'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

मेरे पचीस शील / विजयदेव नारायण साही

विजयदेव नारायण साही 
पहला शीलः मैं बहुत अक्लमंद हूं। मुझ जैसे और भी हैं। बहुत-से ऐसे हैं जो न मुझे जैसे हैं, न मुझ-जैसों जैसे हैं। इसको छिपाने से कोई लाभ नहीं है, न छिपाने से कोई हानि नहीं है; छिपाने से हानि है, न छिपाने से लाभ है।

दूसरा शीलः मैं परम स्वतंत्र हूं। मेरे सिर पर कोई नहीं है। अर्थात् अपने किए के लिए मैं शत-प्रतिशत जिम्मेदार हूं। अर्थात् मेरे लिए नैतिक होना संभव है।

तीसरा शीलः मैं संसार का सबसे महत्त्वपूर्ण प्राणी हूं। यदि नहीं हूं तो आत्म-हत्या के अतिरिक्त कोई रास्ता नहीं है। यही दशा आपकी भी है।

चौथा शीलः नितांत अव्यावहारिक होना नितांत ईमानदारी और अक्लमंदी का लक्षण है। समाज में सब तो नहीं, पर काफी लोग ऐसे होने चाहिए। जिस समाज में नितांत अव्यावहारिक कोई नहीं रह जाता, वह समाज रसातल को चला जाता है।

पांचवां शीलः मैं अपने को बहुत नहीं सेटता, क्योंकि यह मेरा कर्त्तव्य नहीं है। लेकिन आपका कर्त्तव्य है कि मुझे सेटें। इसका प्रतिलोम भी सत्य है।

छठा शीलः सर्वोत्तम समाज वह है जिसमें व्यक्ति के केवल अधिकार ही अधिकार हों, कर्त्तव्य कोई नहीं। अर्थात् जो भी मैं चाहूं वह मुझे मिल जाय, लेकिन जो मैं देना न चाहूं वह मुझे देना न पड़े।

सातवां शीलः कविता के क्षेत्र में केवल एक आर्य-सत्य हैः दुःख है। शेष तीन राजनीति के भीतर आते हैं।

आठवां शीलः कविता को राजनीति में नहीं घुसना चाहिए। क्योंकि इससे कविता का तो कुछ नहीं बिगड़ेगा, राजनीति के अनिष्ट की संभावना है।

नवां शीलः शेली महान् क्रांतिकारी कवि था, इसलिए उसको चाहता हूं; लेकिन उसके नेतृत्व में क्रांतिकारी होना नहीं चाहता। बाबा तुलसीदास महान् संत कवि थे, लेकिन वह संसद के चुनाव में खड़े हों तो उन्हें वोट नहीं दूंगा। नीत्शे का 'जरदुस्त्र उवाच' सामाजिक यथार्थ की दृष्टि से जला देने लायक है, पर कविता की दृष्टि से महान् कृतियों में से एक है। उसकी एक प्रति पास रखता हूं और आपसे भी सिफारिश करता हूं।

दसवां शीलः कवि अनिर्वाचित मंत्रदाता हो सकता है। निर्वाचित मंत्री हो जाने से कवि का हित और जनता का अहित होने की आशंका है। दोनों ही अवांछनीय संभावनाएं हैं।

ग्यारहवां शीलः कविता से समाज का उद्धार नहीं हो सकता। यदि सचमुच समाज का उद्धार करना चाहते हैं तो देश का प्रधानमंत्री बनने या बनाने की चेष्टा कीजिए। बाकी सब लगो है।

बारहवां शीलः इससे पहले कि आलोचक मुझसे पूछे कि समाज का नागरिक होने के नाते आप ऐसा क्यों लिखते हैं, वैसा क्यों नहीं लिखते, मैं आलोचक से पूछता हूं कि पहले यह सिद्ध कीजिए कि समाज का नागरिक होने के नाते कविता लिखना भी मेरा कर्त्तव्य है।

तेरहवां शीलः कवि अ-कवियों से अधिक संवेदनशील या अनुभूतिशील नहीं होता। जो कवि इसके विपरीत कहते हैं उनका विश्वास मत कीजिए; वे अ-कवियों पर रंग जमाने के लिए ऐसा कहते हैं। यह संभव है कि कवि की संवेदना का क्षेत्र अ-कवि से कम हो। प्रायः यही होता है।

चौदहवां शीलः जो मैंने भोगा है वह सब मेरी कविता का विषय नहीं है। कविता का विषय वह होता है जो अब तक की भोगने की प्रणाली में नहीं बैठ पाता। हर कलाकृति ठोस, विशिष्ट अनुभूति से उपजती है और उसका उद्देश्य अनुभूति की सामान्य कोटियों को नए सिरे से परिभाषित करना होता है। परिभाषा विशिष्ट और सामान्य में सामंजस्य का नाम है। बिना सामंजस्य के भोगने में समर्थ होना असंभव है।

पंद्रहवां शीलः अ-कवि अपनी विशिष्ट अनुभूति और अब तक उपलब्ध सामान्य परिभाषा में असामंजस्य नहीं देखता। कभी दीख भी जाता है तो थोड़ी-सी बेचैनी के बाद वह अनुभूति को जबरदस्ती बदलकर परिभाषा में बैठा लेता है। यह अ-कवि का सौभाग्य है।

सोलहवां शीलः कवि अभागा है। वह विशिष्ट अनुभूति को बदल नहीं पाता। तब तक बेचैन रहता है जब तक परिभाषा को बदल नहीं लेता। असामंजस्य देखने का काम बुद्धि करती है। परिभाषा बदलने का काम कल्पना करती है। शब्दों में अभिव्यक्ति अभ्यास के द्वारा होती है। यह सब एक निमिष में हो सकता है, इसको एक युग भी लग सकता है; कवि-कवि पर निर्भर है।

सत्रहवां शीलः कवि की अमरता गलतफहमी पर निर्भर करती है। जिस कवि में गलत समझे जाने का जितना अधिक सामर्थ्य होता है वह उतना ही दीर्घजीवी होता है।

अठारहवां शीलः सार्थकता बराबर तप नहीं, शब्दाडम्बर बराबर पाप।

उन्नीसवां शीलः वस्तु-स्थिति यह है कि मेरे बाबा ने जो कहा था वह न मेरे पिता कहते हैं और न मैं कहता हूं। लेकिन जब मेरे पिता मुझसे कहते हैं कि मेरे बाबा ने क्या कहा था तो वह परंपरा है। जब मैं स्वयं कहता हूं कि मेरे बाबा ने क्या कहा था तो यह प्रयोग है। यदि मैं कुछ नहीं कह पाता तो न परंपरा है न प्रयोग।

बीसवां शीलः पश्चिम से छूटना असंभव दीखता है। अध्यात्म के बिना निस्तार नहीं है, यह भी पश्चिम ने कहा है और यह बासी है। अध्यात्म और भौतिकवाद में समन्वय होना चाहिए, यह भी पश्चिम ने कहा है और यह भी बासी है। केवल भौतिकवाद में निस्तार है यह भी पश्चिम ने कहा है लेकिन नया है।

इक्कीसवां शीलः कविता राग है। राग माया है। माया और अध्यात्म में वैर है। अतः आध्यात्मिक कविता असंभव है। जो इसमें दुविधा करते हैं उन्हें न माया मिलती है न राम। जैसा हाल छायावादियों का हुआ। इससे शिक्षा लेनी चाहिए।

बाईसवां शीलः मुझसे पहले की पीढ़ी में जो अक्लमंद थे, वे गूंगे थे। जो वाचाल थे वे अक्लमंद नहीं थे। अंग्रेजी ने अक्लमंद बनाया लेकिन गूंगा करके छोड़ा। गांधीजी ने आवाज तो दी लेकिन अक्ल बंधक रखवा ली। बड़ा क्रोध आता है। यह मेरा दुर्भाग्य है।

तेईसवां शीलः सोचने का काम क्यों सारे देश ने सिर्फ एक आदमी पर छोड़ दिया और स्वयं शरणागत होकर 'मा शुचः' का पाठ करने लगा? उस आदमी ने भी शरणागतों को 'अटेंशन' और 'स्टैंड-एट-ईज' के निर्देश तो दिए, पर यह नहीं बताया कि कब 'अटेंशन' कहना चाहिए और कब 'स्टैंड-एट-ईज'। वह हमारी आकांक्षा को विराट् और विवेक को बौना छोड़कर चला गया। जो बचे हैं वे अटकल से 'काशन' बोलते हैं जिससे परेड तो हो सकती है लेकिन लड़ाई नहीं जीती जा सकती।

चौबीसवां शीलः पचास से ऊपर वय हो जाना अपने-आपमें अक्लमंदी का प्रमाण नहीं है। प्रमाण-पत्र मैं दूंगा।

पचीसवां शीलः अवज्ञा परमो धर्मः।

('दूसरा सप्तक' में शामिल वक्तव्य)

[ श्रेणी : आलोचना। लेखक : विजयदेव नारायण साही ]