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जीवन की धूप और छाँह के चितेरे / सूरज पालीवाल

सूरज पालीवाल 
स्वाधीनता के बाद के पहले दशक में कविता और कहानी में जो आंदोलन चले, उन पर पश्चिम के साहित्य का प्रभाव था। नए उभरते भारत की चकाचौंध में वे अपने भविष्य को बनता और टूटता देख रहे थे। गाँव या कस्बे से शहर में आए नवयुवक तथा शहर के मध्यवर्ग की पढ़ी-लिखी युवा पीढ़ी उनके लेखन का मुख्य विषय थी। इसलिए टूटन, घुटन तथा संत्रास जैसे शब्द तथा मनःस्थिति का वर्चस्व था। यह भारतीय समाज का कितना प्रामाणिक चित्र था, इस पर बहस की जा सकती है लेकिन यह चित्र संपूर्ण भारतीय जीवन का चित्र तो बिल्कुल भी नहीं था। कुछ नकली विमर्शों के शोर में असली आवाज को दबाने या उस पर मुलम्मा चढ़ाकर प्रस्तुत करने की होड़ जैसी लग गई थी, ग्राम कथा का दूसरे स्तर पर जाना इसी का परिणाम था। प्रेमचंद ने जिस ग्राम कथा का विशद आधार खड़ा किया था उसे दूसरी श्रेणी या आंचलिकता की सीमा में बाँधकर देखने के तर्क गढ़कर नगरीय जीवन के अनुभवों के आधार पर लिखे गए कथा साहित्य को प्रथम स्तर का मानकर चर्चा की गई। इसका परिणाम यह निकला कि चर्चा का केंद्र नगर और उसके मध्यवर्ग तक सीमित रह गया। आजादी के बाद गाँवों में पनपी राजनीति और पंचवर्षीय योजनाओं की विपफलताओं को जिन रचनाकारों ने रेखांकित किया था, उन पर बहुत बाद में जाकर चर्चा हुर्इ्र और अनमनेपन के साथ हुई। यह विसंगति आज भी है इसलिए ग्राम कथा नदारद है - लेखक और आलोचक दोनों के यहाँ से। अधिकांश कहानियाँ नगर केंद्रित लिखी जा रही हैं और आलोचकों का ध्यान भी उसी ओर है। देश की अस्सी प्रतिशत आबादी आज भी गाँवों में रहती है लेकिन कहानियों से गाँव गायब हैं। केवल गाँव ही नहीं आम आदमी भी गायब होता जा रहा है। आम आदमी के वृहत्तर सुख-दुख अब साहित्य के केंद्र में नहीं है। केवल खाते-पीते मध्यवर्ग की अशेष महत्वाकांक्षाओं को आधार बनाकर कब तक साहित्य लिखा जाता रहेगा? यह प्रश्न आज इसलिए और जरूरी हो गया है कि बाजारवाद ने गरीबों को और गरीब बनाया है और खाता-पीता मध्यवर्ग अब हजारों की बात नहीं करता बल्कि उसके सपनों में लखपति से करोड़पति बनने की इच्छा ने स्थान ले लिया है।

छठे दशक में 'नई कहानी' के तीन झंडाबरदारों ने कहानी चर्चा को अपने पक्ष में करने के सारे प्रयत्न किए उनके अलावा कई ऐसे कहानीकार थे जो अपनी तरह से चुप रहकर मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग के बहुत छोटे-छोटे अनुभवों और संघर्षों को कहानियों का आधार बना रहे थे। इन लेखकों में अमरकांत का लेखन सबसे अलग है। वे कस्बेनुमा छोटे से शहर बलिया से आए थे - अपने ताजे और टटके अनुभव लेकर। उनके पात्र बहुत सामान्य स्थितियों में रहकर सपने देखने वाले पात्र थे। जीवन की बहुत बड़ी-बड़ी बातों और सूचनाओं से वे अनजान थे, या उन्हें अपनी सीमा से बाहर मानते थे। यह सच जिस विडंबना से उपजा है अमरकांत उससे बखूबी परिचित थे। बहुत कम लेखक इस सच से परिचित हो पाते हैं। कई तो सारी जिंदगी लिखकर यही नहीं पहचान पाते कि उनकी पकड़ की सीमा कहाँ है? यही कारण है कि अमरकांत की जो कहानियाँ चर्चा के केंद्र में रहीं या आज भी अधिकांश पाठकों की जुबान पर हैं वे वह कहानियाँ हैं जो हाशिए पर रह रहे या कर दिए गए लोगों की तथा निम्नमध्यवर्ग की मार्मिक अनुभूति को रेखांकित करने में सक्षम हैं। हम सब शहर में रहने और नौकरीपेशे से जुड़े होने के कारण मध्यवर्गीय जीवन जीने के आदी हो गए हैं, हमारे सारे मित्र भी लगभग इसी वर्ग से आते हैं इसलिए अनुभव भी हमारे पास इसी वर्ग के हैं, अमरकांत भी मध्यवर्ग के हैं लेकिन शहर में रहकर मध्यवर्गीय जीवन जीते हुए समाज की मुख्यधारा से उपेक्षित पात्रों पर चकित कर देने वाली कहानियाँ लिख रहे थे। ये टटके अनुभव उन्होंने अपने आसपास से ही लिए होंगे, ऐसा कहानियों में आए पात्रों की जीवंतता देखकर कहा जा सकता है। रजुआ, मूस, परबतिया, मुनरी तथा पगली ऐसे ही पात्र हैं, जिनका कोई सामाजिक आधार नहीं है पर हैं इसी समाज के चरित्र। ऐसे दीन-हीन, दुखी और उपेक्षित पात्रों को कहानियों में जीवित एवं जीवंत चरित्र के रूप में अमरकांत ही खड़ा कर सकते थे। अमरकांत के पास ऐसे पात्रों के निजी और गोपन परिवेश को जानने की अनूठी दृष्टि है, केवल प्रगतिशील होने तथा रचनाकार होने से काम नहीं चलता। बहुत सारे प्रगतिशील हैं जो सारा जीवन या तो मजदूरों पर नकली कहानियाँ लिखते रहे या मध्यवर्ग पर उथली कहानियाँ। ऐसी कहानियाँ न साहित्य का भला करती हैं और न उन पात्रों के वर्ग का जो इन कहानियों में आता है। ओढ़ी हुई सहानुभूति या वैचारिक लड़ाई के आधार पर इस प्रकार के पात्र रचे जाते हैं जो अंततः अपना कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। कहानियों में जब तक जीवन की ऊष्मा नहीं होती, जब तक समाज से हाड़-माँस के पात्र सृजित नहीं किए जाते तब तक वे अयथार्थ ही बने रहते हैं। कहानी पढ़ते हुए जीवन यथार्थ और पात्र के सजीव होने का विश्वास नहीं होता तो कहानी अधूरी-सी लगती है और वह अपना प्रभाव छोड़ने में असमर्थ रहती है।

यह महज संयोग नहीं है कि हिंदी में स्वाधीनता के बाद की पीढ़ी में सर्वाधिक चर्चित चरित्र प्रधान कहानियाँ लिखने वाले अमरकांत और भीष्म साहनी ही हैं। दोनों के पास भाषा और चरित्र की एकरूपता न होकर सहजता है जो बहुआयामी है। इस बहुआयामिता को सहेजती सहजता उनके जीवन में भी है। जीवन की सहजता पात्रों को समझने और उन्हें रचने में सहायक होती है, यह तथ्य इन दोनों कहानीकारों को पढ़ने के बाद पक्का और मजबूत होता है। भीष्म साहनी की 'चीफ की दावत' की माँ भुलाए नहीं भूलती। जिस माँ को छुपाने की लाख कोशिशें की जाती हैं वही माँ कहानी में सर्वाधिक प्रभाव छोड़ती है। कहानी के अन्य पात्र गौण हो जाते हैं और अनपढ़ बूढ़ी माँ जिसे कमरे में इसलिए बंद कर दिया गया था कि बेटे की तरक्की होनी है - वह अचानक कहानी और पाठकों की संवेदना का अनिवार्य और अपरिहार्य अंग बन जाती है। इस प्रकार की कहानियाँ अपनी सहजता में संश्लिष्ट प्रभाव छोड़ती है। यह संश्लिष्टता न बहुत कहानियाँ लिखने के बाद आती है और न बहुत ज्यादा आंदोलनधर्मी होने के बाद, बल्कि यह जीवन की गहरी समझ से निर्मित होती है। मेरा यह दृढ़ विश्वास है कि लेखक जितना गहरे तक जीवन से जुड़ा होगा, जितना अंदर तक जीने की कला जानता होगा, उतना अधिक और मार्मिक ढंग से जीवन के अनछुए पक्षों को रचने में सफल होगा। साहित्य को जीवन की आलोचना इन्हीं अर्थों में कहा जाता है।

अमरकांत के पास मध्यवर्ग और निम्नमध्यवर्ग के ऐसे अनछुए असंख्य पात्र हैं, जिन्हें वे अपनी तरह से रचते हैं। अपनी तरह से यानी जीवन के उन पक्षों को वे उजागर करना चाहते हैं, जो अभी तक अछूते थे। मैं सबसे पहले निम्नवर्ग के उन पात्रों पर बात करना जरूरी समझता हूँ, जो पात्र हमारे समाज के ही हैं लेकिन समाज के केंद्र में न होकर उपेक्षित या हाशिए पर ढकेल दिए गए हैं। ऐसे पात्र अमरकांत की संवेदना से जीवित हो उठते हैं। यह संवेदना विरल है, इसे आज के स्त्री विमर्श और दलित विमर्श के नजरिए से बिल्कुल नहीं समझा जा सकता। इसे समझने के लिए तो अमरकांत के पास ही जाना होगा। उदाहरण के रूप में मैं 'मूस' कहानी का जिक्र करना जरूरी समझता हूं। यहाँ एक पात्र नहीं बल्कि पूरा परिवेश - गजगजाता हुआ परिवेश, बीमार, थके, काले, गंदे और जीवन यापन की अनवरत समस्या से जूझते हुए मूस के माध्यम से अमरकांत उस वातावरण को रेखांकित करते हैं, जो हमारे बीच होते हुए भी हमारी संवेदना का पात्र नहीं बन पाया। अमरकांत की विशेषता यह है कि वे पात्र का परिचय पूरी सजग संपूर्णता के साथ देते हैं, जिससे एक साथ बहुत-सी जानकारियाँ उसके बारे में अनायास ही मिल जाती हैं। वे मूस के बारे में लिखते हैं 'क्रोध किस चिड़िया का नाम है, यह मूस एक-सवा साल पहले तक जानता भी नहीं था। उसकी देह-धजा में वह शोभा भी नहीं देता था। चार फुट का मरद होने के कारण लोग उसके बारे में खामखाह कह देते, जैसा नाम वैसा गुण। दुबला-पतला शरीर, छोटा चेहरा, बड़ी-बड़ी फरकती मूँछें, छोटी-छोटी मिचमिचाती आँखें और उभरी हुई गाल की हड्डियाँ। पाँच साल पहले उसने चालीस पार कर लिया था। उसके हाथों तथा पैरों में सिकुड़े हुए केंचुए की तरह मोटी-मोटी नसें उभर आई थीं। संभवतः उसकी सीधाई के कारण कभी-कभी लोग उसके नाम के साथ 'भगत' भी जोड़ देते थे, जो किसी हद तक उसके छोटे कद के प्रति सार्वजनिक हास्य का परिचायक था। करीब बीस वर्ष से मूस इस छोटी, अँधेरी और सीलनदार कोठरी में रहता है। अकाल पड़ने पर वह परबतिया और छः मास की बच्ची जिलेबिया के साथ गाँव छोड़कर बाहर चला आया था। गड़ेरिए के पास जायदाद के नाम पर कुछ भेड़ें और बकरियाँ थीं, जो भूख से बिलबिलाकर मर गई थीं। तब भी यह गली ऐसी ही कच्ची, टूटी-फूटी, गंदी और बदबूदार थी, जिसमें डोम-चमार से लेकर रिक्शेवाले, खोंचेवाले, मिलों में काम करने वाले मजदूर और कुछ ठठेरे रहते थे।'

कहना न होगा कि मूस का यह परिचय चालीस साल के उस व्यक्ति का परिचय है जिसे जीवन के संघर्षों ने कम उम्र में बूढ़ा कर दिया है, जो अकाल की भयाभह स्थितियों से बचकर जीवन जीने की लालसा में शहर की उपेक्षित और सीलन भरी अँधेरी कोठरी में रहने को विवश है। उसकी कद-काठी, रंग-रूप तथा परिवेश कहीं से भी उसे विशिष्ट नहीं बनाते, विशिष्टता तो अमरकांत की उस दृष्टि में है जिससे मूस जैसा साधारण पात्र भी जीवन से हार नहीं मानता। गाँव का गड़ेरिया मूस जिसकी कोई स्थायी संपत्ति गाँव में भी नहीं थी शहर यह सोचकर ही आया होगा कि वहाँ कुछ रोजगार मिलेगा। गाँव में यह मानकर चला जाता है कि शहर बड़े होते हैं इसलिए वहाँ कोई भूखा नहीं मरता, काम करने वाले को काम मिल ही जाता है। मूस को भी काम मिला, घरों में पानी भरने का। चार फुटा मूस काँवर पर लटकाकर घरों में पानी भरने लगा। यह रोजगार नहीं था लेकिन उसने इसे ही रोजगार मान लिया था इसलिए उसके विकल्प के बारे में उसने न कभी सोचा और न सोचने की आवश्यकता ही अनुभव की। बड़े शहरों की तरह छोटे शहरों और कस्बों में भी सरकार की ओर से घरों में पानी पहुँचाने की व्यवस्था की गई। सरकार की यह जिम्मेदारी थी कि विकास के सोपान क्रम में वह स्वच्छ पानी का भी प्रबंध करे। यह विडंबना ही है कि सरकार के इस प्रयास से मूस जैसे लोगों का रोजगार ही छिन गया। मूस और उसकी पत्नी परबतिया ने शायद ही कभी सोचा हो कि सरकार कभी उसका रोजगार भी छीन सकती है। कलकत्ते में पैदल रिक्शा खींचने वालों को बेरोजगार न करने के चक्कर में अभी तक सरकार उस अमानवीय प्रथा को समाप्त नहीं कर पाई है। एक मोटा सेठ रिक्शे पर मुस्कुराता हुआ बैठे और एक गरीब कमजोर आदमी उसे दौड़कर ले जाए, इसे देखकर ही घृणा होती है। लेकिन मार्क्सवादी सरकार भी इसे समाप्त करने की हिम्मत नहीं जुटा सकी। मनुष्य को जिससे रोजगार मिल रहा है, अचानक उसे कैसे समाप्त किया जा सकता है। कुओं, तालाबों से पानी लाने का काम श्रमसाध्य है। कस्बों और शहरों के बढ़ने के साथ दूरियाँ बढ़ती गईं, प्रदूषण और गंदगी भी बढ़ती गई इसलिए उनका पानी पीने योग्य भी नहीं रहा। सरकार की योजना के अनुसार स्वच्छ पानी देना उसकी नैतिक जिम्मेदारी थी इसलिए सार्वजनिक जल वितरण की व्यवस्था की लेकिन इससे मूस जैसे आदमी का तो रोजगार ही छिन गया। यह मूस और उसकी पत्नी की मूर्खता है या जीवन के विकास की अनदेखी कि वे विकास की इस धारा को समझने में असमर्थ रहते हैं। इसलिए परबतिया सरकार को ही गालियाँ देने लगती है 'सरकार कोढ़िया पर भर-बोरसी अंगार डालूँ! बाल बच्चे नहीं क्या उसके? अब किसी का धरम-करम नहीं बचेगा! डोम-चमार सभी एक ही घाट पानी पीएँगे। हैजा-पिलेक से हजारों मनई मरेंगे! हे गंगा मैया! हे बाबा बलेसरनाथ! जो किसी की रोजी छीने उसकी आँखों में कच्चा बैठे! उसके अंग-अंग में कोढ़ फूटे...!' परबतिया जैसी स्त्री को न सरकार के बारे में पता है और न उसकी नीतियों के बारे में। वे अपनी स्थितियों के अंधकार में इतने घिरे हैं कि उन्हें जीवन के उजाले पक्ष की कोई जानकारी ही नहीं है। विकास की धारा से गरीबों को लाभ होना चाहिए पर परंपरागत पेशों के समाप्त हो जाने से उन्हें कठिनाई होती है, अनचाही समस्या उठकर खड़ी हो जाती है। मूस जैसे लोगों की समस्या यह है कि वे खुली आँखों से दुनिया को देखना ही नहीं चाहते। ऐसे निरीह पात्र अपनी परंपरागत चीजों को छाती से लगाकर सुख का अनुभव करते हैं और उनके छिन जाने पर दयनीय हो जाते हैं। यह दयनीयता ही मूस की विशेषता है। इसी दयनीय अवस्था में अमरकांत के पात्र अपने संसार का परिचय देते हैं और हमेशा के लिए अपनी छाप छोड़ जाते हैं।

मूस के जीवन में ऐसा कुछ भी नहीं है, जिसे बताने की जरूरत हो। वह बहुत सामान्य-सा पात्र है अमरकांत के अनेक ऐसे पात्रों की तरह। मूस के बारे में वे लिखते हैं 'मूस का जीवन मरियल बैल की तरह था, जो चुपचाप हल में जुतता है, चुपचाप मार सहता है और चुपचाप नांद में भूसा खाता है। उसको देखकर यह कहना मुश्किल था कि उसकी कोई इच्छा या अनिच्छा भी है। उसके मुख पर कोई भाव नहीं था और वह ऐसी पुरानी मशीन की तरह लगता, जो वर्षों से काम करते रहने पर भी खराब नहीं होती।' यह अमरकांत के परिचय देने का अनोखा ढंग है। मरियल बैल का चित्र सामने आते ही यह स्पष्ट हो जाता है कि मरियल होते हुए भी बैल की तरह काम करना उसकी मजबूरी है। काम से मुँह चुराना उसकी आदत में नहीं है पर आगे से आगे काम बदलते रहने या अच्छे काम की तलाश करना भी उसकी आदत में शुमार नहीं है। एक काम से चिपटे रहने के कारण ही उसपर मुसीबत आती है। अमरकांत दयनीयता में ही जीवन का रस भी ढूँढ़ते रहे हैं। रजुआ और पगली का आकर्षण स्त्री-पुरुष की दृष्टि से देखें तो सहज आकर्षण है लेकिन जिन स्थितियों में यह पैदा हुआ है वह सामान्य नहीं है। सामान्य स्थितियों के न रहने पर भी यदि जीवन रस उपजता है तो वह अपनी अलग छाप छोड़ता है। अमरकांत ऐसी ही स्थिति की तलाश में रहते हैं इसलिए उनकी कहानियाँ दयनीय पात्रों को लेकर भी दीन-हीन नहीं बनती। मूस अपने से 'चार बित्ता लंबी, बीमार गाय की तरह हाड़-हाड़, काली-कलूटी और बदसूरत दमे की मरीज बातूनी तथा लखनऊ के हिजड़ों की तरह दिखने वाली परबतिया के साथ रहते-रहते बुझ-सा गया था। अभाव, उपेक्षा तथा बीमारी जीवन में एकरसता उत्पन्न करती हैं। मूस के जीवन में भी एकरसता आ गई थी लेकिन मुनरी के आने के बाद से उसमें परिवर्तन आया। वह अपने अभाव, उपेक्षा और बीमारी को भूल गया। अमरकांत उसके इस परिवर्तन को रेखांकित करते हैं 'मूस को जीवन में पहली बार ऐसा सुख मिला था। उसको पहली बार अपनी शक्ति और पुरुषत्व का अहसास हुआ था। एक जवान, सुंदर, गुणी और नखरीली औरत उस पर लट्टू है, इस भावना ने झकझोर और गुदगुदाकर उसमें अनंत शक्तियाँ जगा दीं। वह अब साफ-सुथरा रहने की कोशिश करता, देर तक नहाता, दाँतों को मजे में साफ करता, अधपकी मूँछों को तेल से तर करता और उनको अक्सर ऐंठता रहता। वह अब अपना पुरुषत्व प्रदर्शित करने के लिए लालायित रहने लगा। अब तक उसका व्यक्त्वि इतना दबा-दबा था कि उसने प्रेम, सद्व्यवहार और सुख के बारे में सोचने का साहस भी कभी नहीं किया था परंतु अब यह सब उसको मिला तो उसका व्यक्तित्व माँद में सोए हुए बाघ की तरह जाग पड़ा।'

यह सामान्य परिवर्तन नहीं है मुनरी के आने से पहले वह मरियल बैल की तरह था, चुपचाप मार खाने और काम करने वाले बैल जैसा लेकिन अब वह माँद में सोए हुए बाघ की तरह जाग गया है। जगे हुए बाघ और मरियल बैल में जो अंतर है वह मूस के जीवन का अंतर है। अमरकांत अपनी कहानियों में पशु-पक्षियों के माध्यम से इन अंतरों को रेखांकित करते हैं, जिससे वे जीवंत हो उठते हैं। इस परिवर्तन की एक विशेषता यह है कि यह उस व्यक्ति के जीवन में आया है, जो चालीस वर्ष के आसपास की उम्र का है, एकमात्र बेटी का गौना कर चुका है, घर में दूसरे सदस्य के रूप में केवल पत्नी है जो बहुत वाचाल और बदसूरत है, अँधेरी और सीलनभरी कोठरी में अभावों की एक लंबी सूची है - ऐसे पात्र के जीवन में उत्साह पैसे से नहीं आ सकता था, यह बसंत की तरह ताजी और शक्तिदायिनी हवा की तरह, सत्ताईस-अट्ठाईस साल की साँवली गठीली दृढ़ वक्षों वाली मुनरी के आने के बाद ही संभव था। अमरकांत की नजर इस पर थी इसलिए वे मूस के अभावों की कहानी कहते-कहते जीवन-रस के इस अनिवार्य पक्ष को बताना जरूरी समझते थे। जीवन ऐसे ही आशा और निराशा के झूले पर बीतता है। केवल दुखों को रेखांकित कर देने से मनुष्य का संपूर्ण चित्र नहीं बनता। संपूर्णता दुख और सुख के बीच से ही उपजती है। यह सही है कि मूस जैसे आदमी के जीवन में सुख की उम्र लंबी नहीं होती, दुख की टेढ़ी नजर उसे तुरंत जकड़ लेती है। मुनरी के जाने के बाद मूस का जीवन फिर से उदास, उपेक्षित और बोझिल हो गया था।

अमरकांत के कई पात्रों में यह तुलना कर पाना कठिन है कि कौन किससे कमजोर है? यह कमजोरी आर्थिक से अधिक सामाजिक है। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों पर बहुत सारे कहानीकारों ने लिखा है पर सामाजिक रूप से अकेले, बीमार, बेसहारा, दयनीय और अनाम लोगों पर बहुत कम लोगों ने लिखा है। अमरकांत आर्थिक और सामाजिक रूप से कमजोर पात्रों को चुनते हैं और अपनी पूरी संवेदना के साथ, केवल सहानुभूति के साथ नहीं, चरित्र के रूप में खड़ा करते हैं। हमारे अपने खाते-पीते समाज के सामने एक आईने के रूप में उस पात्र को प्रस्तुत करते हैं। जाहिर है कि यह कठिन काम है। 'नई कहानी' के दौर में मध्यवर्गीय जीवन कहानी के केंद्र में रहा था। अभी पिछले दिनों 'नई कहानी' के तीन झंडाबरदारों में से एक राजेंद्र यादव ने स्वयं स्वीकार किया कि 'हम विचार से तो मार्क्सवादी थे लेकिन कहानियों में पात्रों को अस्तित्ववादी विचार के तहत रच रहे थे। यह बहुत पढ़ी-लिखी पीढ़ी थी, स्वयं राजेंद्र यादव ने बहुत सारा विदेशी साहित्य घोट डाला था। इन्हें लग रहा था कि आजादी के बाद का जो भारतीय समाज है वह पश्चिम की पहचान के संकट के निकट है। इसलिए कहानियों में वह संकट हमेशा घनघनाता सुनाई देता है। केवल ग्राम कथाकार इससे मुक्त थे जो प्रसिद्धि के चक्कर में धीरे-धीरे उसी ओर जा रहे थे। रेणु के आरंभिक उपन्यास औेर कहानियों की तुलना परवर्ती उपन्यास और कहानियों से करने से यह अंतर और यह फाँक साफ दिखाई देती है। लेकिन मैं एक बार फिर जोर देकर कहना चाहता हूँ कि अमरकांत के पात्र कस्बेनुमा छोटे शहर में रहते हैं, शहर में उनकी कोई पहचान नहीं है, या तो रोजगार है नहीं और है तो वह संकट में है, शरीर से कमजोर और पैसे को मोहताज ये पात्र जब कहानी में आते हें तो अपनी पूरी कमजोरी के बावजूद ताकतवर पात्र के रूप में उभरते हैं। उनसे जैसे-जैसे परिचय होता जाता है वैसे-वैसे रूह काँपने लगती है। लगता है आदमी के रूप में जानवर से भी गए-बीते ये चरित्र हमारे अपने समाज के ही चरित्र हैं, हमारे मुहल्ले में नहीं तो किसी के मुहल्ले में या किसी के शहर में ये आज भी चल-फिर रहे होंगे। ऐसे पात्रों के बारे में पढ़कर अपने समाज से मोह उत्पन्न नहीं होता बल्कि घृणा होती है। ये अमरकांत की ताकत है कि दयनीय पात्र समाज के प्रति घृणा का वातावरण निर्मित करने में सक्षम होते हैं। 'मूस' और 'रजुआ' में ऐसा क्या है, जिससे उन्हें बार-बार पढ़ने को मन करे? कहना न होगा कि हिंदी के अनेक पाठक ऐसे होंगे जिन्होंने ये कहानियाँ बार-बार पढ़ी होंगी, और जब-जब पढ़ी होंगी तब-तब उनके ये पात्र अपनी दयनीयता में असाधारण नजर आए होंगे।

रजुआ को पढ़ते हुए मुझे बार-बार यह लगा कि वह मूस से अधिक कमजोर पात्र है। मूस के पास किराए की कोठरी है, पत्नी है, अपने जैसे लोगों का आस-पड़ोस है लेकिन रजुआ के पास क्या है? रजुआ 'नाटा, गाल पिचके हुए, आँखें धँसी हुई, छाती की हड्डियाँ साफ बाँस की खपचियों तरह। पेट नांद की तरह फूला हुआ', जिसका कोई घर नहीं, परिवार और रिश्तेदारों में केवल एक चाचा। मुहल्ले में भिखमंगे की तरह सब की डाँट खाता, एक बची और सूखी-बासी रोटी के लिए सबकी बेगार करते घूमते रजुआ को प्राणवत्ता मिली अमरकांत की उस दृष्टि से जो उस सामान्य-से रजुआ में भी मानवीय जीवन की खोज करते हैं। मनुष्य कभी हार मानना नहीं जानता, हर परिस्थिति में जीना चाहता है, जीने की सतत इच्छा मनुष्य को अमर बनाती है। जीने की इच्छा के लिए विशिष्ट व्यक्ति होने की जरूरत नहीं है, सामान्य और सामान्य से भी नीचे जीने वाला आदमी भी विशिष्ट बन सकता है, रजुआ इसका उदाहरण है। कई बार मैं सोचता हूँ कि रजुआ के चरित्र की विशेषता क्या है? अमरकांत ने इस पात्र को चुना तो इसके मूल में क्या रहा होगा? इस प्रश्न का उत्तर कहानी में ही निहित है। रजुआ पूरे मुहल्ले की बेगारी करता है, चोर न होने पर भी मार खाता है, नीची जाति की युवा बहुओं से मजाक करता है, पगली को प्यार करता है, सिर पर कौआ बैठने पर टोटका करने के लिए अपनी मृत्यु का समाचार अपने चाचा के पास भिजवाता है - इन सब विवरणों का चर्वण जब-जब इस कहानी की बात आती है तो होता रहा है। इन सबके बीच क्या एकमात्र रजुआ है? मुझे लगता है कि ये सब मनुष्य की प्रवृति है, रजुआ की जगह कोई और होता तब भी वह यही करता क्योंकि वह दृष्टि जो संघर्ष में ही जीवन की सार्थकता देखती है, वह दृष्टि रजुआ को खड़ा करती है। यहाँ पात्र मुख्य नहीं है बल्कि लेखकीय दृष्टि और सरोकार हैं जो रजुआ जैसे पात्र को असाधारण चरित्र के रूप में खड़ा करते है। दरअसल, जरूरत है रजुआ जैसे पात्र के वर्ग चरित्र को खोजने की और वह दो घटनाओं में साफ दिखाई देता है। अपनी नारकीय स्थितियों में भी वह पगली से प्यार करता है, अपनी सीमा में आदमी जितना कर सकता है रजुआ भी करता है। लेकिन उसका मन टूटता है तब जब पगली के साथ वह किसी दूसरे आदमी को सोए देखता है। यह आदमी का मन और उसका विश्वास है। आदमी कितना भी गया-बीता हो वह जिसे प्यार करता है, नहीं चाहता कि उसे कोई और भी प्यार करे। यह आदमी के छोटे होने या बड़े होने से कम-बढ़ नहीं जाता, यह सनातन मानवीय प्रवृति है। रजुआ की क्या हैसियत कि वह अपने मन का कुछ कर सके इसलिए लफंगे उसे मारकर भगा देते हैं पर रजुआ के अंदर जो आदमी बैठा हुआ था वह तो दरक ही गया। इस दरक को अमरकांत देखते हैं, इसलिए कि उनकी नजर में रजुआ जैसा भी है एक आदमी है। यदि वह उसे कमजोर और दयनीय मानते तो शायद इस प्रसंग को रेखांकित न करते। उन्होंने बहुत कम शब्दों में उसकी इस मनःस्थिति को लिखा 'छत पर मार खाने के चार-पाँच दिन बाद रजुआ फिर मुहल्ले में आकर काम करने लगा था। लेकिन उसमें एक जबर्दस्त परिवर्तन यह हुआ कि उसका स्त्रियों के साथ छेड़खानी करके गधे की भाँति हिचकना-किलकना बंद हो गया।' यह मामूली परिवर्तन नहीं है, एक पगली के साथ इच्छित रूप से न सो पाने के कारण सारी औरतों से ही उसका मोहभंग हो गया। एक विशेष उम्र में अपनी समवयस्क औरतों से मजाक करने की प्रवृति के समाप्त हो जाने का अर्थ यह कि वह ऊर्जा और वह राग जो आदिम है, सनातन है अचानक सूख गया। परिस्थितियों की मार ने उसे हमेशा के लिए असमय ही समाप्त कर दिया। इसी के साथ दूसरी घटना यह हुई कि बरन की बहू को बुआ मानकर उसने अपनी बचत उसके पास सुरक्षित रखनी शुरू की। बरन की बहू के मन में बेईमानी आई और उसने पैसे लौटाने से मना कर दिया। एक के बाद दूसरा अविश्वास। एक प्रेम और दूसरा धन - मनुष्य के जीवन में स्त्री और पैसा दोनों अनिवार्य हैं, दोनों को पाने के लिए वह जी-जान से जुटता है - दोनों ने उसके विश्वास को तोड़ा। दुनिया में यदि विश्वास टूट जाए तो फिर बचता क्या है? रजुआ का मन अब बुरी तरह टूट चुका है। एक बड़े कहानीकार के रूप में अमरकांत के सामने भी यह चुनौती रही होगी कि वे अब ऐसे पात्र का क्या करें? निराशा में आदमी ईश्वर की शरण में जाता है, यह मानव नियति है। रजुआ बरन की बहू को दंड दिलवाने के लिए शनीचरी देवी की पूजा करता है, दाढ़ी रख लेता है और प्यार में असफल हो जाने के परिणामस्वरूप भगत हो जाता है, लोग अब उसे रज्जू भगत के नाम से पुकारने लगते हैं। यह अचानक आया परिवर्तन नहीं है। इस परिवर्तन को मानव नियति के संदर्भ में ही समझा जा सकता है। कहानी के आरंभ में कोई ऐसा संकेत नहीं है कि रजुआ ने कभी ईश्वर का नाम लिया हो, कभी मंदिर गया हो या और किसी प्रकार का धार्मिक उपक्रम किया हो। यह परिवर्तन निराशा में आया सार्वकालीन परिवर्तन है, जो उसके मनुष्य होने की गवाही देता है। ईश्वर की सत्ता के स्वीकार के मूल में मनुष्य की पराजय और निराशा की भावना ही है। जिस दिन वह यह मानने लग जाता है कि अब उसके किए कुछ नहीं होगा तब वह एक सर्वसत्तावान ईश्वर की कल्पना करता है और उससे अपने दुखों को दूर करने की प्रार्थना करने लगता है। रजुआ भी यही करता है। मैं जब-जब रजुआ के बारे में सोचता हूँ तो मुझे ये परिवर्तन ज्यादा बड़े दिखाई दिए हैं। इसके कारण भी रजुआ के जीवन में ही निहित हैं। यदि वह अन्य परिवर्तनों को महत्वपूर्ण मानता तो भूखे होने, चोर कहलाने, मार खाने या बीमार पड़ने पर भी ईश्वर को याद करता लेकिन अमरकांत ऐसा कहीं नहीं दिखाते। यदि ऐसा होता तो वे संकेत भी कर सकते थे पर रजुआ ने उन विपरीत स्थितियों में भी कभी असहाय अनुभव नहीं किया, उसका विश्वास मनुष्य और समाज पर बना रहा। विश्वास बचे रहने की अवस्था अकेले होने की अवस्था नहीं है रजुआ इस तथ्य से भली-भाँति परिचित था। इन सब विषम परिस्थितियों के बाद अचानक उसका विश्वास टूटता है और वह धर्म और धार्मिक पाखंडों की शरण में अपने विश्वास के जीवित होने की कल्पना करता है। यह परिवर्तन रजुआ जैसे आदमी के मानवीय पक्ष को समझने के लिए महत्वपूर्ण है इसलिए मुझे लगता है कि रजुआ संपूर्ण मनुष्य है - उसके कालजयी पात्र होने का यह प्रमाण है। इसलिए ही इस कहानी को बार-बार पढ़ने को मन करता है।

'मूस' तथा 'जिंदगी और जोंक' कहानियाँ उस वर्ग की हैं जिसके पास खोने के लिए कुछ नहीं है। समाज के निचले तबके के बदहाल, उपेक्षित, अकेले, बीमार तथा हारे-थके व्यक्तियों पर कालजयी कहानियाँ अमरकांत ही लिख सकते थे। ये ऐसी कहानियाँ हैं, जिन्हें पढ़कर हम अपने ही समाज के बहुसंख्यक लोगों के बीहड़ अनुभवों से दो-चार होकर शर्मसार होते हैं।

अमरकांत अभावों की जिंदगी में मानवीय गर्माहट के अद्भुत चितेरे हैं। समाज के निचले तबके के अभावों के चित्रण में उन्हें जितनी महारत हासिल है ऊपर के पायदान पर बैठे लोगों के चित्रण में भी उससे कम नहीं है। भारतीय समाज में छोटी जाति और अभावों का अनन्य रिश्ता है लेकिन बड़ी जाति और गरीबी के बारे में पढ़कर पहले थोड़ा चकित होते हैं और फिर विश्वास जमता है। विश्वास जमाने का काम कहानीकार करता है। कहानीकार के पास अनुभवों का जितना बड़ा जखीरा होगा, वह उतना ही विश्वास कायम करने में कामयाब होगा। अमरकांत के पास अकूत जखीरा है, केवल पोटली नहीं। 'दोपहर का भोजन' में वे निम्नमध्यवर्ग के मुंशी चंद्रिका प्रसाद की कहानी सुनाने के लिए प्रतीक रूप में दोपहर के भोजन को लेते हैं। दोपहर यानी दिन का मध्य यानी पूरा उजाला। इस उजाले में मकान किराया नियंत्रण विभाग से छँटनी कर निकाल दिए गए बाबू चंद्रिका प्रसाद की अभावोंभरी जिंदगी में फैले सन्नाटे से परिचय कराते हैं। तीन बच्चों के पिता और पैतालीस वर्ष की उम्र में नौकरी से छँटनी कर निकाल दिए गए बाबू चंद्रिका प्रसाद की पीड़ा और बच्चों के भूखे न सोने देने का दायित्व परंपरागत ढंग से घर-गृहस्थी में मगन उनकी पत्नी सिद्धेश्वरी निभा रही हैं। अमरकांत पूरी कहानी में पत्नी के औदार्य को चित्रित करते हैं। बच्चों से लेकर पति तक वह सामंजस्य बनाये रखने के लिए एक दूसरे के मुँह पर झूठी बड़ाई करती है। इसलिए कि वह जानती है अभाव संशय पैदा करते हैं। संशय से झगड़ा उत्पन्न होता है, वह पूरे परिवार को इस भावी आशंका से बचाती हैं। वह अभावों की छाया में भी चाहती हैं कि परिवार एक बना रहे, वह जिस प्रकार त्याग कर रही है उसी तरह पूरा परिवार एक दूसरे के लिए त्यागी और उदार बना रहे। कहानी का आरंभ और अंत मेरी बात की पुष्टि के लिए पर्याप्त है। कहानी के आरंभ में भूखे पेट पूरे परिवार के लिए खाना बनाने वाली सिद्धेश्वरी का चिंतित चित्र है 'सिद्धेश्वरी ने खाना बनाने के बाद चूल्हे को बुझा दिया और दोनों घुटनों के बीच सिर रखकर शायद पैर की उँगलियाँ या जमीन पर चलते चींटे-चींटियों को देखने लगी। अचानक उसे मालूम हुआ कि बहुत देर से उसे प्यास लगी है। वह मतवाले की तरह उठी और गगरे से लोटा-भर पानी लेकर गट-गट चढ़ा गई। खाली पानी उसके कलेजे में लग गया और वह हाय राम कहकर वहीं जमीन पर लेट गई।' कहना न होगा कि खाली पानी कलेजे में तब लगता है जब पेट एकदम खाली हो। सिद्धेश्वरी जो पूरे परिवार का खाना बना रही है और आगे चलकर वह सबको तृप्त करने का दायित्व निभा भूखे रहकर सुख का अनुभव करती है। यह भारतीय परिवारों में घर में बैठी माँ का सनातन चित्र है जो रात-दिन परिवार की चिंता तो कर रही है पर उसके हाथ में कुछ नहीं है। घर में उपलब्ध साधन उसकी सीमा हैं, उसे उन साधनों से ही घर को चलाना है। यह चिंता उस माँ की चिंता है, जिसके पति को नौकरी से निकाल दिया गया है, घर में आय का कोई अन्य स्रोत नहीं है। लेकिन वह चाहती है कि कोई भूखा न रहे अपनी रोटी भी दूसरों को खिलाकर परिवार के सानंद रहने की कामना करने वाली माँ का यह चित्र उदात्त चित्र है इसलिए बार-बार इस छोटी-सी कहानी को पढ़ने को मन करता है। अमरकांत जिस प्रकार घर की गरीबी का चित्र प्रस्तुत करते हैं, इससे अधिक मार्मिक चित्र अन्यत्र नहीं मिलता। भूखे पेट चिंता में घुल रही सिद्धेश्वरी की चेतना लौटती है तो वह देखती है 'आधे घंटे तक वहीं उसी तरह पड़ी रहने के बाद उसके जी में जी आया। वह बैठ गई, आँखों को मल-मलकर इधर-उधर देखा और फिर उसकी दृष्टि ओसारे में अध-टूटे खटोले पर सोए अपने छह वर्षीय लड़के प्रमोद पर जम गई। लड़का नंग-धड़ंग पड़ा था। उसके गले तथा छाती की हड्डियाँ साफ दिखाई देती थीं। उसके हाथ पैर बासी ककड़ियों की तरह सूखे तथा बेजान पड़े थे और उसका पेट हंड़िया की तरह फूला हुआ था। उसका मुख खुला हुआ था और उस पर अनगिनत मक्खियाँ उड़ रही थीं।' कहानी का यह दूसरा चित्र है। अमरकांत कहानी कहते ही नहीं वरन् एक सिद्ध कलाकार की तरह चित्र बनाते हैं, शब्दों से घटना के मर्म को चाक्षुष करते हैं। यह कला इतनी मार्मिक है कि कहानी पढ़ते हुए हम सिद्धेश्वरी के दुख में शामिल ही नहीं होते बल्कि उसके साथ दुखी भी होते हैं। भूखी माँ अपने सोते हुए बेटे को देखती है, सोते बच्चे अच्छे लगते हैं लेकिन तब जब उनका पेट भरा हुआ हो और वे अपने सपनों में खोए हुए हों। पर यहाँ तो बच्चा जिस अवस्था में सो रहा है उसे देखकर कोई माँ खुश नहीं हो सकती, सिद्धेश्वरी भी नहीं। पहले चित्र में भूखी माँ और दूसरे चित्र में कमजोर और भूखा बेटा - दोनों चित्र हिला देते हैं। कहानी के अंत में एक तीसरा चित्र भी है जो अपने निहितार्थ में संपूर्ण है 'सारा घर मक्खियों से भनभन कर रहा था। आँगन की अलगनी पर एक गंदी साड़ी टँगी थी, जिसमें पैबंद लगे हुए थे। दोनों बड़े लड़कों का कहीं पता नहीं था। बाहर की कोठरी में मुंशीजी औंधे मुँह होकर निश्चिंतता के साथ सो रहे थे, जैसे डेढ़ महीने पूर्व मकान-किराया-नियंत्रण विभाग की क्लर्की से उनकी छँटनी न हुई हो और शाम को उनको काम की तलाश में कहीं जाना न हो।'

यह टिप्पणी कहानी को और बड़ा बनाती है यानी पूरे घर की सारी चिंता केवल सिद्धेश्वरी के जिम्मे हैं बाकी सब अपनी-अपनी तरह से संतुष्ट और सुखी हैं। अमरकांत की कहानियों में स्त्रियों की जो दशा है, उस पर कम लोगों का ध्यान गया है। ये स्त्रियाँ ही हैं जो आर्थिक अभावों से जूझते हुए परिवार को बचाए रखे हुए हैं। भविष्य के सपने और वर्तमान अवस्था की दयनीयता के बीच स्त्री के चुपचाप संघर्ष का भी पाठ होना चाहिए जिससे स्त्री मुक्ति के नए रास्ते खुलें।

मेरे इस आलेख में अमरकांत की कई ऐसी कहानियाँ छूट गई हैं जो विभिन्न प्रसंगों में बार-बार याद की जाती रही हैं लेकिन मेरा उद्देश्य अभाव, उपेक्षा, बीमारी तथा अन्य विषम स्थितियों में रह रहे पात्रों को उनकी संपूर्णता में रेखांकित करने का था जो हमारे समाज और हमारे बीच रहकर भी इस प्रकार का जीवन जीने को विवश हैं लेकिन हमारा ध्यान उनकी ओर नहीं जाता। अमरकांत अपने सरोकारों के साथ उन पात्रों को उनकी अच्छाई और बुराई के साथ खड़ा करते हैं, इसलिए वे अपने समय के महत्वपूर्ण कहानीकार हैं।

[ श्रेणी : आलोचना। लेखक : सूरज पालीवाल ]