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मजाक मत बनाइए भाषा का / राजेश त्रिपाठी

राजेश त्रिपाठी
इन दिनों कुछ तो हिंदी में बुरी तरह से घुसपैठ कर रही अंग्रेजियत और कुछ भाषा के अज्ञान के चलते बड़ा अनर्थ हो रहा है। हमारी वह भाषा जो एक तरह से हमारी मां है, हमारी अभिव्यक्ति का जरिया है और जिसकी बांह थाम हम अपनी जीविका चलाते हैं आज उसका जाने-अनजाने घोर निरादर और अपमान हो रहा है। भाषा भदेस हो रही है या की जा रही है और उसके साथ जम कर छेड़छाड़ और खिलवाड़ हो रहा है। चाहे प्रिंट मीडिया से जुड़े लोग हों या इलेक्ट्रानिक मीडिया के लोग, शिक्षक हों या आलोचक और कथाकार सब इस बात से सहमत होंगे कि उनकी अभिव्यक्ति का आधार सिर्फ और सिर्फ भाषा है। उसका ज्ञान उनसे छीन लिया जाये तो वे मूक और लाचार हो जायेंगे। आज उसी भाषा के साथ जिस तरह से छेड़छाड़ हो रही है वह चिंता का विषय है। ऐसे में जिन्हें भाषा से प्यार है, यह जिनकी अन्नदाता है उनका यह कर्तव्य बनता है कि वे पल भर रुकें और भाषा पर कुछ विमर्श करें। जो गलत प्रयोग हो रहे हैं, उन्हें रोकने के लिए सक्रिय और सचेष्ट हों। आज बड़े-बड़े विद्वानों तक को धड़ल्ले से भाषा का गलत इस्तेमाल करते देखा जाता है। शब्दों के अर्थ और सही प्रयोग की जानकारी न होने के कारण कभी-कभी तो अर्थ का अनर्थ भी होते देखा गया है। मैं अपने को भाषा का पंडित नहीं मानता लेकिन अल्प ज्ञान में जो गलतियां नजर आयीं उन पर ध्यान आकर्षित करना मैं अपना कर्तव्य मानता हूं। कारण, हम जिस भाषा के हैं और जिसके चलते ही हम जो हैं, वो हैं उसका प्रयोग सही और सटीक हो यही हमारा काम्य है। जो इसके सही प्रयोग को नहीं जानते उन्हें राह दिखाना और बताना कि सही क्या है, गलत क्या है यही इसका उद्देश्य है। आइए जरा गौर करें कि शब्दों के गलत प्रयोग से क्या-क्या अनहोनी और अनर्थ हो सकता है। 

अक्सर उर्दू शब्दों के अर्थ मालूम नहीं होने से बड़ा गजब होते देखा गया है। मरहूम और महरूम शब्द के अर्थ में भेद न जाननेवाले अक्सर जीवित व्यक्ति को ही धराधाम से उठा देने का काम कर देते हैं। जहां महरूम (वंचित) लिखना चाहिए वहां अक्सर मरहूम (दिवंगत) लिख दिया जाता है। 

अखबारों वगैरह में यह प्रयोग आपने अक्सर देखा होगा-पांच चोर पकड़ाये या पांच चोर धराये। लिखनेवाले से सवाल किया जा सकता है कि अपने देश के चोर इतने शरीफ कब से हो गये कि उन्होंने चोरी की और खुद आकर पुलिस से कहा की हमें पकड़ लो हमने चोरी की है। सही प्रयोग पकड़े गये है क्योंकि यहां जो क्रिया प्रयोग की गयी है उसमें प्रयास दिखता है अनायास का भाव नहीं है जो ऊपरवाले गलत प्रयोग मे है। चोर धराये गये से प्रतीत होता है कि अनायास ही वे आये और पुलिस को कोई मशक्कत ही नहीं करनी पड़ी। ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिए। 

आपने ऐसे शब्द प्रयोग भी देखे होंगे कि - उन्होंने छूटते ही कहा। लिखनेवाले से पूछा जा सकता है कि जिस जनाब का जिक्र हो रहा है क्या वे कहीं बंधे हुए थे जो छूटे और बोलने लगे। यह प्रयोग गलत है। इसकी जगह होना चाहिए- उन्होंने तपाक से कहा। कभी-कभी क्या अक्सर यह प्रयोग किया जाता है कि -उन्होंने आगे चल कर कहा। तो लिखनेवाले भाई से पूछा जा सकता है कि क्या उन्होंने कुछ पीछे हट कर भी कहा क्या?इसकी जगह सही प्रयोग यह है -उन्होंने आगे कहा। 

यह प्रयोग भी खूब होता है कि उन्होंने अपना वक्तव्य रखा।सवाल यह उठता है कि वक्तव्य पुस्तक या उसकी ही जैसी कोई स्थूल वस्तु है क्या कि उठायी और रख दी? सही प्रयोग यह है कि - उन्होंने अपने विचार व्यक्त किये। 

इसी तरह-उन्होंने बोलते हुए कहा प्रयोग निरर्थक और गलत है। जाहिर है कोई कुछ कहेगा तो बोलते हुए ही कहेगा, खामोश रह कर तो कुछ कहा नहीं जा सकता। सीधा और सही प्रयोग है-उन्होंने कहा। 

उर्दू, अरबी, फारसी शब्दों के सही मायने और इस्तेमाल मालूम न हों तो भी बड़ा गजब हो जाता है। एक पत्रकार साथी (नाम नहीं लूंगा) ने एक खबर बनायी जिसका लब्बोलुआब यह था कि कोई गरीब हिंदू इतना गरीब था कि उसके अंतिम संस्कार के वक्त चिता की लकड़ियां तक खरीदने का पैसा नहीं था। मजबूर होकर परिजनों ने उसे मिट्टी में दफन कर दिया। खबर बस इतनी थी जो देश में गरीबों की दयनीय स्थिति को चित्रित करती थी लेकिन हमारे उस साथी ने अपने उर्दू `ज्ञान' को प्रकट करने के लिए खबर के आखिर में बेवजह एक शब्द `आमीन' जोड़ दिया जिसका अर्थ होता है एवमस्तु यानी ऐसा ही हो। अब उस खबर का अर्थ कुछ यह हो गया कि हिंदुओं को अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां भी न मिलें और उन्हें दफनाया ही जाता रहे। मैंने साथी का ध्यान उस अनर्थ की ओर दिलाया जो वे करने जा रहे थे। मुझे दिवंगत एसपी सिंह ( जिनके संपादकत्व में हमने आनंद बाजार प्रकाशन के हिंदी साप्ताहिक में काम किया) की बात याद आ गयी कि छपने जा रही किसी भी चीज को अपने स्तर पर सुधार लेना चाहिए। जरूरत हो तो कई साथियों से क्रास चेक करा लेना चाहिए क्योंकि छपने गये शब्द और छोड़ा गया तीर आपके हाथों से निकल गये तो फिर वापस नहीं आते। आपकी गलती आपका साथी पकड़ेगा तो संभव है आपको एक के सामने झेंपना पड़े लेकिन वह छपने के बाद लाखों लोगों ने पकड़ी तो आप उनकी नजरों में भाषा के साथ छेड़छाड़ के दोषी पाये जायेंगे। मैंने एसपी का वह गुरुमंत्र ध्यान कर साथी को टोका था जिनसे मुझे पलट जवाब मिला-आप उर्दू नहीं समझते। मुझे तुलसी बाबा याद आये- यहां न ब्यापै राउर माया। जब हमारी सुनी ही नहीं जानी थी तो हम बेकार क्यों सिर धुनते। वह समाचार उस साथी के `आमीन' शब्द के साथ छप गया और जो अनर्थ होना था वह हो गया। दिन भर हमारे अखबार के दफ्तर में फोन का तांता लगा रहा जिनमें जम कर गालियां दी जा रही थीं और कहा जा रहा था कि आप हिंदुओं के दुश्मन हैं क्या जो इस तरह का अभिशाप दे रहे हैं कि उन्हें अंतिम संस्कार के लिए लकड़ियां भी न मिलें। 

यह प्रसंग यहां इसलिए दिया है ताकि लोगों को यह पता चल जाये कि अनावश्यक और गलत जगह पर शब्दों को प्रयोग से क्या मुसीबत हो सकती है। उन्हीं साथी की एक और करतूत याद आती है। देशभक्तों, देश पर मर मिटनेवालों का कोई पावन स्मृति दिवस था जिसमें देश भर में उन्हें श्रद्धासुमन अर्पित किये गये। देशभक्त या देशप्रेमी के लिए उर्दू शब्द वतनपरस्त है। अब भाई उर्दू ज्ञान से बिल्कुल पैदल या कहें खाली ही थे लेकिन दिखाते कुछ ऐसा थे जैसे पूरे आलिमफाजिल हैं। उन्होंने वतनपरस्त को वतनफरोश (देश को बेचनेवाले) लिख दिया। शीर्षक लगाया-मुल्क ने वतनफरोंशों को याद किया। आप समझ सकते हैं कि फिर फोनों का तांता लगा रहा और संपादक से लेकर जिसने भी फोन उठाया उसकी पाठकों ने जम कर खबर ली और कहा कि आप लोगों ने देशभक्तों को भी नहीं बख्शा, उन्हें भी गाली दे दी। मेरे वे साथी जहां कहीं हों मुझे क्षमा करें लेकिन मैं समझता हूं यह लिखना जरूरी था ताकि फिर कोई वतनपरस्त हो वतनफरोश न बना सके या निरर्थक शब्दों का प्रयोग कर अर्थ का अनर्थ न कर बैठे। हमें यह नहीं भूलना चाहिए की जैसे तोल मोल कर बोलना उचित होता है उसी तरह जांच-परख कर लिखना चाहिए कि जो लिखा जा रहा है, कहीं वह गलत तो नहीं। 

फारसी का एक शब्द है ताजा जिसे बड़े-बड़े विद्वान तक गलत लिखते हैं। अक्सर ताजा की जगह `ताजी' का इस्तेमाल किया जाता है। अगर आप उर्दू लागात (शब्दकोश) देखें तो पायेंगे कि ताजी के मायने होते हैं अरब का घोड़ा और शिकारी कुत्ता। 

उर्दू शब्दों के साथ जब बा जुड़ता है तो उसके मायने होते हैं से। जैसे- बाअदब, बामुलाहिजा, बाकायदा। इसी तरह सही शब्द बावजूद है लेकिन बड़े -बड़े विद्वान बावजूद भी धड़ल्ले से लिखते हैं जबकि बावजूद अपने आप में परिपूर्ण है। 

हिंदी भाषा की बड़ी विशेषता है कि यह जिस तरह बोली जाती है, उसी तरह लिखी जाती है। इंडियन एक्सप्रेस के हिंदी दैनिक जनसत्ता में काम करते वक्त महान संपादक और पत्रकार व गांधीवादी विचारक प्रभाष जोशी जी का सानिंध्य मिला था। संपादकीय की बैठक में अक्सर हिंदी भाषा के बारे में वे कहा करते थे- जिस तरह तू बोलता है, उस तरह तू लिख। हालांकि उनका आशय हिंदी को सरल और सुबोध ढंग से आम भाषा के रूप में प्रयोग करने का होता था लेकिन इसमें यह भी निहित रहता था कि हिंदी को निरर्थक इतना कठिन न कर दिया जाये कि लोग उससे बिदकने और दूर जाने लगें। 

अगर हम वर्तनी और वाक्य विन्यास का ध्यान रखें तो हिंदी की बड़ी-बड़ी गलतियों से बच सकते हैं। भाषा को सरल रहने देना चाहिए बेवजह संस्कृतनिष्ठ नहीं करना चाहिए। ध्यान रखिए आपका उद्देश्य किसी को अपनी बात समझाना है, अपनी विद्वता का रौब जमाना या कठिन भाषा से किसी को डराना नहीं। कुछ लोगों को आपने बहुत ही अजीब और गलत प्रयोग करते देखा होगा। 

समाचारपत्र उठायें तो आप उनके बेहूदे और गलत प्रयोग देख कर अपना सिर धुन लेंगे। अक्सर किसी समाचार में लिख दिया जाता है -मृतक साइकिल चला रहा था। यह नितांत असंभव है कि कोई मुर्दा साइकिल चलाने लगे। सच यह है कि जो व्यक्ति मरा वह भूतकाल में साइकिल चला रहा था जिसका वर्तमान निर्जीव और संज्ञाशून्य है जिसके लिए साइकिल चलाना तो दूर उठ कर भागना भी नामुमकिन है। ऐसे प्रयोगों से भाषा की भद्द तो पिटती है लिखनेवाला भी मजाक का पात्र बनता है। किसी जगह पढ़ा कि श्मशान घाट में शवों की लंबी कतार लगी थी जिससे शवदाह नहीं हो पा रहा था। उसमें लिखा गया कि -लंबी लाइन के चलते शव उठ कर अपने घर चले गये। अब बताइए भला क्या यह संभव है। दरअसल हुआ यह था कि लंबी लाइन देख परिजन शवों को लौटा ले गये थे। 

गलत जानकारी के चलते कई शब्द गलत ढंग से प्रयोग किये जाते हैं।जब और तब के प्रयोग में भी लोग अक्सर गलतियां करते हैं। वाक्य में जहां भी तब का इस्तेमाल होगा वह जब के बाद ही होना चाहिए। जैसे -जब मैं स्टेशन पहुंचा तब तक गाड़ी जा चुकी थी। कई शब्दों के बहुबनचन को लेकर भी भ्रम की स्थिति है। इसके चलते गलत प्रयोग होते है। वारदात, जमीन, समय,मानव जैसे शब्द अपने आप में बहुबचन हैं। इनकी जगह वारदातों, जमीनों, समयों मानवों जैसे प्रयोग गलत हैं। 

अक्सर अखबारों, पत्र-पत्रिकाओं में संबंध कारक विभक्तियां गलत ढंग से प्रयोग की जाती हैं। जिन दो शब्दों के बीच संबंध दिखाया गया हो, उन्हें विभक्तियों के पासा आना चाहिए जैसे- युवक की गोली से हत्या प्रयोग गलत है इसकी जगह होना चाहिए -गोली से से युवक की हत्या। गोली गोली होती है, वह न युवक की होती है न युवती की वह तो राइफल या पिस्तौल की होती है फिर युवक की की गोली से हत्या प्रयोग क्यों? 

आजकल हिंदी को आसान बनाया जा रहा है वैसे अगर सरकारी भाषा को लें तो पता नहीं उसे गुरु-गंभीर और डरावना क्यों बनाया जा रहा है। कामकाज की सरकारी भाषा का उद्देश्य जनसामान्य तक पहुंचना बोधगम्य होना चाहिए लेकिन इसके अर्थ खोजने में शायद कभी-कभी इसे गढ़ने वालों को भी पसीना छूट जाता होगा। सीधे-सादे जारी किये जाने के शब्द को इन्होंने निर्गम कर डाला। पूछिए किसी किसान से जो कम पढा लिखा है वह जारी शब्द समझेगा लेकिन निर्गम से भागेगा। गांधी जी ने हिंदुस्तानी भाषा की हिमायत की थी जिसमें हिंदी-उर्दू का मिश्रण हो और जिसे सब समझ सकें लेकिन आज हम कैसी भाषा गढ़ रहे हैं और क्यों ? 

अब छः की जगह छह, दुःख की जगह दुख को अपना लिया गया है इसलिए इनका प्रयोग ही करना उचित है। हलंत् के अनावश्यक प्रयोग से उर्दू का अहम (खास) शब्द अहम् (संस्कृत का मैं) बन जाता है। ऐसे प्रयोगों से बचना चाहिए। 

हत्या के साथ जघन्य या बर्बर शब्द निरर्थक हैं क्योंकि हत्या तो बर्बर ही होती है। प्यार से किसी ने हत्या की हो ऐसा तो सुना नहीं। सच तो यह है कि जिसके दिल में प्यार की भावना है वह हत्यारा हो ही नहीं सकता। ग्लानि से खुद मर जायेगा किसी का जान तो वह ले ही नहीं सकेगा। 

ध्यान रखना चाहिए कि निश्चय, संकल्प ,निर्णय किया जाता है लिया नहीं जाता। 

रेलगाड़ी के लिए सिर्फ रेल का प्रयोग गलत है क्योंकि रेल का मतलब तो पटरी होती है। इसलिए गाड़ी के लिए रेलगाड़ी लिखना ही उचित है। 

दुर्घटना या प्राकृतिक आपदाओं में लोग मरते हैं मारे नहीं जाते। संघर्ष, युद्ध या पुलिस गोलीकांड में लोग मारे जाते हैं। 

कृषि उपज है उत्पादन नहीं। उत्पादन उद्योगों में तैयार वस्तुओं के लिए प्रयोग करना चाहिए। 

कर या वाला शब्दों को संज्ञा व क्रियापद जोड़कर लिखना चाहिए। जैसे-खाकर, जाकर, घरवाला, तांगावाला, फलवाला आदि। कार्यवाही और कार्रवाई का अंतर नहीं जाननेवाले अक्सर इसका गलत प्रयोग करते हैं। कार्यवाही प्रक्रिया के रूप में प्रयोग की जाती है। जैसे-सदन की कार्यवाही में हिस्सा लिया। कार्रवाई कदम उठाने के अर्थ में प्रयोग होता है। जैसे- पुलिस इस पर कार्रवाई करेगी। अक्सर प्रयोग किया जाता है विक्षोभ प्रदर्शन जबकि सही प्रयोग है -विरोध प्रदर्शन। यह ध्यान भी रखना चाहिए कि संस्कृत के साथ उर्दू के शब्द या उर्दू के साथ संस्कृत शब्दों का घालमेल उचित नहीं है। अक्सर आप शरारतपूर्ण (सही शब्द शरारती), अफसोसपूर्ण ( सही-अफसोसनाक), मजाकपूर्ण (मजाहिया) जैसे शब्द देखते होंगे। इनसे बचना चाहिए और यथासंभव शब्दों को सही रूप प्रयोग किये जाने चाहिए। 

निबटना (शौचादि के लिए प्रयोग किया जानेवाला) और निपटना शब्द का भी धड़ल्ले से गलत ढंग से प्रयोग किया जाता है। लोग जहां निबटना लिखना है वहां निपटना और जहां निपटना लिखना है वहां निबटना लिख देते हैं। सही प्रयोग इस तरह हैं-आप बैठें, मैं जरा बाथरूम से निबट कर आता हूं।' निपटना का प्रयोग इस तरह होता है-इस काम को तो आज ही निपटाना है।' थोड़ा सा ध्यान रख कर हम इन गलतियों से बच सकते हैं जो कभी-कभी वाक्य को हास्यास्पद बना देती हैं। 

अपराधी या मुजरिम कोई अपराध साबित होने के बाद होता है ऐसे में एक अपराधी या मुजरिम गिरफ्तार लिखना गलत है। होना चाहिए -चोरी के आरोप में एक व्यक्ति गिरफ्ताऱ। 

अक्सर उम्र के प्रयोग में भी अराजकता है। लोग 14 साल की किशोरी को युवती और 40 साल के अधेड़ को युवा लिख देते हैं। इसका भी ध्यान रखा जाना चाहिए। 

ऐसी तमाम और गलतियां हैं जिन पर ध्यान दिया जाना चाहिए। 

इन दिनों एक आफत यह है कि टेलीविजन में जो अंग्रेजीदां पत्रकार हिंदी को चूंचू का मुरब्बा बनाये दे रहे हैं। पता नहीं कि सीधे-सादे विज्ञान शब्द की क्या खता है कि टेलीविजन की सुमुखि, सुलोचनि समाचार वाचिकाओं के मुख तक पहुंचते-पहुंचते वह विजनान हो जाता है। (यह बात सब के लिए नहीं है। यह हमारा सौभाग्य है कि ज्यादातर लोग उच्चारण और भाषा पर अब ध्यान देने लगे हैं, लेकिन अब भी सुधार और परिष्कार की जरूरत है)। इनके यहां विद्यार्थी विधार्थी और विद्यालय विधालय हो जाता है। योगगुरु बाबा रामदेव तक ज्ञान को जनान कहते हैं तो लगता है कि माजरा क्या है, 

हिंदी को अंग्रेजी की बैसाखी क्यों थमायी जाती है। एक विदेशी भाषा के असर से हम अपनी सशक्त और सक्षम भाषा को भदेस क्यों कर रहे हैं। क्यों हम इसका उच्चारण अंग्रेजी की तरह कर रहे हैं। 

कृपया हमारी हिंदी को हिंदी ही रहने दीजिए। यह किसी परिचय या सहारे की मुंहताज नहीं यह तो दूसरी भाषाओं को भी सहारा दे सकती है। आज अगर आक्सफोर्ड डिक्शनरी में हिंदी शब्दों को मान्यता और प्रवेश मिला है तो यह इस बात का द्योतक है कि आपकी भाषा में वह ताकत है कि वह विश्वपटल पर शान से खड़ी हो सके। आइए इस भाषा की वंदना करें और यह प्रण करें कि इसके सही प्रयोग को प्रोत्साहन देंगे और जहां इसको गलत लिख कर इसका अनादर किया जा रहा है वहां अपना सशक्त और सार्थक विरोध दर्ज कराने में भी कृपणता नहीं दिखायेंगे, पीछे नहीं हटेंगे। जय हिंदी, जयहिंद।

[ श्रेणी : हिन्दी भाषा। लेखक : राजेश त्रिपाठी ]