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पूरे एक देश-काल और उसकी विद्रूपताओं की कथा : देवेंद्र की कहानियाँ / शंभु गुप्त

 शंभु गुप्त 
हम-उम्र लेखकों की समान चिंताधारा और सरोकार

देवेंद्र की पंद्रह-बीस कहानियाँ अभी तक छपी हैं लेकिन लगता है अपनी पीढ़ी के वे एक निर्विकल्प कहानीकार हैं। हालाँकि बकौल मैनेजर पांडेय इस पीढ़ी में यह स्थिति बमुश्किल और कभी-कभी ही देखी जाती है। इंडिया टुडे साहित्य वार्षिकी 2002 में छपे अपने अत्यंत ही महत्वपूर्ण आलेख 'सरोकारों से साक्षात्कार' के 'कथा साहित्य : स्मृति और अनुभव' उपशीर्षक के अंतर्गत कुछ कहानीकारों की चर्चा के अंत में एक सामान्य सी टिप्पणी में उन्होंने लिखा है : 'इस पीढ़ी की रचनाशीलता में एक चिंताजनक बात यह भी है कि एक की रचना पढ़िए तो दूसरे की रचना याद आती है। इस प्रक्रिया में प्रभाव से लेकर अनुकरण तक की स्थितियाँ दिखाई देती हैं। यह प्रवृत्ति मौलिक सृजनशीलता के विकास में बाधक है।' (पृ.-12)। निश्चय ही मैनेजर जी का यह कथन सत्य के काफी निकट है और कविता की तरह कहानी को भी अब यह रोग लगने लगा है। लेकिन इस सच्चाई का एक दूसरा पहलू भी है ही तो! और वह पहलू यह है कि जैसे एक ही उम्र के और लगभग समान सामाजिकार्थिक परिवेश के युवाओं की आदतें, मानसिकता और यहाँ तक कि स्वभाव, रुचियाँ और विचारधारा भी पर्याप्त समानता लिए हुए होती हैं, तो क्या इसे प्रभाव से लेकर अनुकरण तक की स्थितियाँ कहा जाना उचित है? क्या इसे एक पीढ़ी विशेष की- एक ही कालखंड-विशेष में सृजनरत हम-उम्र लेखकों की - समान चिंताधारा और सरोकार नहीं कहा जा सकता? हाँ, नकल और देखा-देखी अक्षम्य है। ऐसे कहानीकार और उनकी कहानियाँ अपनी स्वयं की प्रक्रिया में समय के कूड़ेदान के हवाले हो जाती हैं। ऐसे कहानीकारों की चर्चा व्यर्थ है। मैनेजर पांडेय भी ऐसे कहानीकारों को ध्यान में रखते हुए यह बात नहीं कर रहे होंगे। इनका इशारा संभवतः इस ओर है कि अनेक लेखकों की कहानियों में अनेक स्थितियाँ, संदर्भ और यहाँ तक कि अभिप्रेत भी एक-जैसे हैं। लेकिन फिर इसे प्रभाव और अनुकरण ही क्यों कहा जाए? मसलन, अखिलेश और देवेंद्र; जिन दो कहानीकारों को इस आलेख में उन्होंने लगभग समान महत्व और स्थान दिया है; की अनेक कहानियाँ ऐसी हैं जिनमें लगभग एक जैसी चेष्टाएँ करते, सोचते, निराश और कुंठित होते, एक तरह की सूक्तियाँ, उद्धरण उचारते बेरोजगार युवक हैं जिनकी प्रेमिकाएँ और घरवाले शनैः-शनैः उन्हें दुत्कार रहे हैं। यह हो सकता है कि इनकी अगली परिणतियों में भिन्नता हो, वे अलग-अलग तरह से जिंदगी में ठिकाने तलाशते नजर आएँ लेकिन आधारभूत परिस्थितियाँ और उनकी क्रूरताएँ एक जैसी हैं। जैसे अखिलेश की 'चिट्ठी' कहानी में वे सारे युवक समवेत रूप से यह गाते हैं कि 'माया महा ठगिनी हम जानी।' (शापग्रस्त, पृ.-45) तो देवेंद्र की 'स्वांतः सुखाय' कहानी में प्रभात भी लगभग इसी मानसिकता में इसे उचारता है - 'माया महाठगिनी हम जानी' (शहर कोतवाल की कविता : आधार : 1996; पृ. 95)। क्या इसे प्रभाव/अनुकरण कहेंगे? खोजने पर ऐसे और बहुत-से उदाहरण मिल जाएँगे। निश्चय ही इसे प्रभाव या अनुकरण कहना आलोचना का सरलीकरण या सपाटबयानी होगी।

समय की शिला को तोड़ पाना

यह सचमुच ही एक गहरे और व्यापक शोध का विषय है कि यह देखा जाए कि एक कालखंड-विशेष में उस समय सृजनरत अनेकानेक जेनुइन लेखक किन समान चिंताओं और समस्याओं से और क्यों, दो-चार हो रहे हैं? यों तो हर काल-खंड-विशेष में यह स्थिति देखी जाती है लेकिन जब समूचा राष्ट्र किसी गहरे राजनीतिक तथा सामाजिकार्थिक संकट में हो और समय के पास कोई विकल्प बचता दिखाई न देता हो, बृहत्तर जन-समुदाय जब किंकर्तव्यविमूढ़ता और दिशाहीनता की मनःस्थिति में पहुँचा दिया जाकर शासक-वर्ग और शक्ति-पुरुषों के इस्तेमाल-मात्र की वस्तु बन जाए, जब झूठ को इतनी बार दुहराओ कि वह सत्य बन जाए, जैसी बेहया और बीभत्स राजनीति अधिकांश लोगों के आकर्षण की चीज बन जाए, जब चारों तरफ अँधेरा और कुहासा गहरा जाता है और इन्हीं को समय की सबसे बड़ी स्वाभाविकता मानकर स्वीकर कर लिया गया हो; ऐसे भीषण और सर्वग्रासी समय में यदि हर महत्वपूर्ण लेखक इस यथार्थ से रू-ब-रू होता हुआ इसमें हस्तक्षेप का निश्चय करे तो यह उसका दायित्व और ऐतिहासिक कार्यभार ही तो कहा जाएगा। अलग-अलग लेखक का यथार्थ का आयत्तीकरण और उसका शिल्प-विधान अलग-अलग हो सकता है। यथार्थ को किस कोण से वह उठा रहा है, इसमें भी भिन्नताएँ हो सकती हैं लेकिन युग-सत्य का महाकथ्य समवेततः एक होता है। दरअसल यही महाकथ्य साहित्य के इतिहास में किसी प्रवृत्ति की सामान्यता को निर्धारित करता है। ऐसी सामान्य प्रवृत्तियाँ बहुधा संकट-काल में ही पनपती-बढ़ती हैं। मसलन हमारे यहाँ मोहभंग के विभिन्न समयों को लिया जा सकता है। जहाँ तक नवें दशक की बात है तो आंतरिक आपातकाल, उसके बाद की कथित संपूर्ण क्रांति, इस क्रांति के व्यावहारिक राजनीतिक प्रयोग का अंग-भंग होकर नेस्तनाबूद हो जाना और फिर एक बार फिर उसी अधिनायकवाद का भेष बदल कर सत्ता पर आ जमना; यह अत्यंत ही भारी और निरंतर जारी रही राजनैतिक अथल-पुथल एक के बाद एक अप्रत्याशित मोह-भंग की एक लंबी श्रृंखला रही है। दस-पंद्रह साल तक निरंतर चलने वाली इस अटूट श्रृंखला ने जनतांत्रिक आस्थाओं, मूल्यों, आजादी की लड़ाई में कमाए गए आत्मगौरव, लोककल्याणकारी राज्य के सिद्धांत, जन-सेवा इत्यादि को सिरे से उलटना शुरू किया। सन् 90 के बाद विश्व-स्तर पर की गई इतिहास के अंत की घोषणा और उदार और मुक्त बाजार के सांस्कृतिक संक्रमण ने इस राजनीति को जैसे एक वैचारिक/सामाजिक आधार प्रदान किया और देखते-देखते एक नितांत ही भिन्न और बदला हुआ समय लोगों के सामने नमूदार हुआ। पिछले बीस-पच्चीस सालों की भारतीय राजनीतिक और सामाजिकार्थिक परिस्थितियों का अध्ययन किए बिना इस दौर में लिखी गई कहानियों का आकलन नितांत ही अधूरा और खंडित साबित होगा। दरअसल जरूरत इस बात की है कि हर कहानी और उसके कहानीकार पर अलग-अलग ध्यान दिया जाए और यह देखा जाए कि अपने ऐतिहासिक समय और चयित यथार्थ का उसका आकलन क्या कैसा और किस तरह है। इस अलग-अलग अध्ययन से जो सामान्य प्रवृत्तियाँ उभरकर आएँगी वे इस समूची कथा-पीढ़ी या पीढ़ियों की रचनात्मकता का समन्वित स्वरूप होगा। अतः यह कह देना पर्याप्त नहीं है कि हम एक की कहानी पढ़ते हैं तो दूसरे की कहानी याद आती है। बल्कि यह तो एक बहुत ही स्वाभाविक और सकारात्मक स्थिति है। देखना यह चाहिए कि ये सारे कथाकार मिलकर अपने समय की शिला को तोड़ पा रहे हैं या नहीं!

अपनी जगह तलाशने का उपक्रम

देवेंद्र की कहानियाँ पढ़ते हुए सबसे पहले जो चीज हमारा ध्यान खींचती है वह है उनका आत्मवृत्त-सा लगने वाला कथानक। हो सकता है यह पूरी तरह आत्मवृत्त न हो और लेखक ने एक इंद्रजाल रचा हो। दरअसल यहाँ यह जाँच करना और लेखक से यह तस्दीक कराना आवश्यक नहीं है कि इस कथानक में वह स्वयं है या नहीं है और है तो कितना और किस तरह है। आलोचना कोई जाँच एजेंसी या उसकी रिपोर्ट नहीं होती। हमारा मतलब तो सिर्फ इतना है कि यदि यह आत्मवृत्त है तो लेखक आत्मनिरसन को पाठकीय सामान्यता के स्तर तक उठाकर सृजनात्मक बना पाया है या नहीं। यह उल्लेखनीय है कि देवेंद्र अपने केंद्रीय पात्र को कभी उत्तम पुरुष में आत्म विवरण देता हुआ दिखाते हैं और कभी अन्य पुरुष में उसका वर्णन करते चलते हैं। वह कभी 'मैं' बन जाता है तो कभी 'वह'। हालाँकि, कब वह 'मैं' होगा और कब 'वह', इसका एक सेट पैटर्न-सा भी यहाँ दिखाई देता है। उल्लेखनीय यह भी है कि देवेंद्र का यह 'वह' कमोवेश 'मैं' की ही संरचना प्रस्तुत करता है। दरअसल यहाँ स्थितियाँ इतनी गझिन और संश्लिष्ट और परस्पर उलझी हुई हैं कि यह ध्यान ही नहीं रहता कि कौन किस शैली में बोल रहा है। ध्यान सिर्फ इतना रहता है कि जो कुछ बोला या बताया जा रहा है वह समय की एक ऐसी सच्चाई है जिसका पार पाना फिलहाल असंभव है। देवेंद्र की कहानियों में यथार्थ अपने अत्यंत 'र्यूड' रूप में दिखाई देता है। पर्याप्त प्राथमिक और फर्स्ट हैंड। और ऐसा दरअसल इसलिए है कि देवेंद्र कहानी में नैरेशन से ज्यादा दृश्य-बंध या दृश्य-निर्माण पर ध्यान देते हैं। दृश्य-बंध एक नाट्य-तत्व है लेकिन कहानी में इसका संक्षिप्त और सारगर्भा संरचन पाठकीय रमणीयता की सृष्टि करता है। पाठकीय रमणीयता कहानी की सबसे पहली और बड़ी शर्त है। देवेंद्र ने अपनी एक अचर्चित-सी कहानी 'अवांतर-कथा' में अपनी (यानी कि कथानायक 'मैं' की) लेखिका माँ के हवाले से इसके महत्व पर स्वयं इस प्रकार प्रकाश डाला है : 'पुरानी किताबों के बंडल में ही मुझे एक पत्रिका मिली, जिसमें माँ की फोटो के साथ एक कहानी छपी है। यह कहानी गाँव के एक चरवाहे पर लिखी गई है। आज जबकि मैं खुद कहानियाँ लिखता हूँ और कहानियों का सजग पाठक भी हूँ, तब यह दावे के साथ कह सकता हूँ कि उस कहानी में गाँव के जो कुछेक चित्र आए हैं, उनमें दृश्यों को प्रस्तुत करने की अद्भुत क्षमता है।' (वही; पृ.-79)। दृश्यों को प्रस्तुत करने की यह अद्भुत क्षमता जिस प्रक्रिया से आती है, वह जिंदगी में 'स्थिरता' की जगह 'गति' को पसंद करने की वही प्रक्रिया है जिसमें पड़ने पर इस कहानी की माँ को अपने पुत्र और पति को छोड़ना पड़ा! एक माँ के मार्फत स्त्री-स्वतंत्रता के कथ्य पर लिखी गई यह कहानी पहली नजर में बेशक हमें बेतरह चौंकाती है लेकिन यह कोई अपवाद भी नहीं है कि कोई स्त्री इस तरह अपना घर बरबाद कर चलती बने! मेरा अनुमान है कि इस कहानी को लिखते हुए देवेंद्र एक भारी मर्मान्तक पीड़ा से गुजरे होंगे। एक पुत्र के हाथों एक स्त्री के रूप में एक माँ के स्वतंत्र व्यक्तित्व की स्थापना कराना हिंदी में एक जोखिम भरा काम है। लेकिन दरअसल ऐसे ही चुनौती भरे कथ्यों से किसी लेखक की जेन्युइननैस का पता चलता है और उसके कौशल की परीक्षा होती है। इस कहानी में यह पुत्र जिस खराद पर चढ़ा हुआ है और जिस मुकाम पर अंततः पहुँचता है, वह हिंदी में नितांत ही एक नई चीज है। इस चुनौती का सृजनात्मक निर्वाह देवेंद्र कर ले गए हैं तो इसमें उनके इस अभिमत का सबसे बड़ा हाथ है कि : 'निर्विवाद और निष्पक्ष होना मेरी नजर में अपराधों का मूक हिस्सेदार होना है।' (वही; पृ.-110)। इस तरह देवेंद्र के कथाकार की जो सबसे पहली छवि एक पाठक के मन में बनती है, वह यही है कि यह कथाकार जो जीता या भोगता है या अंतरंग स्तर पर जिसे देखता-महसूस करता है, लगभग वही लिखता और कहता है। उससे भिन्न ज्यादा कुछ नहीं। अब यह जो जीवन का अनुभव या अंतरंग साक्षात्कार है, वह संश्लिष्ट, गझिन और अंदर ही अंदर इतना उलझा हुआ है कि ढेर सारे अंतर्विरोधों का पुलिंदा-सा प्रतीत होता है। इसमें आकर्षण और विकर्षण, प्रेम और घृणा, हार और जीत इस कदर अंतर्संगुंफित हैं कि दिमाग चकरा जाता है और आगे का रास्ता कतई नहीं सूझता। देवेंद्र इस अंतर्विरोधपूर्ण अंतर्संगुंफित यथार्थ को तो संरचित करते ही हैं, आगे के रास्ते का संकेत भी देते चलते हैं। मैनेजर जी ने अपने उसी आलेख में देवेंद्र के बारे में यह बिल्कुल ठीक लिखा कि - 'देवेंद्र के पास परस्पर विरोधी स्थितियों और मनोदशाओं के चित्रण में सक्षम एक ऐसी कथा-भाषा है, जो पाठकों को गहरे स्तर पर बेचैन करती है।' (इंडिया टुडे साहि.वा. 2002; पृ. 12)। दरअसल आगे के रास्ते के संकेत से ज्यादा महत्वपूर्ण ये परस्पर विरोधी स्थितियाँ और मनोदशाएँ हैं। इन्हें विश्वसनीयता के साथ लाना सबसे पहले जरूरी है। ध्यान से देखा जाए तो आगे के संकेत इन्हीं अंतर्विरोधों में से झाँकते प्रतीत होते हैं। जैसे कि 'समय बे-समय' में कथानायक विश्वंभर चला तो हत्या के गुर सीखने और स्वयं उन्हें आजमाने के मकसद से था। हत्या और हत्यारों यानी कि खलनायकी को लेकर उसके मन में बड़ा ही ग्लैमरस और आकर्षण का भाव है, लेकिन अंततः वह किसे मार गिराने का उद्यम करता दिखाई देता है! यह कहानी 'क्षमा करो हे वत्स!' की तरह ही विरोधी स्थितियों और मनोदशाओं का संपुंज है। लेकिन ये विरोधी स्थितियाँ और मनोदशाएँ जहाँ जाकर प्रशमित होती हैं वह एक ऐसा वैचारिक संकेत या सांकेतिक विचार है कि पिछली सारी कहानी एक नए आलोक में प्रकाशित हो उठती है। कहानी में यह चाहे अनायास और आकस्मिक तौर पर हुआ हो लेकिन यह, कहानी, उसके नायक और स्वयं लेखक की स्वाभाविक चाह थी कि गोली सी.जे.एम. को न मारी जाकर सीधे दारोगा को मारी जाए क्योंकि यह दारोगा जिंदा रह गया तो वह बाकी सबको मार डालेगा अतः कहानी में कथित रूप से 'अपने आप घटित' (द्रष्टव्य; कथादेश, जुलाई 2001; पृ.-21) हुआ यह वाकया एक सोचा-समझा लेखकीय उपक्रम है। सत्ता-तंत्र की गुंडई और हिंसा का जवाब उसी तरह की एक जनोन्मुख गुंडई और हिंसा के मार्फत। अब कोई चारा नहीं! जहर को जहर से ही मारा जा सकता है किसी संशोधनवादी मीठी या कड़वी दवा से नहीं। कहानी में यह भी लगभग अनायास और आकस्मिक है हालाँकि लेखकीय संयोजन यहाँ भी है कि सी.जे.एम., इस दारोगा और इन बटमारों-लुटरे-हत्यारों में आधारभूत रूप से अब कोई फर्क नहीं रह गया है। दारोगा को तो हम काफी दिनों से जानते थे लेकिन कानून और न्याय का प्रतिनिधि-प्रतीक यह सी.जे.एम. भी ऐसा हो जाएगा; यह हैरतअंगेज है। वह भी अब इनका 'आत्मीय स्वजन' हो गया है। (वही, पृ. 20)। यह दरअसल उसी सर्वग्रासिता की प्रक्रिया का हिस्सा था जिसका पीछे हमने उल्लेख किया। जब लोकतंत्र का यह सबसे बड़ा संरक्षक भी उसी बहती गंगा में हाथ धोने का अभ्यास पाल ले जिसमें और बहुत सारे लोग हैं तो सत्य के पास चुप होकर बैठने के अलावा और चारा ही क्या रह जाता है! लेकिन स्थिति तो आज दरअसल इससे भी आगे जा चुकी है। सत्य अब चुप रहने भी कहाँ दिया गया है। व्यवस्था ने उसे अब इस स्थिति में ला दिया है कि वह यथास्थिति (स्टेटस्-को) को स्वीकार कर ले और निरीह और निस्तेज आँखों से अपने शून्य भविष्य को देखता रहे! (द्रष्टव्य, वही; पृ.-18)। ऐसी 'विस्फोटक' और सर्कस जैसी स्थिति में रास्ता क्या है? रास्ता दरअसल यह है - 'विश्वंभर अपने-आप से बुदबुदाया, 'तुम खुद सोचो! तुम्हारी जगह कहाँ है?'' (वही)। और, वह जगह हमने ऊपर देखी! यह जगह वह पेड़ नहीं है जिस पर चढ़कर वह दुनिया को थोड़ी ऊँचाई से देखना चाहता था बल्कि घनी अँधेरी काली रात की वह हत्यारी सड़क है, जिस पर भय और रोमांच का मिला-जुला वह दृश्य चल रहा था। और आगे चलकर वह खुद उसका एक निर्णायक हिस्सा बनता है। देखने की बात यह है कि यहाँ यह व्यक्ति- चाहे अपने-आप ही सही - अपने इस भय और रोमांच से निजात पाता है और वह 'तुक' और 'तर्क' का काम कर दिखाता है जिसे किए बिना अब कोई चारा नहीं। अपने अस्तित्व और भविष्य को बचाए रखने का अब केवल यही रास्ता रह गया है कि अपने भय और रोमांच पर काबू पाकर इस अंतहीन सर्कस और विस्फोटक जादू को खत्म किया जाए! यह अपने-आप खत्म नहीं होगा; इसे खत्म करने की इच्छा-शक्ति स्वयं हमारी होनी चाहिए! एक अंदरुनी इच्छा-शक्ति; जिसे कई बार हम भी नहीं जान-पहचान पाते। बस हरदम एक बेकली और बेचैनी में ऊभ-चूभ होते रहते हैं। इस कहानी की सफलता-सार्थकता इस बात में है कि यह इस बेकली और बेचैनी को एक मुकाम पर पहुँचाती है और उसकी तुक और तर्क भी देती चलती है। यह मानो अपने पाठक से भी पूछती है : 'तुम खुद सोचो! तुम्हारी जगह कहाँ है?'

एक तरह से देखा जाए तो अपनी जगह तलाशने का यह उपक्रम ही देवेंद्र की कहानियों का सबसे प्रमुख विमर्श है। यों देखा यह भी जा सकता है कि देवेंद्र में हर तरफ हताशा ही हताशा और विडंबना मिलती है। यथार्थ एक ऐसे दुर्लंघ्य पहाड़ की तरह उनके सामने आता है जिसके सामने खुद को वे बौना महसूस करते हैं और उससे कन्नी काटकर उसे ज्यों का त्यों छोड़ चुप हो जाते हैं। चाहे वह 'बीच के दिन' हो, 'देवांगना' हो, 'तेरी गड्डी दी आस' हो, 'महाकाव्य का आखिरी नायक' हो, 'स्वांतः सुखाय' हो, 'एक खंडित प्रेमकथा' हो, 'नालंदा पर 'गिद्ध' हो, 'एक खाली दिन' हो, यहाँ तक कि चाहे वह 'क्षमा करो हे वत्स!' हो या 'शहर कोतवाल की कविता' हो। हर तरफ एक पराजय, परवशता और पलायन जैसा दृष्टिगोचर होता है। कथानायक या तो गाँव भाग जाता है या वहाँ जहाँ से इस वाकए को सुलटाने वह यहाँ आया है। यह 'गमन' एक प्रवृत्ति की तरह देवेंद्र के यहाँ पाया जाता है। प्रतीत होता है कि लेखक बचपन की आदतों से बाज नहीं आया है और यथार्थ के साथ आँख-मिचौनी का उसका खेल बदस्तूर जारी है। यथार्थ के प्रति यह खिलंदड़ापन स्वयं में एक भारी जोखिमभरा काम है; हिंदी में यह यदा-कदा और विरल रूप में ही पाया जाता है। यह दरअसल एक प्रयोग है, एक लेखकीय कूटनीति या डिप्लोमेसी है।

बस यूँ ही अपने-आप

सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि देवेंद्र पराजय, परवशता और पलायन को कहानी में किसी वैचारिक स्थापना की तरह नहीं लाते; कथानक की अन्य बहुत सारी घटनाओं की तरह एक अत्यंत ही स्वाभाविक अगली घटना की तरह स्वतः - स्वयं देवेंद्र के शब्दों में कहें तो 'बस यूँ ही अपने-आप' (वही; पृ.-21) - यह 'घटित होता' दिखाई देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो यह लेखकीय संयोजन नहीं है बल्कि लेखक की तो स्थिति यहाँ इससे बेहतर नहीं है कि - 'हम ज्यादातर अपनी दिमागी हरकतों का दसवाँ हिस्सा ही जान पाते हैं। शेष बस यूँ ही अपने-आप घटित होता रहता है।' (वही)। यों देवेंद्र इसे 'तत्काल बुद्धि' नाम देते हैं जैसा कि 'समय बे-समय' में विश्वंभर के हाथों चली गोली का वर्णन उन्होंने किया है : 'उसी तत्काल बुद्धि से, जिससे ट्रक की चपेट में आते-आते स्कूटर या साइकिल अपने को बचा लेती है। विश्वंभर के हाथ से गोली चली। कब, कैसे रुख बदल गया? वह नहीं जान पाया। सेकेंड के बीसवें हिस्से में सब कुछ हो गया।' (वही)। देवेंद्र की कहानियाँ अंत में आते-आते यकायक अपना रुख बदलती हैं और लेखक एक कला-फिल्मों के निर्देशक या किसी दुःखांत प्रहसन के नायक की तरह मंच पर चल रहे इतिवृत्त और उसे देख-देखकर झूरते-विगलित होते दर्शकों को ज्यों का त्यों छोड़ नेपथ्य की तरफ बढ़ लेता है। सारी कहानी उसने अपने हाथ से सजाई-सँवारी लेकिन अंत में अपने हाथ खड़े कर दिए! मानो अपने पाठकों और कहानी को यह कहते हुए कि 'अब तुम जानो तुम्हारा काम जाने' वह उनसे विदा ले लेता है। इस स्थिति में उनकी कहानियों की स्थिति लगभग वही हो आती है जैसी कि 'समय-बे-समय' के अंत में लोगों की निगाह में उस वाकये को लेकर होती है : 'आशंका, अनुमान और अफवाह के इस मिले-जुले माहौल में सत्य चुपचाप छिपकर बैठा है।' (वही; पृ.-23)।

वे स्पष्ट हैं कि वे क्या चाहते हैं और क्यों चाहते हैं

पाठकीय आशंका, अनुमान और अफवाह के मिले-जुले ऊपरी माहौल में देवेंद्र की कहानियों के अंदर चुपचाप छिपकर बैठा वह सत्य आखिर क्या है जो एक करिश्मे की तरह वहाँ है और जिसका नायक स्वयं लेखक है? यह सत्य है : समय-संदर्भ और संस्कृति के अनुसार मूल घटना का स्वाभाविक वर्तमान कालिक पाठ और यह मूल घटना है - एक ठंडे और निर्जीव प्रहसन की तरह आहिस्ते-आहिस्ते चल रहा सब कुछ! (द्रष्टव्य; शहर कोतवाल की कविता; पृ.-111 : 'क्षमा करो हे वत्स!' कहानी तथा पृ.-76 : 'धर्मराज' कहानी)। इसे हमने पीछे 'समय-बे-समय' में एक 'अंतहीन सर्कस' और एक 'विस्फोटक जादू' के रूप में देखा! देवेंद्र लगभग हर कहानी में इस प्रहसन, सर्कस या जादू को नए-नए संदर्भ में आख्यायित-पुनराख्यायित करते हैं। उनका यह आख्यान-पुनराख्यान न तो उन उत्तर आधुनिक बुद्धिजीवियों की तरह है जो 'अपने-अपने काम में लगे हैं। और इस प्रहसन से काफी-कुछ अनभिज्ञ हैं और इसी अनभिज्ञता के चलते जो 'सरल को जटिल और जटिल को सरल' करते चलते हैं (द्रष्टव्य : शहर कोतवाल की कविता; पृ.-76) और 'हाथी की नाक, पीठ, पैर और पूँछ जिसकी जो पकड़ में आ जाए उसे ही मूल तथ्य प्रमाणित करने में खंडन-मंडन की सारी पद्धतियों को अपनाते रहते हैं (द्रष्ट.: कथादेश; जुलाई 2001; पृ.-22) और न उन अतिक्रांतिकारियों और विडंबनावादियों की तरह है जो 'आत्ममोह की दुःखांतकी को रचते-रचते अंततः करुण विवादों संवादों से भरी एक हास्यास्पद' परिणति तक पहुँचते नजर आते हैं। (द्रष्ट.: तद्भव-2; पृ.-80)। ध्यान देने की बात है कि यह उत्तर आधुनिकतावाद और विडंबनावाद अंततः एक ही मुकाम पर पहुँचते हैं जो कुल मिलाकर इससे भिन्न नहीं है कि - 'उन्हें खुद भी तो स्पष्ट न था कि वे क्या चाहते हैं?' (द्रष्ट.: वही; पृ.-71)। देवेंद्र इन दोनों ही तरह के लोगों में नहीं हैं। उन्हें अपने लिए स्पष्ट है कि वे क्या चाहते हैं और क्यों चाहते हैं!

कवि की कल्पना और लुहार की भट्ठी अर्थात शब्दों को जैसा चाहे ढाल लेना

एक तरह से देखा जाए तो आलोचनात्मक यथार्थ-दृष्टि देवेंद्र की कहानियों की मूल प्रवृत्ति है। देवेंद्र बड़े ही झोली फटकार अंदाज में अपने चरित्रों से पेश आते हैं। उन्हें अपने पात्रों से बेइंतहा लगाव भी है और साथ ही उतनी ही बेइंतहा नफरत भी। वे पात्रों को अपने कोमल हाथों से सँवारते भी हैं और जब उनके कल्ले फूटने लगते हैं और वे अपने रास्ते चलने लगते हैं तो फिर उन्हें अपनी नियति के हवाले छोड़ वे अपनी माया समेटने भी लगते हैं। कहानी लिखना देवेंद्र के लिए स्वयं अपने को सँवारने-तोड़ने की तरह सामने आता है। हर कहानी में वे लगभग इसी प्रक्रिया से गुजरते दिखाई देते हैं। वे जैसे कोई कहानी नहीं लिखते, अपना प्यार, अपना गुस्सा, अपनी चाहत, अपनी नफरत, अपने द्वंद्व, अपनी असफलताएँ, अपने उल्लास, अपने स्वप्न का आलंबन ढूँढ़ते हैं। लेकिन जैसा कि मैंने पहले कहा, यह कोई आत्माभिव्यक्ति या आत्मनिरसन नहीं है। आत्माभिव्यक्ति या आत्मनिरसन की प्रक्रिया से 'शहर कोतवाल की कविता' या 'क्षमा करो हे वत्स!' या 'समय-बे-समय' या 'एक खाली दिन', 'अवांतर-कथा ', 'क्रांति की तलाश', 'स्वांतः सुखाय' और 'एक खंडित प्रेमकथा' जैसी कहानियाँ संभव नहीं हो सकतीं। और अगर होतीं भी तो इनका रूप वह नहीं रहता जो इस समय है। ये तब लेखक और उसके पात्रों की किसी न किसी दुर्बलता का आख्यान-भर होतीं! आत्माभिव्यक्ति या आत्मनिरसन की प्रक्रिया की सबसे बड़ी पहचान ही यह है कि लेखक और उसके पात्र यहाँ मात्र 'अपनी दुर्बलता का बचाव' (शहर कोतवाल की कविता; पृ.-25) करते दिखाई देते हैं, उसे ग्लोरीफाई या महिमा-मंडित करते दिखाई देते हैं। जबकि देवेंद्र इसके विपरीत स्वयं को और अपने पात्रों को एक के बाद एक अनेक अग्नि-परीक्षाओं से गुजारते हैं। ये अग्नि-परीक्षाएँ प्रकारांतर से 'इस सामाजिक संरचना की ऐसी कमजोर बिंदु मात्र ही तो हैं जहाँ पूरी तरह सड़ चुका हाड़ मांस और रक्त सिर्फ जख्म बनकर फूटता है।' (वही)। देवेंद्र हमारी सामाजिक संरचना के इन कमजोर बिंदुओं को और जख्म बनकर फूटते इनके पूरी तरह सड़ चुके हाड़ मांस और रक्त को पूरी सशक्तता और शिद्दत से दिखाते हैं और न केवल दिखाते हैं बल्कि उन्हें समकालीन ऐतिहासिक भौतिकवादी संदर्भ में परिभाषित भी करते हैं। उनकी ये परिभाषाएँ कहानी में एक ऐसा विमर्श रचती हैं कि यथार्थ एक सामान्य जनोन्मुख व्याख्या ग्रहण करने लगता है। यथार्थ की यह व्याख्या एक महत्वपूर्ण अवयव है जो कहानी को एक पाठकीय स्वरूप देता चलता है। अतः कहानी पढ़कर खत्म करते-करते यह कतई महत्वपूर्ण नहीं रह जाता कि देवेंद्र का कथानायक सब-कुछ से पल्ला झाड़ एक पलायन-सा करता परिदृश्य से ओझल हो जाता है। इस प्रक्रिया में उसका यह पलायन भी यथार्थ के एक अनिवार्य हिस्से की तरह ही कहानी में अपनी जगह बनाता है। यहाँ हार या जीत या संघर्ष या समझौता जैसे सरलीकरणों से काम नहीं चल सकता। इन शब्दों से कहानी के कथ्य और रूप की व्याख्या नहीं की जा सकती। सबसे मुख्य बात यह है कि लेखक की चयित अंतर्वस्तु इस कथित पलायन से पहले ही पूरी हो जाती है। मसलन, यदि लेखक 'क्षमा करो हे वत्स!' कहानी के अंत में यह उल्लेख नहीं भी करता कि वह एकदम निर्जीव-सा वापस लखीमपुर चल दिया और उसने ईश्वर से प्रार्थना की कि उसे मुफ्त के उपदेशकों से बचाए (शहर कोतवाल की कविता; पृ.-118) तो भी कहानी की मूल अंतर्वस्तु में, उसके पाठकीय प्रभाव में कोई फर्क नहीं आ जाता! यह कहानी उस कविता के साथ ही पूरी हो जाती है जिसे अंशुल अपने पापा को संबोधित करते हुए कहता कल्पित किया गया है। इस कविता के बाद यह अंश अनावश्यक बल्कि एक मैनरिज्म की तरह दिखाई देता है। देवेंद्र ने अपनी आदत के मुताबिक कई कहानियों में ऐसा किया है। यह ठीक है कि, जैसा कि उन्होंने इसी कहानी में इसी अंतिम अंश के आस-पास यह अंकित किया है कि - 'मेरे पास कवि की कल्पना है और लुहार की भट्ठी। शब्दों का साथी मैं उन्हें मन मुताबिक जब, जहाँ जैसे चाहूँगा ढाल लूँगा।' (वही; पृ.-117)। देवेंद्र की यह प्रतिभा स्वागतयोग्य है और कोई भी इससे प्रभावित हुए बिना नहीं रहेगा। लेकिन इसका यह अर्थ तो नहीं कि वे कहानी में एक अराजकता-सी पैदा करने लगें।

कविता के अवयवों को भरपूर इस्तेमाल

यह एक उल्लेखनीय तथ्य है कि देवेंद्र कहानी में कविता का, कविता के अवयवों का भरपूर स्तेमाल करते हैं और अपने नैरेशन को काफी ऐंद्रिक बनाते चलते हैं। न केवल काव्यात्मक सी पंक्तियाँ और काव्य-रचना जगह-जगह उनकी कहानियों में मिलती हैं बल्कि इसके साथ ही दृश्य-निर्माण में भी काव्यात्मक भावोद्वेग यत्र-तत्र दिखाई देता है। यह प्रवृत्ति उनकी कहानियों में पाठकीय रमणीयता को बढ़ाती है। पाठक कहानी पढ़ते हुए भावात्मक तल्लीनता का-सा अनुभव करता चलता है। लेकिन यहाँ साथ ही यह ध्यान में रखना सबसे ज्यादा जरूरी है कि देवेंद्र हिंदी में प्रचलित कवि-कथाकार की परिभाषा में नहीं आते और इसके साथ यह भी कि उनकी कहानियों की समीक्षा में कविता के तत्वों से काम लेना कतई आवश्यक नहीं है। दरअसल कहानी विधा इतनी व्यापक, गहरी और बहुआयामी है कि उसमें कविता, नाटक आदि के अनेकानेक उपांग अंतर्निहित रह सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया-भर में कहानी-विधा के जितने प्रारूप, शैलियाँ और विधान मिलते हैं, उतने किसी अन्य विधा में नहीं हैं। कहानी के प्रारंभ से लेकर आज तक कहानी ने जितने रूप बदले और विकसित किए हैं, उतने किसी अन्य विधा ने नहीं किए। स्वयं भारतीय कहानियाँ इसकी बहुत बड़ी मिसाल हैं।

राजनीति से लेकर घर-परिवार तक का अंदरुनी फरेब

कथाकार देवेंद्र का अपने चयित यथार्थ, कथावस्तु और पात्रों-चरित्रों के साथ एक द्वंद्वात्मक रिश्ता हर जगह दिखाई देता है। मैंने पूर्व में कहा कि कहानी में झोली-फटकार शैली अपनाते हुए वे अपने पात्रों को उनकी अपनी नियति स्वयं तलाशने देते हैं। वे न किसी चरित्र से ज्यादा लगाव ही रखते हैं, न ज्यादा घृणा। एक कथात्मक निराग्रहता हर तरफ देवेंद्र की कहानियों में हमें मिलती है। दरअसल इसी का यह परिणाम है कि पुरानी शब्दावली में जिन्हें सद्-असद् पात्र कहा जाता है, उन कथित अच्छे-बुरे सभी पात्रों का अपना पक्ष उनके यहाँ पर्याप्त स्थान पा सका है। दरअसल हुआ यह है कि अच्छे और बुरे के पुराने मानक और अभिलक्षण आज के बदले हुए समय में पर्याप्त अप्रासंगिक हो गए हैं। अब चेहरे से, वाणी से और यहाँ तक कि ऐटीट्यूड से भी यह अंदाज लगाना काफी मुश्किल हो गया है कि अमुक आदमी अच्छा है या बुरा है। आदमी या औरत का अच्छा या बुरा होना अब काफी संश्लिष्ट हो गया है और यह सारा मसला अब स्थितियों-परिस्थितियों के हवाले हो गया है। स्वयं देवेंद्र ने अपनी महत्वपूर्ण कहानी 'समय-बे-समय' में यह इंगित किया है कि अब चेहरे, चाल-ढाल, एप्पीयरेंस से लोगों की असलियत पहचानना एकदम मुश्किल हो गया है। मसलन, आजकल के हत्यारों के विषय में विश्वंभर के मार्फत वे लिखते हैं - 'उसे विश्वास करने में मुश्किल हो रहा था कि आराम से बस में सफर करने वाला आदमी हत्यारा हो सकता है - एकदम आम लोगों के बीच आम आदमियों की ही तरह। उसके लेखे हत्यारे रात के अँधेरे में दबे पाँव निकलने वाले कुछ-कुछ विचित्र और भयावने होते होंगे। उनकी आँखें लाल होती होंगी। भेड़िये की तरह चालाक और चौकन्ने वे लोग कभी हँसते नहीं होंगे। न उनकी स्मृतियाँ होती होंगी, न सपने। यह कैसा, जो आराम से बस में सफर कर रहा है। पान खा रहा है, और ऊँची-ऊँची आवाज में बात कर रहा है।' (कथादेश; जु. 2001; पृ.-17)। न केवल हत्यारे बल्कि और बहुत सारे लोग अब ऊपरी चोला-बोला बदल चुके हैं। इस बदलाव में नया सांस्कृतिक संक्रमण तो अपना कमाल दिखा ही रहा है, हमारी अपनी सैकड़ों-हजारों साल पुरानी सामाजिक संरचना में आधारभूत रूप से निहित दोगलापन भी कम बड़ी भूमिका नहीं निभा रहा है। राजनीति से लेकर घर-परिवार तक हर जगह एक गजब अंदरुनी फरेब आज के हमारे इस समय की सबसे बड़ी पहचान है। देवेंद्र इस अंदरुनी फरेब को तरह-तरह से अपनी कहानियों में चित्रित करते हैं।

पूरे एक देश-काल और उसकी विद्रूपताओं की कथा

निश्चय ही मध्यवर्ग उनका इस मामले में सबसे बड़ा वस्तु-क्षेत्र है लेकिन देवेंद्र को हम उस अर्थ में मध्यवर्ग का कहानीकार नहीं कह सकते, जिस अर्थ में हिंदी में इस प्रत्यय को लिया जाता है। मध्यवर्ग उनकी कथात्मक आलोचना का पात्र बनता है लेकिन देवेंद्र की रचना-दृष्टि या जीवन-दृष्टि मध्यवर्ग-केंद्री नहीं है। एक तरह से देखा जाए तो देवेंद्र समाज के किसी वर्ग-विशेष की सेवा में समर्पित नहीं हैं; उनके ध्यान में सबसे पहले अपना समय है और समय की चकरघन्नी पर घूमता राजनीति से लेकर घर तक का समूचा परिदृश्य है। मध्यवर्ग-केंद्री होने की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि लेखक या तो पूरी तरह उसका प्रवक्ता या प्रोवोकेटर बन जाता है या फिर उसे पूरी तरह डिस्कार्ड करने लगता है। अतः किसी एक वर्ग-विशेष पर केंद्रित होना पाठकीय दृष्टि से अत्यंत घातक है। देवेंद्र की अपनी वृत्ति इसकी इजाजत उन्हें देती भी नहीं है : 'असंग जीवन की निर्मम तटस्थता मेरे प्राण-प्राण में समा गई है।' (शहर कोतवाल की कविता; पृ.-97)। लेकिन जैसा कि मैंने पीछे कहा; इस तटस्थता का अर्थ मूल्यहीनता या यथातथ्यता नहीं है। देवेंद्र एक मूल्यनिष्ठ और मूल्यों को समर्पित कथाकार हैं। मूल्य-स्थापना उनकी सबसे बड़ी चिंता है। यह मूल्य-स्थापना की चिंता ही उनसे 'धर्मराज', 'महाकाव्य', का आखिरी नायक', 'देवांगना' और 'अवांतर-कथा' जैसी कहानियाँ लिखवाती है। हाँ, यह जरूर है कि यह मूल्य चिंता हाय-हाय, फाय-फाय जैसी नहीं है, जो लेखक को लकीर का फकीर बना देती है। देवेंद्र अपने ऐतिहासिक समय की द्वंद्वात्मकता के बीच से इन मूल्यों की 'मा फलेषु कदाचन' जैसी शैली में तलाश करते हैं। दरअसल यही वह प्रक्रिया है जिससे हर चरित्र अपने स्याह-सफेद रूप में उनके रू-ब-रू होता है। देवेंद्र इसी प्रक्रिया के तहत जहाँ 'एक खाली दिन' की शताक्षी, 'एक खंडित प्रेमकथा' की निरुपमा (सेठानी) और 'अवांतर-कथा' की माँ का अपना पक्ष रख पाए हैं वहीं विमला (बीच के दिन), सुमन (स्वांतः सुखाय) जैसे चरित्र भी उकेर पाए हैं। अब इन दोनों ही तरह की स्त्रियों में किसे अच्छा और किसे बुरा कहा जाए यह न तो एक लेखक के रूप में देवेंद्र की चिंता का विषय है और न वे इसे लेकर किसी पशोपेश में ही हैं। मसलन, 'एक खंडित प्रेमकथा' में अपने हाथ से धीरे-धीरे निकलती जाती सेठानी को निरंजन गुस्से में जब यह कहते हैं कि 'तू रंडी है क्या?' तो पलटकर तत्काल सेठानी भी परम घृणा से उन्हें नहले पे दहला मार देती हैः 'तू भी तो रंडा है।' (तद्भव-2; पृ.-82)। यहाँ गलत न सेठानी है, न निरंजन। ये दोनों ही दरअसल सही भी नहीं हैं। लेकिन द्वंद्व यहाँ इन दोनों स्त्री-पुरुष के बीच नहीं है। असल द्वंद्व यहाँ उन उद्दाम और उच्छल संवेदनाओं - जिन्हें सेठानी यानी कि निरुपमा (और प्रकारांतर से निरंजन भी) शिद्दत से जीना चाहती है, थोड़ा जीती भी है - और उस सड़ी-गली सामाजिक संरचना के बीच है जिसके सहारे दुनिया का सारा कारोबार चल रहा है। यह कारोबार क्या है और कैसे चल रहा है; देवेंद्र जगह-जगह इस विद्रूपता की भी अच्छी खबर लेते हैं। मसलन इसी कहानी में सेठ मनोहरलाल जायसवाल हैं जो बुढ़ापे की ओर बढ़ती और विभिन्न बीमारियों का घर बनी अपनी इस उम्र में अपनी बेटी जैसी उम्र की स्त्री से तीसरा विवाह करते हैं और एक तरफ सेठानी निरुपमा है जो निरंजन से आशिकी और और बहुत कुछ प्राप्त कर उसे सार्वजनिक आत्म-अस्वीकृति में ही रिड्यूस कर देने के लिए अभिशप्त है और दूसरी तरफ अपमान और आत्मग्लानि में एक साथ झुलसता लगभग नेस्तनाबूद हुआ निरजन है जो एकाधिकारवादी पुरुष-मानसिकता से यहाँ भी मुक्त नहीं है। भारतीय सामाजिक संरचना और उच्छल-उद्दाम स्वतंत्र संवेदना का यह द्वंद्व सबको अपनी-अपनी धुरी से विलग कर देता है। अब अगर कोई यह पूछे कि इस कहानी का संदेश क्या है तो यह एक वैसा ही प्रश्न होगा कि कोई सेठानी और निरंजन के बारे में यह टिप्पणी करे कि धन्य है इनका यह प्रेम जो एक कूटनीति की तरह चलता अंत में एक-दूसरे को ही पछाड़ देता है! जिस तरह यह टिप्पणी गैर-रचनात्मक और अमानवीय है, ठीक वैसा ही यह प्रश्न है कि इस कहानी में देवेंद्र आखिर स्थापित क्या कर रहे हैं - प्रेम संवेदना या प्रेम के नाम पर एक-दूसरे को और सारी दुनिया को धोखा! आखिर क्या यह वही प्रेम है जिसके बारे मे स्वयं देवेंद्र का यह अभिमत है कि - 'स्त्री और पुरुष के बीच आकर्षण और फिर प्रेम एक स्वाभाविक गुण है। शारीरिक संबंधों का उच्चतम रूप प्राप्त करने के बाद यह प्रेम समाजोन्मुख होने लगता है।' (शहर कोतवाल की कविता; पृ.-104)। यह प्रेम तो, इसके उलट, सामाजिक असंगति और विद्रूप पैदा कर रहा है। तो फिर, इस कहानी का आशय क्या है? मेरी निगाह में इस कहानी का आशय सिवाय इसके कुछ और नहीं है कि लेखक यहाँ एक स्थिति और समय-विशेष की नियति में फँसे विभिन्न चरित्रों का इतिवृत्त प्रस्तुत करना चाह रहा है और उदाहरण के लिए उसने स्त्री-पुरुष-आकर्षण - अर्थात् प्रेम - को आधार बनाया है। ये चरित्र जिस नियति में फँसे हैं उसके पीछे नेपथ्य में देश की राजनैतिक, सामाजिक, आर्थिक व्यवस्था है, जो या तो कहीं है ही नहीं और है तो सिर्फ एक प्रहसन की तरह कहीं चल रही है। इस प्रहसन की अंतःप्रकृति ठीक वही है जिसे लंगूर को खरगोश कबूलवाने में लगी यू.पी. पुलिस के वाक्ये के मार्फत देवेंद्र ने 'क्षमा करो हे वत्स!' कहानी (वही; पृ.-111) में लिया है। व्यवस्था और तंत्र के इस प्रहसन के बीच किसी का भी प्रेम और प्रेम क्या, कोई भी संवेद एक प्रहसन ही तो बन कर रह जाएगा! 'बीच के दिन', 'स्वांतः सुखाय' और 'एक खाली दिन' में भी तो प्रेम-तंतु इसी प्रहसन में तब्दील होते नजर आते हैं। ऐसा नहीं है कि सेठानी निरंजन को एकदम साफ कर देती है। आखिर उसके पेट में उसकी संतान तो पल ही रही है और वह उसे पैदा भी करेगी; लेकिन कुल मिलाकर इस सारे प्रकरण का कोई व्यक्तिगत या सामाजिक भविष्य नहीं है। और हो सकता है कि जैसी कि निरंजन की मनःस्थिति इस समय है, हो सकता है, सेठानी के उस पुराने आशिक की तरह सेठानी और उसकी संतान की नई असलियत खोलता एक गुमनाम पत्र वह भी सेठ को डाल दे और तब उसे गुप्त रखने वाला भी निरंजन जैसा कोई नया आशिक सेठानी के पास न हो; तब, तब क्या होगा? तब क्या-क्या नहीं हो गुजरेगा इस परिवार में! यानी कि, प्रेम यहाँ मुद्दा नहीं है। असल मुद्दा है, वह देश-काल वातावरण जो इन सब लोगों को नचा रहा है। कहानी-समीक्षा का यह परंपरागत अवयव देवेंद्र के संदर्भ में विशेष महत्वपूर्ण हो उठा है। इस देश-काल वातावरण की चपेट में निरंजन और सेठानी ही नहीं हैं, सेठ मनोहरलाल, निरंजन की पत्नी और उनसे जुड़े और बहुत सारे स्त्री-पुरुष भी हैं। देवेंद्र जैसे किसी पात्र या चरित्र की कथा नहीं कहते, पूरे एक देश-काल और उसकी विद्रूपताओं की कथा कहते हैं। इस दृष्टि से, निश्चय ही, देवेंद्र अपनी एक अलग पहचान बना पाने में सफल हुए हैं। 'शहर कोतवाल की कविता' के ब्लर्व पर काशीनाथ जी ने यह सही ही लिखा है कि - 'वे कम लिखते हैं - बहुत सँभल-सँभल कर। कुछ इस इरादे से कि हर कहानी उनकी अपनी 'पहचान' को पुख्ता करे।' हालाँकि जिस 'निजीपन' को उन्होंने उनकी पहचान के बतौर चिन्हित किया है, वह उनकी व्यक्तिगतता नहीं है। देवेंद्र का निजीपन दरअसल वह उद्दामता और गर्मजोशी है, जो उन्हें अपने पात्रों के साथ तद्वत बनाती है। जिसके तहत हर पात्र उनके लिए एक परीक्षा की घड़ी होता है। और यहाँ भी, महत्वपूर्ण यह नहीं है कि इस परीक्षा का परिणाम क्या रहा बल्कि यह है कि परीक्षा की तैयारी और परीक्षा की अदायगी कितनी 'गंभीर और सावधान' रही! यह तो पीछे हमने देखा ही कि देवेंद्र फल की इच्छा न कर केवल कर्मठता में विश्वास रखते हैं। यह कर्मठता जगह-जगह उनकी कहानियों में दिखाई देती है।

[ श्रेणी : आलोचना। लेखक :  शंभु गुप्त ]