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शकुन्तला : एक अभिनव प्रयास - मनोज 'आजिज़'

[समीक्षित पुस्तक : शकुन्तला (भोजपुरी गीतिकाव्य )। लेखक : भगवान मिश्र 'श्री दास'। प्रकाशक : रमा रंगेश प्रकाशन, जमशेदपुर। प्रकाशन वर्ष - 2013 । पृष्ठ - 260 । मूल्य : 360 /-]

अभिज्ञान शाकुन्तलम महाकवि कालिदास द्वारा रचित संस्कृत साहित्य का एक बहु चर्चित ग्रंथ है । जर्मनी के प्रसिद्ध कवि गेटे ने एक बार इस ग्रंथ की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी जिसका संस्कृत अनुवाद महा महोपाध्याय श्री वासुदेव मिरासी जी ने इस प्रकार किया है--

"ऐश्वर्यम् यदि वांछसि प्रिय सखे 
शाकुन्तलाम सेव्यताम् " । 

अर्थात हे मित्र, यदि साहित्य का ऐश्वर्य देखना चाहते हो तो शकुन्तला का अध्ययन करो । शकुन्तला की चर्चा कालिदास के सभी ग्रंथों में से विशिष्ट रूप से की गयी है । संस्कृत में कहा जाता है कि जब कवियों की गणना हो रही थी तो प्रथम ऊँगली (कनिष्ठिका) पर कालिदास का नाम आया । उसके बाद आज तक दूसरा कवि उनके समान नहीं हुआ । इसीलिए दूसरी ऊँगली को अनामिका (बिना नाम वाली ऊँगली ) कहा जाता है । अभिज्ञान शाकुन्तलम् पर अनेक भाषाओँ में अनेक रचनाएँ आई हैं । कुछ अनुवाद हैं और कुछ में कल्पना जनित प्रयोग भी हैं । सबकी अलग-अलग विशेषताएँ हैं । यह प्रशंसनीय एवं स्वागत योग्य है कि क्षेत्रीय भाषाओँ में भी इसका अनुवाद या रूपांतरण हो रहा है और कुछ ऐसा ही हुआ है श्रीभगवान मिश्र 'श्री दास' द्वारा जिन्होंने "शकुन्तला" नाम से अभिज्ञान शाकुन्तलम् का जनपदीय भाषा भोजपुरी में गीतिकाव्य के रूप में रचना की है जो पठनीय कृति है । इस पुस्तक में २६० पृष्ठ हैं और यह सात यह सात खंडों में विभाजित है । इस पुस्तक के ऊपर भोजपुरी जगत के कई मूर्धण्य विद्वानों जैसे भोजपुरी भूषण डॉ बच्चन पाठक 'सलिल', भोजपुरी अकादमी, पटना के अध्यक्ष डॉ रवि कांत दुबे आदि के मंतव्य प्रकाशित हैं और इन लोगों ने कविवर 'श्रीदास' के इस साहित्यिक प्रयास की प्रशंसा की है । श्रीदास वैन विभाग के एक उच्च अधिकारी हैं और वनों से इनका घनिष्ठ सम्बन्ध है । इसीलिए वन कन्या शकुन्तला के चित्रण में इन्होने अधिक से अधिक स्वाभाविकता लाने की चेष्टा की है । विषय वस्तु की दृष्टि से विभिन्न खण्डों में कई महत्वपूर्ण एवं भावनात्मकता से पुष्ट विषय मुख्य रूप से प्रतिपादित किये गए हैं । 

पुस्तक की भाषा सरल भोजपुरी है किन्तु कहीं-कहीं पद्य में भरती के शब्द भी आ गए हैं जिससे काव्यात्मकता पर प्रभाव पड़ता है । इसी प्रकार कुछ छंदों में तुकांत में पुनरावृत्ति भी हुई है जैसे---

"रउरा एह तपोवन के रिनी रहबि जीवन भर 
गइला पर केहू ना भुलाइ ओहिजा तनिको भर । "

किसी भी भाषा में जब साहित्य का सृजन होने लगता है तो उसमें तत्सम शब्दों का प्राचुर्य होना स्वाभाविक है। शकुन्तला के कवि ने भी यह शैली अपनाई है किन्तु साथ ही उन्होंने भोजपुरी के प्रचलित रूपों का भी समावेश किया है । 

"अब जब मुनि कन्या नइखी तब 
बाण ई काम के मोजरि बा 
लागत बा कि हरी प्रान अब 
लछन भी सभ ओसहीं बा ।"

आज भोजपुरी को संविधान की आठवीं सूची में स्थान मिलना लगभग तय हो चुका है और साहित्य अकादमी की यह स्वीकृत भाषा हो जायेगी। अपने इतिहास का कारण भोजपुरी का गौरव तो जगत-विख्यात है किन्तु राज्याश्रय पाने पर क्लासिकल साहित्य की मांग अधिक बढ़ेगी । वैसी अवस्था में शकुन्तला जैसी पुस्तकों का महत्व निश्चित रूप से बढ़ेगा क्योंकि यह प्रबंध-काव्य है । इसमें छंद वैविध्य है। यह एक बहु प्रचलित कथानक पर आधारित है और महाकवि कालिदास के कथानक की युगानुकूल व्याख्या करती है । 

संभवतः यह पुस्तक श्री दास की प्रथम कृति है। वैसे पुस्तक के प्रसंगों को पढ़ने से प्रतीत होता है कि इन्होने इसके लेखन में वर्षों प्रयास किया है । आशा है भविष्य में कवि की द्वितीय पुस्तक भी प्रकाशित होगी और उसमे अधिक साहित्यिकता और अधिक काव्य-रस पाठकों को प्राप्त होगा । इस पुस्तक के अध्ययन से भोजपुरी भाषियों को संस्कृत साहित्य का रस पान करने की भी सुविधा प्राप्त होगी क्योंकि वर्तमान युग में भोजपुरी पत्र-पत्रिकाएँ भी प्रायः प्रचलित अनेक 'वादों' के घेरे में आकर वर्तमान समस्याओं में ही उलझ जाती हैं । इस दृष्टि से इस प्रयास को क्लासिकल कहना चाहिए । कुल मिलाकर लोक-भाषा प्रेमियों के लिए यह कृति पठनीय मानी जाएगी और इस अभिनव प्रयास के लिए 'श्री दास' निश्चित रूप से साधुवाद के पात्र हैं । 

[समीक्षक : मनोज 'आजिज़' । सम्पर्क : आदित्यपुर-२, जमशेदपुर-१४, झारखण्ड]