'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

समांतर / दिनकर बेडेकर

दिनकर बेडेकर 
(पर्दा खुलता है तब स्टेज पर अँधेरा है। फिर किवाड़ खोलने की आवाज। अँधेरे में दो व्यक्ति दिखाई देते हैं। उनमे से एक बिजली का बटन खोजने का प्रयास कर रहा है।)

हेमंत : बिजली को भी ठीक अभी जाना था - (गिरते-पड़ते अंदर आने लगता है। परंतु उसके साथ वाला व्यक्ति आसानी से अंदर आ चुका है। हेमंत फिर कहीं टकराता है।

संगीता : सँभलना...

हेमंत : यहीं कहीं टार्च रखा था मैंने... उसे भी अभी खोना था... (ढूँढ़ता रहता है। फिर कुछ गिरने की आवाज।)

संगीता : तुम रुको न लेकिन जरा... जहाँ हो वहीं रुको...। मै लाती हूँ अंदर से कुछ... कोई मोमबत्ती वगैरह...

( अंदर जाती है। हेमंत आसपास टटोल कर एक कुर्सी पर बैठ जाता है। क्षणिक विराम। फिर बत्तियाँ जलती है। हेमंत का बर्ताव एकदम नॉर्मल हो जाता है। वह दरवाजे के पास पड़े पत्र को उठाने जाता है। उसका ध्यान वहीं नीचे गिरे गमले की ओर जाता है। वह टूटे गमले को सीधा रखता है। नीचे गिरी मिट्टी उसमे भर कर पौधे को उसमें दबा देता है। इतने में संगीता आती है। अंदर से मोमबत्ती जलाकर लाई है - एकदम हिफाजत से।)

संगीता : चीजें जहाँ की तहाँ रखने का ये फायदा है। (मोमबत्ती एक जगह रख देती है।) दरवाजा बंद कर लो जरा -

( हेमंत उसका बर्ताव देख रहा है। अवाक। उसके आखरी वाक्य पर सतर्क हो जाता है। कुछ कहता नहीं, केवल फूँक मार कर मोमबत्ती बुझा देता है।

संगीता : यह क्या, बुझा क्यों दी?

हेमंत : बिजली आ चुकी है।

संगीता : कब से? मुझे बताया क्यों नहीं?

हेमंत : सॉरी -

संगीता : कितना अजीब दिखा होगा... इतनी बत्तियाँ जल रही है और मैं - मोमबती ले कर... (हँसती है।)

( हेमंत पत्र उठाता है, खोल कर पढ़ने लगता है। संगीता कुर्सी की ओर आते हुए हेमंत की बैग से टकराती है।)

संगीता : हेमंत - तुम्हारी बैग -

हेमंत : उठाता हूँ -

(विराम। हेमंत पत्र पढ़ता रहता है।)

संगीता : हेमंत...

हेमंत : हँ -

संगीता : क्या कर रहे हो तुम?

हेमंत : पत्र पढ़ रहा हूँ-

संगीता : किसका है?

हेमंत : हमारे पिताश्री का

संगीता : क्या लिखा है?

( हेमंत पत्र को टेबल पर रखता है।)

हेमंत : अब और क्या? मैंने तुमसे शादी की... यह बात तो उन्हें बुरी लगी ही, फिर मैं उनकी धमकियों के आगे झुका नहीं और आखिरकार उन्हें चुप बैठना पड़ा यह भी उन्हें सहन नहीं होता। फिर ऐसी चिट्ठियाँ लिखते रहते हैं। छोड़ो भी... मैं वॉश ले कर आता हूँ।

( हेमंत अंदर चला जाता है। संगीता पल भर के लिए वहीं बैठी रहती है। फिर कुछ याद कर उठती है। शोकेस की तरफ जाती है। वहाँ रखे पौधे को टटोलती है। उसे अपनी जगह न पाकर अस्वस्थ हो जाती है। वहीं आस-पास ढूँढ़ने लगती है। इतने मे हेमंत आता है। संगीता को देख कर रुक जाता है।)

हेमंत : क्या ढूँढ़ रही हो तुम?

संगीता : यहाँ रखा पॉट...

हेमंत : नीचे रख दिया है मैंने - अँधेरे में नीचे गिर गया था -

संगीता : (नीचे झुक कर पॉट को टटोलने लगती है - पौधे का फील लेती है) मर गया शायद... इतना नाजुक पौधा... आठ दिन पानी भी नहीं... बरौनी से कहा था मैंने कि, कम से कम इस पौधे को पानी डाल दिया करे - लेकिन पिछले आठ दिनों में उसने यहाँ पैर तक नहीं रखा दिखता... सारा घर धूल से भर गया है। पाँव में लग रही है न -

हेमंत : अब जाने भी दो

(कुर्सी पर बैठता है। सिगरेट सुलगाता है।)

हेमंत : बढ़िया रही न अपनी ट्रिप? सफर में भी कोई तकलीफ नहीं हुई।

(संगीता छोटी-मोटी वस्तुओं को ठीक-ठाक कर रही है।)

संगीता : तुम जिद ही पकड़ कर बैठ गए इसलिए मैं चल दी। वर्ना मुझे क्या - सभी जगहें एक जैसी -

हेमंत : मेरे मन में कब से था कि वहाँ जाना है। बहुत सुना था उन टेंपल्स के बारे में। आखिर इस बार हो पाया।

संगीता : उस जगह के बारे में ज्यादा लोग जानते नहीं होंगे अभी... खास भीड़ नहीं थी वहाँ...

हेमंत : अच्छा ही है न - एक बार टूरिस्टों का आना-जाना शुरू हुआ कि पूछो मत - ताजमहल को भी धर्मशाला बना देते हैं। वो जगह ऐसी अनजानी ही ठीक है। तुम्हें जगह कैसी लगी?

संगीता : बढ़िया... एकदम फ्रेश लगा...

हेमंत : देखो! और तुम आने से मना कर रही थी...

संगीता : मुझे लगा था मैं वहाँ जा कर क्या करूँगी? ऐसी जगह जा कर मैं देख नहीं सकती यह बात बहुत जानलेवा लगती है।

हेमंत : कुछ प्राब्लम हुआ तुम्हें?

संगीता : तुम हर बात बारीकी से वर्णन कर रहे थे इसलिए... दरअसल तुम्हारे ऐसा करने से ही मेरा वहाँ जाना सार्थक हुआ।

हेमंत : नाऊ कम ऑन...

संगीता : सच! तुम साथ ना होते तो कितनी ही बातों का मैं अनुभव ही न ले पाती

हेमंत : शायद मुझे भी नहीं सूझता; लेकिन वह परिसर, वहाँ का वातावरण, वो सारा अनुभव ही इतना सुंदर था कि शब्द अपने आप सूझते गए।

संगीता : (संजीदा हो कर) कोई इस तरह भी मुझे समझ लेगा; कभी लगा नहीं था।

हेमंत : सच कहूँ तो पहले मुझे डर सा लगा था। हर दृश्य का, हर शिल्प का इस तरह वर्णन कर रहा हूँ इस बात का कहीं तुम्हें गुस्सा न आ जाए... पर अपने आप को रोक नहीं सका... इतना खूबसूरत अनुभव अकेले ही बटोरूँ यह बात जँची नहीं। तुम्हें भी उसमें शामिल करने की इच्छा हुई इसलिए हिम्मत कर के...

संगीता : मुझसे कोई बात इस तरह शेयर करने की सूझी ही नहीं किसी को। माँ-बाबूजी ने पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया, मेरे कारण कभी-कभी मेरे भाई-बहनों की ओर लापरवाह भी रहे - लेकिन उस सब में मुझे लगता है, ममता से ज्यादा मेरी चिंता थी उन्हें... भाई-बहनों ने भी बहुत प्यार दिया, मेरी मुश्किलें समझ ली, लेकिन कभी-कभार उनके बर्ताव में सहानुभूति का अहसास होता और उस बात से मुझे बहुत फ्रस्ट्रेशन आता... आगे चल कर तो उनमें उठने-बैठने का भी संकोच होने लगा... उनकी कोई गलती नहीं थी... लेकिन मुझे ही लगता था कि... मतलब मन ही नहीं करता था... (विराम) लेकिन तुम्हारे साथ रहते ऐसा कभी मन में भी नहीं आया...

हेमंत : ऐसा क्या कर दिया मैंने?

संगीता : छोटी-छोटी बातें... लेकिन एक-एक याद आती है तो अजीब लगता है। धूप में खड़े रहो तो अपनी परछाईं दिखती है यह मैंने इतने दिन सिर्फ सुना था... तुम्हे याद है? हम टहल रहे थे और तुमने अचानक रुक कर कहा - आसपास इतनी मूर्तियाँ है कि उस दीवार पर बनी अपनी परछाइयाँ भी मूर्तियों जैसी प्रतीत होती हैं। तुम्हारे इस वाक्य से मैं सिहर उठी थी... आदतन छूने के लिए हाथ बढ़ाया और हाथ को स्पर्श हुआ केवल खुरदरे पत्थरों का... (विराम)

हेमंत : तुम्हारी निराशा मैं देख रहा था। बड़ी विचित्र अवस्था हो गई थी मन की... ऐसा लगा मानो सारी कोशिशें नाकाम हो गईं...

(विराम)



संगीता : हेमंत -

हेमंत : क्या?

संगीता : एकदम चुप से हो गए -

हेमंत : अँ? नहीं - मैं कुछ और ही सोच रहा था -

संगीता : क्या?

हेमंत : अगर परछाईं को छू सकते तो शायद...

संगीता : ओह... जाने भी दो... यूँ ही याद आया इसलिए बोल पड़ी मैं।

हेमंत : परछाईं जैसी मामूली बात भी किसी को अचंभे में डाल सकती है यह उस क्षण महसूस हुआ मुझे -

संगीता : जो बात मेरे तुम्हारे बस में नहीं उसका अफसोस करने से क्या फायदा?

हेमंत : लेकिन ऐसी कई बातें - जिन्हें स्पर्श नहीं किया जा सकता - कैसे ध्यान में आती है? जैसे अलग-अलग प्रहर...

संगीता : दिन के हर प्रहर का एक 'फील' होता है। जैसे शाम... आसपास की स्तब्धता से ही उसे पहचान सकते हैं। वातावरण में मानों भर जाती है दिन भर की थकान... (विराम) आँखें न हुईं तो क्या हुआ, और भी कई रास्ते हैं जिनसे अनुभव तक पहुँचा जा सकता है।

हेमंत : तुम लोगों की यही बात मुझे फैसिनेट करती है। सिर्फ अब ही नहीं, पहले भी जब मैं नेत्रहीन लोगों को ऑब्जर्व करता था, उनकी बोलचाल में भी एक मिस्टिक टच मुझे जान पड़ता था। बहुत अनोखे लगते थे वे लोग। तुम्हारे साथ भी तो - एकदम पहली बार जब मेरे कदमों की आहट से ही तुम जान गई कि मै आया हूँ - मैं काँप गया था -

संगीता : अनोखा कुछ नहीं उसमें - आदत की बात है। स्पर्श से ही कितनी बातें खुद-ब-खुद जान पड़ती हैं। कभी-कभी तकलीफ भी होती है। जो नहीं जानना चाहिए वह भी मालूम पड़ जाता है। सीधे-सादे अहसास भी बेलगाम घोड़ों की तरह - अच्छी बातें भी कई बार बेस्वाद हो जाती हैं।

हेमंत : मतलब? कैसे?

संगीता : ओ बाबा... फिलहाल आँखें मूँद कर, कभी ये चीज उठा के देख, वहाँ ले जा कर रख -, सारा घर घूम के देख, यहाँ टकरा... वहाँ गिर... इतना कुछ कर रहे हो वह काफी है न -

हेमंत : तुमने कैसे जाना? जरूर अजित ने बताया होगा -

संगीता : किसी और के बताने की क्या जरूरत है? आज कल घर में मुझसे ज्यादा तुम ही टकराते फिरते हो... इतने इंपेशंट मत बनो, अब सारी उम्र गुजारनी है मेरे साथ। धीरे-धीरे सब समझ जाओगे।

( उठकर अंदर जाने लगती है। रुकती है। मुडकर जहाँ बैग रखी थी उस तरफ जाती है।)



हेमंत : मै रख दूँगा न -

संगीता : नहीं - प्लीज - (बैग उठा कर) पिछले पंद्रह दिनों में तुमने मुझे आलसी बना दिया है

( बैग ले कर अंदर जाती है। स्टेज पर हेमंत अकेला है। सिगरेट सुलगाता है। विराम। क्षणभर बाद संगीता आती है।)



हेमंत : थक गई?

संगीता : थोड़ी सी (विराम) हेमंत -

हेमंत : बोलो -

संगीता : क्या सोच रहे हो?

हेमंत : सोच रहा हूँ? नहीं तो -

संगीता : मैंने जो कहा उसका बुरा मान गए?

हेमंत : नहीं - उसमें क्या बुरा मानना - (विराम)

संगीता : हेमंत -

हेमंत : हूँ -

संगीता : मुझे सचमुच विश्वास ही नहीं हो रहा...

हेमंत : मतलब?

संगीता : साल भर पहले किसी ने ऐसा कुछ सुझाया भी होता तो मैं उसे पागल समझती - और आज हम अच्छा-खासा घर बसा बैठे हैं। (विराम) तुमने प्रपोज किया था तब भी मुझे लगा था कि तुम भावना के बहकावे में आ कर बोल रहे हो। मैंने सीरीयसली लिया भी नहीं था उस बात को। मुझे लगा था कि अपना काम खतम होने पर हम दुबारा मिलेंगे भी नहीं कभी - लेकिन -

हेमंत : उस प्रोजेक्ट के साथ मेरी भावनाएँ जुड़ गई थीं। सच पूछो तो मैं सोच समझ कर ही इनव्हाल्व हुआ था। वर्ना मुझे जो चाहिए था मुझे मिल नहीं पाता। ऐसी इनव्हाल्वमेंट मुझे जरूरी लगती है। बिना उसके हम किसी इंसान को समझ ही नहीं पाते। और ऐसे में मिली तुम - शार्प, सेंसेटिव्ह - मैंने तभी तय कर लिया था कि -

संगीता : सच कहूँ? मुझे भी... मतलब तुम्हारा स्वभाव, बर्ताव सब कुछ बहुत अच्छा लगा था। लेकिन शादी की बात और होती है। वह निर्णय लेना मेरे लिए भी बहुत कठिन था। तुम पर विश्वास था... खुद अपने आप पर ही भरोसा नहीं था।

हेमंत : तुम्हारे पापा भी अपने इस निर्णय से खास खु्श नहीं थे। मैंने जब उनके पास यह विषय छेड़ा तो पल भर के लिए कुछ बोले ही नहीं - और फिर इसमें कौन-कौन सी अड़चनें आ सकती हैं उनकी एक लिस्ट ही सुनाने बैठ गए। शायद उन्हें अब भी इस बात का भरोसा नहीं है कि मैं यहाँ सब ठीक तरह से निभा पाऊँगा। हमारी इस ट्रिप को ले कर भी -

संगीता : तुम मुझे इतने लंबे सफर पर ले जा रहे हो यह उन्हें जरा अटपटा लगा था।

हेमंत : क्यों? और लोग नहीं जाते?

संगीता : उन्हें लगा होगा कि तुम कुछ ज्यादा ही नॉर्मल बन रहे हो -

हेमंत : ऐसा लगा होगा उन्हें? मेरा बिहेव्हिअर, मेरा काम इतने करीब से देखने के बाद भी?

संगीता : सब तुम्हारी तरह सैलाब-सी जिंदगी नहीं जी सकते। तुम्हारे माता-पिता ने भी कहाँ स्वीकारा है मुझे? मेरे कारण तुम्हारे और उनके बीच फासला हो गया यह बात मुझे चुभती ही रहेगी न?

हेमंत : फासला होने के लिए हम करीब थे ही कब? और उसे ले कर तुम्हें गिल्टी फील करने की कोई जरूरत नहीं।

संगीता : फिर भी - लगता तो है ही - (विराम) फिर मेरे कारण तुम पर बंधन भी तो आएँगे -

हेमंत : कैसे बंधन? अभी हम इतनी दूर का सफर तय कर आए - आया कोई प्रौब्लेम?

संगीता : तुम समय पर ही मेरी अड़चनें समझ जाते थे इसलिए। वर्ना उस अपरिचित जगह -

हेमंत : नाऊ प्लीज... एक बात हमेशा याद रखो - मैंने तुम्हारा उद्धार वगैरह करने के लिए तुम से शादी नहीं की है। तुम ही अगर उपकारों के बोझ तले रहने लगी तो यह सारी मेहनत बेकार गई ऐसा लगेगा मुझे।

संगीता : अच्छा बाबा ! - गलती हो गई मुझसे! (विराम) हेमंत - एक मन की बात कहने को जी चाह रहा है - कहूँ?

हेमंत : क्या?

संगीता : मुझे मेरे व्यंग पर मात करनी है। औरों की तरह नार्मल जिंदगी जीना चाहती हूँ मै। वह मेरा अधिकार भी है। लेकिन इस एक बात को साबित करने के लिए इतनी सारी करामातें करना मैं जरूरी नहीं समझती।

हेमंत : संगीता -

संगीता : डोंट मिसअंडरस्टैंड प्लीज... इकट्ठे जीवन बिताना है हमें - मेरी बात समय पर ही स्पष्ट कर देना मैंने ठीक समझा। और तुम उसे समझ लोगे यह विश्वास है इसलिए बोल रही हूँ मैं -

( क्षणिक विराम। फिर संगीता उठ कर चली जाती है। अकेला रह जाता है। विचारमग्न। अँधेरा। कुछ समय बीत गया है। अगला दृश्य शुरू होता है तब भी स्टेज पर अँधेरा है। हेमंत अकेला बैठा है। कुछ क्षण बाद अजित आता है। हेमंत का निकटतम दोस्त, सहकारी, समवयस्क।)

अजित : अँधेरे में क्यों बैठे हो?

( अजित बत्तियाँ जलाता है। रंगमंच प्रकाशित होता है।)

हेमंत : कुछ नहीं - यूँ ही - अकेला बैठा था - अँधेरा कब हुआ पता ही नहीं चला...

अजित : अकेले क्यों? संगीता?

हेमंत : मायके गई है।

अजित : अच्छा! इसलिए तुम तुरंत उदास चेहरा बना कर बैठ गए -

हेमंत : अजित प्लीज -

अजित : अरे, ये क्या बात हुई? अब क्या बिगड़ा है तुम्हारा? सब कुछ तो मनमर्जी से हुआ है। जिद से शादी की, पंद्रह दिन बढ़िया घूम आए हो -

हेमंत : सोचता हूँ - न ही जाता तो बेहतर होता। संगीता तो मना ही कर रही थी -

अजित : लेकिन तुम ही तो जिद कर के ले गए थे उसे -

हेमंत : हाँ - और उन पंद्रह दिनों ने ही हमारे बीच एक दूरी खड़ी कर दी है।

अजित : कैसी दूरी? क्या बोल रहे हो तुम?

हेमंत : अजित, मै उसे यह सोच कर ले कर गया था कि उस वातावरण में हम एक दूसरे को अच्छी तरह समझ पाएँगे - मतलब मुझे वैसा लगा था। लेकिन अब लगता है, मुझे ऐसा नहीं करना चाहिए था।

अजित : क्यों?

हेमंत : पंद्रह दिन हम निरंतर एक दूसरे के साथ थे। लेकिन एक बात मुझे बार-बार महसूस होती रही की हमारे सहवास के परे उसकी अपनी भी एक दुनिया है। मैं लाख कोशिश कर लूँ, मुझे वहाँ प्रवेश नहीं है। ऐसी संवेदनाओं की दुनिया जिन्हें सिर्फ वह अकेली ही महसूस कर सकती है - जिनके बारें में मुझे, हमारी पहली मुलाकात से ही आकर्षण था - लेकिन हकीकत यह है कि इतनी सारी निकटता के बावजूद मैं उन संवेदनाओं के आसपास भी नहीं पहुँच पाया

अजित : तो? इस बात से इतना अवस्थ होने का कारण?

हेमंत : कारण है। बहुत अस्वस्थ कर देने वाली बात है यह। स्पर्श वही, पर कभी उससे किसी चीज को विश्वास होने तक संदेह से टटोलना - और कभी उसी स्पर्श से मन की भावनाओं तक को सही पहचान लेना - ऐसी विरुद्ध सीमाओं की संवेदनक्षमता है उसमें -

अजित : ये तुम्हें आज पता चल रहा है? जब हम उनके साथ काम कर रहे थे तभी हमने करीब से देखा था कि दृष्टिहीनों के बाकी सेंसेस कितने डेवलप्ड होते है -

हेमंत : तुम नहीं समझ पाओगे - उस के साथ लगातार रह कर देखो - उसके घर में रहते, मुझे सहजता से रहना कठिन हो गया है। लगता है कोई पहरा दे रहा है मुझ पर - मेरी हर हरकत वह जान जाती है इस बात का मुझे सुखद अचरज होता था पहले, लेकिन अब तकलीफ होती है। लगता है जैसे उसने अपनी संवेदनाओं का जाल बिछा रखा है सारे घर में। उससे बचने के लिए कोने में छिप कर बैठूँ, कदमों तक की आहट ना होने दूँ, तो कुछ ही क्षणों में वह आवाज देती है और उसका इस तरह आवाज देना भी, मैं आसपास हूँ इस बात को निश्चित करने के लिए होता है। (विराम)

अजित : हेमंत, तुमने पूरी तरह सोच समझ कर यह जिम्मेदारी उठाई है - अब इस तरह के खयाल मन में लाना भी -

हेमंत : मैं जिम्मेदारी कहाँ ठुकरा रहा हूँ? (विराम) और यह सब मैं सिर्फ तुमसे कह रहा हूँ। संगीता को इस बात का अहसास तक नहीं होने दिया है मैंने - लेकिन जब अकेला होता हूँ तो बस यही चलता रहता है दिमाग में - बाहर किसी को अंदाजा तक नहीं होगा, लेकिन भीतर से हमारे रिश्ते में एक दरार-सी पड़ गई है। (विराम) कम से कम मेरी नजर में तो यही सच है। (विराम)

अजित : एक बात याद रखो हेमंत - जिस पल उसे एस बात का जरा-सा भी अहसास होगा वह बिखर जाएगी। उसके लिए तुम ही सबकुछ हो। तुम ही ऐसे बवंडर में फँस गए तो उसका क्या होगा इस बात का अंदाजा है तुम्हें?

हेमंत : इसी वजह से मेरी तड़प और ज्यादा है। मैंने उसके जैसा बनने की कोशिश की न? नहीं की? लेकिन कुछ हासिल नहीं हुआ।

अजित : हासिल होना भी नहीं था। क्योंकि तुम जिन बातों को हासिल करने के लिए छ्टपटा रहे हो उन्हें तो अभ्यास से कोई भी हासिल कर सकता है। असली कसौटी तो उसके बाद है। और तुम वहीं आ कर ठिठक गए हो। (विराम) अंधों के साथ रहना मतलब उनके जैसा हो कर रहना नहीं होता। उनके मन की थाह तक पहुँचना होता है। और तुम वहीं से पीछे हट रहे हो।

हेमंत : नहीं - बिलकुल नहीं - पीछे नहीं हट रहा हूँ मैं। हाँ उलझन में जरूर फँस गया हूँ। लेकिन इसमें दोष मुझ अकेले का नहीं है। संगीता का शादी से पहले का बर्ताव और पिछ्ले कुछ दिनों में मैंने देखी, महसूस की हुई बातें इनमें कोई संगति नजर नहीं आ रही मुझे। (विराम) यहाँ अपना हर काम जिद से खुद करनेवाली संगीता, बाहर पाँव रखते ही मेरे सहारे के बिना एक कदम भी नहीं चल पा रही थी। लेकिन जैसे ही मैं वहाँ के सृष्टि-सौंदर्य का, शिल्पों का वर्णन करने लगता - वह इरिटेट हो जाती थी। कभी जताया नहीं उसने - लेकिन मैं समझ सकता था (विराम) उसे कब मेरे सहारे की जरूरत है और कब उसे उससे तकलीफ होती है यह मैं आखिर तक तय नहीं कर पाया। सब कुछ संदिग्ध-सा हो बैठा है। (विराम) और इस सब के बावजूद तुम लोगों की सहानुभूति उसी के साथ रहेगी। मैं ही जिद्दी हूँ, उतावला हूँ, सीधी-सादी बातों को उलझाना मेरी आदत है इन बातों के सबूत देते फिरोगे तुम।

अजित : औरों से मुझे कुछ लेना-देना नहीं। मैं ऐसा कुछ भी करनेवाला नहीं। हाँ - एक बात पक्की है - ये सारी उलझन तुम्हें ही सुलझानी होगी - जल्द से जल्द -

हेमंत : क्या करूँ मैं?

अजित : तुम जो उसके जैसा बनने के फिराक में हो न, उसे पहले बंद करो। तुम जैसे हो वैसे ही रहो और उसे भी अपने तरीके से जीने दो।

हेमंत : उस से क्या होगा? एक दूसरे से कभी न मिलनेवाली दो समांतर रेखाओं जैसी हो जाएगी हमारी जिंदगी।

अजित : अभी जो केवल एक गुत्थी-सी उलझती जा रही है उस से कहीं बेहतर अवस्था होगी वह।

हेमंत : नहीं अजित, इस लिए नहीं की मैंने यह सारी भागादौड़ी। अगर ऐसा ही करना होता तो मैं शादी ही क्यों करता? तुम जानते हो कि मेरे मन में केवल शारिरिक आकर्षण नहीं था। उल्टे मेरे हिस्से औरों की तरह नार्मल वैवाहिक जीवन नहीं आएगा यह मैं भली-भाँति जानता था। फिर भी मैंने यह रिश्ता सँजोया। कभी औरों से - कभी खुद से लड़-झगड़ कर। ऐसे रिश्ते से खिलने वाली नई अनुभूतियों की जबरदस्त आस थी मुझे। वे मुझे मिली भी - लेकिन खिड़की में लगी काँच के उस पार लोग दिखाई देते हैं उस तरह।

अजित : लेकिन उनका भी मुक्त मन से स्वीकार किया तुमने? नहीं। केवल तुम्हें अवगत रंग, रूप, आकार में उन्हें बिठाने के लिए जूझते रहे और खुद ही निर्माण किये हुए संपूर्ण काल्पनिक संकट के अंदेशे से दहल गए। कुछ देर पहले मैंने जो कहा, शायद तुम्हें बुरा लगा हो, लेकिन दो समांतर रेखाएँ दूर कहीं एक दूसरे से मिल रही हैं इतना आभास तो रहता ही है। ऐसी बेबस उलझनों से तो उस आभास के सहारे जीते रहना ज्यादा मायने रखता है।

( हेमंत इस पर कुछ नहीं कहता। विराम)



अजित : ठीक है -

( उठता है। दरवाजे तक जाता है। पल भर रुकता है। कुछ कहने के लिए मुड़ता है। फिर होंठों तक आए शब्द निगल कर चला जाता है। हेमंत अकेला। इस संभाषण का तनाव उसके चेहरे पर दिखता है। रिएक्शन के तौर पर वह सामने रखे सेंटर टेबल को ठोकर मारता है। टेबल गिरता है , उस पर रखी चीजें गिरती है। फिर सब शांत हो जाता है। विराम। अचानक बत्तियाँ बुझ जाती है। समूचे रंगमंच पर अब अँधेरा है।

इस दृष्य के पश्चात कुछ समय बीत गया है। रंगमंच पर अब भी अँधेरा है। हेमंत अंदर से एक मोमबत्ती जला लाता है। आते हुए किसी चीज से टकराता है। चिढ़ कर उस चीज को ठोकर मार कर दूर करता है। सेंटर टेबल के पास आ कर उसे सीधा करता है। उस पर मोमबत्ती लगाता है। विराम।

हेमंत... हेमंत.... संगीता की पुकार सुनाई देती है। फिर वह दरवाजे में खड़ी दिखती है। वह फिर हेमंत को पुकारती है। एक-दो कदम भीतर आती है और वहाँ किसी चीज से टकराती है - गिर पड़ती है। हेमंत को फिर आवाज देती है। उठने का प्रयास करती है। खड़ी हो कर हाथों से जाने-पहचाने निशान टटोलने लगती है। हेमंत कोने में खड़ा सब देख रहा है। संगीता कुर्सी की ओर जाने लगती है तो हेमंत कोई आहट किये बिना कुर्सी उठाकर ठीक उसके सामने ही रख देता है। संगीता कुर्सी से टकराती है। फिर बिखरी चीजों को संगीता के रास्ते में रखने का ओर उसके गिरने-पड़ने का एक सिलसिला शुरू हो जाता है। संगीता अब अंदर से ढह गई है। भयभीत हो कर वह एक बार स्टेज के दाहिने कोने में पहुँचती है। वह जगह उसे कुछ परिचित-सी लगती है। लेकिन जरा-सा आगे बढ़ते ही वह फिर यहाँ-वहाँ टकराने लगती है। हर चीज की जगह बदल लेने के बाद आखिरकार हेमंत कमरे की रचना पूर्ववत कर देता है। अब संगीता सहमी हुई, एक कोने में, बुत बनी खड़ी है। किसी भी दिशा में एक कदम भी बढ़ाने का साहस उसमें नहीं है। असहाय हो कर, वह थक कर नीचे बैठ जाती है ओर रोने लगती है। पल भर के पश्चात हेमंत उसके समीप जाता है। उसके कंधे पर हाथ रखता है। उसका स्पर्श होते ही संगीता छिटककर दूर हो जाती है।)

संगीता : (उस स्पर्श से अपना बचाव करते हुए) नहीं... पास मत आओ मेरे...

( हेमंत उसके और निकट पहुँचता है। संगीता उस से दूर होने की कोशिश में है।)

संगीता : कौन हो तुम? मेरे पास मत आना वर्ना मैं... हेमंत -

( हेमंत अब उसके एकदम निकट पहुँच गया है)

संगीता : तुम्हें क्या लगा? मुझे दिखाई नहीं देता इसका फायदा उठाकर तुम -

( उसके हाथ, वार करने के लिए कोई वस्तु तलाश रहे हैं। वह हेमंत को बार-बार पुकार रही है।)

हेमंत : संगीता -

( हेमंत की आवाज सुनते ही संगीता रुक जाती है। उसी समय बत्तियाँ भी जल उठती है।)

संगीता : (मानों किसी दुःस्वप्न से जागी हो) हेमंत ... कहाँ थे तुम? मैंने तुम्हे कई बार पुकारा -

( हेमंत उसे सहारा दे कर उठाता है। कुर्सी में बिठाता है।)

संगीता : कहाँ चले गए थे तुम?

हेमंत : मैं तो अभी अभी लौटा हूँ। एक दोस्त से मिलने चला गया था। सुबह बताया भी था तुम्हें - लेकिन हुआ क्या? तुम इतनी घबराई हुई क्यों हो?

संगीता : मैं -

हेमंत : मैं अंदर आया तब तुम मुझे पुकार रही थी - तुम्हें सँभालने के लिए तुम्हारे नजदीक आया तो तुम -

संगीता : लेकिन वह स्पर्श अलग ही था - बिल्कुल पराया, अपरिचित - ऐसा लगा कि तुम्हें मेरे पास न पा कर कोई -

हेमंत : कैसी बेतुकी बातें सोचती रहती हो तुम?

संगीता : नहीं हेमंत - यहाँ पैर रखते ही कुछ अलग ही लगा - लगा मैं किसी गलत जगह आ गई हूँ - मेरे पहचान के निशान ढूँढ़ने लगी तो डर कम होने के बजाय और गहरा होता गया।

हेमंत : डर? डर किस बात का? यहाँ सब कुछ तुम्हारा जाना पहचाना ही है। यहाँ की हर चीज - देखो - ( संगीता का हाथ पकड़ कर कुछ चीजों के पास ले जाता है। वह उनका फील ले कर तसल्ली कर लेती है।) है ना?

संगीता : हाँ - लेकिन कुछ देर पहले ऐसा नहीं था -

हेमंत : तुम्हें वहम हुआ होगा -

संगीता : वहम नहीं - मुझे बिल्कुल साफ पता चल रहा था - ( विराम) लगा जैसे कोई आ कर मेरे समूचे जीवन को ही तहस-नहस कर रहा है -

हेमंत : लेकिन तब इस कमरे में तुम्हारे अलावा -

संगीता : वो मैं नहीं जानती - तुम एक पल के लिए भी मुझे छोड़ कर कहीं मत जाना -

हेमंत : ठीक है - (हेमंत संगीता को अपनी बाँहों में लेता है। वह भी उस से लिपट जाती है।)

हेमंत : अब गया डर?

संगीता : हाँ - (विराम) हेमंत -

हेमंत : हूँ -

संगीता : मैं आजकल तुम्हे बहुत तकलीफ देती हूँ न? तुम्हे अपने से जकड़े रखती हूँ -

हेमंत : नहीं तो - ऐसा क्यों लगता है तुम्हें?

संगीता : मुझे महसूस होता है न - दिन-ब-दिन मैं तुमपर ज्यादा ही निर्भर होने लगी हूँ। तुम्हें अपने लिए थोड़ा भी समय नहीं मिल पाता है आजकल -

हेमंत : नहीं - ऐसी कोई बात नहीं है - हाँ एक बात का आश्चर्य जरूर होता है - जीवन में इतनी हिम्मत से डट कर खड़ी रही तुम जैसी लड़की एकदम इतनी डिपेंडंट कैसे हो गई?

संगीता : मतलब मेरे अंदर का बदलाव तुम्हें भी महसूस हो रहा है - बावजूद उसके तुम -

हेमंत : मैं क्या खास कर रहा हूँ? और तुम्हें, मैं नहीं समझूँगा तो फिर और कौन समझ लेगा?

संगीता : मुझे डर लगता है हेमंत - मन में एक दहशत-सी रहती है आजकल -

हेमंत : इस तरह हिम्मत नहीं हारते - ( प्यार से उसका कंधा थपथपाता है।)

संगीता : हेमंत - एक बात पूछूँ?

हेमंत : हाँ -

संगीता : हमारी शादी से - मतलब तुम्हें किसी बात का पछतावा तो नहीं?

हेमंत : पछ्तावा? पछ्तावा क्यों होगा?

संगीता : कभी कुछ मन में आता हो -

हेमंत : कैसी बातें कर रही हो तुम? मेरे बिहेव्हिअर से कभी लगा तुम्हें? इस तरह की बातें सोच कर तुम अपने आप को तो तकलीफ पहुँचाती ही हो, साथ-साथ मुझे भी -

संगीता : मैं जान-बूझकर ऐसा करती हूँ क्या? ( विराम) तुम दिन भर बाहर रहते हो। मैं यहाँ अकेली रह जाती हूँ। मैं किस तरह दिन गुजारती हूँ इस बात का तुम्हें अहसास भी कहाँ होगा? जब घर से परिचित नहीं थी तब वह एक काम था। सारा घर घूमती और यहाँ की हर चीज को, दीवारों को, खिड़की-दरवाजों को बार-बार छू कर उन्हें अपना बनाने की कोशिश करती रहती। लेकिन उनकी भी अपनी सीमाएँ हैं। ना तो वे बोल सकती है, ना ही उन्हें मेरी तरह स्पर्श की भाषा अवगत है।

हेमंत : समय न कटता हो तो कुछ पढ़ लिया करो - तुम्हारी सारी किताबें तो है यहाँ - संगीता : उन्हें तो छूने की भी इच्छा नहीं होती। (विराम) अजीब हो बैठा है सब कुछ। कभी लगता है मैं अपना अंधापन ही नकारने की कोशिश में हूँ। लेकिन मैं लाख कोशिशें कर लूँ - तुम लोगों की तरह जीने की जिद पकड़ लूँ - मेरी दुनिया तुम से अलग ही है इस बात से मैं मुँह नहीं मोड़ सकती - अभी थोड़ी देर पहले जो हुआ वैसा कुछ होते ही मेरा सारा झूठा ढाँढ़स टूट जाता है।

हेमंत : संगीता - मेरी हमेशा यही कोशिश रही है कि -

संगीता : मुझे तुम्हारा साथ चाहिए हेमंत - इस गुत्थी को मैं अकेले नहीं सुलझा पाऊँगी - (विराम) हेमंत - तुम्हें नहीं लगता की इन दिनों तुम अचानक ही रूखा व्यवहार करने लगे हो - मुझे टालने की कोशिश करते हो - मेरे साथ होते हो तब भी मानों मेरी परीक्षा लेते रहते हो - मैं अपने बलबूते पर कहाँ तक जा सकती हूँ यह जाँचते रहते हो तुम -

हेमंत : संगीता -? ये सब क्या कह रही हो तुम? ऐसा क्या कर दिया है मैंने? मैं कब ऐसा पेश आया हूँ?

संगीता : खुद ही याद करो - हम मंदिर देखने गए थे - जब तक मैं तुम्हारी बातें सुन रही थी तब तक तुम हर बात बड़ी बारीकी से समझा रहे थे। सिर्फ एक बार - जो मुझे महसूस हो रहा था वह मैंने बताया तो अपमानित लगा था तुम्हें -

हेमंत : पता नहीं तुम्हें ऐसा क्यों लगा - मेरा सारा प्रयास तो, मेरी नजर से छूट गई उन संवेदनाओं तक पहुँचने का ही था - तुम ही अचानक चुप हो गई - मैंने कितनी कोशिश की कि तुम कुछ कहो - लेकिन तुम - (विराम) फिर लगा कि तुम शायद अपना अनोखापन सहेजकर रखना चाहती थी इसलिए -

संगीता : मुझे कुछ बातें अलग से जरूर जान पड़ती है, लेकिन उस बात का घमंड नहीं है मुझे। उन्हें उस तरह जान लेना मेरी जरूरत है। जब वह भी न हो पाएगा तब मेरे अस्तित्व के कोई मायने ही नहीं रहेंगे। जीवन में मुझे छोटा-सा ही सही, अपना एक स्थान मिला है। लेकिन तुम्हें भी उस से दूर रखूँ इतना छोटा मन नहीं है मेरा। मैं चुप हो गई थी किसी और कारण से। मैं जो महसूस कर रही थी वह तुम्हें बता देती और तुम्हें वे बातें महसूस नहीं होती तो तुम और भी फ्रस्ट्रेट हो जाते -

हेमंत : मेरा फ्रस्ट्रेशन अलग ही था। तुम जो कह रही थी उस से वह अनुभव सही मायने में संपूर्ण हो रहा था। अन्यथा आँखें है इसलिए हम लोग सिर्फ देखते ही चले जाते हैं। बाकी संवेदनाओं पर जैसे जंग लग जाता है। उन्हें साफ-सुथरा और तेज रखना कितना आवश्यक है यह मैंने तुम्हारी बातों से जाना। लेकिन तुम - पुरानी - निरुपयोगी चीजें जल्दबाजी में कबाड़खाने में ढकेल दी जाएँ... ऐसा कुछ कर गई।

संगीता : यह सब तुमने तब क्यों नहीं कहा?

हेमंत : हमारी संवेदनाओं का वह फर्क देखकर मैं दहल गया था। लगा तुम्हें समझना तो दूर, तुमसे बात तक नहीं कर सकूँगा मैं।

संगीता : निसर्ग के नियमों के तौर पर मिली चीजों को कितना ग्लैमराइज करते हो तुम लोग। यह भूल जाते हो कि हमें स्पर्श, गंध, नाद ये संवेदनाएँ औरों से अलग महसूस होती है लेकिन केवल उनके आधार पर जिया नहीं जा सकता। (विराम) किसी जंगल में घूमते हुए निरंतर साथ देनेवाला हवा का स्वर, वहाँ से लौटने के बाद भी मन में बसी रहनेवाली वनफूलों की महक, इन सारी बातों को यादों के रूप में, मन में संजोकर ही रखना चाहिए। आम जिंदगी में उनका कोई खास उपयोग नहीं होता। उसके लिए मुझे तुम्हारे ही सहारे की जरूरत है हेमंत -

हेमंत : सच कहूँ? मै भी बौखला गया था। तुम्हें समझने की कोशिश में तुमसे ही दूर जा रहा था। जो मुझे नहीं जान पड़ता वह मैं तुमसे जान सकता हूँ इतनी सरल-सी बात मेरी समझ में नहीं आई। लेकिन अब मैंने - (बोलते हुए रुक जाता है। संगीता की ओर देखता है। उसकी नजरें हेमंत पर जमीं है।)

संगीता : हेमंत - एक बात पूछूँ?

हेमंत : अभी और कुछ बाकी है क्या?

संगीता : अभी थोड़ी देर पहले तुमने जो किया वह -

हेमंत : संगीता -

संगीता : तब तुम यहीं थे न?

हेमंत : मतलब?

संगीता : तुम ही एक-एक चीज की जगह बदल कर मेरी रिऐक्शन देख रहे थे -

हेमंत : मैं? मैं ऐसा क्यों करूँगा?

संगीता : हेमंत - तुम आसपास हो यह जानने के लिए अब मुझे तुम्हारे कदमों के आहट की जरूरत नहीं रही।

हेमंत : (अवाक) संगीता - मैं -

संगीता : छोड़ो भी - मजाक किया मैंने - तुम ऐसा कभी नहीं करोगे इस बात का विश्वास है मुझे।

हेमंत : संगीता - सचमुच मैं -

संगीता : कहा न - मजाक किया। चलो थोड़ा टहलकर आएँ? तुम्हारी इच्छा हो तो -

हेमंत : अँ? हाँ - क्यों नहीं?

संगीता : मैं पाँच मिनट में तैयार हो कर आती हूँ -

( संगीता अंदर चली जाती है। हेमंत अब भी सँभला नहीं है। अचानक लाईट्स बुझ जाती है। रंगमंच फिर अँधेरे में डूब जाता है।)

(इस एकांक के रंगमंचीय प्रस्तुतीकरण से पहले पूर्वानुमति लेना आवश्यक है।)

(संपर्क : T-1,उत्कर्ष शीतल, 33 अंबाझरी ले आऊट, नागपुर - 440033, फोन : 09833144152, 
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[श्रेणी : नाटक।  लेखक : दिनकर बेडेकर। अनुवाद : माधुरी बेडेकर ]