'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

मुकदमा : हवा-पानी का / गोविंद शर्मा

गोविंद शर्मा 
पात्र

  • महाराज
  • मंत्री
  • हवा और पानी बने दो बच्चे
  • कुछ लोग
(महाराज का दरबार। महाराज सिंहासन पर बैठे हैं। एक तरफ मंत्री व दरबारीगण बैठे हैं, सामने अन्य लोग बैठे हैं।)

महाराज : मंत्री जी, शिकायत करने वाले लोग आ गए हैं?

मंत्री : (खड़े होते हुए) हाँ, महाराज!

महाराज : जिनके बारे में शिकायत आई है, क्या उन लोगों को भी यहाँ बुला लिया गया है?

मंत्री : हाँ, महाराज! आज सब शिकायतें हवा और पानी के बारे में हैं। वे पास के कमरे में बैठे हैं।

महाराज : ठीक है, मुकदमें की कार्यवाही शुरू करें। पहले पानी को बुलाया जाये।

(मंत्री इशारा करते हैं। भीगे कपड़े पहने एक लड़का हाजिर होता है। उसके कपड़ों के भीतर छिपे टेपरिकॉर्डर से पानी के बहने की कलकल आवाज सुनाई देती है।)

पानी : महाराज की जय हो।

महाराज : पानी, तुमसे इन लोगों की शिकायत है। यदि शिकायत सच साबित हो गई तो तुम्हें दण्डित किया जायेगा।

पानी : महाराज, मुझे नहीं मालूम कि ये लोग मुझसे क्यों नाराज हैं। मैं एकदम निर्मल हूँ महाराज!

मंत्री : महाराज, लोगों की पहली शिकायत यही है कि पानी अब निर्मल नहीं रहा है। नदियों और नहरों में बहते समय गन्दगी और बीमारियाँ अपने साथ बहाकर सब जगह पहुँचा देता है।

पानी : महाराज, ये लोग पहले की तरह पानी की रखवाली नहीं करते हैं। पशुओं को जोहड़ के भीतर तैरने देते हैं। पशु अपनी गन्दगी तालाब में छोड़ देते हैं। गाँव की दूसरी गन्दगी भी तालाब में फेंक दी जाती है। नदियों में कारखानों की गन्दगी व शहर के गन्दे नाले का पानी छोड़ा जाता है। महाराज, मैं अपने आप गन्दा नहीं होता।

महाराज : भाइयो, आपके पास इसका क्या जवाब है?

(लोग आपस में फुसफुसाकर बातें करते हैं। फिर उनमें से एक बोलता है।)

एक : महाराज, यह तो मान लिया। पर कहीं बरसना, कहीं नहीं बरसना, यह तो इस पानी की मनमानी है।

पानी : नहीं, महाराज, मुझ पानी की मर्जी कहाँ चलती है। जिधर ढलान हो, जहाँ का माहौल अनुकूल हो, वहाँ मुझे जाना ही पड़ता है। इन लोगों ने पहाडि़यों को काट कर वहाँ मैदान बना दिये हैं। वन नष्ट कर दिये हैं। ऐसी जगह बरसात कैसे हो सकती है? वर्षा न होने के लिए भी यही लोग जिम्मेदार हैं।

दूसरा : अधिक वर्षा के लिए कौन जिम्मेदार है?

पानी : जो बादल बना है, वह तो बरसेगा ही। फिर जहाँ वर्षा का पानी बहना चाहिए, जहाँ नदी बहनी चाहिए, जहाँ मेरे सुस्ताने की पुरानी जगह होगी, वहाँ तो मैं जाऊँगा ही। लोगों ने ऐसी जगहों पर घर बना लिए हैं। ऐसे घर तो डूबेंगे ही। मैं इनकी बनाई गलियों-नालियों में घूमता रहूँ, यह कैसे सम्भव है?

(लोग फिर आपस में बात करते हैं।)

तीसरा : महाराज, हमारा गाँव सदियों से ऊँची जगह पर बसा हुआ है। हमने नीची जगहों पर कोई घर नहीं बनाया है। फिर भी इस बार हमारा गाँव बाढ़ का शिकार हुआ है।

महाराज, पानी आँख मूँदकर चलता है।

पानी : नहीं महाराज, मैं देखकर चलता हूँ, तभी तो ढलान की तरफ जाता हूँ, कभी ऊँची जगह पर चढ़ने की कोशिश नहीं करता हूँ। ये लोग जानते हैं कि इनके गाँव के पास एक पहाड़ है। पहले उस पर बहुत से वृक्ष होते थे। पहाड़ से उतरते समय मैं वृक्षों के बीच में से होकर आता था और सीधे पानी के रास्ते यानी नदी नाले में बहता था। अब लोगों ने पहाड़ से वृक्ष साफ कर दिए हैं। मैं वहाँ से उतरता नहीं हूँ बल्कि लुढ़कता हुआ नीचे आता हूँ। मुझे खुद पता नहीं चलता कि नीचे मैं कहाँ गिरूँगा।

महाराज : और कोई शिकायत?

(कोई नहीं बोलता)

महाराज : तुम्हारी चुप्पी इस बात की गवाह है कि तुमने भी इन कारणों को मान लिया है। तुम्हारा भला इसी में है कि अपनी गलतियाँ सुधारो और पानी को निर्मल तथा उपयोगी रहने दो।

दूसरा दृश्य

(वैसा ही दरबार। इस बार पानी की जगह हवा है। हवा बनी लड़की के कपड़े उड़ रहे हैं। परदे के पीछे रखे पंखे की हवा सीधे उस पर पड़ रही है। सांय-सांय की हल्की आवाज)

महाराज : मंत्री जी, हवा के प्रति लोगों की क्या शिकायतें हैं?

(एक आदमी आगे आता है)

आदमी : महाराज की जय हो, महाराज आजकल हवा में खुशबू नहीं होती। यह हर समय हमारे यहाँ बदबू फैलाती है।

हवा : महाराज, यह आरोप झूठा है। बदबू के कारण तो मेरा जीना कठिन हो गया है। अपने आप में मेरे पास न तो खुशबू है न बदबू। पहले ऐसा नहीं होता था। पर आजकल ये लोग मरे हुए पशु-पक्षियों को यहाँ-वहाँ डाल देते हैं। उनके कारण मैं बदबू वाली हो जाती हूँ। इनके कारखानों से निकली गन्दगी और गैसें मुझ में घुल जाती है और यह बदबू दूर तक फैलती रहती है।

मुझे याद है कि एक बार भोपाल के एक कारखाने से निकली जहरीली गैस मुझ पर सवार होकर दूर-दूर तक फैल गई थी और कितने ही लोग मौत के मुँह में चले गए थे। इन लोगों से कहिए कि ये गन्दगी के ढ़ेर न लगाएँ, सफाई रखें।

आदमी : लेकिन तुम अचानक चलकर हमारी आँखों में मिट्टी डाल देती हो, सबकुछ तबाह कर देती हो, क्या इसका हमने तुम्हें न्यौता दिया था?

हवा : चलना मेरा काम है। आप कहते हो तो लो, मैने चलना बन्द कर दिया।

(हवा का चलना बन्द हो जाता है। सभी घुटन महसूस करते हैं।)

मंत्री : अरे हवा रानी! नाराज मत हो। धीरे-धीरे तो चलो। सांस लेना मुश्किल हो रहा है।

(हवा बहने लगती है।)

महाराज : हवा के बारे में और कोई शिकायत?

औरत : महाराज, हम अपने घर साफ सुथरे रखते हैं। पर हवा आँधी बनकर आती है और हमारे घर रेत और कूड़े से भर देती है। हवा तो बहे पर आँधी क्यों?

हवा : महाराज, आँधी से इनका मतलब मेरे तेज चलने से है। वैसे तो मैं हर समय बहती रहती हूँ, पर इन्हें जब गर्मी लगती है तो पंखा चलाकर मेरी गति बढ़ा लेते हैं। उसी तरह जहाँ भी हवा कम होती है, मैं तेजी से वहाँ जाती हूँ। जब मैं तेजी से चलती हूँ तो रेत, मिट्टी, कूड़ा आदि जो भी हल्की चीजें मेरे रास्ते में होती हैं, मेरे साथ उड़ने लगती हैं। ये अपने घर और दुकान साफ करके कूड़ा घर के आसपास गली में या सड़क पर डाल देते हैं। कई बार गाँव के बाहर कूड़े के ढ़ेर लगा देते हैं। इनका फेंका कूड़ा ही वापस इनके घरों में जाता है, महाराज। लोग अपने गाँव या शहर में पोलिथिन की थैलियाँ सड़कों पर फैंक देते हैं। वे मेरे साथ उड़कर खेतों में फैल जाती हैं और फसलों को नुकसान पहुँचाती हैं। इससे मेरा मन बड़ा दुखी होता है।

महाराज : मैने सबकी बात सुनी है। लोग हवा से दुःखी तो हैं पर कसूर हवा का नहीं है। लोगों को सफाई की आदत अपनानी होगी। तभी हवा दूषित होने से बचेगी। हमें चाहिए कि हम हवा और पानी को अपना दोस्त मानकर उन्हें नुकसान न पहुँचाएं। इसमें ही हमारा भला और बचाव है।

(लोग हवा, पानी के प्रति दोस्ती का भाव दिखाते हुए चले जाते हैं।)

[श्रेणी : नाटक। लेखक : गोविंद शर्मा ]