ञानी हैं। हमें आप पर पूरा भरोसा है, बल्लू

दादा। लेकिन हमें इतना हक जरूर दीजिए कि जब भी कोई नुकसान होता देखें तो हम

आपसे बालघर को बंद करने की प्रार्थना कर सकें।

बूढ़ा हाथी : बिलकुल ठीक। इसी को समझदारी कहते हैं। बालघर हमारा प्रयोग है।

शेर : धन्यवाद। (सब की ओर देखते हुए) अच्छा तो मेरे प्यारे जंगलवासियो! अब सभा समाप्त होती है।

जानवर : जंगलपति शेर की जय! हमारे जंगलपति की जय। बल्लू दादा के बालघर की जय।

मंत्री जी की जय।

(संगीत उभरता है। जानवर गपशप करते हुए चल पड़ते हैं।)

दृश्य दो

नदी किनारे बल्लू हाथी (बल्लू दादा) का बालघर। घने पेड़। जानवर अपने अपने बच्चों को लिए हर ओर से आते दिखाई दे रहे हैं। बच्चे उछलते कूदते आ रहे हैं। एक दो बच्चे रो भी रहे हैं। बल्लू दादा बच्चों को प्यार कर चुप कर देते हैं। एक दिशा से भालू अपनी

पत्नी और बच्चों के साथ आते हैं।

भालू : बल्लू दादा! ओ बल्लू दादा! (बल्लू हाथी के सामने) लो संभालो इन शैतानों को। जरा कस कर रखना। नहीं तो नाक में दम कर देंगे आपकी। पता नहीं किस पर गए हैं शैतान। मामा की तरफ की ही शैतानी नजर आती है मुझे तो। (हंसता है)

भालिन : (तुनक कर) अजी रहने दो। अपने को देखो। अभी तक मसखरी करने की आदत नहीं गई।

(हाथी हंसता है और भालू भी)

बल्लू हाथी : अरे छोड़ो भी इन हठखेलियों को। बच्चे शरारत नहीं करेंगे तो क्या हम तुम करेंगे। शरारती बच्चे समझदार भी बहुत होते हैं। (बच्चों की ओर देखते हुए) आओ बच्चो, चलो अन्दर चलो। बड़े प्यारे बच्चे हैं। इन्हें तो मैं खूब कहानियां सुनाऊंगा।

भालू-बच्चे : सच बल्लू दादा?

बल्लू हाथी : हां, यहां बहुत मजा आएगा तुम्हें।

जानवर-बच्चे : (एक एक कर) हमारे मां-बाप को फुर्सत ही नहीं होती कहानियां सुनाने की। थके-हारे आते हैं और सो जाते हैं। कहानी सुनाना कल-कल पर टालते रहते हैं। आप तो नहीं टालेंगे न, बल्लू दादा!

बल्लू हाथी : मैं क्यों टालूंगा बच्चो। तुम्हारे माता-पिता को सचमुच मेहनत करनी पड़ती है। उन्हें फुर्सत कहां। मैं तो खाली हूं। तुम्हारी ही तरह। तो खूब मजा करेंगे। खूब कहानियां चलेंगी। इतनी कि तुम सुनते-सुनते ऊब जाओगे।

खरगोश-बच्चा : (खिलखिलाते हुए) आप भी कितने भोले हैं बल्लू दादा। कभी बच्चे भी कहानियों से ऊबते हैं ?

(जानवर हंसते हैं)

भालू : अरे बल्लू दादा, आपके पास तो जादू है जादू। कितना घुल मिल गए हैं। हमारे तो

संभाले नहीं सम्भलते। खैर आप जानें या ये। हम तो चले काम पर। शाम को मिलेंगे (बच्चों की ओर देखकर) और हां, दादा को तंग नहीं करना बच्चो। जैसा कहें, करना।

(जानवर चल पड़ते हैं। बच्चे देखते हैं। बल्लू हाथी बच्चों को संबोधित करते हुए)

बल्लू हाथी : देखो बच्चो आज सबसे पहले मैं तुम्हें एक मजे़दार पर काम की बात बताऊंगा।

बंदर-बच्चा : और कहानी?

जानवर-बच्चे : हां हां पहले कहानी।

बल्लू हाथी : हां हां, कहानी तो होगी ही। पर गहरी दोस्ती के लिए कुछ बातें तो हो जाएं। अच्छा पहले थोड़ा खेल-कूद तो लो ताकि व्यायाम हो जाए और तुममें ताकत आ जाए। इस बीच मुझे तुम्हारे लिए एक अच्छा सा गीत तैयार करना है।

बच्चे : गीत?

बल्लू हाथी : हां गीत जिसे तुम गा सको। हर रोज। बच्चो, गीत हो या कहानी उसका मजा

भी लेना चाहिए और उसकी सीख पर ध्यान भी देना चाहिए।

बंदर-बच्चा : पर आप कहानी कब सुनाएंगे, बल्लू दादा। हम तो बोर हो रहे हैं।

बल्लू हाथी : सब्र करो। सब्र का फल मीठा होता है। और हर चीज का अपना समय। जानते हो जब मैं आदमियों के जंगल में था तो मुझे यह देखकर दुःख होता था कि कई बच्चे ज्यादा से ज्यादा समय टी.वी. पर कार्टून देखने या कमप्यूटर पर खेल खेलने में बिताते थे।

(बच्चे ऊबने लगते हैं। कुछ उबासियां लेने लगते हैं।)

बल्लू हाथी : अरे तुम तो ऊबने लगे। (हंसते हुए) मेरी बात समझ तो आ रही है न? वैसे अच्छी बातें किसे अच्छी लगती हैं। चिन्ता मत करो। कहानियां भी होंगी। (प्यार से) अच्छा चलो अब भागो और थोड़ा खेलकूद लो। गीत तैयार होते ही तुम्हें बुलाता हूं।

जानवर-बच्चे : तो हम जल्दी से खेल-कूद कर आते हैं।

बल्लू हाथी : ठीक है।

(बच्चे चल जाते हैं और मंच के दो कोनों में खेलने लगते हैं। बीच में आगे की ओर बल्लू हाथी कुछ सोचने और लिखने की मुद्रा में। मंच पर अंधेरा। प्रकाश। (हाथी के चेहरे पर काम खत्म होने का संतोष)

बल्लू हाथी : आओ बच्चो आओ। अब तो तुम खेल चुके होगे। मैंने भी गीत तैयार कर लिया है।

(बच्चे दौड़े दौड़े आते हैं।)

बल्लू हाथी : तो गीत शुरू करें। मैं पहले बोलूंगा। पीछे पीछे तुम बोलना। बाद में हम मिलकर

गाएंगे। तो बोलो - हम जानवर जंगल के, हमको जंगल प्यारा है।

जानवर-बच्चे : हम जानवर जंगल के, हमको जंगल प्यारा है।

गधा-बच्चा : बल्लू दादा, एक बात कहूं। गुस्सा तो नहीं करेंगे?

बल्लू हाथी : नहीं नहीं। कहो, बिना डरे।

गधा-बच्चा : हम अगर ऐसा बोलें तो कैसा लगेगा - हम बच्चे जंगल के, हमको जंगल प्यारा है।

बल्लू हाथी : (सोचते हुए और पंक्ति को गुनगुनाते हुए) हम जानवर जंगल के... हम बच्चे

जंगल के (खुश होते हुए) बहुत अच्छा सुझाव है तुम्हारा। तुम तो आलोचक निकले। शाबाश... बस जरा यूं कर लेते हैं - हम बच्चे हैं जंगल के, हमको जंगल प्यारा है। ठीक। तो बोलो - हम बच्चे हैं जंगल के, हमको जंगल प्यारा है।

बच्चे : हम बच्चे हैं जंगल के, हमको जंगल प्यारा है।

बल्लू हाथी : अब आगे...

अलग अलग हैं रंग हमारे

बच्चे : अलग अलग हैं रंग हमारे

बल्लू हाथी : अलग अलग हैं ढंग हमारे

बच्चे : अलग अलग हैं ढंग हमारे

बल्लू हाथी : अलग अलग हैं घर हमारे

बच्चे : अलग अलग हैं घर हमारे

बल्लू हाथी : खान पान सब न्यारे न्यारे

बच्चे : खान पान सब न्यारे न्यारे

बल्लू हाथी : जंगल एक हमारा है, हमको जंगल प्यारा है

बच्चे : जंगल एक हमारा है, हमको जंगल प्यारा है

बल्लू हाथी : आओ अब गीत का यह हिस्सा मिल कर गाते हैं --और जरा घूम घूम कर।

हम बच्चे हैं जंगल के

हमको जंगल प्यारा है

अलग अलग हैं रंग हमारे

अलग अलग हैं ढंग हमारे

अलग अलग हैं घर हमारे

खान पान सब न्यारे न्यारे

जंगल एक हमारा है

हमको जंगल प्यारा है।

कहो बच्चो मजा आया न?

बच्चे : हां बल्लू, दादा, बहुत मजा आया।

बंदर-बच्चा : ओह गीत भी बहुत मजेदार होता है।

बल्लू हाथी : अच्छा !

बच्चे : अब गीत का अगला हिस्सा भी तो सिखाएं।

बल्लू हाथी : तो सुनो - पहले पूरा हिस्सा। फिर पहले की तरह एक एक पंक्ति -

हमको जंगल प्यारा है

(सब की ओर इशारा करता है। सब गाते हैं)

जंगल से ही जीवन अपना

जंगल से ही सच है सपना

सबसे पहले जंगल अपना

इस पर वारें सब कुछ अपना

जंगल देश हमारा है

हमको जंगल प्यारा है

(सब की ओर इशारा करता है। सब गाते हैं)

हम बच्चे हैं जंगल के

हमको जंगल प्यारा है

हम बच्चे हैं जंगल के

हमको जंगल प्यारा है

बल्लू हाथी : बहुत खूब, बहुत खूब। तुम तो बहुत ही होशियार बच्चे हो।

बंदर बच्चा : पर हमारी कहानी कब होगी, बल्लू दादा?

बल्लू हाथी : लगता है तुम्हें कहानी बहुत अच्छी लगती है। अच्छा यह बताओ तुम्हें कैसी कहानी अच्छी लगती है?

बंदर-बच्चा : जो मजेदार हो।

(बल्लू हाथी हंसता है)

बल्लू हाथी : भई, मैं तुम्हें कुछ आदमियों वाली कहानियां भी सुनाऊंगा।

बच्चे : आदमी!

बल्लू हाथी : हां भई, यह एक मजेदार बात है। तुम तो कभी आदमियों के बीच रहे नहीं न? बड़े चालाक लेकिन समझदार होते हैं। उनकी बहुत सी कहानियां ऐसी हैं जिनके पात्र हम जानवर हैं। कभी कभी तो वे अपनी कल्पना से हमें ऐसा दिखाते हैं कि बस पूछो मत। हंसी भी आ जाती है और हैरानी भी।

बच्चे : अच्छा!

बल्लू हाथी : हां। तुम्हें भी आदमियों वाली कहानियां पसंद आएंगी। पर भई... कहानी के साथ

साथ थोड़ी सेवा भी करनी पड़ेगी।

बच्चे : सेवा?

बल्लू हाथी : नहीं समझे न? अरे भई, आदमी जब अपने बच्चों को कहानी सुनाते हैं तो साथ-साथ अपने हाथ, पांव और पीठ दबवाते हैं। इसी को सेवा कहते हैं। (हंसते हुए) खैर, तुम घबराओ मत। मैं कम ही सेवा करवाऊंगा। (बच्चे एक दूसरे को देखते हैं) अच्छा तो अब काफी समय हो गया है। हमारी दास्ती भी खूब हो गई है।

बंदर-बच्चा : तो बल्लू दादा, कहानी तो सुनाइए न?

बल्लू हाथी : पहले कुछ खा-पी तो लो।

खरगोश-बच्चा : मुझे तो बहुत भूख लगी है।

बच्चे : हमें भी।

बल्लू हाथी : तो जाओ सब मिल बांट कर खाओ पियो।

 (बच्चे चले जाते हैं। थोड़ी देर में एक छोटा बच्चा 'खरगोश' रोता हुआ आता है।)

खरगोश-बच्चा : बल्लू दादा! बल्लू दादा! लोमड़ी-बच्चा मुझे बहका का मेरा खाना खा गया। अब

अपना खाना मुझे नहीं देता।

बल्लू हाथी : अच्छा, यह तो बुरी बात है। चलो देखते हैं।

बल्लू हाथी : (लोमड़ी बच्चे से) बेटे, क्या तुमने खरगोश का खाना खाया है?

(लोमड़ी-बच्चा चुप)

यह तो अच्छी बात नहीं। किसी भोले-भाले प्राणी को ठगना नहीं चाहिए। हम

जानवर इसीलिए बदनाम हैं कि हम अपने से छोटे या कमज़ोर को तंग करते हैं या खा जाते हैं। इसीलिए हमें जंगली और असभ्य कहा जाता है। मैंने अच्छे और सभ्य आदमी देखे हैं। सुना है कि वे भी पहले जंगली थे और सभ्य नहीं थे।

बंदर-बच्चा : पर मेरे बापू तो कह रहे थे कि आदमियों के जंगल में बंदूकों, गोले-बारूदों से एक

दूसरे को मार डालते हैं। कमजोर आदमी वहां भी डर डर कर जीते हैं।

बल्लू हाथी : तुम्हारे बापू ने ठीक बताया है। पर हमें किसी की भी केवल अच्छी बातें सीखनी

चाहिए। बुरी नहीं। चाहे वे मेरी ही क्यों न हों।

लोमड़ी बच्चा : मुझे माफ़ कर दीजिए, बल्लू दादा।

बल्लू हाथी : शाबाश। बच्चो, क्या तुम चाहते हो कि आज खरगोश भूखा रहे?

बच्चे : नहीं। (सब बच्चे थोड़ा थोड़ा खाना खरगोश को देते हैं)

बल्लू हाथी : बच्चो, अब शाम हो चली है। वह देखो तुम्हारे माता-पिता भी तुम्हें लेने आ रहे हैं। अब कहानी कल ही हो पाएगी। तुम जल्दी जल्दी अपना गाना गाओ। याद है न?

बच्चे : हम बच्चे हैं जंगल के

जंगल हमको प्यारा है

अलग अलग हैं रंग हमारे

अलग अलग हैं ढंग हमारे

अलग अलग हैं घर हमारे

खान-पान सब न्यारे न्यारे

जंगल एक हमारा है

हमको जंगल प्यारा है।

(पास खड़े माता-पिता खुश हैं। बच्चे उनके साथ कूदते-फांदते चल पड़ते हैं। कोई कोई गीत भी गुगुनाता है। बल्लू हाथी गीली आंखों से देखता रहता है।)

दृश्य तीन

(अगली सुबह। बालघर। बल्लू हाथी छिपे हुए हैं। बच्चे खुश हैं। अपना गीत गा रहे हैं। खत्म होने पर बाहर निकल कर)

बल्लू हाथी : वाह! वाह। बहुत अच्छा। तो आओ बच्चो चलो नदी किनारे। वहां नहाएंगे खूब

मजे से और फिर होगी...

बच्चे : आदमियों वाली कहानी।

बल्लू हाथी : अरे तुम्हें तो याद है।

बंदर-बच्चा : बल्लू दादा, मुझे तो रात नींद भी बहुत देर से आई। यही सोचता रहा कि कैसी होगी कहानी।

बल्लू हाथी : अच्छा! तो आओ चलें नदी किनारे।

(सब नहाते हैं)

बल्लू हाथी : चलो भई अब नहाना बंद करो। मजा़ आया न?

बच्चे : हां बल्लू दादा। अब हम रोज नहाया करेंगे।

गधा-बच्चा : कितना अच्छा लग रहा है नहा कर!

बल्लू हाथी : तो जल्दी से व्यायाम करके मेरे पास पहुंचो ताकि कहानी....

(सब चले जाते हैं)


[श्रेणी : नाटक।  लेखक : दिविक रमेश ]