'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

बसंत पूजा / भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र
(यजमान और सर्वभट्ट और मुदंर भट्ट आते हैं)

यज. : महाराज इसका नाम बसंत पूजा क्यों है?

स.भ. : महाराज इसमें बसंतों की बसंत ही में पूजा करते हैं विशेषतः हम लोग पूरे बसंतनंदन है क्योंकि तौकी बाई को बाईस रुपये मिलें, मियां खिलौना को पंदरह, लाट साहब को नजर भी पंद्रही की असरफी, बड़े डाॅक्टर और वकीलों की फीस भी इतना ही, बीनकारों    को दस, कवियों को पाँच, चपरासियों को दो, कथा पर एक, पंडितों का ईमान बिगड़वाई आठ आना पर हम को दुअन्नी, कठसरैया की  माला और बेलकठा, सेती के चंदन घस मोरे ललुआ।

  मु.भ. : सत्यं सतयं, हम चिल्लाने में किसी से कम नहीं, शास्त्रा भी हमारा सर्वोपरि वेद, उस पर यह दशा।

  य. : अच्छा आज कोई इस समय के अनुसार संहिता पढ़िये तो हम विशेष दक्षिणा दें।

  स. भ. : तर आरंभ करा मुद्रं भट्ट।

  मु. भ. : हंआं भी ह्मणा तो सहस्र शीर्षा पुरुषः सहस्राक्षः।

  स. भ. : अं आं सहताक्षः नेत्रा कुत्रास्ति।

 मु. भ. : स्वकायर्यदर्शने-मा भवतु प्रजा-दर्शनेन्सहस्रपात्-(रेलादिना) सभूमिं सव्र्वतो वृत्तवा-अन्यतिष्ठद्दशांगुलं।

  स. भ. : हां हां अत्यतिष्ठत्सार्द्ध त्रिहस्तं वासप्तबितस्तकं।

  मु. भ. : पुरीषः एवेदं सव्र्व यद्भूंतयच्च भाव्यं।

  स. भ. : उतमद्यत्वस्येशानो यदन्तेनातिरोहति।

  य. : सहस्र शीर्षा का अध्याय तो हमैं भी यह याद है। यह मत पढ़िये दूसरा चरखा निकालिये।

  मु. भ. : तरते नमः म्हणा।

  स. भ. : हां-राज्ञेनमः वणिजेनम गौरायचनमस्ताभ्रायचनमः हूणायवनम्ः कपद्र्दिने नमोनमः।

  मु. भ. : नमश्श्वभ्यश्श्पतिम्यच्चयोनमौनमः।

  य. : हमें यह नमोनमो नहीं सुहाती।

  स. भ. : तर देवता म्हाणा-गौरी देवता हनुमान् देवता जाम्बुवान् देवता चंद्रमा देवता।

  मु. भ. : पूषा देवता मूका देवता ईसा देवता झूठा देवता मीठा देवता गोदेवता के भक्ष को देवता।

  स. भ. : अकाल देवता स्वार्थो देवता धोखा देवता जोषा देवता कोरा देवता शिष्टाचारा देवता।

  मु. भ. : लाटो देवता जज्जो देवता मजिस्टरो देवता पुलिस देवता डाक्टरो देवता।

  स. भ. : बंगला देवता सड़को देवा रेलो देवता तारो देवता धूंआकसो देवता।

  मु. भ. : कोतवालो देवता थानेदारो देवता नाजिरो देवता कांस्टिबलो देवता देव ताकत का हौअः।

  स. भ. : ईशावासमिदं सव्र्व यत्ंिकचित् जगत्यां जगत्।

  मु. भ. : मधुव्वाता ऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नस्सन्त्वोषधीः। मधुम्हणजे मद्य।

  स. भ. : सलामश्चते बंदगीचते घूसश्चते चंदाचते अड्रेसश्चते बालश्चते बलश्चते राज्यंचते पाटंचत्ते पाटंचते कलाकौशल्यंचते स्वच्छ  विहारश्चते लक्ष्मीचते विद्याचते।

  मु. भ. : रिसेप्शनश्चते-इल्युमिनेशनश्चते-टैक्शचते-चुंगीचते जमाचते जुर्मानाचते।

  स. भ. : बैतुलमालश्चते रसूमश्चते स्टाम्पश्चते नजरश्चते डालीश्चते इनामश्चते।

  मु. भ. : रेलतार का किराया च ते अंगरेजी सोदे का दामश्चते रुईचते अजंचते।

  स. भ. : एकाचते बलंचते तनमनधन सव्र्वस्वंचते भवतु।

  मु. भ. : मूर्खताचमे कायरत्वंचमे धक्काचमे गरदनियाचमे हंसीचमे।

  स. भ. : भ्रष्टताचमे आजादीचमे इंग्लिसाइज्डत्वचमे बीएचमे एमएचमे।

  मु. भ. : गव्र्वचमे कमेटीचमे चुंगी कमिश्नरीचमे आनरेरी मेजिस्ट्रेटीचमे।

  स. भ. : खानाचमे टिकट्चमे मद्यंचमे होटलंचमे लेक्चरचमे।

  मु. भ. : स्टारअवइंडियाचमे कौंसिलमेंबरत्वंचमे उपाधिचमे।

  स. भ. : दर्बार में कुरसीचमे मुलाकातचमे आनरचमे प्रतिष्ठाचमे।

  मु. भ. : फूलस्केपचमे हाफसिविलाइजेडत्वंचमे जितत्वमन्धवत्वंचमे बूटचमे शिफारशेन कल्पन्ताम्।

  य. : लीजिए महाराज, दक्षिणा कान की मैल सब निकल गई अब नींद आती है बस धता।

  दोनों. : अहा हा इस गला फाड़ने का फल तो यही था लाइये लाइये।

  सब जाते हैं। 

[ श्रेणी : नाटक । लेखक : भारतेंदु हरिश्चंद्र ]