'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

प्रतिभा का विवाह / भुवनेश्वर

भुवनेश्वर 

पात्र
  • प्रतिभा : अठारह वर्ष की बालिका
  • मोहन : प्रतिभा के पापा
  • प्रकाश वर्मा : प्रतिभा के साथ विवाहेच्छुक वृद्ध
  • महेंद्र : प्रतिभा के साथ विवाहेच्छुक युवक
  • मिस्टर जोशी : एक गृहस्थ
  • मिसेज जोशी : मिस्टर जोशी की पत्नी

पहला दृश्य 


(उत्तरी भारत में एक छोटा-सा रमणीक पर्वतीय स्थान। पत्थर की छोटी-छोटी हवेलियों के मध्य एक अपरिचित के समान लाल डाक बँगला , जिसके उत्तर ओर के बरामदे में सूर्य की मूर्षप्राय किरनों में नहाई एक अठारह वर्ष की बालिका बैठी है। उसकी आकृति में इस समय एक असंगत निरुत्साह और क्षोभ है , अर्थात वह अपने समस्त सौंदर्य के साथ किसी को आकर्षित करने में असमर्थ है। भीतर से एक व्यस्त आवाज आती है)

आवाज : आपकी टिमाटर की चटनी तैयार है। मैं कागजी निचोड़ कर रख दूँ। रोटी भी काटे लेती हूँ।

बालिका : हूँ।

आवाज : क्या बीबी, पथरचटी ही तो गए हैं। न जाने कब आवेंगे?

बालिका : मैं क्या ज्योतिष जानती हूँ! तुम कितनी बातून हो।

आवाज : यहाँ दाल तो गलना जानती ही नहीं, आलू इतने गल गए हैं कि उनका कुछ बन ही नहीं सकता, कोई सीधे मुँह बात ही नहीं करता। न जाने कैसा देश है?

(बालिका खीझ कर टहलने लगती है और बाहर छोटे फाटक तक जा कर लौटना ही चाहती है कि कुछ पदचाप सुन कर ठिठक जाती है। दूसरे ही क्षण दो अधेड़ पुरुष भारी ओवरकोट पहने प्रवेश करते हैं। पहला बालिका को देख कर अप्रतिभ हो जाता है , पर मनोगत विचारों को भरसक दबा कर दूसरी ओर देखने लगता है। दूसरा पास आ कर स्नेह के स्वर में कहता है)

दूसरा पुरुष : क्यों प्रतिभा, इतनी सर्दी में शॉल भी नहीं है?

प्रतिभा : (स्नेह) जी नहीं पापा, मैं आपकी राह देख रही थी।

पहला पुरुष : वहाँ से आ कर हमारा बँगला कितना नीरस दीखता है।

दूसरा पुरुष : बड़ा सुंदर स्थान है मुन्नी! तेरी तबीयत ठीक होते ही हम वहाँ चलेंगे।

प्रतिभा : मुझे अब प्रकृति के हृदयहीन सौंदर्य में तनिक भी रस नहीं है। मानव- प्रकृति कहीं अधिक सुंदर है।

दूसरा पुरुष : अच्छा-अच्छा, इसी तरह तो दिन-रात सोच कर स्वास्थ्य सत्यानाश कर लिया।

पहला पुरुष : अच्‍छा, अब चलिए मिस्टर मोहन, मैं चूर हो गया हूँ। आप तो अभी जवान हैं।

मिस्टर मोहन : (फैशनेबल हँसी हँस कर) खैर, हम बूढ़े ही आजकल के जवानों से अच्छे हैं।

प्रतिभा : अच्छा, पापा, आप यह बात कितनी बार कह चुके हैं।

(तीनों बरामदे की ओर चल देते हें)

मिस्टर मोहन : (सहसा ठिठक कर) हमने आज मिसेज जोशी को क्या समय दिया था?

मिस्टर वर्मा : मुझे तनिक भी ध्यान नहीं है, पर मिसेज जोशी तो आज रानीखेत गई होंगी।

प्रतिभा : नहीं, उन्होंने विचार बदल दिया था।

(बरामदे में पहुँच कर मिस्टर वर्मा कुर्सी पर बैठ जाते हैं। भीतर से एक कुर्सी घसीट कर मिस्टर मोहन ठीक उनके सामने बैठते हैं। प्रतिभा अप्रतिभ बाहर की ओर देखती है)

मिस्टर वर्मा : मिसेज जोशी को मैंने आज बीस वर्ष बाद देखा। पिछली बार जब वह तुम्हारे साथ लखनऊ में थीं...

(मिस्टर मोहन उनको एक विचलित इंगित से रोकते हैं। प्रतिभा मन्थर गति से अंदर चली जाती है)

मिस्टर मोहन : (दयनीय भाव से) यार प्रकाश, तुम कैसे आदमी हो? प्रतिभा भला क्या समझे थी?

मिस्टर वर्मा : आनंद, प्रतिभा इस विषय में जो कुछ समझ सकती थी; समझ चुकी।

मिस्टर मोहन : क्या समझ चुकी?

मिस्टर वर्मा : यही कि एक स्त्री और पुरुष का संबंध या तो आर्थिक है या कामुक।

मिस्टर मोहन : कुछ भी हो, पर मैंने अपना और मिसेज जोशी का संबंध प्रतिभा से प्राणपण से छिपा कर रखा है।

मिस्टर वर्मा : पर तुम नहीं समझते, तुम इस प्रकार मुझे क्षति पहुँचा रहे हो।

मिस्टर मोहन : (आकाश से गिर कर) तुम्हें क्षति!

मिस्टर वर्मा : (अविचलित भाव से) हाँ, क्योंकि मैं प्रतिभा से विवाह करना चाहता हूँ।

मिस्टर मोहन : (जैसे उनका अपने अस्तित्व पर विश्वास न हो) विवाह!

मिस्टर वर्मा : तुम मेरी आयु की ओर देख रहे हो।

मिस्टर मोहन : प्रकाश, तुम मेरे तीस वर्ष से मित्र हो...

मिस्टर वर्मा : फिर अपनी एकमात्र पुत्री के लिए तुम्हें मुझसे अधिक योग्य वर कौन मिलेगा? ...आनंद, मैं प्रतिभा को चाहता हूँ। मैं वास्तव में उसे चाहता हूँ।

मिस्टर मोहन : तुम उसे अपनी पुत्री के समान प्रेम कर सकते हो, वह तुम्हारा कम आदर नहीं करती।

मिस्टर वर्मा : पुत्री के समान! पर मैं तो प्रतिभा से विवाह करना चाहता हूँ...

(मिसेज जोशी का प्रवेश ; अपने आपसे दस वर्ष छाटी , गोल गोरे चेहरे पर विलास की प्रस्फुट विलासिता जो अधरों पर और भी अधिक स्पष्ट और मुखर हो गई है , एक काला चेस्टर पहने तौल-तौल कर पग रखती हुई आती हैं। मिस्टर मोहन खड़े हो कर स्वागत करते हैं और अपनी कुर्सी पर बैठा कर दूसरी कुर्सी लेने भीतर जाते हैं)

मिस्टर वर्मा : आप तो आज रानीखेत जानेवाली थीं?

मिसेज जोशी : (बैठते हुए) हाँ, मैंने अपना विचार बदल दिया था!

(दो क्षण गंभीर नीरवता रहती है)

मिस्टर वर्मा : समय आप लोगों के साथ कितना पक्षपात करता है। मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि आपकी आयु पच्चीस वर्ष से अधिक नहीं जँचती।

मिस्टर मोहन : (एक सामाजिक झेंप के साथ) कम से कम इतने के लिए तो मैं भी सौगंध खा सकता हूँ कि आप भी सौ वर्ष के नहीं दीखते।

मिस्टर वर्मा : (वेग से हँस कर जो उत्तरार्ध में खाँसी हो जाती है) यह सौगंध तो आनंद भी खाने को तैयार है।

(मिस्टर मोहन एक कुर्सी ले कर आते हैं और ठीक मिस्टर वर्मा और मिसेज जोशी के बीच में बैठ जाते हैं।)

मिसेज जोशी : (स्वर को तौल कर) यहाँ आते हुए मैंने आपका अंतिम वाक्य सुना है। मुझे तो बड़ा कुतूहल हो रहा है?

मिस्टर मोहन : (रोना मुँह बना कर) हाँ सरो, मिस्टर वर्मा प्रतिभा से विवाह करना चाहते हैं।

मिसेज जोशी : (मिस्टर वर्मा की दृष्टि को भरसक बचा कर) यदि मैं मिस्टर वर्मा को अप्रतिभ नहीं कर रही हूँ तो ऐसा ही प्रस्ताव उन्होंने मेरे साथ भी किया था।

मिस्टर मोहन : (जैसे स्वप्न में भी इसके लिए प्रस्तुत न हों), तुम्हारे साथ, कब, कहाँ?

(मिस्टर वर्मा , असंबद्ध दूसरी ओर देखते हैं)

मिसेज जोशी : बहुत दिनों की बात है, ज्योती बीमार थे, पर हम लोगों ने आशा का पल्ला न छोड़ा था; पर मैं अजाने भावी वैधव्य के भय और आशंका से तिलमिला उठी थी। एक दिन साँझ को मैं ज्योती को दवा पिला कर बैठी ही थी कि मिस्टर वर्मा ने मुझसे यह प्रस्ताव किया कि मैं उनसे विवाह कर अपने आपको चिंतामुक्त कर सकती हूँ।

मिस्टर वर्मा : देखिए, आपने इसे अत्यंत भावुकता के साथ आनंद के सम्मुख रखा है। सत्य कुछ और ही है। बात यह है कि मैंने देखा, आपका नारी रूप उस समय विलीन हो रहा था। आपका अपना कोई पृथक व्यक्तित्व और अस्तित्व ही न था। मैंने आपको संपूर्ण बनाने का प्रस्ताव किया। मैंने क्या बुरा किया?

मिसेज जोशी : (उत्साह से) पर मैं ज्योती को प्यार करती थी।

मिस्टर वर्मा : पर उस समय एक चतुर और तत्पर नर्स उनके लिए आपसे अधिक महत्व रखती थी।

मिसेज जोशी : खैर, अब आप प्रतिभा से विवाह करना चाहते हैं?

मिस्टर वर्मा : (गंभीरता से) देखिए, मुझमें कुछ है नहीं। मैं कुछ दिनों का मेहमान हूँ। मेरी जमीन-जायदाद, रुपया-पैसा सब प्रतिभा का होगा, समाज में उसका एक विशिष्ट स्थान होगा, वह एक अनस्तित्व गृहिणी या माता नहीं, एक प्रतिष्ठित विधवा होगी। समाज से, जीवन से उसका सीधा संसर्ग होगा, क्योकि समाज में उसका एक अतीत होगा, लोग उसके पति को जानने के लिए उसे जानेंगे...

मिस्टर मोहन : पर क्या तुम समझते हो, प्रतिभा इसमें संतुष्ट रहेगी?

मिस्टर वर्मा : क्या तुम समझते हो, प्रतिभा एक माता या गृहिणी बनने में संतुष्ट रहेगी?

मिसेज जोशी : मातृत्व एक स्त्री का सर्वोत्तम और सर्वोत्कृष्ट रूप है।

मिस्टर वर्मा : मातृत्व एक पेशा है और आप या प्रतिभा की-सी स्त्री के लिए एक निकृष्ट पेशा है। मैं नहीं चाहता, प्रतिभा जीवन को समझने के लिए अपना शरीर और यौवन बेचे, मैं नहीं चाहता वह अपनी जीविका कमाने के लिए एक माता बने।

मिसेज जोशी : मैं तो वैधव्य को एक अपराध समझती हूँ।

मिस्टर वर्मा : क्योंकि आप स्वयं विधवा हैं और अपने स्वस्थ मन से वैधव्य लाभ नहीं किया है। क्षमा कीजिएगा, क्या आप समझती हैं कि आपका जीवन इतना ही उपादेय और सार्थक होता यदि आज मेरे मित्र मि. ज्योती वल्लभ जोशी जीवित होते और आप एक दर्जन बच्चों की माता, नानी और दादी होतीं...

(एक देवदूत के समान प्रतिभा का प्रवेश)

प्रतिभा : (इठला कर) चलिए, चाय तो आप लोगों ने मिट्टी कर दी। उठिए पापा, आप तो सो रहे हैं।

मिस्टर मोहन : (जैसे वास्तव में स्वप्न से जगे हों) महेंद्र का इंतजार है। महेंद्र से तूने कह दिया था। सबेरे तूने चाय के लिए नहीं कहा, वह रूठ के चला गया।

प्रतिभा : महेंद्र कब से मेरे कमरे में बैठा है पापा! मेरी सब चीजें तितर-बितर कर दीं।

मिसेज जोशी : हाँ, महेंद्र तो मुझसे पहले चल दिया था।

मिस्टर वर्मा : (मनोगत विचारों को सहसा दबा कर) प्रतिभा, तुझे अपनी माता की याद है?

प्रतिभा : (किंचित झेंप कर) कुछ-कुछ।

मिस्टर वर्मा : बिलकुल तेरी ही तरह थी, पर मेरी खातिर तुझसे अधिक करती थी।

मिस्टर मोहन : (झेंप कर) अच्छा, बातों से पेट भरेगा नहीं।

(सबसे आगे मिसेज जोशी और पीछे अन्य लोग भीतर चले जाते हैं। केवल प्रतिभा रह जाती है , जो गुलदाउदी के एक बड़े-से पूर्ण विकसित फूल में अपना मुँह दबा देती है। भीतर से एक व्यस्त आवाज आती है : '' प्रतिभा! '' प्रतिभा त्रस्त-सी भीतर चली जाती है।)

दूसरा दृश्य


(खाने का कमरा पश्चिमी ढंग से सजा। दीवार पर फूलों और फूलों के रंगीन चित्र। एक सुनहरा चित्र अवध के विलासी नवाब वाजिद अली शाह का। बीच में एक गोल मे़ज जिसके चारों ओर चार कुर्सियाँ और एक स्टूल। कमरा छोटा , जो बड़ी-बड़ी आलमारियों से और भी छोटा हो गया है। एक कुर्सी पर बाईस वर्ष का स्वस्थ नवयुवक खाकी नेकर और रंगीन पुलोवर पहने कार्य को व्यस्त चला रहा है)

मिस्टर मोहन : जाए तंगमस्त मर्दुमा बिसियार (जगह कम और लोग ज्यादा), अच्छा, मैं बाद को खा लूँगा)

नवयुवक : (त्रस्त-सा उठ कर) मुझे तनिक भी भूख नहीं है।

प्रतिभा : टॉफी! मेरा सारा टॉफी का डिब्बा खत्म कर दिया है।

मिसेज जोशी : (हँस कर) क्यों महेंद्र, घर पर तो 'टॉफी कृत्रिम भोजन है।'

महेंद्र : किसकी बात का विश्वास करती हैं आप। अभी, सबेरे से शाम तक सारी चट कर गईं और मेरा नाम लगा दिया। भला इतनी मैं कैसे खा पाता?

प्रतिभा : (बढ़ कर) और जेबें वे... और जेबें जो भरी हैं।

मिस्टर मोहन : अच्छा, तुम दोनों बाद को खाना। जाओ, खाना लगाने को कहो। चलो महेंद्र भूखे होंगे तो नियत लगेगी।

प्रतिभा : (पुलकित स्वर में) मैं कसम खाके कहती हूँ, मैं भूखी हूँ पापा।

मिस्टर मोहन : अच्छा! अच्छा!

(दोनों बाहर चले जाते हैं। एक कमरा , दीवारें सादे कागज से मढ़ी , कुछ सोफे अस्त-व्यस्त पड़े हैं। जमीन पर एक शीतलपाटी बिछी है जिस पर कुछ पुस्तकें और कागजात अस्त- व्यस्त पड़े हैं। प्रतिभा एक सोफे पर बैठ जाती है। महेंद्र यह देख कर कि खाने के कमरे में दिखाई नहीं देता , उसके चरणों के पास बैठना चाहता है)

प्रतिभा : (उसे उठा कर धीरे से) उठो, यही तो मुझे अच्छा नहीं लगता।

महेंद्र : क्या प्रतिभा? तुमने मेरा हृदय तोड़ दिया।

प्रतिभा : देखो महेंद्र, हृदय तो टूटने के लिए ही बने हैं। मानव जीवन की सबसे बड़ी ट्रेजडी तो यही है कि हमारे हृदय नहीं टूटते, पर तुम कितने नासमझ हो महेंद्र!

महेंद्र : मेरी सोने की लंका राख हो गई। तुम उपदेश दे रही हो निर्दय!

प्रतिभा : फिर वही, लंका यदि जल न गई होती तो उसे कोई सोने की क्यों कहता...

महेंद्र : तुम साफ कह दो, तुम मुझे प्रेम नहीं करती।

प्रतिभा : हाँ, यह हुई बात एक प्रेमी के समान, पर यह मैं कैसे कह दूँ?

महेंद्र : फिर तुम मुझसे विवाह क्यों नहीं करती?

प्रतिभा : (विकल हो कर) क्यों मुँह फोड़ कर कहलवाते हो? मैं तुम्हें प्रेम करती हूँ।

(प्रतिभा और महेंद्र दोनों चुप रहते हैं)

प्रतिभा : तनिक स्वस्थ मन से विचारो, विवाह करने के पश्चात हम दोनों एक-दूसरे को उसके निकृष्ट से निकृष्ट अवसर पर देखेंगे। हमारे बीच में जो विस्मय, जो सरस कुतूहल है, जो कल्पना है, एक ही दो वर्ष में उड़ जाएगी। तुम तनिक- तनिक-सी बात में मुझसे खीजोगे, क्योंकि हममें से कोई एक-दूसरे के लिए न्याय न कर सकेगा।

महेंद्र : तुम मुझे प्रेम ही नहीं करती।

प्रतिभा : अच्छा, मैंने महेंद्र नाम के नटखट लड़के को न कभी प्रेम किया, न करती हूँ और न करूँगी। केवल टॉफी चुराने के अपराध में पुलिस में न दूँगी।

महेंद्र : (निःश्वास ले कर) हँस लो प्रतिभा।

प्रतिभा : (नेत्रों में एक विशेष चमक के साथ) देखो, बिना विवाह किए हुए भी तो हम एक-दूसरे के साथ रह सकते हैं।

महेंद्र : कैसे?

प्रतिभा : मैं तुम्हें अपना योग्य पुत्र बना लूँ।

महेंद्र : धत! (हँसने की चेष्टा करता है)

प्रतिभा : अच्छा, तुम मेरे भाई हुए। हुई न फैशनेबुल बात (दुलरा कर) मेरा भैया!

महेंद्र : देखो प्रतिभा, भाई-बहन का नाता कहने में तो बड़ा सुंदर लगता है, पर इससे शिथिल नाता कोई संसार में होगा भी नहीं...

प्रतिभा : लोलुप शायलॉक, तुम मेरे सब कुछ हो पति के अतिरिक्त, जाओ ब्लैंक चेक देती हूँ।

महेंद्र : पर प्रतिभा, तुम विवाह क्या सचमुच मिस्टर वर्मा से करोगी?

प्रतिभा : (आँखों में आभा भर कर) हाँ।

(महेंद्र दूसरी ओर अन्यमनस्क देखता है और प्रतिभा की अँगुलियों से खेलता है। द्वार से मिस्टर वर्मा का प्रवेश। दोनों अचकचा के उठ खड़े होते हैं। मि. वर्मा उनकी ओर वात्सल्य से देखते हैं)

[ श्रेणी : नाटक । लेखक : भुवनेश्वर ]