'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

ज्ञाति विवेकिनी सभा / भारतेंदु हरिश्चंद्र

भारतेंदु हरिश्चंद्र 
(विपिन राम शास्त्री सभा के सब पंडितों से बोले)

'हे सभा के विराजमान पंडितो, आज हमने आप सब को इस लिए बुलाया है कि आप सब महात्मा हमारी इस बिनती को सुनो और उस पर ध्यान दो। वह हमारी बिनती यह है कि हमारे पुश्तैनी यजमान गड़ेरिये लोग जो परम सुशील और सत्कर्म लवलीन हैं इन्हें किसी वर्ण में दाखिल करें। अरे भाइयो, यह बड़े सोच की बात है कि हमारे जीते जी यह हमारे जन्म के यजमान जो सब प्रकार से हमको मानते जानते हैं नीच के नीच बने रहें तो हमारी जिंदगी को धिक्कार है। कोई वर्ष ऐसा नहीं होता कि इन विचारों से दस बीस भेड़ा बकरा और कमरी आसनादि वस्तु और सीधा पैसा न मिलता होय। बिचारे बड़े भक्तिमान और ब्रह्मण्य होते हैं। इसलिये हमने इनके मूल पुरुष का निर्णय और वर्ण व्यवस्था लिखी है। हम को आशा है कि आप सब हमारी संमति से मेल करेंगे! क्योंकि आज ही हमारी कल की तुम्हारी। अभी चार दिन ही की बात है कि निवासीराम कायस्थ की गढंत पर कैसा लंबा चैड़ा दस्तखत हमने कर दिया है और हम क्या आप सबने ही कर दिया है। रह गई पाँाडित्य, सो उसे आज कल्ह कौन पूछता है गिनती में नाम अधिक होने चाहिए।'

मैंने कलिपुराण का आकाश खंड और निघट पुराण का पाताल खंड देखा तो मुझे अत्यंत खेद भया कि यह हमारे यजमान खासे अच्छे क्षत्राी अब कालवशात् शूद्र कहलाते हैं। अब देखिए इनके नामार्थ ही से क्षत्रियत्व पाया जाता है। गढारि अर्थात् गढ़ जो किला है उसके अरि, तोड़ने वाले, यह काम सिवाय क्षत्राी के दूसरे का नहीं है। यदि इसे गूढ़ारि का अपभ्रंश समझें तो यह शब्द भी क्षत्रियत्व का सूचक है। गूढ़ मत्स्य का नाम है तिनका अरि अर्थ लें तो यह भी ठीक है क्योंकि जल स्थल सब का आखेट करना क्षत्रियों का काम है। सब अर्थ अनुमान मात्रा है मुख्य इनका नाम गरुड़ार्य अर्थात् गरुड़ के वंशी वाॅ गरुड़ के भाई जो अरुण हैं उनके वंश में उत्पन्न। इसी से जो पंडित लोग इनका नाम गरलारि अनुमान करते हैं सो भी ठीक है क्योंकि गरलारि जो मरकत अथवा गरुड़ मणि है सो गरुड़ जी की कृपा से पूर्वकाल में इनके यहाँ बहुत थे और इनको सर्प नहीं काटता था और ये सर्पविष निवारण में बड़े कुशल थे इसी से गरुड़ाय्र्य कहलाते थे, अब गड़रिया कहलाने लगे हैं।

'इनकी पूर्वकालिक प्रशस्तता और कुलीनता का वृत्तांत तो आकाश खंड ही कहे देता है कि इनका मूल पुरुष उत्तम क्षत्राी वर्ण था। यद्यपि इस अवस्था में सब प्रकार से हीन दीन हो गए हैं तथापि बहुत से क्षत्रियत्व के चिन्ह इनमें पाए जाते हैं। पहिले जब इनके पुरखे लोग समर भूमि में जुड़ते थे और लड़ने के लिए व्यूह रचना करते थे तो अपने योद्धाओं के चेतने और सावधान करने के लिए संस्कृत में यह बोली बोलते थे। मत्तोहि मत्तोहि दृढ़ं दृढ़ं। अर्थात् मतवाले हो गए हो संभलो चैकस रहो सो इस वाक्य के अपभ्रंश का लेश अब भी इन लोगों में पाया जाता है। देखो जब ये भेड़ी और बकरियों को डांटने लगते हैं तो 'द्रहि द्रहि मतवाही मतवाही' कहने लगते हैं तो इनके क्षत्राी होने में भला कौन संदेह कर सकता है। क्षत्राी का परम धर्म वीरता, शूरता, निर्भयता और प्रजा-पालन है सो इनमें सहज ही प्राप्त है। सावन भादों की अंधेरी रात में जंगलों के बीच सिंह के समान गरजते हैं और अपनी प्रजा भेड़ी बकरी को बड़े भारी शत्राु वृक से बचाते हैं। शिकारी ऐसे होते हैं कि शशप्रभृति बन जंतुओं को दंडों से पीट लेते हैं। बड़े-बड़े वेगवान आदेशकारी श्वान इनकी सेवा करते और इनकी छाग मेषमय सेना की रक्षा में उद्यत रहते हैं और दुख सुख की सहनशीलता इन्हीं के बाँटे पड़ी हैं। जेठ की धूप और सावन भादों की वर्षा और पूस माघ की तुषार के दुःख को सहकर न खेदित होना इन्हीं का काम है। जैसे इनके पुरखे लोग पूर्वकाल में बाणों से विद्ध होने पर भी रण में पीछे को पांव नहीं देते थे ऐसे ही जब इनके पावं में भदई कुश का डाभा तीव्र चुभ जाता है तो ये उस असह्य व्यथा को सहकर आगे ही को बढ़ते हैं और धरती को सुधारने में तो इनकी प्रत्यक्ष महिमा है कि जिस खेत में दो तीन रात ये गरुड़वंशी नृपति छागमयी सेना को लेकर निवास करते हैं उस खेत के किसान को ऋद्धि सिद्धि से पूर्ण कर देते हैं। फिर वह भूमि सबल और विकार रहित हो जाती है और मोटे नाजों की कौन कहे उसमें गोधूम और इक्षुदंड अपरिमित उत्पन्न होता है तो इनसे बढ़कर भूमिपाल और प्रजारक्षक कौन होगा और यज्ञ करना क्षत्रियों का मुख्य धर्म है सो इनमें भली भाँति पाया जाता है। शरत्कालीन और चैत्रा मासिक नवरात्रा में अच्छे हृष्ट पुष्ट छाग मेषों के बलि प्रदान से भद्रकाली और यौगिनीगण को तृप्त करते हैं और जब इनके यहाँ लोमकर्तनोत्सव होता है तो उस समय सब भाई बिरादर इकट्ठे होकर खान पान के साथ परम आनन्द मनाते हैं। व्यवहार कुशल ऐसे होते हैं कि इनकी सेना की कोई वस्तु व्यर्थ नहीं जाती। यहाँ कि कि मल, मूत्रा, मांस, चाम, लोम उचित मूल्य से सब बिकता है। और बैरीहंता ऐसे हैं कि सबसे बड़े भारी शत्राु को पहिले ही इन्होंने मार डाला है जैसे कहावत प्रसिद्ध है कि गड़रिया अपनी रिस को मनही में मार डालता है यदि ऐसा न करते तो इनकी प्रजा की ऐसी बुद्धि काहे को होती। ये ऐसे नीतिज्ञ होते हैं कि मेष छाग की शक्ति के अनुसार हलकी लकड़ी से उनकी ताड़ना करते हैं। वृक्ष और नदी से बढ़कर परोपकारी साधु कोई नहीं होता सो वहीं इनका रात दिन निवास रहता है इसलिए ये गरुड़ार्य सदैव सज्जनों की संगति में रहते हैं। मनोरंजन तंत्रा में लिखा है कि पूर्व काल में यथार्थ संचित पशुओं को राक्षस लोग उठा ले जाते थे तब उनकी रक्षा का संभार ऋषियों ने इन गरुड़वंशी क्षत्रियों को सौंपा तो इन्होंने राक्षसों को जीत कर यज्ञ पशुओं की रक्षा की तभी से छागमेष की रक्षा इनके कुल में चली आती है।

'मैं अति प्रसन्न हुआ कि आप सबने सम्मति से एकता करके मेरी बात रख ली और तंत्रा के इन प्रामाणिक वचनों को सच्चा किया।'

मेषचारणसंसक्ताः छागपालनतत्पराः।

बभूवुःक्षत्रियादेवि स्वाचारप्रतिवर्जनात् ।।

कलौपंचसहस्राब्दे किंचिदूनेगतैसति।

क्षत्रियत्वंगमिष्यंति ब्राह्मणानांव्यवस्थया ।।

(तदनंतर गरुड़वंशियों के संमुख होकर)

हे गरुड़वंशियों, आज इस सभा के ब्राह्मणों ने तुम्हारे पुनः अपने क्षत्रिय पद के ग्रहण और धारण करने की अभिलाषा को पूर्ण किया। अब सब दक्षिणा लाओ हम सब पंडित जन आपस में बाँट लें और तुम्हारे क्षत्राी बनने के कागद पर दस्तखत कर दें ।।'

(कलऊ गड़ेरिया दक्षिणा देता है पंडित लोग लेते हैं)

कलऊ : सब महरजवन से मोरी इहै बिनती हौ कि कुछ कहा कराना हौ तवन पक्का पाढ़ा कर दिहः। हाँ महरज्जा जिहमा कोऊ दोषै न।

विपिनराम : दोखै का सारे?

कलऊ : अरे इहै कि धरम सास्तरबा में होई तौने एहिमा लिखिहः।

विपिनराम : अरे सरवा धरमसास्तर फास्तर का नाम मत लेइ ताइ तोप कै काम चलाउ सास्तर का परमान ढूँढै़ सरऊ तौ तोहार कतहूँ पता न लागी। अरे फिर आज काल धरमसास्तर को पूछत को है।

कलऊ : अरे महरज्जा पोथी पुरान के अश्लोक फश्लोक लिख दीहा इहै और का महरज्जा तोहार परजा हौं।

विपिनराम : अरे सरवा परजा का नाँव मत लेइ। अस कहु कि हम क्षत्राी हुई।

कलऊ : अच्छा महरज्जा हम क्षत्री हुई तोहरे सबके पायन परत हई।

विपिनराम : अच्छा चिरंजूचिरंजू सुखी रहा। अच्छा कलऊ तुम दोऊ प्राणी एक विरहा गई कै सुनाई दो तौ हम सब विदा होहिं।

कलऊ : बहुत अच्छा महरज्जा (अपनी स्त्री से) आउरे पवरी धीहर।

(दोनों स्त्री पुरूष मिलकर नाचते गाते हैं)

आउ मोरि जानी सकल रखसानी।

मैं भैलों छतरि तु धन छतरानी।

धन धन बम्हना लै पोथिया पुरानी।

(सब का प्रस्थान भया)

[ श्रेणी : नाटक । लेखक : भारतेंदु हरिश्चंद्र ]