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जैनेंद्र की रचनात्मक दुनिया में स्त्री - प्रीति चौधरी

प्रीति चौधरी
किसी भी रचना का जन्म शून्य में नहीं होता। रचना व रचनाकार को उनकी सामाजिक, राजनीतिक परिस्थितियों के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। अच्छे साहित्यकार अपने समय के सवालों से जूझते हैं और वे समय के सम्मुख कई नए सवालों को उपस्थित भी करते हैं। जैनेंद्र निश्चय ही हमारी साहित्यिक विरासत के विशिष्ट स्तंभ हैं, वह अपने कुछ खास दार्शनिक रुझानों के बावजूद समय समाज में रचनात्मक आवाजाही करते हैं और इस प्रक्रिया में भारतीय समाज की एक नई स्त्री प्रकट होती है। जैनेंद्र की कलम स्त्रियों के तत्कालीन प्रश्नों को शिद्दत से घेरती है। समाज में स्त्रियों की स्थिति, उनकी समस्याओं को कमोबेश संबोधित/विश्लेषित करते हुए जैनेंद्र का साहित्य लंबा सफर तय करता है। जैनेंद्र का साहित्यनामा 1929 से 1985 तक का समय समेटे है। पहली प्रमुख रचना 'परख' बाल वैधव्य का मुद्दा उठाती है तो अंतिम रचना दशार्क (अधूरी) देह व्यापार पर केंद्रित है। कई बार ऐसा लगता है कि जैनेंद्र के लेखकीय सरोकार की केंद्रबिंदु स्त्री है। स्त्रियों के ही माध्यम से उनके जीवन दर्शन की प्रतिस्थापना होती है। हालाँकि स्वतंत्रता पूर्व की उनकी रचनाओं में अपरिग्रह, त्याग, संयम जैसी बातें भी बार बार आती हैं।

बीसवीं सदी के शुरुआती दशक, भारत में राष्ट्रवाद के उभार, स्वाधीनता की कल्पना और आदर्शों के दशक हैं। यही समय है जब महात्मा गांधी जन आंदोलन को महिलाओं, किसानों, श्रमिकों तक पहुँचाने की पुरजोर कोशिश कर रहे थे। भारत के राष्ट्र के रूप में विकास के साथ यह हिंदी के भी भाषा के रूप में विकास का समय है। जैनेंद्र का गद्य भाषा व संवेदना, दोनों के स्तर पर इसमें शामिल होता है।

जैनेंद्र की आरंभिक तीनों रचनाओं परख (1929), त्यागपत्र (1937) व सुनीता (1935) के केंद्र में स्त्री है। प्रायः प्रेम करती स्त्रियाँ। प्रेम करती ये स्त्रियाँ विचारशील और कर्मठ हैं। अपने पारिवारिक, सामाजिक दायित्वों का निर्वहन करती ये वे स्त्रियाँ हैं, जिन्होंने पारिवारिक मर्यादा, परंपरा, नियमों की पाखंडी तस्वीर को तोड़ा और जीतने हारने, संघर्ष करने के लिए परंपरागत औरत के चोले से बाहर निकल आईं। जैनेंद्र की साहित्यिक चेतना 'त्यागपत्र' में चरमोत्कर्ष पर है। मृणाल के चरित्र, संघर्ष और त्रासदी ने उसके व्यक्तित्व को अद्भुत ऊँचाई प्रदान की है। 'त्यागपत्र' में आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य का सशक्त स्त्री विमर्श सिर्फ स्त्रियाँ ही कर सकती हैं, यदि ऐसी कोई बाध्यता न हो तो प्रेमचंद और जैनेंद्र की कुछ रचनाएँ आधुनिक स्त्री विमर्श के समकक्ष ठहरती हैं। बीस और तीस के दशक में लिखी प्रेमचंद की कहानियाँ नरक का मार्ग, सुभागी और कुसुम आज के स्त्री विमर्श में भी प्रदीप्त हो सकती हैं। तत्कालीन समाज के लिए तो ये कहानियाँ किसी क्रांति से कम नहीं हैं। प्रेमचंद सुभागी में तो माता पिता बेटे के रहते हुए भी अंतिम संस्कार के लिए बेटी को चुनते हैं। ऐसी कहानियाँ अपने समय से आगे की कहानियाँ हैं।

बहरहाल बात जैनेंद्र की हो रही है। जैनेंद्र के उपन्यास साहित्य की तीनों पात्र 'त्यागपत्र' की मृणाल, 'परख' की कट्टो और 'सुनीता' की सुनीता में एक समानता है। ये तीनों ही कर्तव्य के बोझ तले दबी हैं। आधुनिक अधिकारसंपन्न स्त्री यहाँ नहीं मिलती। किंतु अधिकारसंपन्नता अनिवार्य रूप से व्यक्तित्वसंपन्नता का परिचायक नहीं होती। इन स्त्रियों ने कर्तव्य निर्वाह करते हुए जिस प्रकार नैतिकता, मर्यादा का विश्लेषण किया, जिस तरह सामाजिक संरचना में रचे बसे पाखंड को तार तार किया वह भविष्य की अधिकारसंपन्न स्त्री के लिए रास्ता बनाता है। जैनेंद्र की इन स्त्रियों ने कहीं स्वेच्छा से अपना जीवन नहीं चुना है। अक्सर यही हुआ कि उनके मन की जो बात थी, मन में ही उसका दम घुट गया। लेकिन परिस्थितियों का सामना करने में इनके वजूद की जद्दोजहद प्रकट होती है। नियति की शिकार होने के बाद भी इन स्त्रियों ने अपने लिए रास्ते जरूर बनाए या कम से कम रूढ़ रास्तों से ऐतराज दिखाया।

मृणाल हिंदी साहित्य की पहली आधुनिक स्त्री है जो नैतिकता की परंपरागत मान्यता को सिरे से खारिज करती है। वह न सिर्फ अपने स्त्रीत्व व अस्मिता के प्रति सजग है बल्कि खुद को तिल तिल जला कर भी वह नया रास्ता अख्तियार करती है। सच है कि जलना उसके जैसी स्त्रियों के नसीब में होता है, पर वह घर में इज्जत बचाते दम नहीं तोड़ती। मृणाल ने घर छोड़ा, बाहर निकली और हाशिए के लोगों के बीच पहुँच गई। यहीं उसका व्यक्तित्व नए आयाम पाता है। उसके पास समाज व लोगों को समझने के लिए तार्किक बुद्धि है जो कथित सभ्य समाज के ढोंगों का पर्दाफाश करती है। जिंदगी के आखिरी मुकाम पर वह शराबी, जुआरी, भिखारियों, वेश्याओं जैसे कथित दुर्जनों के बीच है। मृणाल इनके बीच भी इनकी ऊपरी परत खरोंच कर इनसानियत पा जाती है। मृणाल समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े लोगों की सच्ची सहृदयता का सम्मान करती है। तभी वह कहती है 'वहाँ छल असंभव है जो छल कि शिष्ट समाज में जरूरी ही है।' मनुष्य हो तो भीतर एक मनुष्य होना होगा। कलई वाला सदाचार यहाँ खुल कर उघड़ रहता है। यहाँ खरा कंचन ही टिक सकता है। क्योंकि उसे जरूरत नहीं कि वह कहे 'मैं पीतल नहीं हूँ'। दरअसल मृणाल सभ्य समाज के सदाचार की ही शिकार थी। किसी से प्रेम कर बैठना ही मृणाल का कदाचार था। उसका पालन पोषण तो इसलिए हो रहा था कि वह एक अच्छी आर्य स्त्री बने। जबरदस्ती दूसरे से विवाह के बाद जब वह दांपत्य की नींव सच्चाई पर रखना चाहती है तो पति की नजर में दुराचारी हो जाती है। सच्चाई का बोझ पति की मर्दानगी के लिए कहर है। पछाँह का घी खाया मर्द उसकी बेंत से धुनाई करता है। साथ ही यह धौंस भी देता है कि 'बहू बेटियों की चलन की रीति नीति हुआ करती है।' '...अपना कुल शील चला जाता है, वह न निभा तो फिर क्या रह गया'। इस कुल शील का मतलब यही था कि पति की हर जायज नाजायज इच्छा को शिरोधार्य किया जाए। कुल शील की ओखल में स्त्री के सिर पर दनादन मूसल बरसते रहें और वह सहती रहे। पति ने दुश्चरित्रता का आरोप लगा कर मृणाल को छोड़ दिया तो उसका कोई सहारा नहीं। मायके में उसकी जगह तभी तक थी जब तक पति का घर था। घर आने की शर्त ही थी कि 'वहाँ अपनी गिरस्थी अच्छी तरह सँभालना और पति को सुखी रखना' पर मृणाल से तो गृहस्थी ही बिखर गई थी अब नैहर में ठौर कहाँ? स्त्री को मिलने वाले आशीर्वादों का बोझ कैसा होता है, इसको जैनेंद्र ने समझा है।

'पतिव्रता रहने पूतों फलने, बड़भागिन होने आदि के आशीर्वाद उन्होंने ऐसे प्रणत भाव से दिए कि मानो उसके नीचे वह गड़ कर भी मर जाए तो धन्य हो जाए' पर मृणाल विद्रोहिणी निकली उसने 'अन्य' होना स्वीकार न किया। वह कहती है 'क्यों पतिव्रता को यह चाहिए कि पति उसे नहीं चाहता तब भी अपना बोझ डाल दे? मुझे देखना भी नहीं चाहते, यह जान कर मैंने उनकी आँखों के आगे से हट जाना स्वीकार कर लिया।' मृणाल ने अलग रहना स्वीकार किया और पति ने उसे शहर के बाहरी हिस्से की एक कोठरी में पटक दिया। आत्महत्या का विकल्प मृणाल के सामने कभी नहीं था। वह मरने को अधर्म मानती है। उसे जीना था, भले मर कर ही सही। रोटी चलाने में मृणाल की मदद एक निहायत ही मामूली आदमी करता है। यह आदमी मृणाल के रूप यौवन पर आसक्त है। मृणाल इसे समझती है फिर भी वह सहारा देने के लिए उसकी कृतज्ञ है। शीघ्र ही मृणाल परिश्रम से अपनी जीविका अर्जित करने लगती है। उसके गर्भ धारण करते ही दूसरा आदमी उसे छोड़ कर भाग जाता है। मृणाल स्वयं यही चाहती थी कि वह अपने परिवार में लौट जाए। क्योंकि वह समझती थी कि उसके साथ सोने के कारण वह उसे बदजात और बाजारू औरत ही समझेगा। दुख और अपमान की पीड़ा मृणाल को इस मनःस्थिति में पहुँचा देती है कि वह अपने दर्द से ही दवा हासिल करती है : 'मेरा मन पक्का होता रहे कि कोई मुझे कुचले, तो भी मैं कुचली न जाऊँ और इतनी जीवित रहूँ कि उसके पाप के बोझ भी ले लूँ और सबके लिए क्षमा की प्रार्थना करूँ।'

इतनी उदारता निर्वेयक्तिक सोच से ही आ सकती है। मृणाल ने अपने कष्टों को भी साक्षी भाव से देखा तभी अहं का विर्सजन कर पाई। दूसरे मर्द के छोड़ कर जाने के बाद, प्रसूति के लिए मृणाल जब मिशनरी अस्पताल पहुँचती है तो वहाँ उसे धर्म परिवर्तन का प्रलोभन मिलता है किंतु वह धर्म परिवर्तन को राजी नहीं होती है। गौरतलब है कि धर्म परिवर्तन से इनकार वह इसलिए नहीं करती कि हिंदू धर्म में उसकी गहरी आस्था है। ऐसा वह इसलिए करती है कि वह स्त्री है और उसकी स्थिति के लिए किसी भी धर्म में कोई रियायत नहीं है।

जैनेंद्र के स्त्री पात्रों में एक और समानता है वे सभी, रिश्तों की बुनियाद सच्चाई पर रखना चाहती हैं। अपने तथा दूसरे के प्रति ईमानदार रहने की आकांक्षी हैं। परख की कट्टो, त्यागपत्र की मृणाल, सुनीता की सुनीता, मुक्तिबोध की नीना और दर्शार्क की वेश्यावृति करने वाली रंजना, ये सभी अपने कार्य के प्रति जिम्मेदार हैं और सीधा जवाब देती हैं। जैनेंद्र के यहाँ स्त्री प्रेम को स्वीकारती है, पर वह यथासंभव विवाह संस्था के संरक्षण का प्रयास करती है। जैनेंद्र की कहानी 'जाह्नवी' में स्त्री प्रेमी की प्रतीक्षा में हर दिन कौओं को रोटी खिलाती है। जाह्नवी रोटी खाते कौओं से मनुहार करती है कि वे उसके सारे अंग चाहे नोच खा लें पर दो आँखों को छोड़ दें। ये आँखें पियु का इंतजार कर रही हैं। इसी लड़की 'जाह्नवी' का जब विवाह तय हो जाता है तो वह भावी पति को पत्र लिख अपने प्रेमी के बारे में बताती है। वह साफ साफ कहती है कि जीवनसंगिनी बनने में वह असमर्थ है। हाँ अनुगता बन कर वह कर्तव्य निर्वहन भली भाँति कर सकती है। संयोग से जाह्नवी की इस सच्चाई का सम्मान होता है। पर त्यागपत्र में मृणाल की सच्चाई ही उसकी मुसीबतों का कारण बन जाती है। मुसीबतों को न्यौता तो मृणाल खुद देती है प्रेम करके। इस प्रेम को यह सिला मिलता है कि उसे 'कुलबोरन' कहा जाता है।

मृणाल भाई के संरक्षण व भाभी के अनुशासन में बड़ी होती है। भाभी के लिए वह दायित्व है। मृणाल को सुगृहणी बना कर ससुराल भेजना भाभी की जिम्मेदारी है। यहाँ दो स्त्रियों के मध्य निकटता न होकर अनुशासन की औपचारिक दूरी है। घर में मृणाल मात्रा अपने भतीजे प्रमोद के साथ नैसर्गिक रूप से रहती है।

युवा होती लड़कियों की तरह वह खुद से, आकाश से, बादल से, तारों से, हवा से प्रेम करती है। इन्हीं प्रेमों के बीच प्रेम मूर्त हो गया तो बगिया की तरह लहलह हो जाती है। यही प्रेम मृणाल को हुआ है जिसकी वजह से वह चिड़िया बन जाना चाहती है। चिड़िया नन्हीं है पर स्वतंत्र है, उड़ सकती है। मृणाल उड़ने से पहले ही पकड़ ली गई और सजा मुकर्रर हो गई।

ससुराल से लौट कर मृणाल बुझी बुझी है। प्रमोद उससे कुछ सुनना चाहता है जो वह सुनता है, उसके बाल मन को भेदने के लिए पर्याप्त है 'तुम सब लोगों के लिए मैं पराई हूँ। तेरी माँ ने मुझे धक्का देकर पराया बना दिया है। पर मुझे जहाँ भेज दिया है प्रमोद मेरा मन वहाँ का नहीं है।'

मृणाल यहाँ स्पष्टतया कहती है कि उसे धक्का देकर खदेड़ा गया है। वह अवांछित वस्तु है। इसका उसे एहसास है। मायके में उसे सुनना पड़ा 'आइंदा इस तरह बिना फूफा की मर्जी से चली आएगी तो वह उन्हें अपने घर में आश्रय न देंगे।' मृणाल आश्रिता और सामान बन कर रह गई है। वह प्रमोद से खुद को 'फूफा की चीज' कहती है।

'त्यागपत्र' की रचना 1937 में हुई थी। उस समय के भारत में महिला सशक्तिकरण व महिला साक्षरता दर का अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। मृणाल इतनी बहादुर नहीं थी कि घर छोड़ कर, प्रेमी के साथ निकल जाती। उसने बेमेल विवाह में भरसक सामंजस्य स्थापित करने का प्रयास किया था, पर पति के व्यवहार ने उसे तोड़ दिया। ऐसा नहीं था कि मृणाल प्रतिरोध नहीं करती। पति के ठहरे गर्भ को गिराने की कोशिश, विरोध था। मृणाल के गर्भ पर सिर्फ मृणाल का अधिकार था। इसके विपरीत मृणाल दूसरे आदमी (कोयले वाले) से ठहरे गर्भ को जन्म देती है। क्योंकि 'इस पाप को ढो रही हूँ' कहने के बावजूद वह कोयले वाले की कृतज्ञ है। आसनाई के लिए ही सही पर उसने मृणाल को घर परिवार छोड़ कर सहारा दिया था। मृणाल युवा है और अपनी दैहिक जरूरतों को छिपाती नहीं। वह कहती है 'तन दे सकूँगी शायद वह अनिवार्य हो।' तन की जरूरत के बारे में इतने कुंठामुक्त तरीके से तब कितनी औरतें बोल रही थीं? मृणाल देह को पारस्परिक आवश्यकता मान रही है पर वह देह का सौदा करने के सख्त खिलाफ है। यह उसका ऊँचा वसूल है। अन्यथा दर दर की ठोकर से उसे कुछ राहत अवश्य मिली होती। मृणाल की यौवन की उमंगें बेरहमी से कुचली गई थीं। फिर भी मृणाल अपनी आंतरिक गरिमा व स्वाभिमान से समझौता नहीं करती।

इस संदर्भ में प्रेमचंद की एक कहानी याद आती है 'नरक का मार्ग' जो 1925 में 'चाँद' पत्रिका में छपी थी। प्रेमचंद ने उसमें कहा है कि 'स्त्री सब कुछ सह सकती है, दारुण से दारुण दुख बड़े से बड़ा संकट, अगर नहीं सह सकती है तो अपने यौवन काल की उमंगों का कुचला जाना।' इस कहानी में स्थिति थोड़ी अलग है। यहाँ लड़की के माता पिता धन के लोभ में लड़की का बेमेल विवाह कर देते हैं। बूढ़े पति को पाकर भी लड़की सोचती है कि वह पति की सेवा करेगी क्योंकि यह उसका धर्म है। ससुराल में एकदम उल्टा माहौल पाकर स्त्री जल्दी ही अपनी स्थिति समझ जाती है और कहती है कि 'इन्हें स्त्री के बिना घर सूना लगता होगा, उसी तरह जैसे पिंजरे में चिड़िया को न देख कर पिंजरा सूना लगता है।' महत्वपूर्ण बात यह है कि भिन्न प्रकार की रचनाभूमि होने के बावजूद प्रेमचंद और जैनेंद्र की स्त्रियाँ अपनी स्थिति का विश्लेषण बखूबी करती हैं। गुलाम जिस दिन गुलामी का एहसास कर ले, उसकी लड़ाई उसी दिन शुरू हो जाती है। 'नरक का मार्ग' कहानी में प्रेमचंद्र की स्त्री दो हाथ आगे निकल कर कहती है 'मैं इसे विवाह का पवित्र नाम नहीं देना चाहती...' यह कारावास ही है। 'मैं इतनी उदार नहीं हूँ कि जिसने मुझे कैद में डाल रखा हो उसकी पूजा करूँ, जो मुझे लात मारे उसके पैरों को चूमूँ...। स्त्री किसी के गले बाँध दिए जाने से ही उसकी विवाहिता नहीं हो जाती। विवाह का पद वह पा सकता है जिसमें कम से कम एक बार तो हृदय प्रेम से पुलकित हो जाए।'

प्रेमचंद यहाँ उस विवाह की बात कर रहे हैं जहाँ दो लोगों के मन पहले मिलते हैं। जैनेंद्र की रचना 'परख' में भी कट्टो, सूत कातकर बिहारी को माला पहनाती है तो कहती है कि 'आज मेरा विवाह पूर्ण हुआ, एकत्व सार्थक हुआ।' इस विवाह में बिहारी और कट्टो के मन मिले थे। जैनेंद्र की कट्टो ने परख में बाल वैधव्य के अभिशाप को पीछे छोड़ा तो, 1930 में लिखी प्रेमचंद की कहानी सुभागी में गाँव के चौधरी ने आगे बढ़ कर बाल विधवा सुभागी का हाथ अपने बेटे के लिए माँगा।

कट्टो के माध्यम से जैनेंद्र ने विधवा के प्रेम को वैध बनाया है। हालाँकि यह सौभाग्य कट्टो के लिए क्षणिक है। इस सौभाग्य को बरसाने वाला सत्यधन एक कमजोर किस्म का आदमी है। सत्यधन उस बौद्धिक वर्ग का प्रतिनिधि है जहाँ आदर्श की बात होती है पर क्रियान्वयन नहीं होता। जब आदर्श को कार्य रूप में चरितार्थ करने का समय होता है तब परिवार, समाज, नैतिकता सामने खड़े मिलते हैं। वस्तुतः सत्यधन मध्यमवर्गीय सुविधाभोगी, समझौतापरस्त इंसान है जिसे संभ्रांत, आराम की जिंदगी चाहिए। मजे की बात यह है कि वह दार्शनिक तथ्यों व बड़ी बातों के सहारे स्वयं को सही भी ठहराता है।

सत्यधन कट्टो से प्रेम करता है पर इस प्रेम के खातिर वह अपना जीवन दाँव पर नहीं लगा सकता। वह यह जरूर चाहता है कि कट्टो का विवाह हो जाए किंतु यह जिम्मेदारी वह स्वयं लेने को तैयार नहीं। सत्यधन का जिंदगी में जो हिसाब किताब है उसमें कट्टो से विवाह में उसे कोई फायदा नहीं सिवाय इसके कि कट्टो के सपने पूरे होंगे। दूसरा विकल्प गरिमा नामक स्त्री है जिससे विवाह करने पर सत्यधन को धन, प्रतिष्ठा सुरक्षा सब मिल सकती है। गरिमा पढ़ी लिखी शहरी युवती है। गरिमा अमीर पिता की पुत्री है, जिसे जीतने की आदत है। सत्यधन की कट्टो के प्रति भावनाओं को वह विजयी भी हो जाती है। पर कट्टो जैसी विधवा के लिए प्रतिस्पर्धा का क्या औचित्य? उसके लिए तो सेवा ही धर्म है। वह गरिमा की सेवा कर कृतज्ञ होना चाहती है। सत्य उसका आराध्य है। इस आराधिका को सत्य से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति की आराधना कर सुख मिलता है।

कट्टो को सत्यधन पर अटूट विश्वास है। यह उसके व्यक्तित्व की सहजता व निश्छलता है। जब बिहारी उससे सत्यधन के गरिमा से विवाह की बात करता है तो वह विश्वास नहीं करती।

अपने प्रेम पर इतना विश्वास करने वाली कट्टो सच में दुनियादारी नहीं समझती। पर यहाँ यह नहीं समझना चाहिए कि वह कोई टिपिकल' नायिका/प्रेमिका थी जो अबोध, मासूम और, कुछ हद तक बेवकूफ थी। कट्टो आदर्शों को जीने वाली स्त्री है। मुश्किल से साक्षर कट्टो विदुषियों सी समझ रखती है। बिहारी कट्टो के वैधव्य पर कृपा नहीं करता। वह तरस से उपजी सहानुभूति नहीं रखता। उसने ऊँचे विचार और कर्म वाली स्त्री कट्टो को पहचाना और उसके वशीभूत हो गया। बिहारी, सत्यधन की तरफ से कट्टो से मिलने गया था। ताकि वह सत्य की उससे विवाह न कर सकने की असमर्थता समझा सके। वह कट्टो से सत्य को बंधनमुक्त करने की सिफारिश करता है। कट्टो को अपनी स्थिति को लेकर कोई भ्रम नहीं है। वह कहती है 'मैंने कब क्या बाँधा है जो खोल सकूँ? मैं क्या बाँध रखने लायक हूँ?' कट्टो को एकदम से अपनी सीमाएँ दिखने लगती हैं, वह लाचारी का अनुभव करती है। अब वह सत्यधन की खुशी के लिए सर्वस्व न्यौछावर करने को तत्पर है। जब वह सत्य से मिलती है तो उससे यह पूछ कर बहुत छोटा कर देती है 'तो हमारी जीजी को कब लाओगे?' प्रत्युत्तर में सत्य जो कहता है उससे उसकी हिप्पोक्रेसी झलकती है 'तुम चाहती हो, मैं जीजी को लाऊँ?' जबकि वह कट्टो से पूछने से पहले ही गरिमा से विवाह का फैसला कर चुका है। वह स्वयं चाहता है कि गरिमा से उसका विवाह हो। वह कर्तव्य के आवरण में इस फैसले का औचित्य ठहराता है। कट्टो से प्रेम उसके लिए बेमानी है क्योंकि उसे प्रेम का दूसरा संस्करण पसंद आने लगा है जिसके अनुसार 'प्रेम जीवन को बहलाने की वस्तु तो बन सकता है, लेकिन जीवन उसके लिए स्वाहा नहीं किया जा सकता। जीवन तो दायित्व है, और विवाह वास्तव में उसकी पूर्णता की तरह...' प्रेम जो अंत में केवल एक आवेग एक भाव है उस पर जीवन कैसे निछावर कर दिया जाए?

होता यह है कि सत्यधन जो सिर्फ बात का धनी है, विवाह का दायित्व भी नहीं पूरा कर सका। वह अकर्मण्य है। पत्नी और ससुर की नजरों से भी उतरता है। ससुर ने जब संपत्ति में उसको हिस्सा नहीं दिया तो उसका वास्तविक चरित्र बाहर आ जाता है। वह पत्नी का घर छोड़ देता है। उसकी स्थिति पर तरस खाने वाला कोई नहीं है। ऐसे में कट्टो उसे चालीस हजार रुपये देकर कृतार्थ तो करती ही है साथ ही उसको उसके बौनेपन का भी एहसास कराती है। परख में कट्टो के समानांतर कोई खड़ा है तो वह है बिहारी। बिहारी फक्कड़ प्रवृत्ति का है। व्यक्तित्व और विचार की पारदर्शिता उसका प्रमुख गुण है। हल्का फुल्का दिखने वाला बिहारी गुरुता का पुंज है। वह सत्यधन की आत्मप्रवंचना की भर्त्सना करता है। कट्टो की सहजता उसे शीघ्र बाँध देती है। बिहारी कट्टो को अपनी जीवनसंगिनी बनाता है। यह कि वह कुछ अलग किस्म का है। कट्टो और बिहारी बड़े लक्ष्य के लिए साथ चलते हैं। बिहारी जनकल्याण में रत होता है, कट्टो उसकी सहायता करती है। दोनों का अपरिग्रह, पूँजी और परिश्रम के प्रति विचार उन्हें गांधीवादी दर्शन के निकट लाता है। अपरिग्रह पर जैनेंद्र का विशेष ध्यान है। त्यागपत्र में प्रमोद, मृणाल के मरने की खबर सुन कर कसम खाता है कि वह आवश्यकता से अधिक का संचय नहीं करेगा। जैनेंद्र के तीसरे उपन्यास 'सुनीता' में हरिप्रसन्न क्रांतिकारी है और अपरिग्रह में विश्वास रखता है।

'सुनीता' उपन्यास में जैनेंद्र ने स्त्री के व्यापक रूप को प्रतिस्थापित करने की चेष्टा की है। 'सुनीता' पत्नी और पतिव्रता स्त्री की भूमिका से स्त्री का डिपार्चर है। 'उस पत्नी से क्या होगा जो खाली पतिव्रता हो। मुझे चाहिए एक प्रतिमा भी जो पतिव्रता चाहे न हो, पर अटूट हो जो विपत्तियों में ऐसे चमके जैसे घोर घन में बिजली। जो पताका उठाए और युवक जिसके पीछे लहू की नदियाँ पार करते हुए चले जाएँ।' जैनेंद्र स्त्री की क्षमता का विस्तार घर से बाहर भी चाहते हैं। राष्ट्रीय आंदोलन में वे स्त्रियों की भागीदारी के समर्थक हैं। घर के कामकाज को कर्तव्य मानती स्त्री के सामने, जैनेंद्र कुछ और कर्तव्य निभाने की पेशकश करते हैं। यह कर्तव्य स्त्री को कोने से खींच कर केंद्र में ले आता है। 'तुम अपनी शक्ति पहचानने से नहीं दब सकती तुममें सब कुछ है।' हरिप्रसन्न देश के लिए उससे बाहर निकलने को कहता है। वह देवी, चंडी या फिर मायावी रूप में उसे शक्ति व प्रेरणा का स्रोत बनाना चाहता है। यह स्त्री युवकों की स्फूर्ति का केंद्र है जिसे देख कर वे निराश हुए बिना, थके बिना संघर्षरत रहें। जैनेंद्र स्त्री के सौंदर्य व आकर्षण का उपयोग ऐसे आधारलंब के रूप में कर रहे हैं जिसे देख कर युवक हँसते हुए देश के लिए प्राणोत्सर्ग कर दें।

जैनेंद्र के लिए स्त्री मायावी है, भोग्या नहीं। प्रश्न ये है कि क्या सामान्य स्त्री या सिर्फ स्त्री के रूप में सुनीता घर से बाहर नहीं निकल सकती। हरिप्रसन्न जब उसको रानी सुनीता कहता है तो वह विरोध भी करती है 'मैं गृहस्थन हूँ, गृहस्थन सुनीता।' पर गृहस्थन सुनीता आम स्त्री सुनीता इतनी अधिकारसंपन्न नहीं है कि स्वयं घर के खिड़की दरवाजे खोल दे। मायावी, शक्ति, चंडी आदि जैसी भूमिकाएँ यहाँ पुरुष उसके लिए तय कर रहा है। स्वयं सुनीता इसका निर्णय नहीं लेती। वह तो पति की इच्छानुसार हरिप्रसन्न से जुड़ती है।

आम स्त्री सुनीता पत्नी है, गृहस्थन है। उसे लगता है कि विवाह के बाद जीवन ठहर सा गया है। जैसे पानी कहीं रुक जाता है। उसे यह भी महसूस होता है कि बाहरी दुनिया के नए अनुभव उसको पुकारते हैं। किंतु वह जबरन उनको अनदेखा अनसुना कर घर के कामकाज में खुद को व्यस्त रखती है। लेकिन ये सवाल हैं कि दबते नहीं जो अगणनीय अवकाश तक चित्र विचित्र दुनिया फैली है, यह क्या इसलिए है कि उसकी तरफ से पीठ फेर कर इस घर में रह जाए? क्या हमारा उसका परस्पर कोई सरोकार नहीं है। सरोकार क्यों नहीं होना चाहिए?' प्रश्न की इस मुद्रा से सुनीता अपनी पहचान के प्रति सजग तर्क वितर्क करने वाली स्त्री मालूम होती है। संभव है यदि सुनीता को अवसर मिलता तो वह ड्योढ़ी पार कर अपने दायित्व का विस्तार करती। यह भी हो सकता है कि वह गहरे सामाजिक सरोकारों वाली महिला बनती। कई बार ऐसा होता है कि पुरुष, जिंदगी में ठहराव से तंग आकर कुछ नया खोजने पाने बोरिया बिस्तर लेकर निकल जाते हैं। मकसद सिर्फ घुमक्कड़ी भी हो सकता है। स्त्री को यह सुविधा कहाँ? तेवरों में आधुनिक लगने वाली सुनीता भी पति के ही निर्देशन का पालन कर धन्य हो रही है। वह पति की बात को सही भी मानती है। 'यह उनकी बात क्या झूठ है कि स्त्री को अपने घर में ही बहुत कुछ है। बाहर दुनिया में वह क्या पाने जाए?' पति के कहने पर वह स्वयं को भी उसके मित्र के समक्ष प्रस्तुत कर देती है। सुनीता का पति श्रीकांत उसकी रूप माधुरी पर बिछा है। स्त्री का यह रूप जीवन के प्रति लास्य और लालित्य उत्पन्न करता है। अपने मित्र हरिप्रसन्न को जीवन की मुख्यधारा में लाने के लिए वह पत्नी का सहयोग चाहता है। स्त्री का प्रेम पुरुष की भटकन भुला कर उसे नवजीवन दे सकता है।

हरिप्रसन्न रिवाल्वर रखने वाला क्रांतिकारी है। स्त्री से अपरिचित है। सुनीता से मिलने के बाद उसका स्त्री से संपर्क होता है। यह संपर्क उसे बेचैन करता है। स्त्री को शक्ति, माया, चंडी आदि रूपों में रखने के बावजूद उसको सुनीता से जो प्रेम होता है वह एक पुरुष का स्त्री के लिए प्रेम है। सुनीता के साथ एकांत उसे पुलकित करता है। उसकी प्रणयाकांक्षा अदम्य हो जाती है। सुनीता उसकी इच्छा समझती है। उसका और उसके पति का मंतव्य भी यही है। हरिप्रसन्न स्त्री देह को समक्ष पाकर कातर है। प्रणय का उद्दाम आवेग, कभी चरणों में सिर रखने तो कभी आलिंगन में कुचल देने जैसे भावों के रूप में आता जाता है। तभी सुनीता एकदम से निर्वस्त्र हो जाती है। हरिप्रसन्न अवाक हो जाता है। 'यह मैं हूँ, मुझे लो' कहती सुनीता देह को नगण्य बना देती है। हरिप्रसन्न लज्जा और ग्लानि से भर जाता है। सुनीता में कहीं कोई ग्रंथि नहीं है। वह हरिप्रसन्न की कामना का सम्मान करना चाहती थी। यह सब करने से पहले सुनीता बहुत द्वंद्व से गुजरी। पति के प्रेम का सहारा पाकर खुद को मजबूत करती रही। विवाह के बाद सुनीता को लगता था वह खुद को खोने लगी है। हरिप्रसन्न का आगमन सुनीता के लिए भी खुद को पाने जैसा रहा।

सुनीता उपन्यास निश्चित रूप से नैतिकता के कई मानदंडों को ध्वस्त करता है। उसके जरिए स्त्री की परंपरागत भूमिका से अलग नई स्त्री का जन्म हिंदी साहित्य में हुआ।

जैनेंद्र का साहित्य, स्त्री की भूमिका और उसके सवाल जवाब करने का दस्तावेज है। जैनेंद्र की कहानी है 'पत्नी' जो 1940 में लिखी गई। पत्नी कहानी की पत्नी कम पढ़ी लिखी है। उसका पति देश के स्वाधीनता आंदोलन से जुड़ा है। घर और पत्नी को बिल्कुल समय नहीं दे पाता। पत्नी चाहती है कि पति उससे भी कभी देश और आजादी की बात करे तो वह समझने का पूरा प्रयास करेगी। पत्नी सुनंदा ने हाल ही में बच्चा खोया है। वह शोक संतप्त है। पति की व्यस्तता समझती है, पर अपनी उपेक्षा से आहत है। उसके हिस्से सिर्फ पति की सुविधाओं का ध्यान रखना है। उसे ये भी लगता है कि 'वह कोई गुलाम थोड़े है' पर अगले ही पल उसके संस्कार उससे कहते हैं 'उसका काम तो सेवा है। बस, यह मान कर उसने कुछ समझने की चाह छोड़ दी है।' कहानी का मूल तत्व पति के चरित्रा में निहित है। पति दल में शांत स्वभाव के लिए जाना जाता है। वह विवेक का समर्थक और उग्रता का विरोधी है। वह दल को विश्वास दिलाने का प्रयास करता है कि उग्रता, विवेक को नष्ट करती है। ऐसे विचार वाला पति, पत्नी के समक्ष सारा विवेक ताक पर रख कर पेश आता है। पत्नी के मौन को अपनी उपेक्षा समझ वह तुरंत कुपित हो जाता है। पत्नी की तकलीफ ये है कि सारी व्यस्तताओं के मध्य पति कुछ कर न सके तो, मुँह से पत्नी के प्रति संवेदना प्रकट कर ही सकता है। पत्नी सारा भोजन उसे व उसके मित्रों को परोस देती है पर पति एक बार भी नहीं सोचता कि उसका इंतजार करती पत्नी खायेगी या नहीं। उसके लिए कुछ बचा या नहीं? वह पत्नी के मुँह फेरने पर पैर अलग पटकता है। फिर भी पत्नी अभ्यासवश उसकी सेवा में तत्पर है। प्रायः पत्नियों का पूरा जीवन सवालों के द्वंद्व में गुजर जाता है। जवाब में वे पति का और ख्याल रखती हैं।

1965 में लिखे गये उन्यास 'मुक्तिबोध' में जैनेंद्र ने ऐसी स्त्री को प्रस्तुत किया है जो अपनी देह के साथ सहज है। सुनीता में सुनीता पति की इच्छानुसार हरिप्रसन्न को समर्पण हेतु तत्पर है। मुक्तिबोध में नीला स्वयं यह फैसला करती है। नीला अभिजात वर्ग की स्त्री है। पति के साथ रहती है। किंतु प्रेम किसी और से है। प्रेमी से दैहिक समर्पण की अपेक्षा रखती है। वह प्रेमी की पत्नी से कहती है कि 'उसने अपने पति के अंदर देह का डर रहने क्यों दिया है? नीला समझती है कि डर से डर पर नियंत्रण की इच्छा उत्पन्न होती है। यह डर पर नियंत्रण उसकी देह का नियंत्रण नहीं हो सकता। नीला देह को प्राकृत, आदिम सत्य मानती है। इस पर नियंत्रण वाली व्यवस्था से उसे सख्त चिढ़ है। उसके विचार हैं, 'मेरा शरीर क्या मेरा अपना नहीं है। क्या मैं उसके साथ सहज नहीं हो सकती...'

नीला आत्मविश्वास से लबरेज आधुनिक स्त्री है। वह पुरुष के छद्म पर सीधे प्रहार करती है 'तुम लोगों ने औरत को गुड़िया बना रखा है। बस, तुम्हारे अच्छे लगने के लिए तो औरत को होना है।' स्त्री यदि यह समझ ले कि उसे बस दूसरों के मानदंड के हिसाब से नहीं जीना है तो वह अपने अस्तित्व को तलाश सकती है। अस्मिता की समझ यहीं से शुरू होती है। अक्सर पुरुषों का दिल गुड़िया टाइप नासमझ लड़कियों पर बड़ी जल्दी आ जाता है। 'कुछ न जानने वाली' मासूमियत पर तो वे लुट जाते हैं। जाहिर है, खेलने के लिए गुड़िया ही सही रहती है। इससे आगे जाएँगे तो सुख सुविधा के साजोसामान के बीच गुड़िया जी को घर में सजा देंगे। तेज तर्रार बौद्धिक किस्म की स्त्रियाँ तो अमानत में खलल डालती हैं। जैनेंद्र भी इस तरह के वाक्य पत्नी से नहीं बुलवाते हैं। पत्नी राजश्री तो पहले ही हथियार डाले है। पति को देवत्व जगाने प्रेयसी के पास भेजती है। प्रेमिका, नीला ही खरा बोलती है। प्रेमिका समाज के लिए खलनायिका से कम नहीं होती। उसकी उन्मुक्तता तो अस्वीकृत है ही, उसे बदचलन भी माना जाता है। असली बात तो तब है जब पत्नी, पुरुषपति से दो दो हाथ करे। पत्नी अपने मन की बिना 'लाउड' हुए भी कर सकती है। नीलाक्षी सिंह की कहानी 'रंगमहल में नाची राधा' में स्त्री अधेड़ उम्र में पति व बच्चों को छोड़ कर प्रेमी के घर चली जाती है। यह आधुनिक लेखक की दृष्टि की बानगी भर है।

जैनेंद्र का अंतिम उपन्यास दशार्क जो पूरा न हो सका 1985 में आया। यह उपन्यास देह व्यापार के मुद्दे को उठाता है। रंजना आत्मविश्वास से भरपूर व्यवहारकुशल स्त्री है जो वेश्यावृत्ति करती है। इस वेश्यावृत्ति को वह समाज सेवा कहती है। समाज सेवा की उसकी फीस काफी ऊँची है। धनोपार्जन का माध्यम उसने देह को बनाया है। रंजना पारिवारिक दबाव व मजबूरी के कारण इस धंधे में उतरी है। वेश्यावृत्ति को उसने ऐसी मोरी बताया है जो समाज की गंदगी साफ करती है। समाज की गंदगी साफ करने से बड़ी समाज सेवा और क्या हो सकती है? रंजना अपने कार्य का औचित्य सिद्ध करने के लिए अकाट्य तर्क प्रस्तुत करती है। जैनेंद्र स्वातंत्रयोत्तर भारत में भौतिकता की चमक दमक, परिवार के बिखराव, धन लोलुपता, विवाहेतर संबंधों को देखते हुए ऐसे मुद्दों को उठा रहे थे। आजादी के संघर्ष में सिर चढ़ कर बोलता अपरिग्रह व गांधी का आर्थिक चिंतन आजादी मिलते ही औंधे मुँह गिर गया। जैनेंद्र ने अपने जीते जी देश की राजनीतिक, सामाजिक संरचना में कई रंग और बदलाव महसूस किए। अपने समय व समाज को समझने की उनकी जो दृष्टि थी, उसके अनुकूल उन्होंने पात्र रचे। समाज पर टिप्पणी की, विश्लेषण किया। ये सच है कि जैनेंद्र ने कोई 'गोदान' नहीं लिखा न ही वे 'मैला आँचल' लिख सके। संभवतः वे ऐसा कुछ करना भी नहीं चाहते थे। इसी प्रसंग में यह भी कहा जा सकता है कि कई बार जैनेंद्र अपनी नायिकाओं के लिए विद्रोह और आधुनिकता का निर्देश नहीं देते, वे उसे सद्गृहस्थन और पुरुष के लिए प्रेरणा के सिंहासन पर बिठाना चाहते हैं और इस प्रकार उसे शक्ति नहीं शक्ति के सुंदर स्रोत के रूप में देखना चाहते हैं। लेकिन यह हकीकत है कि जैनेंद्र के रचना संसार में नायिकाएँ लेखक से बार बार विद्रोह कर देती हैं, वे जैनेंद्र के स्वप्नों और मंतव्यों से अलग डगर पकड़ने लगती हैं। और इसी कारण वे प्रायः अपने को लेकर लेखकीय पाठ से पृथक स्वतंत्र पाठ की गुंजाइश बनाती हैं। उनकी स्त्रियों की सीमाएँ हो सकती हैं, यह भी कि वे वैसी स्वतंत्र नहीं जो स्वयं निर्णय लें और उसके सुख दुख झेलें। दरअसल वे घटनाओं की शिकार हैं और 'प्रतिक्रिया' व्यक्त करती हैं। महत्वपूर्ण यह है कि इस प्रक्रिया में वे निश्चित रूप से अपने समय को पीछे छोड़ती हैं। जिस स्त्री ने परंपरा से विद्रोह किया उसी ने ठोकर खाने के बावजूद नई राह बनाई। परंपरा को जैनेंद्र की स्त्रियों ने तोड़ा, नई राह आधुनिक स्त्री विमर्श बना रहा है।

[श्रेणी : आलोचना। लेखक : प्रीति चौधरी ]