'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

ओ जर्मनी, म्लान माँ! / बर्तोल ब्रेख्त

बर्तोल ब्रेख्त
औरों को बोलने दो उसकी शर्म के बारे में,
मैं तो अपनी शर्म के बारे में बोलता हूँ ।

ओ जर्मनी, म्लान माँ !
तुम कितनी मैली हो
अब जबकि तुम बैठी हो
और इतरा रही हो
कीचड़ सनी भीड़ में ।

तुम्हारा सबसे गरीब पुत्र
बेजान होकर गिर पड़ा ।
जब भूख उसकी बर्दाश्त से बाहर हो गई ।
तुम्हारे अन्य पुत्रों ने
अपने हाथ उसके खिलाफ़ उठा दिए ।
यह तो कुख्यात है ।

अपने हाथ इस तरह उठा कर,
अपने ही भाई के विरुद्ध,
वो तुम्हारे चारों तरफ़ घूमते हैं
और तुम्हारे मुँह पर हँसते हैं ।
यह भी सर्वज्ञात है ।

तुम्हारे घर में
दहाड़ कर झूठ बोले जाते हैं
लेकिन सच को
चुप रहना होगा
क्या ऐसा ही है ?

क्यों उत्पीड़क तुम्हारी प्रशंसा करते हैं दुनिया भर में,
क्यों उत्पीड़ित निंदा करते हैं ?
जिन्हें लूटा गया
तुम्हारी तरफ़ उंगली उठाते हैं, लेकिन
लुटेरा उस व्यवस्था की तारीफ़ करता है
जिसका अविष्कार हुआ तुम्हारे घर में !

जिसके चलते हर कोई तुम्हें देखता है
अपनी ओढ़नी का किनारा छुपाते हुए, जो कि खून से सना है
उसी खून से जो
तुम्हारे ही पुत्रों का है ।

तुम्हारे घर से उग्र भाषणों की प्रतिध्वनि को सुन कर,
लोग हँसते हैं।
पर जो भी तुम्हें देखता, अपनी छुरी पर हाथ बढ़ाता है
जैसे कोई डाकू देख लिया हो ।

ओ जर्मनी, म्लान माँ !
क्या तुम्हारे पुत्रों ने तुम्हें मज़बूर कर दिया है
कि तुम लोगों के बीच बैठो
तिरस्कार और भय की वस्तु बन कर !

अंग्रेज़ी से अनुवाद: अनिल एकलव्य

[ संकलन : माँ । बर्तोल ब्रेख्त ]