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नैतिकता तो मात्र हिंडोला है / कुमार मुकुल

[समीक्षित पुस्तक : डॉक्टर ग्लास (अंग्रेजी उपन्यास)। लेखक: ज़लमार सॉडरबर्ग। प्रकाशक : अंतिका प्रकाशन, दिल्ली। अनुवादक: द्रोणवीर कोहली। मूल्य : $ 13.95 ]

इस स्वीडिश उपन्यास का अंग्रेजी से अनुवाद द्रोणवीर कोहली ने किया है। उपन्यास के आरंभ में एक जगह डाक्टर ग्लास कहता है- 'मुझसे, यानी डाक्टर ताइको गैबरियल ग्लास से, बढकर और कोई इतना तन्हा नहीं है जो कभी-कभार दूसरों की मदद करने दौड़ पड़ता है, लेकिन जिसमें अपनी मदद करने की क्षमता ही नहीं है और जो तीस बरस की उम्र बीत जाने के बाद भी किसी औरत के नज़दीक नहीं गया। तीस की उम्र में एक तन्हा व्यक्ति की स्त्री की नजदीकी की कामना उसके मानस में किन भावों को जन्म देती है और इस अभाव की पूर्ती के लिए वह कैसे एक बूढ़े पादरी की हत्या के तर्क को अभिव्यक्त करता है और उसे अंजाम तक पहुंचाता है, यही इस उपन्यास का विषय है। विवाह संस्था, धर्म की व्याख्या और सामाजिकताओं के दबाव कैसे अपराध् की पृष्ठभूमि तैयार करते हैं यह भी साथ-साथ दृषिटगोचर होता चलता है। दरअसल सारे अपराध् थोपी गयी पवित्रता और भलाई के दबावों से बच निकलने की जद्दोज़हद में ही अपना रास्ता पाते हैं।' 

डाक्टर ग्लास की विडंबना यह है कि जिस स्त्री की कामना से वह पादरी की हत्या तक जाता है उससे कभी वह अपने प्यार का खुलकर इज़हार तक नहीं कर पाता, यहां तक कि हत्या के बाद भी वह स्त्री को खुद से दूर जाता हुआ पाता है। देखा जाए तो ग्लास के बहाने उपन्यासकार मानव मन पर तथाकथित सभ्यता के दबावों से पैदा होने वाली विकृतियों से पाठक का परिचय कराता है। यह सभ्यता प्रेम की सहज भोग को विकृत कर देती है, ग्लास एक जगह सोचता है- 'लोग हमेशा एक-दूसरे के प्रेम-प्रसंगों के भी इसी लपेटे में लेते हैं। नतीजा क्या होता है... गर्भवती स्त्री घिनौनी लगने लगती है... ऐसा क्यो कि जिस इन्द्रिय का इस्तेमाल हम दिन में कई बार गलाजत को बाहर निकालने के लिए नाली की तरह करते हैं क्यों उसी से मानव जाति सुरक्षित रहती है... यही काम क्या किसी गरिमामय ढंग से... नहीं किया जा सकता ?'

हमारी सभ्यता को सबसे ज्यादा विकृत उस पर थोपे गए पवित्रता के दबाव करते हैं जो स्त्री-परुष संबंधों में तमाम गलत चुनावों की भूमिका तैयार करते हैं। शादी-व्याह के नाम पर इतना गाजा-बाजा और तमाशा होता ही इसलिये है कि सहज युवा मन अपनी सिथति पहचान ही ना पाए। पादरी के साथ विवाह के बाद जिस स्त्री का दम घुटता है अपने समाज और सभ्यता के दबाव में खुद ही पादरी का चुनाव किया था पर नतीजा यह होता है कि पादरी के सारे सदव्यवहार के बाद भी उसके मन में उसके प्रति घृणा ही उपजती है और एक बाहरी युवक के वह प्रेम कर बैठती है। युवक को हासिल करते ही वह पादरी से छुटकारे के लिए तड़पने लगती है। यह तड़प ही डा. ग्लास की नज़रों में पादरी को अपराधी बना देती है। 

उधर पादरी के लिए उसकी स्त्री उसकी सम्पत्ती मात्र है जिसका कभी भी भोग किया जा सकता है। उस स्त्री का विरोध इसी संपत्ती होने के खिलाफ है। 

बारीकी से देखा जाए तो यह उपन्यास समाज की जड़ और चेतन सत्ताओं की टकराहट को सामने लाती है पादरी सभ्यता की स्थापित, जड़ हो रही सत्ता का नमूना है। इसलिये एक स्त्री मन को जाने बिना वह अपनी सत्ता से लौट अपनी र्इच्छा की अभिव्यकित मात्रा से उसे हासिल कर लेता है। दूसरी ओर डा ग्लास चेतन सत्ता है जो अपनी अभिव्यकित के लिए जगह ना निकाल पाने की तड़प में पादरी की विराट सत्ता को नष्ट करने का सपफल षडयंत्रा करता है। और सत्ता के मद में पादरी जिस स्त्री मन की चेतन सत्ता का हनन कर उसे गुलाम बनाता है और गुलाम समझता है, वही उसकी सत्ता के विनाश का साधन बनती है। 

पादरी का जड, तयशुदा व्यवहार उसकी स्त्री मन में उसके प्रति कैसी घृणा पैदा करता है इसे पादरी कभी जान नहीं पाता। पर वह स्त्री पादरी की जड़ता को अच्छभ् तरह जानती है। पादरी द्वारा शारीरिक संबंध् बनाने की हर कोशिश उसे बलात्कार लगती है पर वह पादरी से अपना मन खोलने की कल्पना भी नहीं कर सकती। दुनिया भर के अपराधें के लिये क्षमा और प्रार्थना करने वाले पादरी के पास इस स्त्री के लिए राहत का एक शब्द नहीं हो सकता, यह वह जानती है एक जगह डाक्टर ग्लास को वह समझती है- ... आप उसे नहीं जानते। तलाक और पादरी! वह कतई राजी नहीं होगा, कभी नहीं ।चाहे मैं सर पटकूं, दुनिया इधर-से-उधर हो जाए। खड़ी-खड़ी मुझे 'क्षमा कर देगा, एक बार नहीं सत्तर बार। ... नहीं मेरे भाग्य में तो रौंदा जाना ही लिखा है। 

यहां हम आलोक ध्न्वा की कविता 'भागी हुर्इ लड़कियां की पंकितयों की याद कर सकते हैं- 'क्या तुम्हें दाम्पत्य दे दिया गयाक्या तुम उसे उठा लाएअपनी हैसियत, अपनी ताकत सेतुम उठा लाए एक ही बार मेंएक स्त्राी की तमाम रातें...। यह उपन्यास पादरी की उसी हैसियत और ताकत की बानगी पेश करता है, जो वैध् तरीके से स्त्री को गुलाम बनाए रखती है। उस स्त्री और डा ग्लास का विद्रोह इसी हैसियत और ताकत के खिलापफ है- 'अब यह औरत जाग उठी है! और इसको माता-पिता ने, जिन्हें यह मालूम होना चाहिए या कि शादी-ब्याह क्या हेाता है, जिन्होंने जानते-समझते हुए भी अपनी स्वीकृति दी थी... और स्वयं यह पादरी भी : क्या इसके जेहन में भी यह बात नहीं आर्इ कि कितना अप्राकृतिक, कितना अनुचित व्यवहार कर रहा है वह?... इसके पहले मैंने कभी नहीं सोचा था कि नैतिकता तो मात्र हिंडोला है...। नैतिकता की व्युत्पत्ति प्रेंफ शब्द मोरल; प्राथाद्ध से है इसी तरह एक जगह डा ग्लास सोचता है- 'पादरी हमेशा पिछले दरवाजे से ही चर्च में प्रवेश करते हैं, ऐसा क्यों ? 

पोटैशियम सायनाइड की जो गोलियां डा. ग्लास ने अपने लिए तैयार कर रखी थीं उसे ही पादरी को विश्वास मे लेकर खिलाया था उसने। गोलियां बनाते समय उसने अपनी जान लेने की नहीं सोची थी, हां यह विचार जरूर था कि एक अक्लमंद आदमी को आत्महत्या के लिए तैयार रहना चाहिए। 

यहां देखा जाए तो आत्महत्या के नये निहितार्थ सामने आते हैं। आत्महत्या को लेकर ग्लास के सोचने का तरीका यह जाहिर करता है कि वर्तमान व्यवस्था में अपनी सपफार्इ पर होने वाली नकारात्मक प्रतिक्रिया के प्रति निशिचंत होने के कारण व्यकित आत्महत्या की ओर बढ़ता है और बहुत बार जब वह अपने शत्रु को मारना तो चाहता है पर मारने के तर्क को जमाने के लिए अग्राहय पाता है तो आत्महत्या कर लेता है? मतलब बहुत बार आत्महत्या करने वाला किसी की हत्या में खुद को असमर्थ पाकर भी आत्महत्या कर सकता है। यानि कि सामने वाले को मार डालने के जिस तर्क के प्रति वह अश्वस्त है उस पर दुनिया केा सहमत करा पाने में विपफल होने की आशंका उसे आत्महत्या की राह पर ढेल सकती है। कुल मिलाकर आत्महत्याएं हमारी व्यवस्था के लिए खतरनाक प्रश्न चिन्ह की तरह हैं। वे उस खतरनाक बिंदु की ओर र्इशारा कर रही होती हैं, जिसमें मामूली हेर-फेर व्यवस्था को गर्त में ढकेल देने की राह तैयार कर सकती है। किसी भी सकारात्मक व्यवस्था की आत्महत्या की घटनाओं के बाद अपनी स्थिति का आकलन शुरू कर देना चाहिये वर्ना आत्महत्या की उपेक्षा उस व्यवस्था के लिए आत्महत्या की तैयारी साबित होगी। 

आत्महत्या भी एक विद्रोह है इसलिये सोच-समझ कर व्यवस्था आत्महत्या से बच गए आदमी के लिए सजा की व्यवस्था करती है। आत्महत्या की कोशिश व्यवस्था के प्रति व्यकित के विद्रोही को उजागर कर देती है, इसलिए व्यवस्था उसे बच जाने पर बंध्क बना लेती है, वह जानती है कि खुद को मारने में असपफल रहा व्यकित आसानी से व्यवस्था को नष्ट करने की ओर बढ सकता था, या बढ़ सकता है, इसलिये उसे कंडीशंड करने और तोड़ने के लिए कैद की व्यवस्था रहती है। 

आत्महत्या से बचे आदमी को सजा का ही एक पहलू है इच्छामृत्यु का अधिकार ना देना। डा ग्लास इच्छा मृत्यु के अधिकार को मतदान के अधिकार से भी महत्वपूर्ण मानता हे। 

प्रेम की भावना को डा ग्लास बहुत महत्व देता है। वह मानता है कि किसी व्यक्ति के लिए सबसे बुरी स्थिति यह होती है कि वह देखता है कि वह किसी का प्रेमपत्र नहीं वह सोचता है कि- 'प्यार नहीं तो प्रशंसा मिले... नहीं तो हमारा दबदबा हो, ऐसा नहीं तो घृणा, तिरस्कार मिले। कि आदमी अपनी पहचान खोजता है। दूसरों पर अपना असर देखना चाहता है, किसी भी रूप में वह आनंद को भी परिभाषित करता है- 'हर आदमी को अपनी स्थिति में जो भी अच्छा लगता है, वही आनंद है। उपन्यास मानव मन की चेतन-अवचेतन तमाम परतें उधेड़ता चलता है। और यह उधेड़ अपना एक मौलिक लहजा रखता है। उधेड़ता हुए वह पाता है कि - 'सदाचारी बने रहने का मतलब है, अपनी सीमाओं को पहचानना या चुनाव करने का मतलब ही है अपने आपको महरूम करना। लोग सुख की चिंता नहीं करते, केवल भोग-विलास के पीछे भागते हैं या मेरी देह ही मैं हूं। देह के माध्यम के बिना कोई खुशी नहीं, कोई गम नहीं।

कुल मिलाकर उपन्यास बहुत अच्छा है, जिसे संजोकर रखा जा सकता है। काफी पहले हंस में जान स्टाइनबेक का उपन्यास पढ़ा था 'एक मछुआ एक मोती। अनुवाद राजेन्द्र यादव ने किया था। वह भी इतना अच्छा लगा था कि सहेज कर रख लिया। मात्र सौ पेज पढ़कर संतुष्ट करा देना ऐसा कुछ ही कृतियों के बस का होता है।

[समीक्षक : कुमार मुकुल, स्थानीय सम्पादक - कल्पतरु एक्सप्रेस, आगरा, उ.प्र.]