'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

‘आतिशे-चिनार’ पर एक नजर / मुहम्मद शीस ख़ान

मुहम्मद शीस ख़ान 
'काव्य और चित्रकारी कलाओं सदृश जीवन पूर्णतया अभिव्यक्ति है, कर्मविहीन चिन्तन मृत्यु।' यदि डॉ. इक़बाल का यह कथन सत्य है तो किसी न किसी मंज़िल पर कर्मवीर के लिए यह अनिवार्य हो जाता है कि वह अपने कर्म-प्रधान जीवन पर एक चिन्तन भरी दृष्टि डाले। अनुचिन्तन की इसी प्रक्रिया का नाम है - आत्मकथा। शेख़ अब्दुल्लाह की उर्दू में लिखी आत्मकथा 'आतिशे-चिनार' वस्तुतः अनुचिन्तन की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग है। प्रयोग इसलिए कि यह आत्मकथा के परम्परागत पैटर्न का अनुसरण नहीं करती। इसकी तरतीब कुछ इस प्रकार है कि हर अध्याय अपने आप में एक स्वतंत्र लेख की हैसियत रखता है और पूरी पुस्तक की एक इकाई भी है। इकहत्तर अध्यायों की यह भीमकाय कृति नौ सौ इकसठ पृष्ठों पर फैली है। वृत्तांत की अनौपचारिकता, विचारों की ताज़गी, घटनाओं की अर्थवत्ता और निष्कर्षों की निष्पक्षता सर्वत्र समान रूप से दिलचस्पी बनाए रखते हैं। नुक़्ते की बातों को फ़ारसी, उर्दू और कश्मीरी शेरों के माध्यम से कहने की प्रवृत्ति है तो ऐतिहासिक पैराये में उन्हें टटोलने का रुझान भी। समाज के विराट कैन्वस पर व्यक्ति के निज के दुःख-सुख, आशा-निराशा के क्षण, उद्यम एवं उत्साह के नमूने चित्र के कुछ रंग और चन्द रेखाएँ मात्र हैं। चित्र की अर्थवत्ता रंगों एवं रेखाओं के सामंजस्य में है तो जीवन की सार्थकता विषम एवं प्रतिकूल परिस्थितियों को नियंत्रित करके उन्हें आत्मानुभूति एवं आत्म-विकास की अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने के प्रयास में। 'आतिशे-चिनार' इसी प्रयास की अभिव्यंजना की गाथा है। यही इसकी पठनीयता तथा औचित्य की दलील भी।

'आतिशे-चिनार' उर्दू की एक शाहकार कृति ही नहीं, कश्मीर के भूत एवं वर्तमान के सन्दर्भ में उसी प्रकार की एक राजनीतिक दस्तावेज़ भी है जिस प्रकार हिन्द-पाक उपमहाद्वीप के प्रकरण में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की 'इण्डिया विन्स फ्रीडम'। दोनों मरणोपरान्त प्रकाशित हुईं। दोनों लिखी नहीं, लिखायी (डिक्टेट की) गयी हैं। अन्तर केवल इतना है कि 'इण्डिया विन्स फ्रीडम' उर्दू डिक्टेशन की अंग्रेज़ी प्रस्तुति है जबकि 'आतिशे-चिनार' मूल उर्दू में ही लिखायी गयी। दोनों में व्यक्तियों और समुदायों के अन्ध-बिंदुओं (ब्लाइंड स्पॉट्स) के प्रति संकेत है। यह अवश्य है कि मौलाना ने संक्षिप्तता से काम लिया है, जबकि शेरे-कश्मीर ने बड़े इत्मीनान से मुलम्मा उतारा है।

कश्मीर आंदोलन की प्रेरणा के मूल में डॉ. इक़बाल का व्यक्तित्व एवं काव्य रहा है। उनका दिल सदैव कश्मीरी अवाम के दुःख-दर्द से तड़पता था। अपनी अनेक फ़ारसी और उर्दू कविताओं में उन्होंने कश्मीर की दुर्दशा और वहाँ के अवाम के शोषण के प्रति तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। इसके अतिरिक्त आल इण्डिया कश्मीर कमिटी के अध्यक्ष के रूप में तथा मुस्लिम लीग के अपने अध्यक्षीय भाषणों में भी कश्मीर की समस्याओं के प्रति सार्वजनिक ध्यान आकर्षित किया। फ्रांस की क्रांति की पृष्ठभूमि में रूसो जैसे विचारक की चिंतन-शक्ति थी तो कश्मीर की जाग्रति के पीछे इक़बाल की नज़्में एवं गज़लें। ईरान के राष्ट्रपति ख़मेनी और ईरानी विचारक डॉ. अली शरीअती ने दावा किया है कि ईरान की वर्तमान क्रांति डॉ. इक़बाल के विचारों का परिणाम है - कवि ने सबसे पहले ईरानियों को ही संबोधित किया था। अतः यह बिल्कुल उचित ही था कि शेख़़ अब्दुल्लाह ने उन्हें कश्मीर जागरण के अभिभावक (मुरब्बी) के रूप में याद किया है और अपनी आत्मकथा का नाम उनके निम्न शेर से लिया है :

जिस खाक़ के ज़मीर में हो आतिशे-चिनार
मुमकिन नहीं कि सर्द हो वो खाक़े-अर्ज़मन्द

'आग जिन्दगी, जोश और हरारत का प्रतीक है और चिनार कश्मीर की शिनाख़्त है। इस शेर में कश्मीर के मंगलमय भविष्य के प्रति शुभ-संदेश दहक रहा है और मुझे पूर्ण विश्वास है कि अर्ज़मन्दी (आदरणीयता) मेरे खूबसूरत वतन का मुक़द्दर है। इस तरह 'आतिशे-चिनार' का वाक्य-विन्यास मेरा प्रवक्ता बन गया है।'

'आतिशे-चिनार' के अनुसार, कश्मीरी जीवन को सबसे बड़ा आघात अकबर ने लगाया जब उसने एक फरमान के ज़रिये कश्मीरियों को हथियार बाँधने से मना कर दिया। इस फरमान का उद्देश्य यही था कि कश्मीरी अपनी खोयी हुई आज़ादी को प्राप्त करने की चेष्टा न करें। कश्मीरियों की निरुपायता की दिशा में यह पहला कदम था। इस दृष्टि से अकबर उन्नीसवीं सदी की उन अंग्रेज़ नीतिज्ञों का पूर्वगामी था जिन्होंने हिन्दुस्तानियों को लड़ाकू (मार्शल) और गैर-लड़ाकू (नॉन-मार्शल) जातियों में विभाजित किया। कश्मीर के परवर्ती शासकों - पठानों, सिखों और डोगरों - सभी ने अकबर की नीति को बरक़रार रखा। कश्मीरियों की निरुपायता की यह प्रक्रिया विभिन्न अवस्थाओं से गुज़रती हुई डोगरा शासनकाल में अमानवीयता की सीमा छूने लगी। डोगरों ने कश्मीर को अपने बाहुबल से नहीं बल्कि अमृतसर संधि के विक्रय-पत्र द्वारा खरीदा था, अतः वे शीघ्रातिशीघ्र निवेशित पूँजी को ब्याज सहित उगाहना चाहते थे। कश्मीरी अवाम का व्यवस्थित रूप से शोषण करने के लिए उन्होंने 'दाग़ शाल' नामक एक नया विभाग खोला। इस विभाग के कारिन्दे हर नयी बुनी हुई शाल पर मुहर से दाग़ देते थे ताकि टैक्स से किसी प्रकार बचाव न हो। शाल बुनकरों को शाल बुनने के अतिरिक्त किसी और धंधे की अनुमति नहीं थी। 'दाग़ शाल' के विभाग के अधिकारियों से लेकर अन्य विभागों के अधिकांश कर्मचारी कश्मीरी पंडित होते थे। अल्पसंख्यक कश्मीरी पंडित बहुसंख्यक कश्मीरी मुसलमानों के विरुद्ध अन्याय और शोषण के हथियार के रूप में काम आते थे। बृहत्तर भारत की परिकल्पना का प्रतिपादन करने वाले इतिहासकारों ने ईस्ट इण्डिया कम्पनी के गुमाश्तों द्वारा बंगाल के दस्तकारों पर ढाये जाने वाले अत्याचारों की तो खूनी दास्तान लिखी है, मध्य काल में तोड़े गए मंदिरों की इन्वेण्ट्री (सूची) भी बड़ी मेहनत से बनायी है, किन्तु वर्तमान सदी की चौथी दहाई के अंत तक कश्मीरियों पर होने वाले अत्याचारों से उन्हें कोई सरोकार नहीं। सर यदुनाथ सरकार ने औरंगज़ेब पर लगभग दस जिल्दों में महत्वपूर्ण सामग्री एकत्र कर दी है। उनकी एक स्थापना तो जज़िया के बारे में है और दूसरी स्थापना मुग़लों के शासनकाल में सरकारी नौकरियों में हिन्दुओं की भागीदारी और उनके आनुपातिक प्रतिनिधित्व के सिलसिले में है। सर यदुनाथ के विचारों से मतभेद हो सकता है किन्तु योगदान से नहीं। यह भी सच है कि मध्य युग की घटनाओं की जाँच-पड़ताल में तो दूर की कौड़ी लाने के लिए बड़ी दूर-दराज़ वादियों में निकल जाते हैं लेकिन उनकी स्वयं की नाक के नीचे और उनके युग में क्या हो रहा है यह उनके लिए कोई महत्व नहीं रखता। यदि सर यदुनाथ या डॉ. रमेश चन्द्र मजूमदार सरसरी तौर पर भी डोगरा शासनकाल की तीस-चालीस साल की घटनाओं पर दृष्टिपात करते तो उनके मन-पसंद विषय पर बीसियों जिल्दों की सामग्री मिल जाती। मुग़लों ने कश्मीरियों को हथियार बाँधने से मना अवश्य किया किन्तु उन्होंने कश्मीरी दस्तकारियों को प्रोत्साहन के साथ ही साथ निशात बाग़, शालीमार, चश्माशाही, पत्थर-मस्जिद जैसी सौन्दर्य बोध की यादगारें भी भेंट कीं। इस सिलसिले में वह जो काम करना भूल गए वह यह था कि उन्होंने अपने परवर्ती शासकों, सिखों एवं डोगरों के सौंदर्य बोध वर्धन और नैतिक विकास के लिए कोई स्कूल, कॉलेज खोलकर वसीयत में नहीं छोड़ा।

डोगरा शासकों ने अनेक क़ानूनी बारीकियों एवं विधानों द्वारा कश्मीरी मुसलमानों में उच्च शिक्षा पर कड़ी पाबंदियाँ लगा दी थीं। चूँकि महाराजा का परिवार जम्मू का निवासी था और यहाँ की अधिकांश आबादी हिंदुओं की थी जो महाराजा हरि सिंह के शासन को अपना शासन यानी हिंदू राज समझते थे और महाराज उनको अपनी इकलौती प्रजा, इसीलिए विकास कार्यों एवं उच्च शिक्षा का केन्द्र जम्मू को बनाया गया। शिक्षा की तरह नौकरियों के द्वार भी कश्मीरी मुसलमानों के लिए बंद थे। साठ प्रतिशत नियुक्तियाँ नामांकन द्वारा होती थीं, शेष चालीस प्रतिशत के लिए कुलीनता की अनिवार्य शर्त थी। यदि कोई मेधावी छात्र कभी-कभार कुलीनता की रुकावट पार कर भी जाता तो एक और हथियार उसके विरुद्ध था, वह यह कि बिना कोई कारण बताये उसकी नियुक्ति रद्द की जा सकती थी। उच्च शिक्षा के लिए कश्मीरी मुसलमानों को लाहौर और अलीगढ़ की राह नापनी पड़ती। शिक्षा समाप्त करने के बाद बेरोजगारी की स्थिति मुँह खोले रहती। गरज़ कि न तो शिक्षा ही काम आती और न तो शाल-दुशाले बनाने की कला। बीसवीं सदी के आरंभ में जब डॉ. इक़बाल कश्मीर आए तो जो स्थिति थी वही 1930 तक बरकरार थी जब शेख़़ अब्दुल्लाह मुस्लिम विश्वविद्यालय, अलीगढ़ से एम.एससी. की उपाधि लेकर लौटे, डॉ. इक़बाल ने लिखा था :

सर्मां की हवाओं में उर्यां है बदन उसका
देता है हुनर जिसका अमीरों को दुशाला

इसी उर्यां (नग्न) बदन वाले तथा सर्मां (जाड़े) की हवाओं वाले कश्मीर की राजधानी श्रीनगर के निकट सूरह नामक बस्ती में शेख़़ मुहम्मद अब्दुल्लाह का जन्म हुआ था। उनके पूर्वज मूलतः सप्रू गोत्र के कश्मीरी ब्राह्मण थे। अफग़ानों के शासनकाल में उनके एक पूर्वज रघूराम ने एक सूफी के हाथों इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया। उनके दादा गुलाम रसूल उन्हीं के वंशज थे। इनका परिवार पश्मीने का व्यापार करता था और अपने छोटे से निजी कारख़ाने में शाल और दुशाले तैयार कराके बाज़ार में बेचता था। इनके पिता शेख़़ मुहम्मद इब्राहीम ने आरंभ में एक छोटे पैमाने पर काम शुरू किया किन्तु मेहनत और लगन के कारण शीघ्र मझोले दर्जे के कारख़ानेदार की हैसियत तक पहुँच गए। शेख़़ साहब के परिवार की स्थिति एक औसत दर्जे के घराने की थी। किन्तु -

'घर से बाहर मेरा सारा माहौल मेहनतकशों और मज़दूरों का था। मेरे पड़ोस में पश्चिम की तरफ शालबाफ रहते थे। उत्तर की तरफ शाख़साज़ों और मेहनतपेशा लोगों की झोपड़ियाँ थीं और पूर्व में तेली और रफूग़र गुज़र-बसर करते थे। इन्हीं लोगों के बच्चे-बालकों के साथ मैंने अपना बचपन गुज़ारा। यह मुफ्लिसी, मोहताजी और मिस्कीनी का माहौल था। मेरे घर की कच्ची दीवारें मुझे दुःख-दर्द की उन लहरों से दूर नहीं रख सकती थीं जो चारों तरफ मौजें मार रही थीं।'

जब अपने गिर्द दुःख-दर्द के व्याप्त माहौल के एहसास ने शेख़़ अब्दुल्लाह को अपने अस्तित्व एवं परिवार के कुएँ से नज़र उठाने के लिए विवश किया तो उन्हें सर्वत्र ज़ालिम और मज़्लूम की एक बेरहम कशमकश नज़र आयी। 'अचानक मेरे दिल में एक हूक सी उठी कि मैं ज़ात (अस्तित्व) का हिसार (परिधि) तोड़कर इस कशमकश में कूद पड़ूँ। मज़्लूम की पासदारी करने और अगर इस ज़ुल्म से नजात न दिला सकूँ तो उसी कशमकश (संघर्ष) में जान दे दूँ।' (पृष्ठ 32)। इस ज़ुल्म व उत्पीड़न की गुत्थी सुलझते देर न लगी। शीघ्र ही 'मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि मुस्लिम बहुसंख्यक समुदाय के साथ उनके इस बर्ताव की बुनियादी वजह धार्मिक भेदभाव और पक्षपात था। यद्यपि यह एक अधूरी हक़ीकत थी लेकिन विगत इतिहास पर दृष्टिपात से इसे बल मिलता था।' (पृष्ठ 29)।

शेख़़ अब्दुल्लाह की उच्चाकांक्षा डॉक्टर बनने की थी। प्रतिभाशाली विद्यार्थी होने के बावजूद न तो रियासत के मेडिकल कॉलेज में दाख़िला मिला और न जम्मू स्थित साइंस कॉलेज के दरवाज़े ही उनके लिए खुल सके। विवश होकर लाहौर की राह ली जहाँ इस्लामिया कॉलेज से बी.एससी. की उपाधि प्राप्त की। यहीं लाहौर में उन्हें सबसे पहले डॉ. इक़बाल से भेंट का गौरव प्राप्त हुआ। लाहौर प्रवास ने नवयुवक अब्दुल्लाह की प्रबुद्ध चेतना को एक अभूतपूर्व आध्यात्मिक चेतना से परिचित कराया -

'मैंने कश्मीरी मुसलमानों को बड़े-बड़े काफ़िलों की सूरत में अपने सुंदर देश से पंजाब के चटियल और पथरीले मैदानों की तरफ जाते देखा। ये लोग अपनी सरज़मीन से रोज़ी न पाकर उसकी तलाश में पंजाब का रुख करते थे। यह आश्चर्य की बात थी कि अपनी हरी-भरी ज़मीन उनके पेट की आग बुझाने के सिलसिले में किसी बाँझ की कोख की तरह शुष्क हो गयी थी जिससे उगने वाली घास भी जाफ़रान बन जाती है। यद्यपि उरफी जैसे कवि ने इसकी प्रशंसा में कहा था कि यदि कोई झुलसा हुआ परिंदा भी कश्मीर पहुँच जाये तो उसमें नई ज़िंदगी पैदा होगी और उसके बालो-पर नए सिरे से उग आयेंगे। न मज़दूरों को बनिहाल और मरी जैसे बर्फानी कोहिस्तान पैदल तय करना पड़ते थे... कई बार पहाड़ों की चोटियाँ लाँघते हुए बर्फीले तूफ़ानों की नज़्र हो जाते; न कफ़न-दफ़न की नौबत आती और न जनाज़े और फातिहा की।' (पृष्ठ 37)

लाहौर से अलीगढ़ की ओर प्रस्थान किया। मुस्लिम विश्वविद्यालय में एम.एससी. में दाखिला लिया। यह खिलाफ़त और असहयोग आंदोलनों के चढ़ाव के बाद उतार का ज़माना था। देश के वातावरण में कुछ कर गुज़रने की दृढ़ इच्छा के बावजूद नाकामी और निराशा की गहरी टीस भी थी। 1930 में एम.एससी. करके शेख़़ साहब अपनी कर्मभूमि, श्रीनगर लौट आए।

चूँकि और रियासतों की तुलना में जम्मू एण्ड कश्मीर रियासत सबसे अधिक प्रतिक्रियावादी और अवाम विरोधी थी, लिहाज़ा यहाँ राजनीतिक कार्यों एवं संगठनों के अवसर सबसे कम थे। यहाँ की सेंसर व्यवस्था बारहमासी थी। अलीगढ़ से लौटने के बाद जब 1930 में शेख़़ अब्दुल्लाह ने कश्मीरी चेतना को जगाने का संकल्प किया, उस समय उनके पास न तो कोई साधन थे और न कोई मंच और न कोई संगठित राजनीतिक दल। उन्होंने रीडिंग रूम (दारुल मुताला) से शुरुआत की। संपादकों के नाम पत्र (जम्मू और कश्मीर से बाहर के अख़बारों में) लिखकर कश्मीर की दुर्दशा के प्रति ध्यानाकर्षित करना तो अलीगढ़ से ही शुरू कर दिया था। अब उन्होंने पंजाब के मुस्लिम समाचारपत्रों, इन्क़िलाब और ज़मीनदार तथा लंदन स्थित प्रगतिशील पत्र 'इण्डियन स्टेट्स' के संपादक रजनी पाम दत्त से भी संबंध स्थापित किया। सबसे बड़ी मुसीबत यह थी कि कश्मीर के बारे में यदि कोई अख़बार ज़रा सी भी आवाज़ उठाता तो रियासत में उसका प्रवेश निषिद्ध हो जाता। इस बीच 'हाकिमे-आला' की सेवा में मेमोरेण्डम और शिष्ट मण्डल इत्यादि हथियार भी इस्तेमाल किए जाने लगे। नौकरियों में प्रतिनिधित्व और स्कूल-कॉलेजों में भर्ती की बात भी की जाने लगी। बस चिनगारी लगाने की बात थी कि ज्वालामुखी तो फटने के लिए तैयार ही था। एक वर्ष बाद जब अप्रैल के अंत में (1931 में) पोस्टर चिपकाने के अपराध में पुलिस द्वारा गिरफ्तार किए जाने वाले व्यक्ति को छुड़ाने वाली भीड़ को श्रीनगर में शेख़़ अब्दुल्लाह ने आग़ा हश्र काश्मीरी के निम्न शेर से संबोधित किया तो कश्मीर आंदोलन का विधिवत सूत्रपात हो चुका था :

आह जाती है फलक पर रहम लाने के लिए
बादलो हट जाओ दे दो राह जाने के लिए

इस भाषण का वांछित प्रभाव पड़ा। अवाम की सामूहिक चेतना ने एक नई अँगड़ाई ली। अब धुआँधार तक़रीरों का सिलसिला शुरू हो गया। हज़रत बल और ख़ानकाहे-मुअल्ला शेख़ अब्दुल्लाह के भाषण केन्द्र बन गए। आल जम्मू एण्ड काश्मीर मुस्लिम कॉन्फ्रेंस की स्थापना, जो शेख़ के नेतृत्व की महत्वपूर्ण उपलब्धि थी, के लिए भूमिका तैयार हो गयी। अब वह उस मार्ग पर काफी दूर निकल गए थे जहाँ से उन्हें पीछे मुड़कर नहीं देखना था। जब 24 जून, 1938 को 52 घंटे के घमासान सम्मेलन के बाद शेख़़ अब्दुल्लाह और उनके साथियों ने मुस्लिम कॉन्फ्रेंस को नेशनल कॉन्फ्रेंस में परिणित करने का प्रस्ताव पास किया तो वास्तव में वे हिंदुस्तानी नेताओं को मीलों पीछे छोड़ गए थे। 1916 में लखनऊ समझौते के अंतर्गत कांग्रेस और लीग एक मेज़ पर इकट्ठे हुए, गले मिले और फिर भूल गए। 1920 के बाद खिलाफ़त और असहयोग आंदोलन आए, हिंदू-मुस्लिम एकता का कबूतर आया फिर चार साल बाद 1924 में दो अंडे देकर सदा के लिए उड़ गया। इस अंडे से दो भयंकर जंतु शुद्धि संगठन और तंज़ीम व-तब्लीग़ निकले, फिर इसके बाद तो इतनी बरकत हुई कि ड्रायडेन के शब्दों में 'गॉड्स प्लेन्टी ही प्लेन्टी'।

आल जम्मू एण्ड कश्मीर मुस्लिम कान्फ्रेंस को नेशनल कान्फ्रेंस में कायाकल्प करने की पृष्ठभूमि में शेख़़ अब्दुल्लाह का आत्म-विश्वास था जो उनके बहुसंख्यक अवाम के नेता होने की चेतना की उपज था। स्वस्थ आर्थिक कार्यक्रमों के अभाव में बड़े से बड़े हंगामी आंदोलन कुछ ही समय बाद दम तोड़ने लगते हैं। 1944 में 'नया कश्मीर' मेनिफेस्टो की घोषणा से शेख़़ अब्दुल्लाह के आंदोलन ने इस कमी को भी पूरा कर लिया। इस मेनिफेस्टो की तैयारी में शेख़ साहब ने अपने प्रसिद्ध प्रगतिशील मित्र बी.बी.एल. बेदी की सेवाएँ प्राप्त कीं। मुहम्मद दीन तासीर, के.एम. अशरफ, दानियाल लतीफी और एहसान दानिश जैसे विद्वानों ने भी इसकी तैयारी में सहयोग दिया। इस घोषणपत्र को शेख़़ साहब ने एक अभूतपूर्व एवं क्रांतिकारी दस्तावेज़ की संज्ञा दी है। इस मोड़ पर आकर कश्मीर आंदोलन हिंदुस्तान के आंदोलन से बहुत आगे निकल गया था क्योंकि इस अवस्था में पहुँचते-पहुँचते जहाँ कश्मीर में नेशनल कान्फ्रेंस मुसलमान-सिख-हिंदू एकता का अभूतपूर्व मंच बन गया था, वहाँ हिंदुस्तान में हिंदुओं और मुसलमानों के प्रमुख दलों कांग्रेस और लीग के मध्य बढ़ती दरार ने गंभीर रूप धारण कर लिया था। हिंदुस्तान का बहुसंख्यक हिंदू वर्ग यदि उसी उदारता से काम लेता जो शेख़़ अब्दुल्लाह और उनके साथियों की शिनाख़्त बन गयी थी, तो संभवतः इतिहास का रुख ही बदल गया होता।

शेख़़ अब्दुल्लाह लिखते हैं, 'हमारे आंदोलन का दायरा पहले तो मुसलमानों तक सीमित रहा। उस समय उसका रैलीइंग पॉइंट इस्लाम था। लेकिन अब आंदोलन के दरवाज़े सब धर्मों के लोगों पर खोल दिए गए थे तो एक संयुक्त मोर्चे की आवश्यकता महसूस हुई। यह मात्र धार्मिक नहीं बल्कि राजनैतिक एवं आर्थिक कोटि ही हो सकती थी। जीवन और आंदोलन के अनुभव ने हमें कायल कर दिया था कि अवाम के विभिन्न वर्गों में बुनियादी टकराव धर्मों का नहीं बल्कि हितों का था। एक तरफ शोषण करने वाले थे और दूसरी तरफ वह जो शोषण का शिकार थे। हमारी लड़ाई की मंशा व मक़्सद मज़्लूम की हिमायत और ज़ालिम की मुख़ालफत था। हम समझ चुके थे कि हमारी एक बर्बर व्यवस्था से टक्कर है, किसी व्यक्तित्व से नहीं। हमारा जागीरदारी व्यवस्था से झगड़ा था, जागीरदार की ज़ात से नहीं।'

'नया कश्मीर' दस्तावेज़ में ज़मीन को काश्तकार के हवाले करने का जो विचार पेश किया गया था उसे तो उपमहाद्वीप में आज़ादी के बाद भी अनेक वर्षों तक लागू नहीं किया जा सका। इसमें औरतों, मज़दूरों और समाज के दूसरे कमज़ोर वर्गों के अधिकारों को संवैधानिक रूप से स्वीकार करके सुरक्षित करने की प्रतिज्ञा की गयी थी। इस आलोचना के उत्तर में कि इस पर साम्यवादी विचारों का प्रभाव है, शेख़़ अब्दुल्लाह ने बड़ी निर्भीकता से अपनी स्थिति स्पष्ट की है, 'जहाँ तक साम्यवाद के उस पहलू का संबंध है जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मेहनतकशों और मज़्लूमों के संघर्ष की तरफ्दारी करता है, नेशनल कान्फ्रेंस ने हमेशा उसको सराहा है। जब हमने नये कश्मीर को अपनाया तो मुस्लिम नवाबों के साथ-साथ कांग्रेस के प्रतिक्रियावादियों ने भी हम पर आवाज़ें कसीं... एक हिंदू नेता ने यह कहकर भर्त्सना की कि यदि इसको लागू किया गया तो हिंदू औरतों को मुसलमान औरतों की तरह तलाक़ आसानी से हासिल हो जाएगी और इस प्रकार हिंदू सोसाइटी ख़तरे में पड़ जाएगी... इण्डियन नेशनल कांग्रेस का अवाड़ी सेशन का प्रस्ताव जिसमें देश का चरम लक्ष्य एक समाजवादी व्यवस्था की स्थापना ठहराया गया था, वास्तव में 'नया कश्मीर' के विचारों की प्रतिध्वनि थी।'

दूसरे विश्व युद्ध ने ब्रिटेन का दिवाला निकाल दिया। विश्व-शक्ति से हटकर वह अब तीसरे दर्जे पर अपना अंतरराष्ट्रीय स्थान क़ायम रख सका। उपनिवेशों पर शासन जमाए रखना असंभव हो गया। हिंदुस्तान की राजनीतिक स्थिति से अवगत होने तथा यहाँ के नेताओं से बातचीत के लिए कैबिनेट मिशन प्लान आया। रियासतों के संबंध में कैबिनेट मिशन में यह मामला विचाराधीन था कि उपमहाद्वीप के भारत और पाकिस्तान दो सार्वभौमिक राष्ट्रों में विभाजन के बाद रियासतों के राजे और नवाब इस निर्णय के अधिकारी होंगे कि वे किसमें सम्मिलित हों। जवाहरलाल और कांग्रेस इसका विरोध कर रहे थे और मिस्टर जिन्ना और मुस्लिम लीग इसका समर्थन। किंतु कश्मीरी अवाम शेख़़ अब्दुल्लाह के नेतृत्व में यह गवारा नहीं कर सकते थे कि वे अपनी क़िस्मत का फैसला महाराजा हरि सिंह - योरप के गुलाबी शामों वाले मिस्टर ए - के हाथों में दे दे। अन्य रियासतों की तुलना में कश्मीर और जम्मू की स्थिति भिन्न थी। यहाँ एक जन आंदोलन अपने संघर्ष के सभी अनिवार्य मरहले तय कर चुकने के बाद अब कश्मीर की आज़ादी की दहलीज़ पर खड़ा था, अतः इसे अन्य रियासतों के साथ नत्थी करने का विचार सर्वथा अनुचित था। अतः अपने आत्म-निर्णय के अधिकार को मनवाने के लिए कश्मीरी जनता ने शेख़़ अब्दुल्लाह के नेतृत्व में मई 1946 में 'कश्मीर छोड़ो आंदोलन' आरंभ कर दिया। शेख़़ अब्दुल्लाह, जो अपने साथियों के साथ गांधी जी और अन्य कांग्रेसी नेताओं से बातचीत के लिए जवाहरलाल के निमंत्रण पर दिल्ली जा रहे थे, मुज़फ्फराबाद में 20 मई, 1946 को गिरफ़्तार कर लिए गए। इसके विरोध में सारी रियासत में आम हड़तालें एवं प्रदर्शन हुए। बड़े पैमाने पर गिरफ़्तारियों का सिलसिला शुरू हो गया। अनेक कश्मीरी गोलियों का निशाना बने जिनमें सभी मुसलमान थे। गांधी जी, मौलाना आज़ाद और जवाहरलाल को छोड़कर अधिकांश कांग्रेसी तथा जम्मू और कश्मीर के पण्डित और हिंदू निहित स्वार्थ महाराजा का समर्थन कर रहे थे। मुस्लिम लीग ने भी कश्मीर आंदोलन का विरोध किया।

हिंद-पाक आज़ादी/विभाजन के समय शेख़़ अब्दुल्लाह जेल में थे। गांधी जी और जवाहरलाल के ज़ोर देने पर उन्हें 29 सितंबर, 1946 को रिहा किया गया। क़बायली आक्रमणों के समय जब हरि सिंह खज़ाने के साथ जम्मू भाग आए तो शेख़़ अब्दुल्लाह और उनके साथियों ने आक्रमणकारियों का डटकर मुकाबला किया और हिंदू और सिख अल्पसंख्यकों की जान व माल की रक्षा की। यद्यपि क़बायलियों के आक्रमण के कारण कश्मीरियों में पाकिस्तान के विरुद्ध रोष की एक लहर दौड़ गयी थी, तथापि कश्मीर में पाकिस्तान समर्थकों की संख्या काफी थी। इसमें कोई शक नहीं यदि शेख़़ अब्दुल्लाह का करिश्माई व्यक्तित्व न होता तो कश्मीर का भारत के साथ अधिमिलन असंभव था। भारत के साथ रिश्ता जोड़ने में शेख़़ अब्दुल्लाह के प्रबुद्ध और प्रगतिशील विचारों के अतिरिक्त भारत में मौलाना आज़ाद, गांधी जी और जवाहरलाल जैसे मित्रों एवं शुभचिंतकों की मौजूदगी भी एक निर्णायक कारण बनी। शेख़ साहब हमेशा कहते थे कि भारत के साथ रिश्ते की गाँठ आदर्शों से जुड़ी है। यह आदर्शों की गाँठ लगते देर न लगी थी कि उनके मोह भंग की प्रक्रिया शुरू हो गयी तथापि आशा की किरण ने कभी साथ न छोड़ा। वास्तव में देखा जाए तो जहाँ भारतीय नेताओं का संघर्ष आज़ादी के बाद समाप्त होता है वहीं शेख़़ अब्दुल्लाह का असली संघर्ष सत्तारूढ़ होने के बाद शुरू होता है। इस दृष्टि से यदि यह कहा जाए कि 'आतिशे-चिनार' एक मोह भंग की दास्तान है तो यह बात अनुचित न होगी।

'हिंदुस्तान के वातावरण को मेरे अस्तित्व के विरुद्ध खड़ा करने के लिए जो मुहिम चलायी जा रही थी उसके पीछे जो कारण थे उन पर एक दृष्टि डालना कश्मीर की राजनीति की पेचीदगियों को समझने के लिए अनिवार्य है। सबसे पहली बात जो मेरे विरोधियों को खटकती थी यह थी कि मैं कश्मीर आंदोलन का प्रवर्तक हूँ और सदियों के बाद मैंने यहाँ की सुसुप्त आबादी को एक नई ज़िंदगी से अवगत कराया। संयोग से जागने वालों का बहुसंख्यक वर्ग मुसलमान था और शासक वर्ग हिंदू था। इसलिए बहुत से हिंदू पहले दिन से ही इस स्थिति को पसंद न करते थे। उन्होंने न केवल मेरा साथ न दिया बल्कि मुझे अपना शत्रु समझ लिया। इस बात का सबूत पंजाब और दिल्ली के हिंदू अख़बारों के पृष्ठ प्रस्तुत करते हैं जो 1931 से आज तक किसी न किसी रंग में और किसी न किसी मसले पर मेरे विरुद्ध ज़हर उगलते रहे हैं। कई बार मेरे इक़्दामात से मेरे मुसलमान भाई भी खुश न हो सके। लेकिन इन अख़़बारों पर विद्वेष की ऐसी ऐनक चढ़ी हुई है कि वह भी इसे मेरी चालाकी समझते रहे। यह इन अख़बारों का दोष नहीं बल्कि उस मानसिकता का करिश्मा है जिसका यह प्रतिनिधित्व करते हैं। एक और मामला जिसने हिंदू संप्रदायवादियों को मुझसे बदगुमान कर दिया था, यह था कि मैंने आज़ादी के बाद कुछ ऐसे सुधारों को लागू कर दिया जिनमें संयोग से शासक वर्ग के शोषक तत्वों पर चोटें पहुँची और उनका अधिकांश लाभ संयोगवश बहुसंख्यक वर्ग को पहुँचा। यह और बात है कि उनसे लाभान्वित होने वालों में लाखों हरिजन और दूसरे गैर-मुस्लिम भी थे। चूँकि वह लोग निम्न वर्ग से संबंध रखते थे और ख़ामोश थे इसलिए हिंदू संप्रदायवादियों की निगाह उनकी तरफ नहीं गयी। एक और बात यह थी कि अविभाजित हिंदुस्तान की रियासतों को आमतौर पर उनकी आबादी की संरचना के स्थान पर उनके शासकों के धर्म के आधार पर बाँट दिया गया था और इसी हवाले से उन्हें हिंदू, मुसलमान या सिख रियासतों के अंतर्गत सम्मिलित किया जाता था। हैदराबाद के अवाम की बहुसंख्यक आबादी हिंदुओं की थी लेकिन मुसलमान उसे मुस्लिम रियासत ही समझते थे। इसके विपरीत जम्मू एवं कश्मीर की रियासत की पचासी प्रतिशत से अधिक आबादी यद्यपि मुसलमान थी तथापि हिंदू उसे एक हिंदू रियासत ही मानते थे। शेष रियासतों का हाल भी न्यूनाधिक ऐसा ही था। रियासते-कश्मीर में निरंकुशता के विरुद्ध जो संघर्ष मैंने शुरू किया था वह राजा की ज़ात (पर्सन) के विरुद्ध न था बल्कि एक व्यवस्था के विरुद्ध था। लेकिन इसको कोई नहीं समझता था। यह स्थिति हिंदुओं तक सीमित नहीं थी बल्कि मुसलमान भी इसका शिकार थे और मैं इस संबंध में मौलाना गुलाम रसूल मेहर का वह व़ाक़िआ बयान कर चुका हूँ जब उन्होंने कश्मीर की बात करते हुए कहा था कि वहाँ से हिंदू महाराजा का आधिपत्य समाप्त होना चाहिए। लेकिन मेरे टोकने पर कि फिर ऐसा ही मामला हैदराबाद में भी पेश आना चाहिए, वह बोल पड़े थे कि 'हैदराबाद की बात दूसरी है। हम उसके लिए कई कश्मीर क़ुर्बान कर सकते हैं।" कुछ आदरणीय व्यक्ति इसके अपवाद थे। मसलन गांधी जी और जवाहरलाल। लेकिन गांधी जी तो दूसरी अति को गए थे और उन्होंने एक बार यह भी कहा था, 'चूँकि कश्मीर में मुसलमानों का बहुमत है अतः उसे पाकिस्तान में जाना चाहिए।' मैंने चूँकि एक हिंदू शासक के विरुद्ध विद्रोह करने की धृष्टता दिखायी थी इसलिए हिंदू संप्रदायवादियों की आँखों में हमेशा के लिए खटकता हुआ काँटा बनकर रह गया। चौथी वजह यह थी कि हिंदुस्तान के बँटवारे के बाद हिंदुओं और मुसलमानों में परस्पर अविश्वास का वातावरण इस प्रकार बना हुआ था कि हर मुसलमान को हिंदुस्तान में शंका की दृष्टि से देखा जाता था। मेरी बिसात क्या है? मौलाना आज़ाद जैसी महान हस्ती को भी इस इल्ज़ाम से बरी नहीं रखा गया। इसी कारण मेरे कार्यों को आशंका की दृष्टि से देखा जाता था। महाराजा हरि सिंह के ख़ानदानी शासन का उन्मूलन, इस व्यवस्था की छाँव में पलने वाले एक बड़े वर्ग के हितों पर चोट की हैसियत रखता था। भला वह इसके लिए क्यों मेरा स्वागत करते। अतः उन्होंने रियासत में मेरे विरुद्ध वातावरण बनाने के लिए अपनी तिजोरियों के मुँह खोल दिए। इन्हीं तत्वों ने भारत के संप्रदायवादियों से गठबंधन करके जम्मू में प्रजा परिषद के आंदोलन को उकसाया और 'एक विधान, एक निशान और एक प्रधान' के नारे को अपना युद्धनाद बना लिया। वह इस तथ्य को भलीभाँति समझते थे कि महाराजा हरि सिंह के परिवार को राज सिंहासन को फिर से सौंप देना संभव नहीं है किंतु भारत का चक्कर घुमाकर कश्मीर के मुसलमानों को अब भी दबाया जा सकता है।' (पृष्ठ 503-505)

'दिल्ली समझौते को अंतिम रूप देने के लिए केन्द्र की ओर से जवाहरलाल नेहरू, मौलाना आज़ाद, गोपालास्वामी आयंगर और सर गिरिजाशंकर वाजपेयी बातचीत में हिस्सा ले रहे थे और रियासत की तरफ से मैं, बख्शी ग़़़ुलाम मुहम्मद और मिर्ज़ा अफ़जल बेग भाग ले रहे थे। मुझे याद है जब समझौते की किसी धारा पर ज़ोरों की बहस हो रही थी तो जवाहरलाल ने मेरे कान में बड़े मनोहर अंदाज के साथ कहा, 'शेख़़ साहब, अगर आप हमारे साथ बग़ल में खड़े होने में हिचकिचाएँगे तो हम आपके गले में सोने की जंजीर पहना देंगे। मैं जवाहरलाल को एक क्षण देखता रह गया। लेकिन दूसरे क्षण मैंने मुस्कराते हुए कहा कि, 'ऐसा कभी न कीजिएगा क्योंकि इस तरह आप कश्मीर से हाथ धो बैठेंगे।' जवाहरलाल की इस मानसिक कैफियत पर मेरे मस्तिष्क पटल पर इक़बाल का यह शेर रोशन हो गया था :

जादू-ए-महमूद की तासीर से चश्मे अयाज़
देखती है हल्क़ए गर्दन में साज़े-दिलबरी

लेकिन जवाहरलाल हमारी मानसिक कैफियत के बारे में साफ तौर पर गलत अंदाज़ा लगा रहे थे'। (पृष्ठ 541-542)

'जवाहरलाल को बता दिया गया कि मैं गुलमर्ग में किसी पाकिस्तानी अफसर से कश्मीर में बग़ावत करने की साजिश करने के लिए जा रहा हूँ। यह इतना ज़बरदस्त झूठ था कि बाद में भारतीय योद्धा इसको दोहराने की हिम्मत ही न कर सके। सवाल यह है कि सारी रियासत में भारत की फौज फैली हुई थी। उनकी इजाज़त के बिना युद्ध-विराम रेखा पर परिंदा पर नहीं मार सकता था। यदि बक़ौल मलिक यह बात सही होती कि उन्हें ज्ञात था कि मक़बूल गीलानी के माध्यम से पाकिस्तानी फौज का कोई अधिकारी मुझसे गुलमर्ग में मिलने वाला है तो उन्हें उस अधिकारी को मेरे साथ गिरफ़्तार करने से किसने रोका था? इसके अतिरिक्त रियासत के गृह मंत्री की हैसियत से सी.आई.डी. और पुलिस के तमाम विभागों पर बख़्शी ग़ुलाम मुहम्मद का अधिकार था। मैं इन हालात में कैसे किसी बाह्य शक्ति के गुप्त जासूस से साजिश करने के लिए मुलाक़ात कर सकता था। इस कार्यवाही को तर्क के तराज़ू पर तौलना व्यर्थ है क्योंकि झूठ बोलने वाले स्वयं भी अपनी झूठ से भलीभाँति अवगत थे और जानबूझकर झूठ बोल रहे थे और फिर मेरे साथ तीन कश्मीरी पण्डित अधिकारी (आर.सी.रैना, जानकी नाथ ज़ुत्सी और श्याम लाल वाठ) भी तो गुलमर्ग आए थे।

'जेल में पहुँचकर मेरा शरीर तो आराम से था लेकिन मेरा दिल कश्मीर के गली-कूचों में अटककर रह गया था। मुझे यद्यपि सूचनाएँ नहीं मिल रहीं थीं कि हालात का सही रुख़ क्या है लेकिन क़ातिलों के ख़ौफनाक तेवर देखकर मैं जान गया था कि कश्मीर को फिर आग और ख़ून के दरयाओं से गुज़रना होगा। मैं बंदीगृह में इस दुआ के सिवा और क्या कर सकता था :

दयारे-यार तेरी जोशिशे-जुनूँ पे सलाम
मेरे वतन तेरे दामाने-तार-तार की ख़ैर
रहे यक़ीं तेरी अफ्शाने-ख़ाकाओ खूँ पे सलाम
मेरे चमन तेरे ज़ख्मों के लालाज़ार की ख़ैर

और संयोग देखिए कि कुछ समय बाद फैज़ अहमद फैज़ ने अपने हस्ताक्षरों से वह नज़्म मुझे समर्पित करके मुझे भेज दी जिससे ये अशआर लिए गए हैं।' (पृष्ठ 601-602)

'मैं जिन न किए गए गुनाहों के आधार पर इतनी भयानक साज़िश का शिकार बन गया था उसके तमाम हालात और विवरणों से मृदुला साराभाई अच्छी तरह अवगत थीं। मृदुला अहमदाबाद (गुजरात) के एक समृद्ध परिवार की नाज़ों पली बेटी थीं। उनके धनवान पिता अंबालाल साराभाई कांग्रेस के बड़े उत्साही समर्थकों में थे और उसकी तन-मन-धन से सहायता करते रहते थे। जवाहरलाल के साथ भी इस परिवार के संबंध हो गए थे। मृदुला बड़ी जोशीली तबीयत की मालिक थीं। उन्होंने अपने आपको राजनीति में झोंक दिया और गांधी जी के सत्याग्रह आंदोलन में बढ़-चढ़ कर भाग लेती रहीं। जब जवाहरलाल नेहरू कांग्रेस के अध्यक्ष बने तो उन्होंने मृदुला को महासचिव के पद पर नियुक्त किया। मृदुला बहुत ही दर्दमंद, रहम-दिल और गरीब-नवाज़ महिला थीं। जवाहरलाल से मेरे निकट के संबंध थे। मैं उन्हीं के घर में मृदुला से मिला। धीरे-धीरे यह जान-पहचान इस सीमा तक बढ़ी कि हम उनको अपने परिवार का एक सदस्य समझने लगे और वह भी यही एहसास रखने लगीं। 9 अगस्त की घटना हुई तो उन्होंने अपनी पूरी शक्ति से इस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठायी। उन्होंने मात्र इतना ही न किया बल्कि एक मिशनरी की तरह वह इस साज़िश को तार-तार करके बेनक़ाब करने में लग गयीं। उनको जवाहरलाल का सामीप्य प्राप्त था। इसलिए कश्मीर के सिलसिले में उन्हें सही हालात से अवगत कराने की कोशिश करती थीं। लेकिन अब तो जवाहरलाल भी सच्ची बात सुनने की सामर्थ्य न रखते थे। इसलिए वह मृदुला से भी खिंचे-खिंचे रहने लगे। हमारी हिमायत के बदले मृदुला को क्या-क्या कष्ट न उठाना पड़े? किंतु वाह रे उनकी हिम्मत कि उनकी त्यौरी पर बल न आया। उनको कांग्रेस से निकाल दिया गया। उनके विरुद्ध अत्यंत गैर-शरीफाना और घिनावने प्रोपगंडे की मुहिम शुरू की गयी। कश्मीर में उनके प्रवेश पर पाबंदी लगा दी गयी और अंत में उन्हें जेल पहुँचा दिया गया जहाँ इस लाड़-प्यार से पली रईस बाप की बेटी को मुक़दमा चलाए बिना एक साल से अधिक अवधि तक हिरासत में रखा गया।' (पृष्ठ 605-606).

आत्मकथा, जीवनी, संस्मरण, डायरी और जर्नल यद्यपि सभी साहित्य की एक ही विद्या के अंतर्गत हैं यथापि सबमें परस्पर मौलिक अंतर है। आत्मकथा में आत्म-विकास की कड़ियों को यथासंभव संबंधित माहौल, समाज, राजनीति, धर्म, साहित्य, कला, विज्ञान या इतिहास के सूत्रों में पिरोने की प्रवृत्ति होती है और तदनुसार घटनाओं, व्यक्तियों और दृश्यों का निरूपण होता है। किंतु संस्मरण में घटनाक्रम की अपेक्षा घटनाओं, व्यक्तियों एवं दृश्यों के इंप्रेशन को पकड़ने का प्रयास होता है। लेखक की गिरफ्त या पकड़ उसकी ऐतिहासिक चेतना के प्रसार एवं सौंदर्य बोध तथा उसके इगो के फैलाव या संकीर्णता पर निर्भर करती है। मसलन इतिहास और सौंदर्य बोध जितना ही पैना और इगो जितना विस्तृत होगा उसी अनुपात में उसकी अनुभूति प्रामाणिक एवं ग्राह्य होगी। इस दृष्टि से भी 'आतिशे-चिनार' बहुत महत्वपूर्ण कृति है। यह व्यक्तियों, घटनाओं एवं समुदायों के शब्द-चित्रों से भरी हुई है जिन पर बार-बार उँगली उठायी जाती है और फैसले किये जाते हैं। लेखक का इगो इतना विराट और ऐतिहासिक चेतना इतनी सूक्ष्म है कि उसके निर्णयों का उद्देश्य दोष देना नहीं अपितु किसी नैतिक नुक़्ते की तरफ संकेत करना मात्र होता है। सरहद के क़बायलियों के आक्रमण के फलस्वरूप कश्मीर और जम्मू की घटना में महाराजा हरि सिंह का हीरे-जवाहरात से लद-फँद कर सौ से अधिक मोटर गाड़ियों के काफिले के साथ सपरिवार जम्मू भाग जाना, अपनी कश्मीरी प्रजा को विपत्ति के समय उसके हाल पर छोड़ देना, महाराजा और महारानी तारा देवी का जम्मू के उग्रवादी हिंदुओं को वहाँ के मुसलमानों के क़त्ले-आम के लिए भड़काना, पाकिस्तान भेजने के झाँसे से मुसलमानों को एक पार्क में इकट्ठा कराके ट्रकों में भरकर एक पहाड़ी के पास उतरवाकर मशीनगनों से उड़ा देना, जम्मू में मुसलमानों की आबादी के अनुपात को कम करने के लिए सरदार पटेल के पालक-बालक न्यायमूर्ति मेहर चन्द खन्ना (महाजन) द्वारा जम्मू के हिंदू अख़बारों में यह बयान कि कार्य-विशेष पूरा किया जा रहा है - यह सब शेख़़ अब्दुल्लाह और उनके आंदोलन की आत्मा को झुलसाने के लिए काफी था। इन सबका रिकार्ड के तौर पर उल्लेख है और कई तथ्य तो ऐसे हैं जो शायद और कहीं न मिलें। इस सिलसिले में महारानी तारा देवी और बलराज मधोक की चर्चा, जो उस समय राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की एक मुहल्ला टुकड़ी की कमान सँभाले हुए थे, उल्लेखनीय है। लगभग 35 वर्ष की दीर्घ अवधि के बाद इन घटनाओं की चर्चा के सिलसिले में बलराज मधोक - मुसलमानों का राष्ट्रीयकरण करने वाले प्रो. बलराज मधोक - के उल्लेख के पीछे भी शेख़़ साहब की ऐतिहासिक दृष्टि ही कार्यरत थी, क्योंकि इन घटनाओं के उल्लेख के बिना प्रोफेसर साहब का असली चेहरा सामने नहीं आ सकता था।

शेख़ 'महाराजा ने बोरिया-बिस्तर बाँधकर अपने जवाहरात और दूसरी बहुमूल्य संपत्तियाँ संदूकों में बंद करके एक सौ से अधिक गाड़ियों में लाद दिया और स्वयं उस भगोड़े काफिले की रहनुमाई करते हुए 25 अक्टूबर को जम्मू की तरफ कूच कर गया। उसके साथ उसके नज़दीकी रिश्तेदार, मुसाहिब, मित्रों इत्यादि के अतिरिक्त उसके ख़ानदानी मंदिर गदाधर की सुनहरी मूर्ति भी थी। जब यह काफिला ऊधमपुर पहुँचा तो महारानी तारा देवी ने अपने बाल बिखेरकर उस मूर्ति को अपनी गोद में ले लिया। जब स्थानीय आबादी एक खुली कार में महारानी को मूर्ति लिए हुए देख रही थी तो यह अंदाज़ा करना मुश्किल नहीं कि भावावेश का पारा कहाँ पहुँचा होगा। उनका ख़ून उबालकर महारानी वहाँ मुसलमानों के खून की होली खेलने का जो नाटक खेलना चाहती थी उसका यथेष्ट प्रभाव पड़ा। महाराजा की इस कायरतापूर्ण हरकत से कश्मीरी अवाम को बड़ा दुःख हुआ। क्योंकि उन पर एक सौ वर्ष राज करने के बाद और खून-पसीने की कमाई से आलीशान प्रासाद निर्मित कराने के बाद अपने ख़ानदान के नुमाइंदे की हैसियत से उसने संकट की घड़ी में उन्हें अकेला छोड़ दिया था।' (पृष्ठ 411-412)

'इधर हम कश्मीर में क़बायलियों को पीछे धकेलने में व्यस्त थे, उधर जम्मू में महाराजा हरि सिंह सांप्रदायिकता की आग को भड़काने के लिए ख़ूब हाथ-पैर मार रहे थे... जम्मू पहुँचकर महाराजा और महारानी तारा देवी ने खिसियानी बिल्ली की तरह खंभा नोचना शुरू किया। अपने दिल की भड़ास निकालने के लिए उन्होंने जम्मू के उग्रवादी हिंदुओं और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सधे हुए सदस्यों में घातक हथियार वितरित किये और उन्हें मुसलमानों का सफाया करने की उत्तेजना दिलाते रहे। ऐसी ही एक टोली की निगरानी प्रोफेसर बलराज मधोक कर रहे थे। उन्होंने ऊधमपुर और रियासी में मुसलमानों के ख़ूने-नाहक से खूब हाथ रँगे।' (पृष्ठ 433-434)

'व्यक्ति और राष्ट्र' शीर्षक (अध्याय 32) के अंतर्गत इतिहास में व्यक्ति और घटनाओं के पारस्परिक संबंध से बात शुरू की गयी है और फिर बहस का मोड़ भारत-पाक स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख कर्णधारों की तरफ मोड़ दिया गया है। सरोजिनी नायडू, मुहम्मद अली जिन्ना, महात्मा गांधी, मौलाना आज़ाद, ख़ान अब्दुल गफ्फार ख़ाँ, मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल, राजेन्द्र प्रसाद, डॉ. अंबेडकर इत्यादि की भूमिका पर व्यक्तिगत संस्मरणों के माध्यम से प्रकाश डाला गया है। राष्ट्रों का इतिहास कुछ व्यक्तियों की कहानी है या व्यक्ति ऐतिहासिक शक्तियों के हाथ में मात्र मोहरे की तरह हैं - इस बहस से बात उठाकर निम्न शब्दों में अपनी स्थिति स्पष्ट की गयी है -

'ऐतिहासिक शक्तियों की अनुकूल और साज़गार हवा के बिना व्यक्ति महान उपलब्धियों का अलाव रोशन नहीं कर सकते। लेकिन व्यक्तियों की विशेषता इसमें है कि वह अपनी ख़ुदी (इगो - अहं) और कर्म के उत्साह (जोशे-अमल) के बल से ऐतिहासिक शक्तियों की गति तेज़ करते हैं। यह सिकंदर महान के लिए भी सच है और लेनिन के बारे में भी। कार्ल मार्क्स का विचार था कि साम्यवादी क्रांति के लिए यूरोप के देशों में जर्मनी में सबसे अधिक अनुकूल दशाएँ हैं और रूस में सबसे अधिक प्रतिकूल। लेनिन के युग प्रवर्तक अस्तित्व ने इस धारणा को निर्मूल सिद्ध करके साम्यवाद का उदय रूस की धरती से कर दिखाया।' (पृष्ठ - 336)

व्यक्ति के चरित्र, आस्थाओं एवं आदर्शों की सही परीक्षा संकट या अप्रत्याशित और प्रतिकूल परिस्थितियों में ही संभव है। कांग्रेसी नेताओं की परख की घड़ी 'भारत छोड़ो आंदोलन' के बाद पैदा हुई। 1937 में होने वाले सूबों के चुनावों में मुस्लिम लीग पिट गयी थी। किंतु 1942 के बाद होने वाले चुनावों में उसकी स्थिति सुदृढ़ हो गयी थी। किसी भी हालत में अब न तो कांग्रेस के आत्मौचित्य-युक्त नेता और न तो अंग्रेज़ ही उसे उपेक्षित कर सकते थे। यद्यपि मुस्लिम लीग ने 1940 में पाकिस्तान प्रस्ताव पारित कर दिया था किंतु 1944 तक, जैसा कि डॉ. अंबेडकर ने अपनी पुस्तक 'पाकिस्तान या हिंदुस्तान का विभाजन' में बार-बार संकेत किया था, मि. जिन्ना ने तथाकथित पाकिस्तान की भौगोलिक सीमाओं को स्पष्ट नहीं किया था। (डॉ. अंबेडकर की पुस्तक 1944 में छपी थी)। अतः इससे यह निष्कर्ष निकालना सर्वथा निराधार न होगा कि जिन्ना साहब पाकिस्तान की माँग को मुस्लिम अल्पसंख्यकों की राजनीतिक सौदाबाजी के हथियार के रूप में कांग्रेसी नेताओं की अनुदारतापूर्ण एवं आत्मौचित्यपूर्ण नीतियों के विरुद्ध कर रहे थे। यदि ऐसा न होता तो वह कैबिनेट मिशन प्लान के प्रस्तावों को कदापि न स्वीकार करते। अभी तक कांग्रेसी नेता मि. जिन्ना और उनकी लीग को नजरंदाज करते आए थे किंतु अब ऐसा करना उनके लिए संभव न रह सका। ध्यान रहे कि कैबिनेट मिशन के प्रस्तावों और मौलाना आज़ाद के फार्मूले में, जिसे गांधी जी ने हिंदू-मुस्लिम समस्या के समाधान का गुर बताया था और जिसे कांग्रेस ने स्वीकार भी किया था, कोई मौलिक अंतर नहीं था। मौलाना ने राज्यों को दो सूचियों में रखा था और कैबिनेट मिशन ने इसमें देशी रियासतों की एक तीसरी सूची भी बढ़ा दी थी।

शेख़़ साहब का दावा है कि 1953 से फरवरी 1964 तक उन्हें अकारण जेल में सड़ाने तथा उनकी अवामी नेतृत्व शक्ति को बर्दाश्त न कर सकने की पृष्ठभूमि में पं. नेहरू की दुविधाएँ थीं। 'जवाहरलाल के दिल में एक बड़ा साहित्यकार छुपा हुआ था। उनका शानदार और ज़ोरदार अंग्रेज़ी गद्य उनकी लेखनी-शक्ति का साक्षी है। वह अपने को नास्तिक कहते थे लेकिन हिंदुस्तान के उस भूत के प्रेमी भी थे और प्रशंसक भी जिसमें हिंदू-पुनरुत्थान और हिंदू राज का जादू भी था। वह अपने अंतिम दिनों में कश्मीर के मामले में अपनी ग़लतियों का प्रायश्चित करने की बड़ी अभिलाषा रखते थे और इसलिए उन्होंने बख़्शी गुलाम मुहम्मद को कामराज योजना की कुल्हाड़ी की एक चोट से यहाँ की राजनीति के उद्यान से अलग करके रख दिया।... उन्होंने 1964 में मेरी रिहाई के बाद अपने रंज और पश्चात्ताप की अभिव्यक्ति की और सच्चे दिल से इस गुत्थी का हल सुलझाने के लिए मेरी मदद प्राप्त करना चाहते थे लेकिन इतिहास बड़ा बेरहम है, उसने उन्हें प्रायश्चित से पहले ही मौत के हाथों में दे दिया और उनकी दिल ही दिल में रह गयी :

'मेरी यह आदत नहीं किसी की खातिर रख लूँ मये-शबाना (इक़बाल)' (पृष्ठ 354-355)

जीवन और साहित्य के लावण्य के स्रोत हैं - हास्य, व्यंग्य। हमारे आधुनिक महापुरुषों में विनोबा भावे और मोरारजी भाई के अतिरिक्त संभवतः किसी ने हास्य-व्यंग्य से परहेज़ नहीं किया। गांधी जी का ह्यूमर तो सर्वविदित है। उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक से इस सदी के आरंभिक दो-तीन दशकों में यूरोप में इतनी तादाद में जीवनियों और आत्मकथाओं की रचना हुई कि एक अनुमान के अनुसार हर चार प्रकाशित पुस्तकों में एक जीवनी रही है। 'आतिशे-चिनार' को इसी परंपरा में रखना चाहिए। इस आत्मकथा में हास्य-विनोद के अनेक स्थान हैं। कई बार तो लेखक इनके सुराग़ में इतिहास के पन्नों को भी खँगालने लगता है। एक भरपूर ज़िंदगी जीने वाले व्यक्ति के लिए यह लगभग असंभव है कि वह जीवन के इस महत्वपूर्ण पक्ष को नज़रंदाज कर दे। पुस्तक के अंतिम अध्याय में कश्मीर के विशिष्ट राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में जहाँ कश्मीरी पण्डित वर्ग की महत्ता का विशद वर्णन किया गया है वहीं इस वर्ग के बौद्धिक योगदान, व्यावहारिक सूझ-बूझ और वाग्पटुता और हाज़िर-जवाबी के अनेक उदाहरण भी पेश किए गए हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि डॉ. इक़बाल की तरह शेख़़ अब्दुल्लाह को भी अपने कश्मीरी ब्राह्मण मूल पर गर्व है।

'कश्मीर छोड़ दो' आंदोलन के उपरांत शेख़़ अब्दुल्लाह अपने साथियों मिर्ज़ा अफ़जल बेग, पण्डित कश्यप बंधु, सरदार बुध सिंह और ख़्वाजा ग़ुलाम नबी उर्फ नबजी समेत, रियासी उपजेल में हैं। गर्मियों के दिन हैं। जेल में सर्वत्र मच्छरों, सांप-बिच्छुओं का बोलबाला है। रेडियो और अख़बारों की भी सुविधा नहीं है -

'लेकिन एक बात बहुत अच्छी थी। मेरे साथियों ने डेरा ख़ूब सजाया था। जिस कोठरी में मुझे बिठाया गया वह मेरे साथियों का गोदाम घर था। फर्श पर विभिन्न प्रकार की हाण्डियाँ रखी हुई थीं और दीवारों पर पुड़ियाँ कतार-दर-कतार लगी हुई थीं। मुझे शौक चर्राया कि ज़रा देखूँ हांडियों इत्यादि में क्या रखा हुआ है? जब उनके ढक्कन खोले तो क्या देखता हूँ कि इनमें भाँति-भाँति की पुड़ियाँ रखी हुई हैं। उनको खोला तो किसी में लौंग और दूसरे गरम मसाले पाए और बहुत-सी चीजें फर्श से लटक रही थीं। कुछ और हांड़ियों में खाण्ड, सूजी, घी इत्यादि रखे हुए थे। गरज़ कि कमरा क्या था, विधिवत पन्सारी की एक दुकान थी। मैंने अपने साथियों से पूछा - 'भई, यह पन्सारी की दुकान क्यों और किस लिए सजाई रखी है?' सरदार बुध सिंह मुस्कराते हुए बोले, 'ये मेरे दो साथी जो जेल में बचत करने के लिए आए हैं खुद खाते-पीते तो है नहीं। अपने राशन के पैसों से ऊल-जुलूल चीज़ें मंगवाते रहते हैं और इसमें से थोड़ा खर्चा करके बाक़ी हिफाज़त से रख देते हैं। बाद में महीने भर के बाद इसे बाज़ार में बिकने के लिए भेज देते हैं और इसे नक़दी में तब्दील करते हैं। हद तो यह है कि अस्पताल से ये शीखों के बंडल के बंडल ला चुके हैं और संभवतः उनको भी बाद में नगद नारायण की शक्ल देंगे।' सरदार साहब खामोश हुए तो बंधु जी एक कोने से बोल उठे, 'सरदार साहब अनाप-शनाप बोल रहे हैं। यह ख़ुद तो रोज़ हलवा-दुलिया चटख़ारे लेकर चट कर जाते हैं और फिर दुनिया को बताते हैं कि मैं त्यागी हूँ और पेट पर पत्थर बाँधे रहता हूँ।' इस पर क़हक़हे छूटे और खूब हँसी-मजाक़ रहा। लेकिन मैंने एक बार कश्यप बंधु से पूछ ही लिया कि आख़िर इस कार्य-प्रणाली का उद्देश्य क्या है? अब बंधु जी बड़ी गंभीर मुद्रा बनाकर डाँटने के अंदाज में कहने लगे, 'भई, तुम मुसलमान लोग सिर्फ पेट पूजा की फिक्र में लगे रहते हो। जो भी हाथ आया चुटकियों में उड़ा देते हो। तुम्हें कभी कल की चिंता की तौफीक नहीं हुई। आख़िर हम जेल में आए हैं और क्या पता हमें कब तक यहाँ सड़ना पड़े। इसलिए ख़ैरियत इसी में है कि हम यहाँ भी कुछ पैसा पूँजी जमा कर लें ताकि जब जेल से बाहर जाएँ तो ठन-ठन गोपाल की तरह ख़ाली हाथ न जाएँ।' मैं इस तर्क पर खूब हँसा। बहरहाल बात आई-गई हुई। अलबत्ता उन्होंने जो खांड इत्यादि जमा की थी उसका मैं हलवा बनाता रहा, उन्हें भी खिलाता और खुद भी खाता। बेचारे कश्यप बंधु विवश होकर मेरे साथ बैठकर खाते थे लेकिन बक़ौल शाइर 'कुछ दिल ही जानता है किस दिल से बैठे हैं।' (पृष्ठ 373-374)

शेख़़ साहब, नबजी, कश्यप बंधु, मिर्ज़ा अफज़ल बेग अब भद्रवाह जेल में हैं। विभाजन हो गया है। उपमहाद्वीप में खून की नदियाँ बह रही हैं। भद्रवाह में भूचाल के तीव्र झटके आने शुरू हो गए हैं। लोग डर के मारे अपने घरों से बाहर मैदानों में आ गए हैं।

'भूकंप का ज़बरदस्त धक्का आया तो हम चारों साथी झट से सेदन में निकल खड़े हुए। हमारी निगाहें क़िले के कंगूरों की तरफ लगी हुई थीं। बेग साहब भूचाल से बहुत डरते हैं। वह काफी घबरा गए। कश्यप बंधु उनके पीछे खड़े थे। उनके हाथ में चाय की गर्म प्याली थी। उनकी नज़र किले की कंगूरों पर लगी थी लेकिन कभी-कभी घबराहट में चाय की चुस्की भी ले लेते और बेग साहब को तसल्ली भी देते। प्याले से गर्म चाय के कतरे बेग साहब की गर्दन पर टिप-टिप गिर रहे थे। बेग साहब ने कंगूरों से तो नज़र नहीं उठाई लेकिन चिल्ला उठे, 'भई, तुमने तो मुझे जला दिया।' कश्यप बंधु जवाब दे रहे थे, 'मेरी नहीं, भूचाल की करतूत है।' उधर झटकों पर झटके लग रहे थे। हमारा बावर्ची एक हिंदू था। हम उसको बाहर आने के लिए कह रहे थे, लेकिन वह न माना और बड़े ज्ञानी-ध्यानी का रूप धारण करके बोला कि 'परमात्मा जो करता है वही होगा। उसके अलावा किसी से डरना नहीं चाहिए लेकिन जब झटके ज़रा सा तेज़ हो गए और कंगूरों से ईंटें गिरने लगीं तो पण्डित जी महाराज की सारी शेख़़ी हवा हो गयी। वह डर के मारे काँपने लगे। घुटनों-घुटनों चलते हुए और राम-राम करते हुए वह सीढ़ियों से नीचे आ गए। महाशय का रंग फक्क हो चुका था। सीधे हमारे पास पहुँचकर बीच में घुस गए.... स्थिति बिगड़ती जा रही थी और हमारी जान के लाले पड़े हुए थे। बाहर निकलने का कोई रास्ता न था। हमने जेलर से बहुत अनुनय-विनय किया कि दरवाज़ा खोलकर हमें मैदान में ले जाएँ, लेकिन उसने सुपरिन्टेंडेंट के आदेश के बिना ऐसा करने से इनकार कर दिया। मरता क्या न करता। हमने दरवाज़ा तोड़ना शुरू किया। लेकिन दरवाज़ा भी ख़म ठोंक कर खड़ा रहा। अंत में जब हालात अत्यंत नाजुक हो गए तो दरवाज़ा किसी न किसी तरह खुल गया और हम दूर मैदान में जाकर प्रकृति के इस प्रतापवान तरंग का अवलोकन करने लगे। सुपरिन्टेंडेंट जेल एक स्थानीय डॉक्टर था। हमारा पता लेने के लिए आन पहुँचा और हमारी हालत देखकर दूर से ही कहने लगा कि घबराने की ज़रूरत नहीं। हम एक ऊँची सतह के मैदान में खड़े थे और डॉक्टर साहब हमारी तरफ ऊपर आ रहे थे। वह हमें तसल्ली देते हुए ऊपर आने लगे कि भूकंप का एक झटका आया। बेचारे डॉक्टर साहब औंधे होकर रह गए और नीचे लुढ़कते चले गए। अब हमारी बारी थी, उन्हें दिलासा देने लगे कि घबराइए मत। सब ख़ैरियत है। बहरहाल हम एक महीने तक शामियानों में रहे। जब भूकंप के झटके थम गए तो हम वापस क़िले में दाख़िल कर दिए गए। उन दिनों की एक और मज़ेदार घटना मेरे मस्तिष्क पटल पर उभर रही है। हमें जो राशन एलाउंस मिलता था उसका हिसाब-किताब हमने पण्डित कश्यप बंधु के सुपुर्द कर दिया था। वह जेलर के जरिए नित्य प्रति की आवश्यक वस्तुएँ मंगवाया करते थे और उनका हिसाब रखते। एक दिन मैंने अपने कमरे में ऊँची आवाज़ से चख-चख की आवाज सुनी। बाहर आकर देखा कि बंधु जी जेलर के साथ सख़्त तेज़कलामी कर रहे हैं। हमने पूछा कि माजरा क्या है? बंधु जी बोले, 'मैंने सुबह जेलर से सिगरेट की डिबिया लाने के लिए कहा था, लेकिन इसने अनसुनी कर दी और मैं सुबह से सिगरेट के एक कश के लिए तड़प रहा हूँ।' मैंने मामला ख़त्म करने के उद्देश्य से कहा, 'कोई बात नहीं है, मैं बेग साहब से एक सिगरेट लाता हूँ। रात भर गुज़ारा कीजिए और फिर सुबह जेलर से दो डिब्बे सिगरेट वसूल कीजिए।' मामला रफा-दफा हुआ और बंधु जी कोने में संध्या में लग गए। मुझे किसी चीज़ के लिए उनके कमरे में जाने की ज़रूरत पड़ी। कमरे में मेरी नज़र एक कोने में लटके हुए एक थैले पर पड़ी। मैंने थैले को खोला तो मेरी आँखें आश्चर्य से खुली की खुली रह गईं क्योंकि इस थैले में सिगरेट के एक नहीं, दो नहीं, पूरे सत्तर डिब्बे सुरक्षित रखे हुए थे। मैं उल्टे पाँव बेग साहब के कमरे में गया, उनको सारा माजरा सुनाया और सिगरेट का थैला उनके सामने रखा। बेग साहब को शरारत सूझी। हमने सिगरेट थैले से बाहर निकाल लिए और हमारे पास फटे-पुराने जितने जूते थे उनको थैले में बंद करके बंधु जी के कमरे में उसी जगह लटका दिया जिस जगह यह रखा हुआ था। दूसरे दिन फैसले के मुताबिक जेलर बंधु जी के लिए सिगरेट के दो डिब्बे ले आया। बंधु जी खरामाँ-खरामाँ एक डिबिया को थैले में रखने के लिए चले। हम चुपके-चुपके उनको ताक रहे थे। जब उन्होंने वह थैला खोला तो उन पर अर्ध-मूर्छा सी छा गयी। लेकिन हमसे कुछ कहते नहीं बना। चंद दिन गुज़र गए तो हमारे पास आकर बैठ गए और मुस्कराने लगे। हमने पूछा मुस्कराहट किस खुशी में है तो बोले कि सब कुछ मालूम होने के बावजूद चुप साधे बैठे हो। हमने जानबूझ कर अनजान बनते हुए कहा कि हमें तो कुछ भी नहीं मालूम। बहरहाल बड़ी चिरौरी-मिन्नत की तो मेरा दिल पसीज गया और हमने उन्हें सिगरेट वापस कर दिए। लेकिन उन्हें सिगरेट लौटाते हुए मैंने उनसे पूछा कि 'क्या आपका इरादा सिगरेट की दुकान चलाने का है?' बंधु जी ने रियासी जेल वाला जवाब दोहराया और कहा, 'तुम मुसलमानों ने तो कभी कल की चिंता की ही नहीं है। आख़िर हम जेल में हैं और कमाई का कोई माध्यम नहीं। अगर चौरसिया ने सिगरेट बेच-बेच कर लाखों रुपये बना लिए तो मैं भी कुछ न सही घर जाकर सिगरेट की दुकान ही करूँगा'। (पृष्ठ 377-380)

यह बात भी कम अर्थपूर्ण नहीं कि 'आतिशे-चिनार' का आरंभ में कल्हण पण्डित के 'कश्मीर जिसे आध्यात्मिक खूबियों से तो परास्त किया जा सकता है...किंतु तलवार के बल से... कदापि नहीं' कथन से होता है और अंत फ़ारसी के प्रसिद्ध सूफी कवि मौलाना जलालुद्दीन रूमी के निम्न शेर पर -

तू बराये वस्ल कर्दन आमदी।
नय बराये फस्ल कर्दन आमदी।।
(तू मिलन कराने के लिये आया है
न कि वियोग कराने के लिए)

'आतिशे-चिनार' आदर्शों के शील भंग के परिणामस्वरूप उत्पन्न मोहभंग की कहानी भी है। किंतु शेख़़ अब्दुल्लाह की महानता इसमें थी कि बार-बार मित्रों और साथियों के विश्वासघात के बावजूद उनकी आस्था के कदम न डगमगा सके -

'मैंने अपने भारतीय दोस्तों से कहा कि मेरा भारत के साथ अधिमिलन होने पर मतभेद नहीं है। अलबत्ता अधिमिलन की सीमाओं पर अवश्य उनमें और मेरे बीच मतभेद है। हमने 1947 में अधिमिलन की सीमाएँ तय करके उसे परस्पर समझौते की दृष्टि से जिस प्रकार धारा 370 के रूप में निश्चित किया था, भारतीय नेताओं ने बलात और अवैधानिक तरीक़े पर उसको मनमानी करते हुए विकृत कर लिया है। यही बात हमारे रास्ते अलग होने की बुनियाद बना। अब यदि उन शर्तों को पुनः बहाल किया जाए तो हमारे आपसी मतभेद दूर हो सकते हैं।' (पृष्ठ 835-836).

फरवरी 1975 में होने वाले कश्मीर समझौते को शेख़ साहब ने उद्देश्यों का नहीं बल्कि कूटनीति का परिवर्तन कहा है। साथ ही इसे बहाली की दिशा में एक पुनः प्रयास भी बताया है।

[ श्रेणी : आलोचना। लेखक : मुहम्मद शीस ख़ान ]