'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

प्यासी माँ / माया मृग

माया मृग
रेगिस्तान में अन्तःसलिला की अवधारणा पर आधारित

ओ मरु माँ!
तुम प्यासी हो ना?
सदियों से अनबुझी है
ये तुम्हारी प्यास माँ
लेकिन अभी तू
मत हो ‘निरास’[1] माँ
तू जन्मदात्री है
जानती है माँ
प्रसव-पीड़ा बिन भला
जीवन जन्मता है क्या?
पीडा को झेल माँ
समझ ले इसे तू
नव जीवन का खेल माँ
किलकारियों का ध्यान कर
आँख बंद कर ले
साँस तेज़ होने दे पर
सिसकी मंद कर ले
आँखों में सपने ले-ले
होंठों को भींच ले माँ
आँसू का नीर पी ले
भीतर को सींच ले माँ
सदियों सही है पीड़ा
बस झेल और पल-भर
रेतीली कूख [2] से माँ
तू जीवन पैदा कर ।

शब्दार्थ:
  1. निराश
  2. कोख
[ संकलन : माँ । माया मृग ]