'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

निर्मला : सामर्थ्य और सीमा / विजेंद्र नारायण सिंह

विजेंद्र नारायण सिंह 
प्रेमचंद ने 'असरारे मआबिद' (1903 ई.) से लेकर 'मंगलसूत्र' (1936 ई.) तक कुल 15 उपन्यासों की रचना की। इनमें से अधिकांश उपन्यास बड़े आकार के हैं। छोटे आकार के तीन-चार उपन्यास ही हैं। उनका छोटे आकार का सर्वाधिक महत्वपूर्ण उपन्यास 'निर्मला' है। 'निर्मला' इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली महिलाओं की पत्रिका 'चाँद' में धारावाहिक रूप से नवंबर 1925 से नवंबर 1926 तक प्रकाशित हुआ था। पुस्तक रूप में यह हिंदी में 1927 में और उर्दू में 1929 में प्रकाशित हुआ। चूँकि यह उपन्यास महिलाओं की पत्रिका में प्रकाशित हुआ था, इसलिए स्वाभाविक रूप से इसका विषय महिलाओं से संबंधित होना चाहिए था। प्रेमचंद ने अपनी समाज सुधारवादी प्रवृत्ति के अनुकूल इस उपन्यास का विषय दहेज-प्रथा और उसके दुष्परिणामों को बनाया। अपने एक पत्र में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है कि इस उपन्यास की रचना का उद्देश्य समाज की बुराइयों का पर्दाफाश करना है।

'निर्मला' में अनमेल विवाह और दहेज-प्रथा की दुखांत कहानी है। उपन्यास के अंत में निर्मला की मृत्यु इस कुत्सित सामाजिक प्रथा को मिटा डालने के लिए एक भारी चुनौती है। पिता उदयभानु लाल की मृत्यु हो जाने पर माता कल्याणी दहेज न दे सकने के कारण अपनी पुत्री निर्मला का विवाह भालचंद और रंगीली के पुत्र भुवनमोहन से न कर बूढ़े वकील तोताराम से कर देती है। तोताराम के तीन पुत्र पहले ही से थे, इस पर भी उनकी विलासिता किसी प्रकार कम न हुई। इतना ही नहीं निर्मला के घर में आने पर एक नवयुवती वधू के हृदय की उमंगों का आदर और उसे अपना प्रेम देने के स्थान पर तोताराम को अपनी पत्नी और अपने बड़े लड़के मंशाराम के पारस्परिक संबंध पर विलासिताजन्य संदेह होने लगता है, जो अंततोगत्वा न केवल मंशाराम के प्राणांत का कारण बनता है वरन सारे परिवार के लिए अभिशाप बन जाता है। दूसरा लड़का जियाराम भी घर के विषाक्त वातावरण के प्रभाव अंतर्गत कुसंग में पड़कर निर्मला के आभूषण चुराकर ले जाता है। रहस्य का उद्घाटन होने पर वह भी आत्महत्या कर लेता है। सबसे छोटा लड़का सियाराम विरक्त होकर साधु हो जाता है। परिवार में निर्मला की ननद रुक्मिणी उसको फूटी आँखों भी नहीं देख सकती और प्रायः निर्मला के लिए दुख और क्लेश का कारण बनती है। तोताराम दो पुत्रों के विरह से संतप्त होकर सियाराम को ढूँढ़ने निकल पड़ते हैं। उधर भुवनमोहन निर्मला को अपने प्रेमपाश में फाँसने की चेष्टा करता है और असफल होने पर आत्महत्या कर लेता है। निर्मला के जीवन में घुटन के सिवाय और कुछ नहीं रह जाता। अंत में वह मृत्यु को प्राप्त होती है। जिस समय उसकी चिता जलती है, तोताराम लौट आते हैं। इस प्रकार, उपन्यास का अंत करुणापूर्ण है और घटना-प्रवाह में अत्यंत तीव्रता है।

निर्मला और तोताराम की इस प्रधान कथा के साथ सुधा की कहानी जुड़ी हुई है। तोताराम को जब निर्मला और मंशाराम के संबंध में निराधार संदेह होने लगता है और निर्मला अपने को निर्दोष सिद्ध करने के लिए मंशाराम के प्रति निष्ठुरता का अभिनय करती है और जब मंशाराम को घर से हटाकर बोर्डिंग में दाखिल कर दिया जाता है, तो बालक मंशाराम के हृदय को मार्मिक आघात पहुँचता है। उसकी दशा दिन-पर-दिन गिरती जाती है और अंत में अपने पिता का भ्रम दूरकर वह मृत्यु को प्राप्त होता है। तोताराम को मानसिक विक्षोभ होता है। इसी समय प्रेमचंद ने सुधा और उसके पति डॉ. भुवनमोहन का (जिसके साथ निर्मला का पहले विवाह होने वाला था) निर्मला से मित्रतापूर्ण संबंध स्थापित कराया। सुधा और निर्मला घनिष्ठ मित्र बन जाती है। सुधा अपने शील, सौजन्य और सहानुभूतिपूर्ण हृदय से निर्मला को मुग्ध कर लेती है। वह निर्मला की छोटी बहन कृष्णा का विवाह अपने देवर से कराती ही नहीं वरन् निर्मला की माता की गुप्त रूप से आर्थिक सहायता भी करती है। निर्मला के मायके में कृष्णा के विवाह के बाद सुधा का पुत्र मर जाता है। निर्मला के भी एक बच्ची पैदा होती है। उसे लेकर वह अपने घर लौट आती है। एक दिन सुधा की अनुपस्थिति में जब निर्मला उसके घर गई, तो डॉक्टर भुवनमोहन आत्मसंयम खो बैठते हैं। पता लगने पर सुधा अपने पति की ऐसी भर्त्सना करती है कि वह आत्मग्लानि के वशीभूत हो आत्महत्या कर लेता है। इस घटना के पश्चात तो निर्मला के जीवन की विषादपूर्ण कथा अपनी चरमसीमा पर पहुँच जाती है।

प्रेमचंद ने भालचंद और मोटेराम शास्त्री के प्रसंग द्वारा उपन्यास में हास्य की सृष्टि की है। दहेज की प्रथा हिंदू समाज के लिए अभिशाप रही है। 'निर्मला' को पढ़कर लगता है कि प्रेमचंद के दिनों में भी यह कम भयानक नहीं थी। निर्मला के जीवन की त्रासदी का मूल कारण यही प्रथा है। इस प्रथा का समाधान क्या हो सकता है, प्रेमचंद ने इस उपन्यास में इसका कोई संकेत नहीं दिया है। इससे यह स्पष्ट होता है कि इस उपन्यास की रचना करते समय प्रेमचंद उस दिशा में अग्रसर हो रहे थे जिसका परिणाम 'गोदान' जैसे उपन्यास और 'कफन', 'पूस की रात', 'बड़े भाई साहब' जैसी कहानियों के रूप में सामने आया। प्रेमचंद ने अपने उपन्यासों में एक आयामी समस्याओं को कभी नहीं उठाया। एक मुख्य समस्या के साथ और भी कई समस्याएँ लिपटी रहती हैं। इस उपन्यास में दहेज की समस्या तो केंद्र में है ही, उसके साथ ही अनमेल विवाह की समस्या भी है। यह दहेज की समस्या का परिणाम है। यों तो 'निर्मला' एक व्यक्ति और एक परिवार की त्रासदी है लेकिन वह समाज से कटी हुई नहीं है। प्रेमचंद मनुष्य के व्यक्तिगत जीवन का चित्रण नहीं करते हैं बल्कि उसके संस्थाबद्ध जीवन का चित्रण करते हैं। वे उसे एक स्वायत्त इकाई के रूप में स्वीकार नहीं करते हैं, बल्कि एक ऐसी इकाई के रूप में स्वीकार करते हैं जो अन्य इकाइयों के साथ अविच्छिन्न है। इसीलिए इसमें निर्मला की त्रासदी ऐसे समाज में घटित होती है जो भ्रष्ट और रूढ़िबद्ध है, जिसमें निर्मला के पिता उदयभानु लाल अपनी उदारता और ईमानदारी से अपने बच्चों को अभिशप्त करते हैं और आबकारी विभाग के भ्रष्ट कर्मचारी भालचंद्र सिन्हा दिन-दिन मोटे होते जाते हैं। इस भ्रष्टाचार के प्रति प्रेमचंद के मन में आक्रोश है जो भालचंद्र के इस व्यंग्यचित्र के रूप में अभिव्यक्ति पाता है - 'भालचंद्र बहुत ही स्थूल, ऊँचे कद के आदमी थे। ऐसा मालूम होता था कि काला देव है, या कोई हब्शी अफ्रीका से पकड़कर आया है। सिर से पैर तक एक ही रंग था - काला चेहरा इतना स्याह था कि मालूम न होता था कि माथे का अंत कहाँ है और सिर का आरंभ कहाँ? बस कोयले की एक सजीव मूर्ति थी। आपको गर्मी बहुत सताती थी। आप आबकारी में ऊँचे ओहदे पर थे, छह सौ रुपए वेतन मिलता था। ठेकेदारों से खूब रिश्वत लेते। आँखों का रंग लाल था। जैसे पक्का मुसलमान पाँच बार नमाज पढ़ता है, वैसे ही आप भी पाँच बार शराब पीते थे।' स्वाभाविक है कि ऐसे भ्रष्ट लोगों में मानवीयता मर जाती है। इसलिए निर्मला के पिता के मरते ही भालचंद्र ने उसके साथ अपने पुत्र का विवाह करने से साफ इनकार कर दिया और निर्मला को अपने पिता की अवस्था के मुंशी तोताराम की पत्नी बनना पड़ा।

मुंशी तोताराम और निर्मला दोनों इस भ्रष्ट समाज-व्यवस्था के अपने-अपने ढंग से शिकार हैं। निर्मला तो विवश है। इसलिए वह दयनीय है। इस उपन्यास में अनेक करुण प्रसंगों की उद्भावना करके निर्मला के प्रति पाठकों की करुणा को लेखक ने उत्तेजित किया है। इसकी चरम परिणति निर्मला की मृत्यु पर रूपात्मक टिप्पणी है : 'चौथे दिन संध्या समय वह विपत्ति-कथा समाप्त हो गई। उसी समय जब पशु-पक्षी अपने बसेरे को लौट रहे थे, निर्मला का प्राण-पक्षी भी दिन भर शिकारियों के निशानों, शिकारी चिड़ियों के पंजों और वायु के प्रचंड झोंकों से आहत और व्यथित अपने बसेरे की ओर उड़ गया।' निर्मला के करुण अवसान और प्रेमचंद की इस टिप्पणी को पढ़ते समय हार्डी के उपन्यास 'टैस' की नायिका की करुण परिणति हमारी चेतना में कौंध जाती है। निर्मला को वरण की स्वाधीनता नहीं थी, उसके सामने कोई विकल्प नहीं था, लेकिन मुंशी तोताराम के सामने विकल्प था। वे चाहते तो अपने बड़े पुत्र से एक वर्ष छोटी यानी 15 वर्ष की लड़की से विवाह न करते। उनकी जिस प्रकार की परिस्थिति थी, उसमें उनके लिए विवाह अनिवार्य नहीं था। उनकी उम्र पचास वर्ष की थी। उनकी बयालीस वर्ष की विधवा बहन उनके साथ रहती थी। उनके पहली पत्नी से तीन पुत्र थे, फिर भी उन्होंने विवाह किया। इसमें उनका अपना दोष कितना था और समाज का कितना था, जिसमें मुंशी तोताराम रहते थे। हमें लगता है कि लेखक मुंशीजी को पूर्णतः दोषी नहीं मानता, समाज को ही दोषी मानता है। इसलिए उसने उन्हें दया और उपहास दोनों का विषय बनाया है।

जहाँ ऐसा पति और ऐसा समाज हो, उसमें त्रासदी का घटना आश्चर्य की बात नहीं है, त्रासदी का न घटना आश्चर्य की बात हो सकती है। फिर यहाँ तो त्रासदी के घटने के लिए और भी स्थितियाँ थीं। निर्मला का सबसे बड़ा सौतेला पुत्र मंशाराम था। उसमें एक आदर्श युवक की सभी विशेषताएँ थीं। वह इकहरे बदन का छरहरा, सुंदर, हँसमुख और लज्जाशील युवक था। वह कुशाग्रबुद्धि, पढ़ने में तेज और साहसी था। इसलिए एक ओर तो वह निर्मला की विलासिनी कल्पना की तृप्ति का साधन था और दूसरी ओर तोताराम के संदेह का विषय था। अगर सौतेले पुत्र के रूप में मंशाराम न होता, तो निर्मला अनमेल विवाह के बावजूद सहज जीवन व्यतीत कर सकती थी। निर्मला के आचरण को अस्वाभाविक बनाने और उसे त्रासदी की ओर ले जाने में उसकी ननद रुक्मिणी, अड़ोसी-पड़ोसियों तथा अन्य सौतेले पुत्रों ने भी अपनी भूमिका निभाई है। ऐसा लगता है, जैसे निर्मला के त्रासद अंत को पूर्णतः स्वाभाविक, विश्वसनीय और अनिवार्य बनाने के लिए प्रेमचंद ने पूरी घेरेबंदी की है और इसमें उन्हें बहुत बड़ी सीमा तक सफलता मिली है।

डॉ. रामविलास शर्मा ने माना है कि 'निर्मला प्रेमचंद के कथा-साहित्य के विकास में एक मार्ग-चिह्न है। 'निर्मला' तक पहुँचते-पहुँचते प्रेमचंद की उपन्यास-कला में परिपक्वता आ चली थी। इसलिए वे इस उपन्यास में एक चुस्त और सुगठित कथा कह सके हैं। इस उपन्यास का लक्ष्य एक है और इसका केंद्र भी एक है। इसका लक्ष्य है निर्मला का त्रासद अंत और केंद्र है स्वयं निर्मला। इस उपन्यास की सभी छोटी-बड़ी घटनाएँ निर्मला से संबद्ध हैं। वे या तो निर्मला के द्वारा प्रेरित हैं या निर्मला को आचरण-विशेष के लिए प्रेरित करती हैं। लगता है हर घटना उसे उसके त्रासद अंत की ओर ठेल रही है। घटनावली के बीच-बीच में सूक्ष्म संकेत प्रेमचंद देते चलते हैं जो उपन्यास के वातावरण को गहराते हैं। निर्मला की असहायता बार-बार इस उपन्यास में उभरकर आती है, उसके पूरे जीवन का विहगावलोकन करें, तो स्पष्ट होगा कि उसके प्राण-पखेरू को कहीं बसेरा नहीं मिला - न पिता के घर, न पति के घर और न सखी-सहेली के घर। उसकी इस असहायता के संदर्भ में उपन्यास के प्रारंभ में कहे गए उसका एक कथन बहुत गहरा अर्थ देने लगता है। जब निर्मला के विवाह की बातचीत चलती है, तब उसकी बहन कृष्णा पूछती है कि जिस तरह निर्मला को पिता के घर से निकालकर पति के घर भेज दिया जाएगा, क्या उसी तरह कृष्णा को भी किसी दिन निकालकर भेज दिया जाएगा। निर्मला कहती है - 'और नहीं क्या, तू बैठी रहेगी? हम लड़कियाँ हैं, हमारा घर कहीं नहीं होता है।' निर्मला की जीवन-कथा से तो यही सिद्ध होता है कि हमारे समाज में लड़कियाँ एकदम विवश होती हैं, उनका घर कहीं नहीं होता है।

लेकिन, सब जगह 'निर्मला' के कथानक का गठन इतना अच्छा नहीं है। इस उपन्यास के गठन में अनेक दोष अतिकथन के कारण आ गए हैं। प्रेमचंद ने पाठकों की बुद्धि और कल्पना पर बहुत कम विश्वास किया है। इससे उपन्यास की प्रभावशीलता कम होती है। इस उपन्यास के कथाशिल्प की एक और दुर्बलता संयोगों का अत्यधिक उपयोग है। उदाहरण के लिए जिस समय मुंशी तोताराम निर्मला से अपनी बहादुरी की डींग हाँक रहे थे, उसी समय रुक्मिणी के कमरे में साँप निकल आया। जिस समय निर्मला के दाह-कर्म की समस्या उपस्थित हुई, उसी समय मुंशी तोताराम आ उपस्थित हुए। ऐसे संयोग यदि एकाध बार घटित होते हैं, तो कथाशिल्प की अधिक हानि नहीं करते किंतु बार-बार घटित होने पर वे कथा की स्वाभाविकता को, उसकी विश्वसनीयता को खंडित करते हैं, पाठक को उबाते हैं। प्रेमचंद अपने उपन्यासों में अनेक पात्रों को जन्म देते हैं, कितु जब कुछ पात्र लेखक की इच्छा के विपरीत फलने-फूलने लगते हैं तब वे लेखक के लिए समस्या बन जाते हैं। लेखक उनका क्या उपयोग करे, ऐसी स्थिति में प्रेमचंद ऐसे पात्रों की हत्या, आत्महत्या आदि का उपयोग करके मंच से हटा देते हैं। हत्या या आत्महत्या को अनिवार्य बना देने के लिए लेखक स्थितियाँ तैयार नहीं करता, बल्कि संयोगों का सहारा लेता है। जहाँ उन्होंने संयोग और स्थितियों की अनिवार्यता को समंजित कर दिया है वहाँ संयोग की ओर हमारा ध्यान कम ही जाता है। हमारी बात एक ही उदाहरण से स्पष्ट हो जाएगी। निर्मला अपने और अपनी बच्ची के आर्थिक भविष्य की अनिश्चितता के कारण बहुत कंजूस हो गई है। उसकी इस कृपणता के कारण बाजार का सारा काम सियाराम को करना पड़ता है। इतना ही नहीं, वह बाजार से जो चीजें मँगवाती है, उनमें अनेक कमियाँ निकालती है और बार-बार बदलवाती है। एक दिन वह सियाराम से घी मँगवाती है, फिर उसे लौटवाती है। सियाराम बहुत परेशान हो जाता है। वह भूखा ही स्कूल चला जाता है। उसे एक साधु मिलता है और वह उसी के साथ चला जाता है। यहाँ संयोग से साधु से सियाराम की होने वाली मुलाकात और उसका घर से भाग जाना इतना स्वाभाविक और अनिवार्य लगता है कि संयोग की ओर हमारा ध्यान ही नहीं जाता है। साधु के साथ सियाराम के घर छोड़कर चले जाने पर मुंशी तोताराम उसे खोजने निकलते हैं। निर्मला बीमार पड़ती है और उसकी मृत्यु हो जाती है। अगर सियाराम को निर्मला ने तंग न किया होता, तो वे सब घटनाएँ न घटतीं, जिन्होंने निर्मला को इतनी जल्दी मृत्यु-मुख में पहुँचा दिया। पर निर्मला क्या करती? वह जिन परिस्थितियों और जिस मानसिकता में घिरी थी, उसमें यह सब करने के लिए विवश थी। कार्य-कारण शृंखला में घटने वाली घटनाओं की अनिवार्यता ही इसे प्रमाणित करती है कि यह परिपक्व कथाकार की रचना है। इस छोटी सी घटना के प्रतिक्रियास्वरूप घटित होनेवाली घटनाएँ उपन्यास को जिस परिणति की ओर ले जाती हैं, वे हमें अनिवार्य लगती हैं।

'निर्मला' में अनेक शिल्पगत कमजोरियाँ हैं, लेकिन इस बात का अनुभव हमें बराबर होता है कि यह उपन्यास एक श्रेष्ठ कथाकार की रचना है। इसमें पात्रों के व्यक्तित्व की रचना कुलशतापूर्वक हुई है। सभी छोटे-बड़े पात्रों की अलग पहचान बना पाने में उपन्यासकार सफल हुआ है। पात्र न तो उपन्यासकार के मंतव्यों, विचारों और आग्रहों को व्यक्त करनेवाली कठपुतलियाँ बनकर रह गए हैं और न निजत्व और मनोवैज्ञानिकता के नाम पर अजूबा बनकर रह गए हैं। वे जीते-जागते मनुष्य हैं जो अपनी वर्गगत विशेषताएँ भी रखते हैं और व्यक्तिगत विशेषताएँ भी। इस उपन्यास में वर्णनात्मकता कम हुई है, संवादों की मात्रा बढ़ी है। 'निर्मला' उपन्यास का दो तिहाई कलेवर संवादों से निर्मित हुआ है। इसके संवाद जीवन के एकदम निकट के संवाद हैं।

'निर्मला' में प्रेमचंद ने जिस भाषा का उपयोग किया है, वह अनगढ़ सहज और आम बोलचाल की भाषा है। संस्कृत के तत्सम शब्दों के अतिरिक्त उर्दू के बहुप्रचलित शब्दों का अवसरानुकूल प्रयोग किया है। अंग्रेजी के शब्दों से उन्हें परहेज नहीं, ग्राम्य जीवन की शब्दावली के उपयोग में कहीं कोई हिचक नहीं, मुहावरेदानी उनकी भाषा की विशेषता है। बिल्कुल सीधे-सादे वाक्यों में केवल उनकी अनुतान के द्वारा गजब की व्यंजकता भर दी गई है। प्रेमचंद की संवेदना लोक संवेदना के बहुत निकट थी। इसी कारण वे नितांत सामान्य से पात्रों को लेकर, दैनिक जीवन की सामान्य-सी घटनाओं को लेकर इतने रोचक उपन्यासों की रचना कर सके। इसी का परिणाम है कि वे लोक भाषा को बहुत मामूली-सा फेरबदल करके साहित्यिक भाषा बना सके। वे लोकभाषा के जादू से परिचित थे। 'निर्मला' में लोकभाषा का जादू सिर चढ़कर बोल रहा है।

इस प्रकार, निर्मला प्रेमचंद की उपन्यास-कला के विकास में एक मील का पत्थर है। वह सामाजिक समस्या को मनोवैज्ञानिक गहराई के साथ प्रस्तुत करता है। यह ठीक है कि 'निर्मला' 'गोदान' नहीं है, लेकिन यह 'गोदान' की वह प्रारंभिक सीढ़ी अवश्य है जिस पर होकर प्रेमचंद 'गोदान' के शिखर का स्पर्श कर सके। वह प्रेमचंद के सर्वाधिक सुगठित उपन्यासों में से एक है। आकार में छोटा होने पर भी प्रेमचंद की उपन्यास-कला की सामर्थ्य और सीमा को व्यक्त करने में यह सक्षम है।

[ श्रेणी : आलोचना। लेखक : विजेंद्र नारायण सिंह ]