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दिन क्या बुरे थे! : ज़मीनी चेतना के गीत - डॉ सन्तोष कुमार तिवारी

[समीक्षित पुस्तक : दिन क्या बुरे थे! (गीत‌‌-संग्रह-)। लेखक : वीरेंद्र आस्तिक। प्रकाशक : के के पब्लिकेशन, दरियागंज, नई दिल्ली। पृष्ठ - 102, हार्डबाउंड। मूल्य- 250 /-]

कानपुर में जन्मे वीरेन्द्र आस्तिक अपनी बहुआयामी गीत-यात्रा में मानवहित, नैतिक मूल्य, अन्वेषण तथा ज्ञात से अज्ञात को जानने की कोशिश को सर्वोपरि मानते हैं। रचनाकार का निर्विकार मन स्वत: ही संवेदनाओं की गहराई के साथ मानवता से जुड़ जाता है। वीरेन्द्र की खोज का विषय यह है कि- 

वो क्या है जो जीवन-तम में
सूरज को भरता है
पतझर की शुष्क, थकी-हारी
डाली में खिलता है।

गीतों में हमेशा एक ही विचार, भाव या घटनाक्रम की अन्विति का शुरू से अंत तक निर्वाह किया जाता है। रचनाकार अपनी अनुभूतिजन्य वैचारिकता या विचारजन्य अनुभूति से यहां-वहां भटक नहीं सकता अन्यथा गीत अपनी समग्रता में प्रभावहीन हो जाता है। गीत की जो उठान शुरू में होती है वही उठान समापन तक बनी रहनी चाहिए। गेयता तथा संक्षिप्तता की दृष्टि से भी आस्तिक के गीत निर्दोष हैं। मशीनीकरण के युग में भी वे अपनी प्रकृति-जन्य संवेदना और विचारजन्य संवेदना को छोड़कर व्यवसायी-संवेदना के शिकार नहीं हुए।

इस गीत संग्रह में वीरेद्र के पास, पैनी अभिव्यक्ति हैं। शब्द और अर्थ सहचर हैं। अबूझ को सहज बनाते हैं। पैनी अभिव्यक्ति के लिए आवश्यक है कि सार्थक शब्दों का मितव्ययता से प्रयोग हो- आओ! बोलो वहॉ, जहां शब्दों को प्राण मिले/पोथी को नव अर्थो में पढ़ने की आंख मिले/बोलो आमजनों की भाषा/खास न कोई बाकी। हम इक्कसवी सदी के दूसरे दशक में जा रहे हैं फिर हमारी भाषा बीसवीं सदी के पूर्वाद्ध की क्यों हो? बासी-तिबासी अभियक्ति से बचने के लिए जरूरी है कि हम आज की प्रचलित नयी शब्दावली को काव्यात्मकता प्रदान करें या पुराने शब्दों में नयी अर्थवत्ता को भरने की कोशिश करें। वीरद्र आस्तिक ने नये समय की कम्प्यूटराइज्ड शब्दावली को अपनाकर गीतों को नयी कल्पना और ताजगी प्रदान की है जो काबिलेतारीफ है। विण्डो, मेमोरी, चैटिंग, कूल, मार्केटिंग, ग्लोबल, वायरस, एण्ट्री, संसेक्स और केमिस्ट्री आदि शब्दों को काव्य-माला के धागे में पिरोकर कवि ने युगानुरूप नयापन लाने का प्रयास किया है।

कई गीतों में रचनाकार ने प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से ऐसा कन्ट्रास्ट पैदा किया है कि हम अतीत और वर्तमान की सांस्कृतिक-सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का तुलनात्मक विश्लेषण करने पर बाध्य हो जाते हैं। जंगे-आजादी के दिन क्या बुरे थे या अब न पहले सी रहीं ये लड़कियाँ- जैसी पंक्तियां इसका प्रमाण है। वीरेन्द्र की प्रकृतिजन्य संवेदना उन्हें टेसू, मंजरी, कोयल, निबुआ-अंबुआ, जमुनिया, बनस्थली की ओर ले जाती है और वे प्रकृति-सुंदरी के रोमानी रूप में खो जाते हैं। गीतकार को इस बात की बड़ी शिकायत है कि हमारी संवेदनाएं पथरा गई हैं। तोते को पिंजड़े का डर है, प्यासी चोचों और जलते हुए नीड़ों ने जीवन से मोह भंग कर दिया है। सेक्स, क्राइम तथा मीडिया बाजार में हमें किसानों तक की चिंता नहीं रही- 

लग न जाए रोग
बच्चों को
कुछ बचा रखिए
जमीनी चेतना
अब कहां वो आचरण
रामायणी
पाठ से बाहर हुई
कामायनी। 

रचनाकार को इस बात की पीड़ा है कि मुखड़ा मोहक आजादी का/ पांव धॅसे लेकिन कीचर में।

मेरी स्पष्ट धारणा है कि जब तक माँ-पिता के वात्सल्यपूर्ण त्याग और संरक्षण को हार्दिक श्रद्धा के साथ नहीं देखा जाता तब तक स्वस्थ समाजिकता संभव नहीं। परिवारजन्य संस्कार ही योग्य नागरिकता का और जीवन का शुद्ध पाठ पढ़ा सकते हैं। माँ पर कविता की कुछ मर्मस्पर्शी पंक्तियां देखिये- माँ। तुम्हारी जिंदगी का गीत गा पाया नहीं/ आज भी इस फ्लैट में/तू ढू़ंढ़ती छप्पर/झूठे बासन मॉजने को/जिद करती है/आज भी बासी बची रोटी न मिलने पर/ बहू से दिन भर नहीं तू बात करती है/मैं न सेवा कर सका अर्थात असली धन कमा पाया नहीे। इसी तरह पिता का स्वतंत्रता संग्राम याद करते हुए गीतकार की चिंता का विषय, बालू पर लोट रहे, कंचे खेल रहे घरौंदेें बनाते हुए बच्चों पर केद्रित होता है क्योंकि देश का भावी नक्शा इन्हीं के जिम्मे हैं। चाहे हरित वन का मनुष्यों की स्वार्थपूर्ण आरी से काटने की बात हो, या नदियों के जल-बॅटवारे की, चाहे कश्मीर-गोधरा हादसे का दृश्य हो या औरत पर पुरूष दासिता की नीयत- सब पर वीरेद्र की कलम चली है। अखिल सृष्टि के साथ रागात्मक संबंध इसी का नाम है या फिर सॉसों की डिबिया में ब्रह्मांड का समा जाना भी कहा जा सकता है। स्व से पर के विस्तारण की कोई हद नहीं होती। फिर भी निराशा-अवसाद-अनास्था का स्वर नकारात्मकता की ओर नहीं जाता- 

इस महानाश में
नव-संवेदन
मुझको रचना होगा। 

हारा-सा सूना खंडहर हूँ 
बिरवा-सा उगना होगा। 

यह आशापूर्ण संघर्ष का स्वर है।

जाहिर है *दिन क्या बुरे थे!* में वीरेंद्र आस्तिक ने नए शब्द विन्यास और अभिनव शैली-शिल्प से गीतों को संवारा है, नई धुनें दीं है और इस मिथक को तोड़ने में सबसे ज्यादा हाथ बँटाया है कि गीतों के लिए तो बस दो दर्जन शब्दावली पर्याप्त है- हथेली, मेंहदी, महावर, चांदनी, सागर, लहर, ...मुखड़ा, चमेली आदि। वे आधुनातन शब्द विन्यास के पक्षधर हैं और इस मामले में अपने ही तटबंधों का अतिक्रमण करते हैं। विषय-वैविध्य इतना है कि इस प्रतिस्पर्धा में गीत-नवगीत नयी कविता का ग्राफ लगभग एक-सा है। मेरी विनम्र राय में वीरेन्द्र आस्तिक नयी कविता को गीत-नवगीत के जवाब हैं।

[ समीक्षक : (स्व.) डॉ सन्तोष कुमार तिवारी, सागर, म प्र ]