'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

मर्द और औरत / रशीद जहाँ

राशिद जहाँ 
औरत - अरे फिर आ गये!

मर्द - जी हाँ

औरत - अभी कल ही तो आप शादी करने गये थे!

मर्द - गया तो था!

औरत - तो फिर?

मर्द - तो फिर?

औरत - मतलब यह है कि आपकी दुल्‍हन साहिबा कहाँ हैं?

मर्द - तुम तो सचमुच चाहती हो कि मेरी जिन्‍दगी बर्बाद हो जाये!

औरत - लीजिए, यह मैंने कब कहा!

मर्द - तो फिर तुम्‍हारा क्‍या मतलब है मुझको परेशान करने से!

औरते - मतलब!

मर्द - बनती क्‍यूँ हो! तुम मेरा मतलब खूब अच्‍छी तरह जानती हो!

औरत - अच्‍छा, अब समझी! लेकिन, जनाब, मैं तो आपसे शादी करने को साल भर से तैयार हूँ, आप ही नहीं करते!

मर्द - लेकिन मैं तो यह बात गवारा नहीं कर सकता कि मेरी बीवी नौकरी करती फिरे! न घर की देखभाल करे न बच्‍चों का खयाल करे और सुबह ही सुबह उठ कर काम पर सिधार जाये!

औरत - आप भी वो सुबह उठ कर काम पर सिधार जायेंगे। तो मैं सारा दिन क्‍या मक्खियाँ मारा करूँगी!

मर्द - घर में कुछ काम होता है या नहीं! आखिर घर की देखभाल... !

औरत - हूँ! आप दफ्तर जायें और मैं घर का कोना-कोना झाँकती फिरूँ!

मर्द - मैंने यह कब कहा! आखिर घर में भी तो काम होता है।

औरत - जैसे...

मर्द - भई, यही घर की देखभाल! आखिर हमारी माँएँ भी घर की देखभाल करती थीं या नहीं!

औरत - तो चूल्‍हा झों‍क लिया करूँ!

मर्द - मैंने यह कब कहा!

औरत - तो फिर आपका मतलब घर की देखभाल से क्‍या है?

मर्द - भई, मुझे नहीं मालूम! तुमने बस यह आदत डाल ली है कि जहाँ मैं तुमसे मिलने आया और तुमने टाँग ली!

औरत - अच्‍छा अगर आपको मेरी आवाज पसन्‍द नहीं तो लीजिए मैं खामोश बैठी जाती हूँ... .बताइए न, क्‍या सचमुच आपकी शादी हो रही है! या बस मुझ पर ही रोब गाँठा करते हैं!

मर्द - हो ही जायेगी! कोई जनाब ही तो इस दुनिया में अकेली औरत नहीं हैं। आपको मेरी इतनी फिक्र क्‍यूँ हैं!

औरत - इसीलिए कि मुझको बेइन्‍तहा मुहब्‍बत है!

मर्द - जी हाँ, मुहब्‍बत है! मुहब्‍बत होती तो साल से क्‍यूँ जिद किये बैठी रहतीं और इस तरह परेशान करतीं! नौकरी नहीं छोड़ेंगी। आखिर रखा क्‍या है इस नौकरी में! कौन-सा एक हजार रुपया आप कमा रही हैं। सौ रुपया तो आपकी तनख्‍वाह है!

औरत - कुछ भी हो! है तो यह मेरी आजा़दी की कुंजी!

मर्द - अर्थात आपकी आजादी की जान इन्‍हीं सौ रुपयों में है!

औरत - सौ हो या दो सौ इससे बहस नहीं। आजादी की जान तो अपने पैरों पर खुद खड़े होने में है।

मर्द - यानी आपको मेरा जरा भी विश्‍वास नहीं और आप सोचती हैं कि मैं आपको रुपया बिल्‍कुल नहीं दूँगा!

औरत - वह रुपया लेकिन मेरी अपनी मेहनत का कमाया तो न होगा!

मर्द - औरत के कमाने से होता क्‍या है!

औरत - होता क्‍यूँ नहीं! सुनिए! चिड़ा लाया चावन का दाना, चिड़िया लायी दाल का दाना, दोनों ने मिल कर खिचड़ी पकायी!

मर्द - नहीं चाहिए मुझे आपकी दाल का दाना!

औरत - खाली चावल तो मुझसे खाये नहीं जायेंगे!

मर्द - जी हाँ, आपको तो चटनी, अचार की जरूरत है!

औरत - बिल्‍कुल ठीक!

मर्द - जब देखो एक जमघटा आपके चारों तरफ लगा रहता है। आपके परवाने!

औरत - उनको तो आप बिल्‍कुल घर में घुसने न देंगे!

मर्द - बिल्‍कुल नहीं!

औरत - आपको तो मालूम है कि वह सब मेरे दोस्‍त हैं।

मर्द - जी हाँ, बड़े दोस्‍त हैं!

औरत - तो फिर इन लोगों को तो आप घर में घुसने न देंगे!

मर्द - जी हाँ, मुझे इनसे सख्त नफरत है!

औरत - क्‍यूँ?

मर्द - बस है अपनी-अपनी तबियत!

औरत - तो मुझे परदे में क्‍यूँ न बिठा दें!

मर्द - दिल तो यही चाहता है लेकिन आप मानेंगी!

औरत - मैं तो और भी बहुत-सी बातें नहीं मानूँगी।

मर्द - खैर आप मेरी कोई बात मानें या न मानें लेकिन में यह जमघटा गवारा नहीं कर सकता!

औरत - तो फिर हमारे घर में कौन लोग आया करेंगे?

मर्द - वही जो कामन फ्रेन्‍ड्स हों यानी दोनों के मिले-जुले दोस्‍त!

औरत - हूँ! मिस्‍टर और मिसेज सेठी और मिस्‍टर सफदर!

मर्द - उनमें बुराई क्या है?

औरत - इसलिए कि वह मुझको बिल्‍कुल पसन्‍द नहीं!

मर्द - क्‍यूँ!

औरत - अपनी-अपनी तबियत!

मर्द - तुम तो बच्‍चों जैसी बातें करती हो!

औरत - और तुम!

मर्द - मैं तो हमेशा सही बात कहती हूँ!

औरत - जी हाँ! मेरे दोस्‍तों से आपको नफरत हो तो वह घर में न घुसें और आपके दोस्‍तों से मुझे नफरत हो तो वह शौक से आयें-जायें!

मर्द - ठीक है, बीवी साहिबा सुबह से शाम तक नौकरी पर सिधारें, शाम को जब हम थक-थकाकर दफ्तर से वापस आयें और दो घड़ी दिल बहलना चाहें तो बीवी तो आयें लेकिन दोस्तों की एक भीड़ लायें! यह है आपके दिमाग में घर का नक्‍शा!

औरत - और आपके दिमाग का नक्‍शा क्‍या है? बीवी हो! सुबह आप दफ्तर जायें, जल्‍दी-जल्‍दी आप को सजा कर गुड्डा बना कर दफ्तर भेजे! दिन भर घर के पीछे डंडा ले कर घूमे जो हर समय आपके नाम की माला जपे! इस बेकारी की कैद का नाम आप ने घर की देखभाल रखा है! फिर दफ्तर से थक-थकाकर बदमिजाजी करते हुए घर आयें तो आपका दिल खुश करे! शाम को सफदर साहब और मिसेज सेठी की हाँ में हाँ मिलाये!

मर्द - यह मैंने कब कहा!

औरत - और आप ने क्‍या कहा!

मर्द - मेरा तो सिर्फ यह मतलब है कि दूसरी औरतों की तरह आप भी रहिए!

औरत - फिर वही घर की देख-भाल!

मर्द - जी हाँ, घर की देख-भाल!

औरत - मैं नौकरी छोड़कर अपनी आजादी नहीं बेच सकती!

मर्द - आपकी आजादी!

औरत - जी हाँ, मेरी आजादी!

मर्द - आप नौकरी करती फिरें और बच्‍चे रोते फिरें!

औरत - बच्‍चे शादी होते ही थोड़ी हो जायेंगे!

मर्द - आखि़र कभी तो होंगे ही या आपको उनके जन्‍म से भी इनकार है!

औरत - नहीं, मुझे तो इंकान नहीं!

मर्द - और जब होगें तो आप नौकरी छोड़ देंगी!

औरत - नहीं, तब भी नहीं छोड़ूंगी!

मर्द - क्‍या मैं आप से पूछ सकता हूँ कि उनकी देखभाल कौन करेगा?

औरत - मैं और आप दोनों मिल कर!

मर्द - औरत का पहला कर्तव्‍य बच्‍चों की परवरिश है!

औरत - मर्द का पहला कर्तव्‍य बच्‍चों का हकदार होना है!

मर्द - क्‍या मतलब?

औरत - मतलब यह कि औरत को बच्‍चे पालने का हुक्‍म लगा दिया लेकिन बच्‍चे होते किसकी मिलकियत हैं!

मर्द - बाप की!

औरत - तो फिर मैं उनको क्‍यूँ पालूँ! जिसकी मिलकियत हैं वह स्‍वयं पाले!

मर्द - क्‍या अजीब बातें करती हो!

औरत - इसमें अजीब कौन-सी बात है!

मर्द - अजीब नहीं तो और क्‍या? अब बच्‍चे पालने से भी तुम्‍हें इनकार है!

औरत - मुझे हो या न हो, तुम्‍हें है!

मर्द - मेरा काम बच्‍चे पालना नहीं, रुपया कमाना है!

औरत - रुपया तो मैं भी कमाऊँगी!

मर्द - हूँ... रुपया कमायेंगी! सौ रुपये पर इतना गर्व है! जो कहीं ज्‍यादा होते तो न जाने क्‍या आफत ढातीं।

औरत - तो अच्‍छा समझो कि तुम्‍हारी पगार कम हो और मेरी आठ सौ तो नौकरी किसे छोड़नी चाहिए! तुम्‍हें या मुझे?

मर्द - तुम्‍हें!

औरत - क्‍यूँ?

मर्द - इसलिए कि मैं मर्द हूँ!

औरत - तो तुम हर बार अपने ही को बड़ा समझते हो!

मर्द - मैं क्‍या समझता हूँ, कुदरत ने ही मुझे बड़ा बनाया है!

औरत - मैं तो तुमको अपने से बड़ा नहीं खयाल करती! तो फिर तुम क्‍यूँ एक ऐसी औरत से शादी नहीं कर लेते जो रात दिन तुम्‍हारी पूजा किया करें!

मर्द - कर ही लेंगे! कोई एक आप ही तो दुनिया में नहीं!

औरत - तो फिर जाइए न! रोज क्‍यूँ आकर मेरी जान खा जाते हैं!

मर्द - (ठहर कर) बड़ा मुहब्बत का दम भरती हैं!

औरत - और आप भी तो भरते हैं!

मर्द - (ठहर कर) अच्‍छा यह सब तो हुआ, अब बताओ शादी कब करोगी!

औरत - लेकिन अपनी नौकरी नहीं छोडूँगी!

[ श्रेणी : नाटक । लेखक : रशीद जहाँ। अनुवाद : नगमा परवीन ]