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उधेड़बुन : आत्मबोध में डूबा हुआ कवि - राजेश कुमार पाण्डेय

[समीक्षित पुस्तक : उधेड़बुन (कविता संग्रह)। लेखक : राहुल देव। प्रकाशक : अंजुमन प्रकाशन, इलाहाबाद। प्रकाशन वर्ष : 2014 । पृष्ठ - 112 । मूल्य: 20 /-]

‘उधेड़बुन’ राहुल देव का पहला कविता संग्रह है | श्री देव हिंदी साहित्य के एक उदीयमान कवि हैं | किशोरावस्था में ही रचित यह साहित्य कवि की साहित्यिक प्रतिभा को सिद्ध करने में पूर्णतः समर्थ है | 

प्रस्तुत कविता संग्रह की कविताएँ कवि की प्रारंभिक रचनाएँ होने पर भी अपने कथ्य एवं शिल्प की दृष्टि से उत्कृष्ट हैं | आपके पास शब्दों का विशाल भण्डार है | इस संग्रह की रचनाओं में आपके व्यापक दृष्टिकोण एवं भावानुवर्तिनी भाषा का दिग्दर्शन प्राप्त होता है | प्रस्तुत संकलन में कवि ने अपने आस-पास के परिवेश के प्रभाव, अपनी संवेदनाओं की सच्चाई और हृदय के भावों को अपनी 49 कविताओं के माध्यम से प्रस्तुत किया है | कवि द्वारा अपनी काव्य यात्रा की चिंतनधारा में जीवन के कटु एवं तिक्त अनुभवों को बड़ी बारीकी से विश्लेषित करते हुए जन-मानस तक पहुंचाने का प्रयत्न किया गया है | आत्मबोध में डूबा हुआ कवि का किशोरवय मन अन्याय तथा कदाचार का विरोधी है | वह अव्यक्त परमेश्वर से साक्षत्कार करने का इच्छुक है | जीवन की गतिशीलता कवि के दार्शनिक दृष्टिकोण को व्यक्त करती है | यहाँ तक कि उसे ओस की एक छोटी सी बूंद में भी अनंत संभावनाएं नज़र आने लगतीं हैं | बूँद को जीवन की गति का प्रतीक बताते हुए कवि का कथन है- ‘बूँद / पूर्ण है स्वयं में / समेट सकती है विश्व को / स्वयं में /.................../ओस की वह बूँद / प्रतीक है जीवन का / गति का !’ 

सामजिक विद्रूपता का एक चित्र दृष्टव्य है- ‘मैं शक्ति हूँ / प्रदूषण व् वैमनस्य से / क्षीण हो, विश्राम चाहती हूँ / इस गंदगी को देख / बहुत मैं ऊब गयी हूँ / हाँ शक्ति होकर भी अब मैं / दुर्बलता का प्रतीक बन गयी हूँ !’ 

दिनोंदिन बढ़ते हुए पाप और अत्याचारों को देखकर कवि हृदय कह उठता है – ‘हाय ! यह कैसा जगत दर्शन / जहाँ होता राक्षसी नर्तन / ले चलो मुझे यहाँ से / दूर कहीं / जहाँ हों निर्विकार, मिले शांति / बच सकें, सबके प्राण!’ 

सधी हुई भाषा तथा भावप्रवण अभिव्यक्ति कवि की निजी विशेषता है | जिसका यह उदाहरण उदृत करने का मैं लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूँ, देखिये- ‘गूंजे तेरा निनाद / उर में हर क्षण / विश्वानुराक्त / तम दूर करो इस मन का / अंतर्पथ कंटक शून्य करो / हरो विषाद, दो आह्लाद / मैं बलाक्रांत, भ्रांत, जड़मति / विमुक्ति, नव्यता, ओज मिले / परिणीत करो मेरा तन-मन / मैं नित-नत पद प्रणत / निःस्व तुम्हारी शरणागत !’ 

संग्रह की अंतिम कुछ कविताओं में कवि ने व्यंग्यविधा का भी अच्छा सम्मिश्रण किया है- ‘यहाँ आदमी / जो सोचता है वो करता नहीं / और जो सोचता है वो करता नहीं / .../ छुटपन में सोचे गये सपने / टूट जाते हैं भुंजे हुए पापड़ के समान / और हम उन्हें चबा जाते हैं / समय की चटनी के साथ .......’ 

इस प्रकार प्रस्तुत संग्रह की समस्त कविताएँ कवि के प्रभावी एवं काव्यात्मक भाषा विन्यास से युक्त सृजन की ऊँचाई को सिद्ध करने में सक्षम हैं | मुझे विश्वास है कि राहुल देव की इस कृति का हिंदी साहित्य जगत अत्यंत हर्ष एवं उत्साह के साथ स्वागत करेगा ! 

[समीक्षक : डॉ राजेश कुमार पाण्डेयवरिष्ठ प्रवक्ता- हिंदी विभागआनंदी देवी इंटर कॉलेज, सीतापुर, उ. प्र. ]