'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

रीढ़ की हड्डी / जगदीशचंद्र माथुर

जगदीशचंद्र माथुर 
पात्र परिचय
  • उमा : लड़की
  • रामस्‍वरूप : लड़की का पिता
  • प्रेमा : लड़की की माँ
  • शंकर : लड़का
  • गोपालप्रसाद : लड़के का बाप
  • रतन : नौकर

[ मामूली तरह से सजा हुआ एक कमरा। अंदर के दरवाजे से आते हुए जिन महाशय की पीठ नजर आ रही है वह अधेड़ उम्र के मालूम होते हैं , एक तख्‍त को पकड़े हुए पीछे की ओर चलते-चलते कमरे में आते हैं। तख्‍त का दूसरा सिरा उनके नौकर ने पकड़ रखा है। ]

बाबू : अबे, धीरे-धीरे चल!... अब तख्‍त को उधर मोड़ दे… उधर…बस, बस!

नौकर : बिछा दूँ, साहब?

बाबू : (जरा तेज आवाज में) और क्‍या करेगा? परमात्‍मा के यहाँ अक्‍ल बँट रही थी तो तू देर से पहुँचा था क्‍या?… बिछा दूँ साब…! और यह पसीना किसलिए बहाया है?

नौकर : (तख्‍त बिछाता है) ही-ही-ही।

बाबू : हँसता क्‍यों है?… अबे, हमने भी जवानी में कसरतें की हैं। कलसों से नहाता था लोटों की तरह। यह तख्‍त क्‍या चीज है?…उसे सीध कर…यों…हां, बस।…और सुन बहूजी से दरी मांग ला, इसके ऊपर बिछाने के लिए।…चद्दर भी, कल जो धोबी के यहाँ से आई है वही।

[ नौकर जाता है। बाबूसाहब इस बीच में मेजपोश ठीक करते हैं। एक झाड़न से गुलदस्‍ते को साफ करते हैं। कुर्सियों पर भी दो-चार हाथ लगाते हैं। सहसा घर की मालकिन प्रेमा आती है। गंदुमी रंग, छोटा। चेहरे और आवाज से जाहिर होता है कि किसी काम में बहुत व्‍यस्‍त है। उसके पीछे-पीछे भीगी बिल्‍ली की तरह नौकर आ रहा है - खाली हाथ। बाबू साहब - रामस्‍वरूप - दोनों की तरफ देखने लगते हैं। ]

प्रेमा : मैं कहती हूँ तुम्‍हें इस वक्‍त धोती की क्‍या जरूरत पड़ गई! एक तो वैसे ही जल्‍दी-जल्‍दी में…

रामस्‍वरूप : धोती!

प्रेमा : अच्‍छा जा, पूजावाली कोठरी में लकड़ी के बक्‍स के ऊपर धुले हुए कपड़े रक्खे हैं, उन्‍हीं में से एक चद्दर उठा ला।

रतन : और दरी?

प्रेमा : दरी यहीं तो रक्‍खी है, कोने में। वह पड़ी तो है।

रामस्‍वरूप : (दरी उठाते हुए) और बीबीजी के कमरे में से हारमोनियम उठा ला और सितार भी।… जल्‍दी जा! (रतन जाता है। पति-पत्‍नी तख्‍त पर दरी बिछाते हैं।)

प्रेमा : लेकिन वह तुम्‍हारी लाड़ली बेटी तो मुँह फुलाए पड़ी है।

रामस्‍वरूप : मुँह फुलाए!… और तुम उसकी माँ किस मर्ज की दवा हो? जैसे-तैसे करके वे लोग पकड़ में आए हैं। अब तुम्‍हारी बेवकूफी से सारी मेहनत बेकार जाय तो मुझे दोष मत देना!

प्रेमा : तो मैं ही क्‍या करूँ? सारे जतन करके तो हार गई। तुम्‍हीं ने उसे पढ़ा- लिखाकर इतना सिर चढ़ा रक्‍खा है। मेरी समझ में तो यह लिखाई-पढ़ाई के जंजाल आते नहीं। अपना जमाना अच्‍छा था! 'आ-ई' पढ़ ली, गिनती सीख ली और बहुत हुआ तो 'स्‍त्री-सुबोधिनी' पढ़ ली। सच पूछो तो स्‍त्री- सुबोधिनी में ऐसी-ऐसी बातें लिखीं हैं - ऐसी बातें कि क्‍या तुम्‍हारी बी.ए., एम.ए. की पढ़ाई होगी। और आजकल के तो लच्‍छन ही अनोखे हैं…

रामस्‍वरूप : ग्रामोफोन बाजा होता है न!

प्रेमा : क्‍यों?

रामस्‍वरूप : दो तरह का होता है। एक तो आदमी का बनाया हुआ। उसे एक बार चलाकर जब चाहे रोक लो। और दूसरा परमात्‍मा का बनाया हुआ; उसका रिकार्ड एक बार चढ़ा तो रुकने का नाम नहीं।

प्रेमा : हटो भी! तुम्‍हें ठठोली ही सूझती रहती है। यह तो होता नहीं कि उस अपनी उमा को राह पर लाते। अब देर ही कितनी रही है उन लोगों के आने में!

रामरूवरूप : तो हुआ क्‍या?

प्रेमा : तुम्‍हीं ने तो कहा था कि जरा ठीक-ठीक करके नीचे लाना। आजकल तो लड़की कितनी ही सुंदर हो, बिना टीम-टाम के भला कौन पूछता है? इसी मारे मैंने तो पौडर-वौडर उसके सामने रक्‍खा था। पर उसे तो इन चीजों से न जाने किस जन्म की नफरत है। मेरा कहना था कि आँचल में मुँह लपेटकर लेट गई। भई, मैं तो बाज आई तुम्‍हारी इस लड़की से।

रामस्‍वरूप : न जाने कैसा इसका दिमाग है! वरना आजकल की लड़कियों के सहारे तो पौडर का कारबार चलता है।

प्रेमा : अरे, मैंने तो पहले ही कहा था। इंट्रेंस ही पास करा देते - लड़की अपने हाथ रहती; और इतनी परेशानी न उठानी पड़ती! पर तुम तो -

रामस्‍वरूप : (बात काटकर) चुप, चुप!… (दरवाजे में झाँकते हुए) तुम्‍हें कतई अपनी जबान पर काबू नहीं है। कल ही यह बता दिया था कि उन लोगों के सामने जिक्र और ढंग से होगा, मगर तुम अभी से सब-कुछ उगले देती हो। उनके आने तक तो न जाने क्‍या हाल करोगी!

प्रेमा : अच्‍छा बाबा, मैं न बोलूँगी। जैसी तुम्‍हारी मर्जी हो करना। बस, मुझे तो मेरा काम बता दो।

रामस्‍वरूप : तो उमा को जैसे हो तैयार कर लो। न सही पौडर, वैसे कौन बुरी है! पान लेकर भेज देना उसे। और नाश्‍ता तो तैयार है न? (रतन का आना) आ गया रतन?… इधर ला, इधर! बाजा नीचे रख दे। चद्दर खोल।… पकड़ तो जरा इधर से।

[ चद्दर बिछाते हैं ]

प्रेमा : नाश्‍ता तो तैयार है। मिठाई तो वे लोग ज्‍यादा खाएँगे नहीं, कुछ नमकीन चीजें बना दी हैं। फल रक्‍खे हैं ही। चाय तैयार है, और टोस्‍ट भी। मगर हाँ, मक्‍खन? मक्‍खन तो आया ही नहीं।

रामस्‍वरूप : क्‍या कहा? मक्‍खन नहीं आया? तुम्‍हें भी किस वक्‍त याद आई है! जानती हो कि मक्‍खनवाले की दुकान दूर है; पर तुम्‍हें तो ठीक वक्‍त पर कोई बात सूझती ही नहीं। अब बताओ, रतन मक्‍खन लाए कि यहाँ का काम करे। दफ्तर के चपरासी से कहा था आने के लिए सो, नखरों के मारे…

प्रेमा : यहाँ का काम कौन ज्‍यादा है? कमरा तो सब ठीक-ठाक है ही। बाजा- सितार आ ही गया। नाश्‍ता यहाँ बराबरवाले कमरे में 'ट्रे' में रक्‍खा हुआ है, सो तुम्‍हें पकड़ा दूँगी। एकाध चीज खुद ले आना। इतनी देर में रतन मक्‍खन ले ही आएगा। दो आदमी ही तो हैं?

रामस्‍वरूप : हाँ, एक तो बाबू गोपालप्रसाद और दूसरा खुद लड़का है। देखो, उमा से कह देना कि जरा करीने से आए। ये लोग जरा ऐसे ही हैं। गुस्‍सा तो मुझे बहुत आता है इनके दकियानूसी खयालों पर। खुद पढ़े-लिखे हैं, वकील हैं, सभा-सोसाइटियों में जाते हैं, मगर लड़की चाहते हैं ऐसी कि ज्‍यादा पढ़ी- लिखी न हो।

प्रेमा : और लड़का?

रामस्‍वरूप : बताया तो था तुम्‍हें। बाप सेर है तो लड़का सवा सेर। बी.एससी. के बाद लखनऊ में ही तो पढ़ता है मेडिकल कालेज में। कहता है कि शादी का सवाल दूसरा है, तालीम का दूसरा। क्‍या करूँ, मजबूरी है! मतलब अपना है वरना इन लड़कों और इनके बापों को ऐसी कोरी-कोरी सुनाता कि ये भी…

रतन : (जो अब तक दरवाजे के पास चुपचाप खड़ा हुआ था, जल्‍दी-जल्‍दी) बाबूजी, बाबूजी!

रामस्‍वरूप : क्‍या है?

रतन : कोई आते हैं।

रामस्‍वरूप : (दरवाजे से बाहर झाँककर जल्‍दी मुँह अंदर करते हुए) अरे, ऐ प्रेमा, वे आ भी गए। (नौकर पर नजर पडते ही) अरे, तू यहाँ खड़ा है, बेवकूफ! गया नहीं मक्‍खन लाने?… सब चौपट कर दिया।… अबे, उधर से नहीं, अंदर के दरवाजे से जा (नौकर अंदर आता है।) और तुम जल्‍दी करो, प्रेमा। उमा को समझा देना थोड़ा-सा गा देगी

[ प्रेमा जल्दी से अंदर की तरफ आती है। उसकी धोती जमीन पर रक्‍खे हुए बाजे से अटक जाती है। ]

प्रेमा : उह! यह बाजा वह नीचे ही रख गया है, कमबख्‍त।

रामस्‍वरूप : तुम जाओ, मैं रखे देता हूँ।… जल्‍द!

[ प्रेमा जाती है। बाबू रामस्‍वरूप बाजा उठाकर रखते हैं। किवाड़ों पर दस्‍तक। ]

रामस्‍वरूप : हँ हँ हँ। आइए, आइए… हँ हँ हँ।

[ बाबू गोपालप्रसाद और उनके लड़के शंकर का आना। आँखों से लोक- चतुराई टपकती है। आवाज से मालूम होता है कि काफी अनुभवी और फितरती महाशय हैं। उनका लड़का कुछ खीस निपोरनेवाले नौजवानों में से है। आवाज पतली है और खिसियाहट-भरी। झुकी कमर इनकी खासियत है। ]

रामस्‍वरूप : (अपने दोनों हाथ मलते हुए) हँ हँ, इधर तशरीफ लाइए, इधर…!

[ बाबू गोपालप्रसाद उठते हैं, मगर बेंत गिर पड़ता है। ]

रामस्‍वरूप : यह बेंत!… लाइए, मुझे दीजिए। (कोने में रख देते हैं। सब बैठते हैं।) हँ हँ… मकान ढूँढ़ने में कुछ तकलीफ तो नहीं हुई?

गोपालप्रसाद : (खखारकर) नहीं। ताँगेवाला जानता था।… और फिर हमें तो यहाँ आना ही था; रास्‍ता मिलता कैसे नहीं!

रामस्‍वरूप : हँ हँ हँ, यह तो आपकी बड़ी मेहरबानी है। मैंने आपको तकलीफ तो दी -

गोपालप्रसाद : अरे नहीं साहब। जैसा मेरा काम, वैसा आपका काम। आखिर लड़के की शादी तो करनी ही है। बल्कि यों कहिए कि मैंने आपके लिए खासी परेशानी कर दी।

रामस्‍वरूप : हँ हँ हँ! यह लीजिए, आप तो मुझे काँटों में घसीटने लगे। हम तो आपके हँ हँ हँ - सेवक ही हैं। हँ हँ! (थोड़ी देर बाद लड़के की ओर मुखातिब होकर) और कहिए शंकरबाबू, कितने दिनों की छुट्टियाँ हैं?

शंकर : जी, कालिज की तो छुट्टियाँ नहीं हैं। 'वीक एंड' में चला आया था।

रामस्‍वरूप : तो आपके कोर्स खत्‍म होने में तो अब साल-भर रहा होगा?

शंकर : जी, यही कोई साल-दो साल।

रामस्‍वरूप : साल-दो साल!

शंकर : जी, एकाध साल का 'मार्जिन' रखता हूँ।

गोपालप्रसाद : बात यह है, साहब कि यह शंकर एक साल बीमार हो गया था। क्‍या बताएँ, इन लोगों को इसी उम्र में सारी बीमारियाँ सताती हैं। एक हमारा जमाना था कि स्‍कूल से आकर दर्जनों कचौड़ियाँ उड़ा जाते थे, मगर फिर जो खाना खाने बैठते तो वैसी-की-वैसी ही भूख!

रामस्‍वरूप : कचौड़ियाँ भी तो उस जमाने में पैसे की दो आती थीं। और अकेले दो आने की हजम करने की ताकत थी, अकेले! और अब तो बहुतेरे खेल वगैरा भी होते हैं स्‍कूल में। तब न बॉलीवाल जानता था, न टेनिस, न बैडमिंटन। बस, कभी हॉकी या कभी क्रिकेट कुछ लोग खेला करते थे। मगर मजाल कि कोई कह जाय कि यह लड़का कमजोर है।

[ शंकर और रामस्‍वरूप खीसें निपोरते हैं। ]

रामस्‍वरूप : जी हाँ, जी हाँ! उस जमाने की बात ही दूसरी थी। हँ हँ!

गोपालप्रसाद : (जोशीली आवाज में) और पढ़ाई का यह हाल था कि एक बार कुर्सी पर बैठा कि बारह घंटे की 'सिटिंग' हो गई, बारह घंटे! जनाब मैं सच कहता हूँ कि उस जमाने का मैट्रिक भी वह अंग्रेजी लिखता था फर्राटे की कि आजकल के एम.ए. भी मुकाबला नहीं कर सकते।

रामस्‍वरूप : जी हाँ, जी हाँ! यह तो है ही।

गोपालप्रसाद : माफ कीजिएगा बाबू रामस्‍वरूप, उस जमाने की जब याद आती है, अपने को जब्‍त करना मुश्किल हो जाता है।

रामस्‍वरूप : हँ हँ हँ!… जी हाँ, वह तो रंगीन जमाना था, रंगीन जमाना! हँ हँ हँ।

[ शंकर भी हीं-हीं करता है। ]

गोपालप्रसाद : (एक साथ अपनी आवाज और तरीका बदलते हुए) अच्‍छा तो साहब, फिर 'बिजनेस' की बातचचीत हो जाय।

रामस्‍वरूप : (चौंककर) बिजनेस... बिज… (समझकर) ओह… अच्‍छा, अच्‍छा! लेकिन जरा नाश्‍ता तो कर लीजिए।

[ उठते हैं। ]

गोपालप्रसाद : यह सब आप क्‍या तकल्‍लुफ करते हैं?

रामस्‍वरूप : हँ… हँ… हँ, तकल्‍लुफ किस बात का! हँ-हँ! यह तो मेरी बड़ी तकदीर है कि आप मेरे यहाँ तशरीफ लाए; वरना मैं किस काबिल हूँ! हँ - हँ!… माफ कीजिएगा जरा, अभी हाजिर हुआ।

[ अंदर जाते हैं। ]

गोपालप्रसाद : (थोड़ी देर बाद दबी आवाज में) आदमी तो भला है, मकान-वकान से हैसियत भी बुरी नहीं मालूम होती। पता चले, लड़की कैसी है!

शंकर : जी... (कुछ खखारकर इधर-उधर देखता है।)

गोपालप्रसाद : क्‍यों, क्‍या हुआ?

शंकर : कुछ नहीं।

गोपालप्रसाद : झुककर क्‍यों बैठते हो? ब्‍याह तय करने आए हो, कमर सीधी करके बैठो। तुम्‍हारे दोस्‍त ठीक कहते हैं कि शंकर 'बैकबोन'…

[ इतने में बाबू रामस्‍वरूप आते हैं, हाथ में चाय की ट्रे लिए। मेज पर रख देते हैं। ]

गोपालप्रसाद : आखिर आप माने नहीं!

रामस्‍वरूप : (चाय प्‍याले में डालते हुए) हँ हँ हँ, आपको विलायती चाय पसंद है या हिंदुस्‍तानी?

गोपालप्रसाद : नहीं-नहीं साहब, मुझे आधा दूध और आधी चाय दीजिए। और जरा चीनी ज्‍यादा डालिएगा। मुझे तो भाई, यह नया फैशन पसंद नहीं। एक तो वैसे ही चाय में पानी काफी होता है, और फिर चीनी भी नाम के लिए डाली, तो जायका क्‍या रहेगा?

रामस्‍वरूप : हँ-हँ, कहते तो आप सही हैं। (प्‍याले पकड़ाते हैं।)

शंकर : (खखारकर) सुना है, सरकार अब ज्‍यादा चीनी लेनेवालों पर 'टैक्‍स' लगाएगी।

गोपालप्रसाद : (चाय पीते हुए) हूँ। सरकार जो चाहे सो कर ले; पर अगर आमदनी करनी है तो सरकार को बस एक ही टैक्‍स लगाना चाहिए।

रामस्‍वरूप : (शंकर को प्‍याला पकड़ाते हुए) वह क्‍या?

गोपालप्रसाद : खूबसूरती पर टैक्‍स! (रामस्‍वरूप और शंकर हँस पड़ते हैं) मजाक नहीं साहब, यह ऐसा टैक्‍स है, जनाब कि देनेवाले चूँ भी न करेंगे। बस शर्त यह है कि हर एक औरत पर यह छोड़ दिया जाय कि वह अपनी खूबसूरती के 'स्‍टैंडर्ड' के माफिक अपने ऊपर टैक्‍स तय कर ले। फिर देखिए, सरकार की कैसी आमदनी बढ़ती है!

रामस्‍वरूप : (जोर से हँसते हुए) वाह-वाह! खूब सोचा आपने! वाकई आजकल यह खूबसूरती का सवाल भी बेढब हो गया है। हम लोगों के जमाने में तो यह कभी उठता भी न था। (तश्‍तरी गोपालप्रसाद की तरफ बढ़ाते हैं।) लीजिए!

गोपालप्रसाद : (समोसा उठाते हुए) कभी नहीं साहब, कभी नहीं।

रामस्‍वरूप : (शंकर को मुखातिब होकर) आपका क्‍या ख्‍याल है, शंकर बाबू?

शंकर : किस मामले में?

रामस्‍वरूप : यही कि शादी तय करने में खूबसूरती का हिस्‍सा कितना होना चाहिए?

गोपालप्रसाद : (बीच में ही) यह बात दूसरी है बाबू रामस्‍वरूप; मैंने आपसे पहले भी कहा था, लड़की का खूबसूरत होना निहायत जरूरी है। कैसे भी हो, चाहे पाउडर वगैरा लगाए, चाहे वैसे ही। बात यह है कि हम आप मान भी जायँ, मगर घर की औरतें तो राजी नहीं होतीं। आपकी लड़की तो ठीक है?

रामस्‍वरूप : जी हाँ, वह तो अभी आप देख लीजिएगा।

गोपालप्रसाद : देखना क्‍या? जब आपसे इतनी बातचीत हो चुकी है, तब तो यह रस्‍म ही समझिए।

रामस्‍वरूप : हँ - हँ, यह तो आपका मेरे ऊपर भारी अहसान है। हँ - हँ!

गोपालप्रसाद : और जायचा (जन्‍म-पत्र) तो मिल ही गया होगा!

रामस्‍वरूप : जी, जायचे का मिलना क्‍या मुश्किल बात है! ठाकुरजी के चरणों में रख दिया। बस खुद-ब-खुद मिला हुआ समझिए।

गोपालप्रसाद : यह ठीक कहा है आपने, बिल्‍कुल ठीक (थोड़ी देर रुककर) लेकिन हाँ, यह जो मेरे कानों में भनक पड़ी है, यह तो गलत है न?

रामस्‍वरूप : (चौंककर) क्‍या?

गोपालप्रसाद : यही पढ़ाई-लिखाई के बारे में।… जी हाँ, साफ बात है साहब, हमें ज्‍यादा पढ़ी-लिखी लड़की नहीं चाहिए। मेमसाहब तो रखनी नहीं, कौन भुगतेगा उनके नखरों को। बस, हद-से-हद मैट्रिक होनी चाहिए…क्‍यों शंकर?

शंकर : जी हाँ, कोई नौकरी तो करानी नहीं।

रामस्‍वरूप : नौकरी का तो कोई सवाल ही नहीं उठता।

गोपालप्रसाद : और क्‍या साहब! देखिए कुछ लोग मुझसे कहते हैं कि जब आपने अपने लड़कों को बी.ए., एम.ए. तक पढ़ाया है तब उनकी बहुएँ भी ग्रेजुएट लीजिए। भला पूछिए इन अक्‍ल के ठेकेदारों से कि क्‍या लड़कों और लड़कियों की पढ़ाई एक बात है। अरे, मर्दों का काम तो है ही पढ़ना और काबिल होना। अगर औरतें भी वही करने लगीं, अंग्रेजी अखबार पढ़ने लगीं और 'पालिटिक्‍स वगैरह बहस करने लगीं तब तो हो चुकी गृहस्‍थी! जनाब, मोर के पंख होते हैं, मोरनी के नहीं; शेर के बाल होते हैं, शेरनी के नहीं।

रामस्‍वरूप : जी हाँ, मर्द के दाढ़ी होती है, औरत के नहीं। हँ… हँ

[ शंकर भी हँसता है, मगर गोपालप्रसाद गंभीर हो जाते हैं। ]

गोपालप्रसाद : हाँ, हाँ। वह भी सही है। कहने का मतलब यह है कि कुछ बातें दुनिया में ऐसी हैं जो सिर्फ मर्दों के लिए हैं और ऊँची तालीम भी ऐसी ही चीजों में से एक है।

रामस्‍वरूप : (शंकर से) चाय और लीजिए!

शंकर : धन्‍यवाद, पी चुका।

रामस्‍वरूप : (गोपालप्रसाद से) आप?

गोपालप्रसाद : बस साहब, यह खत्‍म ही कीजिए!

रामस्‍वरूप : आपने तो कुछ खाया नहीं। चाय के साथ 'टोस्‍ट' नहीं थे। क्‍या बताएँ, वह मक्‍खन -

गोपालप्रसाद : नाश्‍ता ही तो करना था साहब, कोई पेट तो भरना था नहीं; और फिर टोस्‍ट-वोस्‍ट मैं खाता भी नहीं।

रामस्‍वरूप : हँ…हँ (मेज को एक तरफ सरका देते हैं। अंदर के दरवाजे की तरफ मुँह कर जरा जोर से) अरे जरा पान भिजवा देना…! सिगरेट मँगाऊँ?

गोपालप्रसाद : जी नहीं।

[ पान की तश्‍तरी हाथों में लिए उमा आती है। सादगी के कपड़े, गर्दन झुकी हुई। बाबू गोपालप्रसाद आँखें गड़ाकर और शंकर आँखें छिपाकर उसे ताक रहे हैं। ]

रामस्‍वरूप : हँ… हँ!… यह… हँ… हँ, आपकी लाड़की है? लाओ बेटी, पान मुझे दो।

[ उमा पान की तश्‍तरी अपने पिता को देती है। उस समय उसका चेहरा ऊपर को उठ जाता है और नाक पर रक्‍खा हुआ सोने की रिमवाला चश्‍मा दीखता है। बाप-बेटे दोनों चौंक उठते हैं। ]

गोपालप्रसाद

शंकर : (एक साथ) - चश्‍मा !

रामस्‍वरूप : (जरा सकपकाकर) - जी, वह तो… वह… पिछले महीने में इसकी आँखें दुखने आ गई थीं, सो कुछ दिनों के लिए चश्‍मा लगाना पड़ रहा है।

गोपालप्रसाद : पढ़ाई-वढ़ाई की वजह से तो नहीं है?

रामस्‍वरूप : नहीं साहब; वह तो मैंने अर्ज किया न!

गोपालप्रसाद : हूँ (संतुष्‍ट होकर कुछ कोमल स्‍वर में) बैठो बेटी!

रामस्‍वरूप : वहाँ बैठ जाओ, उमा, उस तख्‍ते पर, अपने बाजे-बाजे के पास।

[ उमा बैठती है। ]

गोपालप्रसाद : चाल में तो कुछ खराबी है नहीं। चेहरे पर भी छवि है!… हाँ, कुछ गाना- बजाना सीखा है?

रामस्‍वरूप : जी हाँ, सितार भी, और बाजा भी। सुनाओ तो उमा, एकाध गीत सितार के साथ।

[ उमा सितार उठाती है। थोड़ी देर बाद मीरा का मशहूर गीत 'मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई' गाना शुरू कर देती है। स्‍वर से जाहिर है कि गाने का अच्‍छा ज्ञान है। उसके स्वर में तल्‍लीनता आ जाती है, यहाँ तक कि उसका मस्‍तक उठ जाता है। उसकी आँखें शंकर की झेंपती-सी आँखों से मिल जाती हैं और वह गाते-गाते एक साथ रुक जाती है। ]

रामस्‍वरूप : क्‍यों, क्‍या हुआ? गाने को पूरा करो, उमा!

गोपालप्रसाद : नहीं-नहीं साहब, काफी है। लड़की आपकी अच्‍छा गाती है।

[ उमा सितार रखकर अंदर जाने को उठती है। ]

गोपालप्रसाद : अभी ठहरो, बेटी!

रामस्‍वरूप : थोड़ा और बैठी रहो, उमा! (उमा बैठती है)

गोपालप्रसाद : (उमा से) तो तुमने पेंटिंग-वेंटिग भी…?

उमा : (चुप)

रामस्‍वरूप : हाँ, वह तो मैं आपको बताना भूल ही गया। यह जो तसवीर टँगी हुई है, कुत्तेवाली, इसी ने खींची है; और वह दीवार पर भी।

गोपालप्रसाद : हूँ। यह तो बहुत अच्‍छा है; और सिलाई वगैरा?

रामस्‍वरूप : सिलाई तो सारे घर की इसी के जिम्‍मे रहती है; यहाँ तक कि मेरी कमीजें भी। हँ… हँ… हँ...

गोपालप्रसाद : ठीक!… लेकिन, हाँ बेटी, तुमने कुछ इनाम-विनाम भी जीते हैं?

[ उमा चुप। रामस्‍वरूप इशारे के लिए खाँसते हैं। लेकिन उमा चुप है, उसी तरह गर्दन झुकाए। गोपालप्रसाद अधीर हो उठते हैं और रामस्‍वरूप सकपकाते हैं! ]

रामस्‍वरूप : जवाब दो, उमा! (गोपाल से) हँ हँ, जरा श्‍रमाती है। इनाम तो इसने…

गोपालप्रसाद : (जरा रूखी आवाज में) जरा इसे भी तो मुँह खोलना चाहिए।

रामस्‍वरूप : उमा, देखो, आप क्‍या कह रहे हैं। जवाब दो न!

उमा : (हल्‍की लेकिन मजबूत आवाज में) क्‍या जवाब दूँ, बाबूजी! जब कुर्सी-मेज बिकती है, तब दुकानदार कुर्सी-मेज से कुछ नहीं पूछता, सिर्फ खरीदार को दिखला देता है। पसंद आ गई तो अच्‍छा है, वरना…

रामस्‍वरूप : (चौंककर खड़े हो जाते हैं।) उमा, उमा!

उमा : अब मुझे कह लेने दीजिए, बाबूजी!… ये जो महाशय मेरे खरीदार बनकर आए हैं, इनसे जरा पूछिए कि क्‍या लड़कियों के दिल नहीं होता? क्‍या उनके चोट नहीं लगती? क्‍या वे बेबस भेड़-बकरियाँ हैं, जिन्‍हें कसाई अच्‍छी तरह देख-भालकर खरीदते हैं?

गोपालप्रसाद : यह तो हमारी बेइज्जती...

उमा (ताव में आकर) जी हाँ; हमारी बेइज्जती नहीं होती जो आप इतनी देर से नाप-तोल कर रहे हैं? और जरा अपने इस साहबजादे से पूछिए कि अभी पिछली फरवरी में ये लड़कियों के होस्‍टल के इर्द-गिर्द क्‍यों घूम रहे थे, और वहाँ से क्‍यों भगाए गए थे!

शंकर : बाबूजी, चलिए!

गोपालप्रसाद : लड़कियों के होस्टल में?… क्‍या तुम कालेज में पढ़ी हो?

[ रामस्‍वरूप चुप! ]

उमा : जी हाँ, मैं कालेज में पढ़ी हूँ। मैंने बी.ए. पास किया है। कोई पाप नहीं किया, कोई चोरी नहीं की, और न आपके पुत्र की तरह ताक-झाँककर कायरता दिखाई है। मुझे अपनी इज्जत - अपने मान का खयाल तो है। लेकिन इनसे पूछिए कि ये किस तरह नौकरानी के पैरों पड़कर अपना मुँह छिपाकर भागे थे!

रामस्‍वरूप : उमा! उमा!

गोपालप्रसाद : (खड़े होकर गुस्‍से से) बस, हो चुका। बाबू रामस्‍वरूप, आपने मेरे साथ दगा दगा की। की। आपकी लड़की बी.ए. पास है, और आपने मुझसे कहा था कि सिर्फ मैट्रिक तक पढ़ी है। लाइए, मेरी छड़ी कहाँ है। मैं चलता हूँ। (छड़ी ढूँढ़कर उठाते हैं।) बी.ए. पास? ओफ्फोह! गजब हो जाता! झूठ का भी कुछ ठिकाना है! आओ बेटे, चलो… (दरवाजे की ओर बढ़ते हैं।)

उमा : जी हाँ, जाइए, जरूर चले जाइए! लेकिन घर जाकर जरा यह पता लगाइएगा कि आपके लाड़ले बेटे के रीढ़ की हड्डी भी है या नहीं - यानी बैकबोन, बैकबोन -

[ बाबू गोपालप्रसाद के चेहरे पर बेबसी का गुस्‍सा है और उनके लड़के के रुआँसापन। दोनों बाहर चले जाते हैं। बाबू रामस्‍वरूप कुर्सी पर धम से बैठ जाते हैं। उमा सहसा चुप हो जाती है। लेकिन उसकी हँसी सिसकियों में तबदील हो जाती है। प्रेमा का घबराहट की हालत में आना। ]

प्रेमा : उमा, उमा… रो रही है?

[ यह सुनकर रामस्‍वरूप खड़े होते हैं। रतन आता है। ]

रतन : बाबूजी, मक्‍खन!

[ सब रतन की तरफ देखते हैं और परदा गिरता है। ]

[श्रेणी : नाटक।  लेखक : जगदीशचन्द्र माथुर ]