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उँगलियाँ उठती रहें : परिस्थितिगत यथार्थ का स्पष्ट चित्रण - राधेलाल बिजघावने

[समीक्षित पुस्तक : ऊँगलियाँ उठती रहें (गीत संग्रह)। लेखक : मयंक श्रीवास्तव। प्रकाशक : नमन प्रकाशन, नई दिल्ली। प्रथम संस्करण : 2006। पृष्ठ - 120, हार्डबाउंड। मूल्य- 150 /-]

गीत रक्त संबंधों की प्रतिबद्धताओं और अपनत्व की भावनाओं को व्यक्त करते हैं। इसलिए अनेकमुखी सतत अन्तर्क्रियाशील एवं मिश्रित भाव संवेदनों की परत दर परत मिलावट के होते हैं। यदि गीतों की आंतरिक जड़ों की तरफ जायें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि गीत विविध दिशा बोध के मार्ग संकेतों के साथ गुँथे होते हैं। गीतों के आंतरिक संगठन को खण्डित निगाह से देखने से इनकी रचनात्मकता में सम्पूर्णता का भ्रम महसूसा जा सकता है परंतु वास्तविक रूप में गीत एक दृश्याभास की सृष्टि करते हैं।

गीतों में एक ओर तो सघन यथार्थ की उपस्थिति होती है, दूसरी ओर जीवन जगत का अन्तर्द्वद्व विद्यमान होता है। इसलिए इनमें सामाजिक अविछिन्नता के साथ संबंधों की अभिन्नता की भी दिखाई देती है। गीतों में संवेदनात्मक भावों का अन्तप्रवाह काव्यगत ईमानदारी के साथ होता है। यही कारण है कि गीत जीवन के सामान्य अनुभवों को ही अभिव्यक्त नहीं करते बल्कि जीवन के जटिलतम क्षणों की अनुभूतियाँ भी प्रमाणिकता के साथ प्रस्तुत करते हैं। कुल मिलाकर यह कि मानवीयता की भावना इनमें बहुत ही संरचनात्मक कहन के साथ होती है।

''उँगलियाँ उठती रहें'' के गीत ऐसे ही विभिन्न वर्णीय एवं विविध पक्षीय भाव संवेदनों के अन्तर्प्रवाह के हैं। क्योंकि इनमें परिस्थितिगत यथार्थ स्पष्ट दिखाई देता है।

''इसीलिए अपना घर
रोशन नहीं हुआ
अपने घर का
दिया जलाना भूल गया
दाता आकर दरवाजे से लौट गया
मैं ही अपना हाथ बढ़ाना
भूल गया'' (हाथ बढ़ाना भूल गया से)

अच्छे गीत जीवन का अलग संदेश देते हैं तथा अपने जीवन के प्रति सजग और सचेत रहने का संकेत भी देते हैं ताकि मनुष्य अपने समय की गति को पहचाने। क्योंकि परिस्थितियाँ विचित्र होती हैं। कभी भी कैसा भी समय आ सकता है इसी भाव संदर्भ में मयंक श्रीवास्तव का यह गीत प्रासंगिक हो जाता है-
''इसीलिए मैंने अपना कद
ऊँचा नहीं किया
शायद कभी किसी के आगे
झुकना पड़ जाए'' (कद ऊँचा नहीं किया से)

मयंक श्रीवास्तव के गीतों में मनुष्य के स्वाभिमान का प्रतिष्ठापूर्ण और गरिमापूर्ण चित्रांकन हुआ है। इसके साथ ही अराजक लोकतांत्रिक सभ्यता में उपस्थित चौहद्दी, शोषण, दमन, अतिवाद तथा विविध स्तरीय अपराध बोध की असंगत भाव संवेदनाओं को पूरी लगन निष्ठा एवं ईमानदारी के साथ व्यक्त किया गया है। जैसे-

''फिर से धुँआ उठा बस्ती में
होती भागमभाग
शायद किसी सिरफिरे ने फिर
सुलगा दी आग'' (फिर से धुँआ उठा)

''उँगलियाँ उठती रहें'' के गीत उदास मानवीय मूल्यों की अवधारणाओं की पारदर्शिता से गुजरते हैं और गलत अवधारणाओं के इस्तेमाल पर शिकंजा कसते हैं। इन गीतों की मूल अवधारणा सामाजिक कल्याण और विकास की बची हुई गुंजाइश को हमारे समक्ष रखती है। ये गीत अनेक अनछुए प्रसंगों को उभारते हैं। इसके साथ ही कोमल भावानाओं की गहरी अभिव्यक्ति के साथ सचेतक का कार्य भी निष्पादित करते हैं-

''बंजारों का गाँव /
चाँदनी मत आना/
दु:ख जाएँगे पाँव/
चाँदनी मत आना'' (बंजारों का गाँव)

''उँगलियाँ उठती रहें'' के गीत अर्थवान तथा भाव प्रवण होने से जीवन का सजीव चित्रण प्रस्तुत करते हुए सृजनात्मक ऊर्जा विकसित करते हैं। इन गीतों की भाषा एवं विचार संवेदन एवं भाव संतुलन अत्यंत सुव्यवस्थित है। वक्त के बदलाव से परिस्थितियाँ बदल जाती हैं। यह सवाल आज हर आदमी के मन को मथता है। उच्च पद पर पदासीन व्यक्ति के बदलने से पूरी की पूरी व्यवस्था तो नहीं बदलती क्योंकि वह जड़ मूल्यों की होती है जो शक्ति सम्पन्न और गहरी होती है, उसे बदलना आसान नहीं। यही सच सामाजिक जीवन में जब उतर जाता है तो बार-बार यही अहसास होता है कि -

''वही महल है वही संतरी
बंदे वही मिले
राजा बदला मिला मगर
कारिन्दे वही मिले'' (कारिन्दे वही मिले)

''उँगलियाँ उठती रहें'' के गीत समस्याओं और विचारों के बीच से गुजरते हैं तथा देश की सामाजिक आर्थिक अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक खोखलेपन की स्थितियों को परत दर परत उघाड़ते हैं। ये गीत वैश्विक दृष्टि की भूमिका का निर्वहन करते हैं। इसीलिए ये अपने समय की मूल्य विभीषिकाओं का खुलासा भी करते है-

''टहनी पर बैठ कर अकेली
दुखिया मन को सता रही है
लम्बी गहरी उसाँस लेकर
चिड़िया आँसू बहा रही है'' (चिड़िया यह जानती नहीं है)

''उँगलियाँ उठती रहें'' के गीत मर्यादा भंग करने और मूल्य विकृति की पहल करने वाले लोगों के विरुद्ध संघर्ष करते हैं। ये एक चिंतक की चेतावनी की तरह सुनाई पड़ते हैं। इसके साथ ही समय और सदी के आवश्यक सवालों की तरफ भी सबका ध्यान केन्द्रित करते हैं। ये गीत केवल कल्पनाजीवी नहीं है बल्कि अभावग्रस्त जीवन, दु:खों, तकलीफों से सीधी मुठभेड़ भी करते हैं और आने वाले वक्त की चिन्ता में लीन होते हैं-

''जाने कब खिड़कियाँ खुलेंगी
कब अन्तर्द्वार शुद्ध होगा
जाने कब सिरफिरे मनन का
नभ में उड़ना निषिद्ध होगा'' (कौन बुद्ध होगा।)

''उँगलियाँ उठती रहें'' के गीत मनुष्य की मंगल भावना और कामनाओंकी आकांक्षाओं को उत्प्रेरित करते हैं और मनुष्य के भीतर निर्णयात्मक आलोचना के निष्कर्षों की खोज करते हैं। ये गीत निश्चित उद्देश्य एवं लक्ष्यों को लेकर लिखे गए हैं। ये मात्र उपदेशक की भूमिका निर्वहन नहीं करते बल्कि प्रेरणा के समवाय को भी विकसित करते हैं। इसीलिए इनमें आत्मा का विद्रोह और क्रंदन का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है।

संग्रह के गीत सुमधुर मर्मस्पर्शी एवं अदभुत समन्वय सद्भाव मूलक हैं। क्योंकि इनमें दु:ख भरे अनुभवों की स्मृति एवं स्वीकृति है। इनमें मनुष्य की दैनिक जीवन की घटनाएँ सजीवता के साथ उपस्थित हैं जो मनुष्य को जागृत करती हैं और कर्तव्यबोध की भावनाओं को मजबूत आधार देती हैं। मयंक श्रीवास्तव के गीत समय के साथ यात्रा करते हैं और उसके विचलनों की समीक्षा करते हैं इसलिए इनमें वक्त बोलता है, गाता थिरकता और चिन्तित भी होता है।

[समीक्षक : राधेलाल बिजघावने, संपर्क - ई 8/73, भरत नगर (शाहपुरा), अरेरा कालोनी भोपाल, म.प्र. ]