'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

संग्राम / प्रेमचंद

प्रेमचंद 

अनुक्रम

अंक - एक 
पहला दृश्य

प्रभात का समय। सूर्य की सुनहरी किरणें खेतों और वृक्षों पर पड़ रही हैं। वृक्षपुंजों में पक्षियों का कलरव हो रहा है। बसंत ऋतु है। नई-नई कोपलें निकल रही हैं। खेतों में हरियाली छाई हुई है। कहीं-कहीं सरसों भी फूल रही है। शीत-बिंदु पौधों पर चमक रहे हैं।

हलधर : अब और कोई बाधा न पड़े तो अबकी उपज अच्छी होगी। कैसी मोटी-मोटी बालें निकल रही हैं।

राजेश्वरी : यह तुम्हारी कठिन तपस्या का फल है।

हलधर : मेरी तपस्या कभी इतनी सफल न हुई थी। यह सब तुम्हारे पौरे की बरकत है।

राजेश्वरी : अबकी से तुम एक मजूर रख लेना। अकेले हैरान हो जाते

हो।

हलधर : खेत ही नहीं है। मिलें तो अकेले इसके दुगुने जोत सकता हूँ।

राजेश्वरी : मैं तो गाय जरूर लूंगी। गऊ के बिना घर सूना मालूम होता

है।

हलधर : मैं पहले तुम्हारे लिए कंगन बनवाकर तब दूसरी बात करूंगा। महाजन से रूपये ले लूंगा। अनाज तौल दूंगा।

राजेश्वरी : कंगन की इतनी क्या जल्दी है कि महाजन से उधर लो।अभी पहले का भी तो कुछ देना है।

हलधर : जल्दी क्यों नहीं है। तुम्हारे मैके से बुलावा आएगा ही। किसी नए गहने बिना जाओगी तो तुम्हारे गांव-घर के लोग मुझे हंसेंगे कि नहीं ?

राजेश्वरी : तो तुम बुलावा फेर देना। मैं करज लेकर कंगन न बनवाऊँगी। हां, गाय पालना जरूरी है। किसान के घर गोरस न हो तो किसान कैसा तुम्हारे लिए दूध-रोटी का कलेवा लाया करूंगी। बड़ी गाय लेना, चाहे दाम कुछ बेशी देना पड़ जाए।

हलधर : तुम्हें और हलकान न होना पड़ेगा। अभी कुछ दिन आराम कर लो, फिर तो यह चक्की पीसनी ही है।

राजेश्वरी : खेलना-खाना भाग्य में लिखा होता तो सास-ससुर क्यों सिधार जाते ? मैं अभागिन हूँ। आते-ही-आते उन्हें चट कर गई। नारायण दें तो उनकी बरसी धूम से करना।

हलधर : हां, यह तो मैं पहले ही सोच चुका हूँ, पर तुम्हारा कंगन बनना भी जरूरी है। चार आदमी ताने देने लगेंगे तो क्या करोगी ?

राजेश्वरी : इसकी चिंता मत करो, मैं उनका जवाब दे लूंगी लेकिन मेरी

तो जाने की इच्छा ही नहीं है। जाने और बहुएं कैसे मैके जाने को व्याकुल होती हैं, मेरा तो अब वहां एक दिन भी जी न लगेगी। अपना घर सबसे अच्छा लगता है। अबकी तुलसी का चौतरा जरूर बनवा देना, उसके आस-पास बेला, चमेली, गेंदा और गुलाब के फूल लगा दूंगी तो आंगन की शोभा कैसी बढ़ जाएगी!

हलधर : वह देखो, तोतों का झुंड मटर पर टूट पड़ा।

राजेश्वरी : मेरा भी जी एक तोता पालने को चाहता है। उसे पढ़ाया करूंगी।

हलधर गुलेल उठाकर तोतों की ओर चलाता है।

राजेश्वरी : छोड़ना मत, बस दिखाकर उड़ा दो।

हलधर : वह मारा ! एक फिर गया।

राजेश्वरी : राम-राम, यह तुमने क्या किया? चार दानों के पीछे उसकी जान ही ले ली। यह कौन-सी भलमनसी है ?

हलधर : (लज्जित होकर) मैंने जानकर नहीं मारा।

राजेश्वरी : अच्छा तो इसी दम गुलेल तोड़कर फेंक दो। मुझसे यह पाप नहीं देखा जाता। किसी पशु-पक्षी को तड़पते देखकर मेरे रोयें खड़े हो जाते हैं। मैंने तो दादा को एक बार बैल की पूंछ मरोड़ते देखा था, रोने लगी। तब दादा ने वचन दिया कि अब कभी बैलों को न मारूंगा। तब जाके चुप हुई मेरे गांव में सब लोग औंगी से बैलों को हांकते हैं। मेरे घर कोई मजूर भी औंगी नहीं चला सकता।

हलधर : आज से परन करता हूँ कि कभी किसी जानवर को न मारूंगा।

फत्तू मियां का प्रवेश।

फत्तू : हलधर, नजर नहीं लगाता, पर अबकी तुम्हारी खेती गांव भर से उसपर है। तुमने जो आम लगाए हैं वे भी खूब बौरे हैं।

हलधर : दादा, यह सब तुम्हारा आशीर्वाद है। खेती न लगती तो काका की बरसी कैसे होती ?

फत्तू : हां बेटा, भैया का काम दिल खोलकर करना।

हलधर : तुम्हें मालूम है दादा, चांदी का क्या भाव है। एक कंगन बनवाना था।

फत्तू : सुनता हूँ अब रूपये की रूपये-भर हो गई है। कितने की चांदी लोगे ?

हलधर : यही कोई चालीस-पैंतालीस रूपये की।

फत्तू : जब कहना चलकर ले दूंगा। हां, मेरा इरादा कटरे जाने का है। तुम भी चलो तो अच्छा। एक अच्छी भैंस लाना । गुड़ के रूपये तो अभी रखे होंगे न ?

हलधर : कहां दादा, वह सब तो कंचनसिंह को दे दिए । बीघे-भर भी तो न थी, कमाई भी अच्छी न हुई थी, नहीं तो क्या इतनी जल्दी पेल-पालकर छुट्टी पा जाता ?

फत्तू : महाजन से तो कभी गला ही नहीं छूटता।

हलधर : दो साल भी तो लगातार खेती नहीं जमती, गला कैसे छूटे!

फत्तू : यह घोड़े पर कौन आ रहा है ? कोई अफसर है क्या ?

हलधर : नहीं, ठाकुर साहब तो हैं। घोड़ा नहीं पहचानते ? ऐसे सच्चे पानी का घोड़ा दस-पांच कोस तक नहीं है।

फत्तू : सुना, एक हजार दाम लगते थे पर नहीं दिया ।

हलधर : अच्छा जानवर बड़े भागों से मिलता है। कोई कहता था। अबकी घुड़दौड़ में बाजी जीत गया। बड़ी-बड़ी दूर से घोड़े आए थे, पर कोई इसके सामने न ठहरा । कैसा शेर की तरह गर्दन उठा के चलता है।

फत्तू : ऐसे सरदार को ऐसा ही घोड़ा चाहिए । आदमी हो तो ऐसा हो, अल्लाह ने इतना कुछ दिया है, पर घमंड छू तक नहीं गया। एक बच्चा भी जाए तो उससे प्यार से बातें करते हैं। अबकी ताऊन के दिनों में इन्होंने दौड़-धूप न की होती तो सैकड़ों जानें जातीं ।

हलधर : अपनी जान को तो डरते ही नहीं इधर ही आ रहे हैं। सबेरे-सबेरे भले आदमी के दर्शन हुए।

फत्तू : उस जन्म के कोई महात्मा हैं, नहीं तो देखता हूँ जिसके पास चार पैसे हो गए वह यही सोचने लगता है कि किसे पीस के पी जाऊँ। एक बेगार भी नहीं लगती, नहीं तो पहले बेगार देते-देते धुर्रे उड़ जाते थे। इसी गरीबपरवर की बरकत है कि गांवों में न कोई कारिंदा है, न चपरासी, पर लगान नहीं रूकता। लोग मीयाद के पहले ही दे आते हैं। बहुत गांव देखे पर ऐसा ठाकुर नहीं देखा ।

सबलसिंह घोड़े पर आकर खड़ा हो जाता है। दोनों आदमी झुक-झुककर सलाम करते हैं। राजेश्वरी घूंघट निकाल लेती है।

सबल : कहो बड़े मियां, गांव में सब खैरियत है न ?

फत्तू : हुजूर के अकबाल से सब खैरियत है।

सबल : फिर वही बात । मेरे अकबाल को क्यों सराहते हो, यह क्यों नहीं कहते कि ईश्वर की दया से या अल्लाह के फजल से खैरियत है। अबकी खेती तो अच्छी दिखाई देती है ?

फत्तू : हां सरकार, अभी तक तो खुदा का फजल है।

सबल : बस, इसी तरह बातें किया करो। किसी आदमी की खुशामद मत करो, चाहे वह जिले का हाकिम ही क्यों न हो, हां, अभी किसी अफसर का दौरा तो नहीं हुआ ?

फत्तू : नहीं सरकार, अभी तक तो कोई नहीं आया।

सबल : और न शायद आएगी। लेकिन कोई आ भी जाए तो याद रखना, गांव से किसी तरह की बेगार न मिले। साफ कह देना, बिना जमींदार के हुक्म के हम लोग कुछ नहीं दे सकते। मुझसे जब कोई पूछेगा तो देख लूंगा। (मुस्कराकर) हलधर ! नया गौना लाए हो, हमारे घर बैना नहीं भेजा ?

हलधर : हुजूर, मैं किस लायक हूँ।

सबल : यह तो तुम तब कहते जब मैं तुमसे मोतीचूर के लड्डू या घी के खाजे मांगता। प्रेम से शीरे और सत्तू के लड्डू भेज देते तो मैं उसी को धन्य-भाग्य कहता। यह न समझो कि हम लोग सदा घी और मैदे खाया करते हैं। मुझे बाजरे की रोटियां और तिल के लड्डू और मटर के चबेना कभी-कभी हलवा और मुरब्बे से भी अच्छे लगते हैं। एक दिन मेरी दावत करो, मैं तुम्हारी नयी दुलहिन के हाथ का बनाया हुआ भोजन करना चाहता हूँ। देखें यह मैके से क्या गुन सीख कर आई है। मगर खाना बिल्कुल किसानों का-सा हो, अमीरों का खाना बनवाने की फिक्रमत करना।

हलधर : हम लोगों के लिट्टे सरकार को पसंद आएंगे ?

सबल : हां, बहुत पसंद आएंगे।

हलधर : जब हुक्म हो,

सबल : मेहमान के हुक्म से दावत नहीं होती। खिलाने वाला अपनी मर्जी से तारीख और वक्त ठीक करता है। जिस दिन कहो, आऊँ। फत्तू, तुम बतलाओ, इसकी बहू काम-काज में चतुर है न ? जबान की तेज तो नहीं है ?

फत्तू : हुजूर, मुंह पर क्या बखान करूं, ऐसी मेहनतिन औरत गांव में और नहीं है। खेती का तार-तौर जितना यह समझती है उतना हलधर भी नहीं समझता। सुशील ऐसी है कि यहां आए आठवां महीना होता है, किसी पड़ोसी ने आवाज नहीं सुनी।

सबल : अच्छा तो मैं अब चलूंगा, जरा मुझे सीधे रास्ते पर लगा दो, नहीं तो यह जानवर खेतों को रौंद डालेगा। तुम्हारे गांव से मुझे साल में पंद्रह सौ रूपये मिलते हैं। इसने एक महीने में पांच हजार रूपये की बाजी मारी। हलधर, दावत की बात भूल न जाना।

फत्तू और सबलसिंह जाते हैं।

राजेश्वरी : आदमी काहे को है, देवता हैं। मेरा तो जी चाहता था। उनकी बातें सुना करूं। जी ही नहीं भरता था।एक हमारे गांव का जमींदार है कि प्रजा को चैन नहीं लेने देता। नित्य एक-न -एक बेगार, कभी बेदखली, कभी जागा, कभी कुड़की, उसके सिपाहियों के मारे छप्पर पर कुम्हड़े-कद्दू तक नहीं बचने पाते। औरतों को राह चलते छेड़ते हैं। लोग रात-दिन मनाया करते हैं कि इसकी मिट्टी उठे। अपनी सवारी के लिए हाथी लाता है, उसका दाम असामियों से वसूल करता है। हाकिमों की दावत करता है, सामान गांव वालों से लेता है।

हलधर : दावत सचमुच करूं कि दिल्लगी करते थे ?

राजेश्वरी : दिल्लगी नहीं करते थे, दावत करनी होगी। देखा नहीं, चलते-चलते कह गए। खाएंगे तो क्या, बड़े आदमी छोटों का मान रखने के लिए ऐसी बातें किया करते हैं, पर आएंगे जरूर।

हलधर : उनके खाने लायक भला हमारे यहां क्या बनेगा ?

राजेश्वरी : तुम्हारे घर वह अमीरी खाना खाने थोड़े ही आएंगी। पूरी-मिठाई तो नित्य ही खाते हैं। मैं तो कुटे हुए जौ की रोटी, सावां की महेर, बथुवे का साफ, मटर की मसालेदार दाल और दो-तीन तरह की तरकारी बनाऊँगी। लेकिन मेरा बनाया खाएंगे ? ठाकुर हैं न ?

हलधर : खाने-पीने का इनको कोई विचार नहीं है। जो चाहे बना दे। यही बात इनमें बुरी है। सुना है अंग्रेजों के साथ कलपघर में बैठकर खाते हैं।

राजेश्वरी : ईसाई मत में आ गए ?

हलधर : नहीं, असनान, ध्यान सब करते हैं। गऊ को कौरा दिए बिना कौर नहीं उठाते। कथा-पुराण सुनते हैं। लेकिन खाने-पीने में भ्रष्ट हो गए हैं।

राजेश्वरी : उह, होगा, हमें कौन उनके साथ बैठकर खाना है। किसी दिन बुलावा भेज देना । उनके मन की बात रह जाएगी।

हलधर : खूब मन लगा के बनाना।

राजेश्वरी : जितना सहूर है उतना करूंगी। जब वह इतने प्रेम से भोजन करने आएंगे तो कोई बात उठा थोड़े ही रखूंगी। बस, इसी एकादशी को बुला भेजो, अभी पांच दिन हैं।

हलधर : चलो, पहले घर की सगाई तो कर डालें।

दूसरा दृश्य

सबलसिंह अपने सजे हुए दीवानखाने में उदास बैठे हैं। हाथ में एक समाचार-पत्र है, पर उनकी आंखें दरवाजे के सामने बाग की तरफ लगी हुई हैं।

सबलसिंह : (आप-ही-आप) देहात में पंचायतों का होना जरूरी है। सरकारी अदालतों का खर्च इतना बढ़ गया है कि कोई गरीब आदमी वहां न्याय के लिए जा ही नहीं सकता। जार-सी भी कोई बात कहनी हो तो स्टाम्प के बगैर काम नहीं चल सकता। उसका कितना सुडौल शरीर है, ऐसा जान पड़ता है कि एक-एक अंग सांचे में ढला है। रंग कितना प्यारा है, न इतना गोरा कि आंखों को बुरा लगे, न इतना सांवला होगा, मुझे इससे क्या मतलबब वह परायी स्त्री है, मुझे उसके रूप-लावण्य से क्या वास्ता। संसार में एक-से-एक सुंदर स्त्रियां हैं, कुछ यही एक थोड़ी है? ज्ञानी उससे किसी बात में कम नहीं, कितनी सरल ह्रदया, कितनी मधुर-भाषिणी रमणी है। अगर मेरा जरा-सा इशारा हो तो आग में कूद पड़े। मुझ पर उसकी कितनी भक्ति, कितना प्रेम है। कभी सिर में दर्द भी होता है तो बावली हो जाती है। अब उधर मन को जाने ही न दूंगा।

कुर्सी से उठकर आल्मारी से एक ग्रंथ निकालते हैं, उसके दो-चार पन्ने इधर-उधर से उलटकर पुस्तक को मेज पर रख देते हैं और फिर कुर्सी पर जा बैठते हैं। अचलसिंह हाथ में एक हवाई बंदूक लिए दौड़ा आता है।

अचल : दादाजी, शाम हो गई। आज घूमने न चलिएगा ?

सबल : नहीं बेटा ! आज तो जाने का जी नहीं चाहता। तुम गाड़ी जुतवा लो।यह बंदूक कहां पाई ?

अचल : इनाम में. मैं दौड़ने में सबसे अव्वल निकला। मेरे साथ कोई पच्चीस लड़के दौड़े थे।कोई कहता था।, मैं बाजी मारूंगा, कोई अपनी डींग मार रहा था।जब दौड़ हुई तो मैं सबसे आगे निकला, कोई मेरे गर्द को भी न पहुंचा, अपना-सा मुंह लेकर रह गए। इस बंदूक से चाहूँ तो चिड़िया मार लूं।

सबल : मगर चिड़ियों का शिकार न खेलना।

अचल : जी नहीं, यों ही बात कहता था। बेचारी चिड़ियों ने मेरा क्या बिगाड़ा है कि उनकी जान लेता गिरूं। मगर जो चिड़ियां

दूसरी चिड़ियों का शिकार करती हैं उनके मारने में तो कोई पाप नहीं है।

सबल : (असमंजस में पड़कर) मेरी समझ में तो तुम्हें शिकारी चिड़ियों को भी न मारना चाहिए । चिड़ियों में कर्म-अकर्म का ज्ञान नहीं होता। वह जो कुछ करती हैं केवल स्वभाव-वश करती हैं, इसलिए वह दण्ड की भागी नहीं हो सकती।

अचल : कुत्ता कोई चीज चुरा ले जाता है तो क्या जानता नहीं कि मैं बुरा कर रहा हूँ। चुपके-चुपके, पैर दबाकर इधर-उधर चौकन्नी आंखों से ताकता हुआ जाता है, और किसी आदमी की आहट पाते ही भाग खड़ा होता है। कौवे का भी यही हाल है। इससे तो मालूम होता है कि पशु-पक्षियों को भी भले-बुरे का ज्ञान होता है¼ तो फिर उनको दंड क्यों न दिया जाए ?

सबल : अगर ऐसा ही हो तो हमें उनको दंड देने का क्या अधिकार

है? हालांकि इस विषय में हम कुछ नहीं कह सकते कि शिकारी चिड़ियों में वह ज्ञान होता है, जो कुत्ते या कौवे में है या नहीं

अचल : अगर हमें पशु-पक्षी, चोरों को दंड देने का अधिकार नहीं है तो मनुष्य में चोरों को क्यों ताड़ना दी जाती है ? वह जैसा करेंगे उसके फल आप पाएंगे, हम क्यों उन्हें दंड दें ?

सबल : (मन में) लड़का है तो नन्हा-सा बालक मगर तर्क खूब करता है। (प्रकट) बेटा ! इस विषय में हमारे प्राचीन ऋषियों ने बड़ी मार्मिक व्यवस्थाएं की हैं, अभी तुम न समझ सकोगी। जाओ सैर कर आओ, ओरवरकोट पहन लेना, नहीं तो सर्दी लग जाएगी।

अचल : मुझे वहां कब ले चलिएगा जहां आप कल भोजन करने गए थे? मैं भी राजेश्वरी के हाथ का बनाया हुआ खाना खाना चाहता हूँ। आप चुपके से चले गए, मुझे बुलाया तक नहीं, मेरा तो जी चाहता है कि नित्य गांव ही में रहता, खेतों में घूमा करता।

सबल : अच्छा, अब जब वहां जाऊँगा तो तुम्हें भी साथ ले लूंगा।

अचलसिंह चला जाता है।

सबल : (आप-ही-आप) लेख का दूसरा पाइंट (मुद्रा) क्या होगा? अदालतें सबलों के अन्याय की पोषक हैं। जहां रूपयों के द्वारा फरियाद की जाती हो, जहां वकीलों?बैरिस्टरों के मुंह से बात की जाती हो, वहां गरीबों की कहां पैठ ? यह अदालत नहीं, न्याय की बलिवेदी है। जिस किसी राज्य की अदालतों का यह हाल हो। जब वह थाली परस कर मेरे सामने लाई तो मुझे ऐसा मालूम होता था। जैसे कोई मेरे ह्रदय को खींच रहा हो, अगर उससे मेरा स्पर्श हो जाता तो शायद मैं मूर्च्र्छित हो जाता। किसी उर्दू कवि के शब्दों में यौवन फटा पड़ता था। कितना कोमल गात है, न जाने खेतों में कैसे इतनी मेहनत करती है। नहीं, यह बात नहीं खेतों में काम करने ही से उसका चम्पई रंग निखर कर कुंदन हो गया है। वायु और प्रकाश ने उसके सौंदर्य को चमका दिया है। सच कहा है हुस्न के लिए गहनों की आवश्यकता नहीं उसके शरीर पर कोई आभूषण न था।, किंतु सादगी आभूषणों से कहीं ज्यादा मनोहारिणी थी। गहने सौंदर्य की शोभा क्या बढ़ाएंगे, स्वयं अपनी शोभा बढ़ाते हैं। उस सादे व्यंजन में कितना स्वाद था ? रूप-लावण्य ने भोजन को भी स्वादिष्ट बना दिया था। मन फिर उधर गया, यह मुझे क्या हो गया है। यह मेरी युवावस्था नहीं है कि किसी सुंदरी को देखकर लट्टू हो जाऊँ, अपना प्रेम हथेली पर लिए प्रत्येक सुंदरी स्त्री की भेंट करता गिरूं। मेरी प्रौढ़ावस्था है, पैंतीसवें वर्ष में हूँ। एक लड़के का बाप हूँ जो छ: -सात वर्षों में जवान होगी। ईश्वर ने दिए होते तो चार-पांच संतानों का पिता हो सकता था।यह लोलुपता है, छिछोरापन है। इस अवस्था में, इतना विचारशील होकर भी मैं इतना मलिन-ह्रदय हो रहा हूँ। किशोरावस्था में तो मैं आत्मशुद्वि पर जान देता था।, फूंक-फूंककर कदम रखता था।, आदर्श जीवन व्यतीत करता था। और इस अवस्था में जब मुझे आत्मचिंतन में मग्न होना चाहिए, मेरे सिर पर यह भूत सवार हुआ है। क्या यह मुझसे उस समय के संयम का बदला लिया जा रहा है। अब मेरी परीक्षा की जा रही है ?

ज्ञानी का प्रवेश।

ज्ञानी : तुम्हारी ये सब किताबें कहीं छुपा दूं ? जब देखो तब एक-न -एक पोथा। खोले बैठे रहते हो, दर्शन तक नहीं होते।

सबल : तुम्हारा अपराधी मैं हूँ, जो दंड चाहे दो। यह बेचारी पुस्तकें बेकसूर हैं।

ज्ञानी : गुलबिया आज बगीचे की तरफ गई थी। कहती थी, आज वहां कोई महात्मा आए हैं। सैकड़ों आदमी उनके दर्शनों को जा रहे हैं। मेरी भी इच्छा हो रही है कि जाकर दर्शन कर आऊँ।

सबल : पहले मैं आकर जरा उनके रंग-ढ़ंग देख लूं तो फिर तुम जाना। गेरूए कपड़े पहनकर महात्मा कहलाने वाले बहुत हैं।

ज्ञानी : तुम तो आकर यही कह दोगे कि वह बना हुआ है, पाखण्डी है, धूर्त है, उसके पास न जाना। तुम्हें जाने क्यों महात्माओं से चिढ़ है।

सबल : इसीलिए चिढ़ है कि मुझे कोई सच्चा साधु नहीं दिखाई देता।

ज्ञानी : इनकी मैंने बड़ी प्रशंसा सुनी है। गुलाबी कहती थी कि उनका मुंह दीपक की तरह दमक रहा था।सैकड़ों आदमी घेरे हुए थे पर वह किसी से बात तक न करते थे।

सबल : इससे यह तो साबित नहीं होता कि वह कोई सिद्व पुरूष हैं। अशिष्टता महात्माओं का लक्षण नहीं है।

ज्ञानी : खोज में रहने वाले को कभी-कभी सिद्व पुरूष भी मिल जाते हैं। जिसमें श्रद्वा नहीं है उसे कभी किसी महात्मा से साक्षात् नहीं हो सकता। तुम्हें संतान की लालसा न हो पर मुझे तो है। दूध-पूत से किसी का मन भरते आज तक नहीं सुना।

सबल : अगर साधुओं के आशीर्वाद से संतान मिल सकती तो आज संसार में कोई निस्संतान प्राणी खोजने से भी न मिलता। तुम्हें भगवान् ने एक पुत्र दिया है। उनसे यही याचना करो कि उसे कुशल से रखें। हमें अपना जीवन अब सेवा और परोपकार की भेंट करना चाहिए ।

ज्ञानी : (चिढ़कर) तुम ऐसी निर्दयता से बातें करने लगते हो इसी

से कभी इच्छा नहीं होती कि तुमसे अपने मन की बात कहूँ। लो, अपनी किताबें पढ़ो इनमें में तुम्हारी जान बसती है, जाती हूँ

सबल : बस रूठ गई।चित्रकारों ने क्रोध की बड़ी भयंकर कल्पना की है, पर मेरे अनुभव से यह सिद्व होता है कि सौंदर्य क्रोध ही का रूपांतर है। कितना अनर्थ है कि ऐसी मोहिनी मूर्ति को इतना विकराल स्वरूप दे दिया जाए ?

ज्ञानी : (मुस्कराकर) नमक-मिर्च लगाना कोई तुमसे सीख ले

मुझे भोली पाकर बातों में उड़ा देते हो,लेकिन आज मैं न मानूंगी

सबल : ऐसी जल्दी क्या है ? मैं स्वामीजी को यहीं बुला लाऊँगा, खूब जी भरकर दर्शन कर लेना। वहां बहुत से आदमी जमा होंगे, उनसे बातें करने का भी अवसर न मिलेगी। देखने वाले हंसी उड़ाएंगे कि पति तो साहब बना गिरता है और स्त्री साधुओं के पीछे दौड़ा करती है।

ज्ञानी : अच्छा, तो कब बुला दोगे ?

सबल : कल पर रखो

ज्ञानी चली जाती है।

सबलसिंह : (आज-ही-आप) संतान की क्यों इतनी लालसा होती है ? जिसके संतान नहीं है वह अपने को अभागा समझता है, अहर्निश इसी क्षोभ और चिंता में डूबा रहता है। यदि यह लालसा इतनी व्यापक न होती तो आज हमारा धार्मिक जीवन कितना शिथिल, कितना नीरव होता। न तीर्थयात्राओं की इतनी धूम होती, न मंदिरों की इतनी रौनक, न देवताओं में इतनी भक्ति, न साधु-महात्माओं पर इतनी श्रद्वा, न दान और व्रत की इतनी धूम। यह सब कुछ संतान-लालसा का ही चमत्कार है ! खैर कल चलूंगा, देखूं इन स्वामीजी के क्या रंग-ढ़ंग हैं। अदालतों की बात सोच रहा था।यह आक्षेप किया जाता है कि पंचायतें यथार्थ न्याय न कर सकेंगी¼ पंच लोग मुंह?देखी करेंगे और वहां भी सबलों की ही जीत होगी। इसका निवारण यों हो सकता है कि स्थायी पंच न रखे जाएं। जब जरूरत हो, दोनों पक्षों के लोग अपने?अपने पंचों को नियत कर देंबकिसानों में भी ऐसी कामिनियां होती हैं, यह मुझे न मालूम था।यह निस्संदेह किसी उच्च कुल की लड़की है। किसी कारणवश इस दुरवस्था में आ फंसी है। विधाता ने इस अवस्था में रखकर उसके साथ अत्याचार किया है। उसके कोमल हाथ खेतों में कुदाल चलाने के लिए नहीं बनाए गए हैं, उसकी मधुर वाणी खेतों में कौवे हांकने के लिए उपयुक्त नहीं है, जिनके केशों से झूमर का भार भी न सहा जाए उन पर उपले और अनाज के टोकरे रखना महान् अनर्थ है, माया की विषम लीला है। भाग्य का द्रूर रहस्य है। वह अबला है, विवश है, किसी से अपने ह्रदय की व्यथा। कह नहीं सकती। अगर मुझे मालूम हो जाये कि वह इस हालत में सुखी है, तो मुझे संतोष हो जाएगी। पर वह कैसे मालूम हो, कुलवती स्त्रियां अपनी विपत्ति?कथा। नहीं कहतीं, भीतर-ही-भीतर जलती हैं पर ाबान से हाय नहीं करती।मैं फिर उसी उधेड़-बुन में पड़ गया। समझ में नहीं आता मेरे चित्त की यह दशा क्यों हो रही है। अब तक मेरा मन कभी इतना चंचल नहीं हुआ था।मेरे युवाकाल के सहवासी तक मेरी अरसिकता पर आश्चर्य करते थे।अगर मेरी इस लोलुपता की जरा भी भनक उनके कान में पड़ जाए तो मैं कहीं मुंह दिखाने लायक न रहूँ। यह आग मेरे ह्रदय में ही जले, और चाहे ह्रदय जलकर राख हो जाए पर उसकी कराह किसी के कान में न पड़ेगी। ईश्वर की इच्छा के बिना कुछ नहीं होता। यह प्रेम-ज्योति उद्दीप्त करने में भी उसकी कोई-न-कोई मसलहत जरूर होगी।

घंटी बजाता है।

एक नौकर : हुजूर हुकुम ?

सबल : घोड़ा खींचो।

नौकर : बहुत अच्छा।

तीसरा दृश्य

समय : आठ बजे दिन।

स्थान : सबलसिंह का मकान। कंचनसिंह अपनी सजी हुई बैठक में दुशाला ओढ़े, आंखों पर सुनहरी ऐनक चढ़ाए मसनद लगाए बैठे हैं, मुनीमजी बही में कुछ लिख रहे हैं।

कंचन : समस्या यह है कि सूद की दर कैसे घटाई जाए। भाई साहब मुझसे नित्य ताकीद किया करते हैं कि सूद कम लिया करो। किसानों की ही सहायता के लिए उन्होंने मुझे इस कारोबार में लगाया। उनका मुख्य उद्देश्य यही है। पर तुम जानते हो धन के बिना धर्म नहीं होता। इलाके की आमदनी घर के जरूरी खर्च के लिए भी काफी नहीं होती। भाई साहब ने किफायत का पाठ नहीं पढ़ा। उनके हजारों रूपये साल तो केवल अधिकारियों के सत्कार की भेंट हो जाते हैं। घुड़दौड़ और पोलो और क्लब के लिए धन चाहिए । अगर उनके आसरे रहूँ तो सैकड़ों रूपये जो मैं स्वयं साधुजनों की अतिथि-सेवा में खर्च करता हूँ, कहां से आएं ?

मुनीम : वह बुद्विमान पुरूष हैं, पर न जाने यह फजूलखर्ची क्यों

करते हैं?

कंचन : मुझे बड़ी लालसा है कि एक विशाल धर्मशाला बनवाऊँ। उसके लिए धन कहां से आएगा ? भाई साहब के आज्ञानुसार नाम-मात्र के लिए ब्याज लूं तो मेरी सब कामनाएं धरी ही रह जाएं। मैं अपने भोग-विलास के लिए धन नहीं बटोरना चाहता, केवल परोपकार के लिए चाहता हूँ। कितने दिनों से इरादा कर रहा हूँ कि एक सुंदर वाचनालय खोल दूं। पर पर्याप्त धन नहीं यूरोप में केवल एक दानवीर ने हजारों वाचनालय खोल दिए हैं। मेरा हौसला इतना तो नहीं पर कम-से-कम एक उत्तम वाचनालय खोलने की अवश्य इच्छा है। सूद न लूं तो मनोरथ पूरे होने के और क्या साधन हैं ? इसके अतिरिक्त यह भी तो देखना चाहिए कि मेरे कितने रूपये मारे जाते हैं? जब असामी के पास कुछ जायदाद ही न हो तो रूपये कहां से वसूल हों। यदि यह नियम कर लूं कि बिना अच्छी जमानत के किसी को रूपये ही न दूंगा तो गरीबों का काम कैसे चलेगा ? अगर गरीबों से व्यवहार न करूं तो अपना काम नहीं चलता। वह बेचारे रूपये चुका तो देते हैं। मोटे आदमियों से लेन-देन कीजिए तो अदालत गए बिना कौड़ी नहीं वसूल होती।

हलधर का प्रवेश।

कंचन : कहो हलधर, कैसे चले ?

हलधर : कुछ नहीं सरकार, सलाम करने चला आया।

कंचन : किसान लोग बिना किसी प्रयोजन के सलाम करने नहीं चलते। फारसी कहावत है: सलामे दोस्ताई बगैर नेस्तब

हलधर : आप तो जानते ही हैं फिर पूछते क्यों हैं ? कुछ रूपयों का काम था।

कंचन : तुम्हें किसी पंडित से साइत पूछकर चलना चाहिए था।यहां आजकल रूपयों का डौल नहीं क्या करोगे रूपये लेकर?

हलधर : काका की बरसी होने वाली है। और भी कई काम हैं।

कंचन : स्त्री के लिए गहने भी बनवाने होंगे ?

हलधर : (हंसकर) सरकार, आप तो मन की बात ताड़ लेते हैं।

कंचन : तुम लोगों के मन की बात जान लेना ऐसा कोई कठिन काम नहीं, केवल खेती अच्छी होनी चाहिए । यह फसल अच्छी है, तुम लोगों को रूपये की जरूरत होना स्वाभाविक है। किसान ने खेत में पौधे लहराते हुए देखे और उनके पेट में चूहे कूदने लगे नहीं तो ऋण लेकर बरसी करने या गहने बनवाने का क्या काम, इतना सब्र नहीं होता कि अनाज घर में आ जाए तो यह सब मनसूबे बांधें। मुझे रूपयों का सूद दोगे, लिखाई दोगे, नजराना दोगे, मुनीमजी की दस्तूरी दोगे, दस के आठ लेकर घर जाओगे, लेकिन यह नहीं होता कि महीने-दो-महीने रूक जाएं। तुम्हें तो इस घड़ी रूपये की धुन है, कितना ही समझाऊँ, ऊँच-नीच सुझाऊँ मगर कभी न मानोगे। रूपये न दूं तो मन में गालियां दोगे और किसी दूसरे महाजन की चिरौरी करोगी।

हलधर : नहीं सरकार, यह बात नहीं है, मुझे सचमुच ही बड़ी जरूरत

है।

कंचन : हां-हां, तुम्हारी जरूरत में किसे संदेह है, जरूरत न होती तो यहां आते ही क्यों, लेकिन यह ऐसी जरूरत है जो टल सकती है, मैं इसे जरूरत नहीं कहता, इसका नाम ताव है, जो खेती का रंग देखकर सिर पर सवार हो गया है।

हलधर : आप मालिक हैं जो चाहे कहैं। रूपयों के बिना मेरा काम न चलेगा। बरसी में भोज-भात देना ही पड़ेगा, गहना-पाती बनवाए बिना बिरादरी में बदनामी होती है, नहीं तो क्या इतना मैं नहीं जानता कि करज लेने से भरम उठ जाता है। करज करेजे की चीर है। आप तो मेरी भलाई के लिए इतना समझा रहे हैं, पर मैं बड़ा संकट में हूँ।

कंचन : मेरी रोकड़ उससे भी ज्यादा संकट में है। तुम्हारे लिए बंकधर से रूपये निकालने पड़ेंगी। कोई और कहता तो मैं उसे सूखा जवाब देता, लेकिन तुम मेरे पुराने असामी हो, तुम्हारे बाप से भी मेरा व्यवहार था।, इसलिए तुम्हें निराश नहीं करना चाहता। मगर अभी से जताए देता हूँ कि जेठी में सब रूपया सूद समेत चुकाना पड़ेगा। कितने रूपये चाहते हो ?

हलधर : सरकार, दो सौ रूपये दिला दें।

कंचन : अच्छी बात है, मुनीमजी लिखा-पढ़ी करके रूपये दे दीजिए। मैं पूजा करने जाता हूँ। (जाता है)

मुनीम : तो तुम्हें दो सौ रूपये चाहिए न। पहिले पांच रूपये सैकड़े नजराना लगता था।अब दस रूपये सैकड़े हो गया है।

हलधर : जैसी मर्जी।

मुनीम : पहले दो रूपये सैकड़े लिखाई पड़ती थी, अब चार रूपये सैकड़े हो गई है।

हलधर : जैसा सरकार का हुकुम।

मुनीम : स्टाम्प के पांच रूपये लगेंगी।

हलधर : सही है।

मुनीम : चपरासियों का हक दो रूपये होगी।

हलधर : जो हुकुम।

मुनीम : मेरी दस्तूरी भी पांच रूपये होती है, लेकिन तुम गरी। आदमी हो, तुमसे चार रूपये ले लूंगा। जानते ही हो मुझे यहां से कोई तलब तो मिलती नहीं, बस इसी दस्तूरी पर भरोसा है।

हलधर : बड़ी दया है।

मुनीम : एक रूपया ठाकुर जी को चढ़ाना होगी।

हलधर : चढ़ा दीजिए। ठाकुर तो सभी के हैं।

मुनीम : और एक रूपया ठकुराइन के पान का खर्च।

हलधर : ले लीजिए। सुना है गरीबों पर बड़ी दया करती हैं।

मुनीम : कुछ पढ़े हो ?

हलधर : नहीं महाराज, करिया अच्छर भैंस बराबर है।

मुनीम : तो इस स्टाम्प पर बाएं अंगूठे का निशान करो।

सादे स्टाम्प पर निशान बनवाता है।

मुनीम : (संदूक से रूपये निकालकर) गिन लो।

हलधर : ठीक ही होगी।

मुनीम : चौखट पर जाकर तीन बार सलाम करो और घर की राह लो।

हलधर रूपये अंगोछे में बांधता हुआ जाता है। कंचनसिंह का प्रवेश।

मुनीम : जरा भी कान?पूंछ नहीं हिलाई।

कंचन : इन मूखोऊ पर ताव सवार होता है तो इन्हें कुछ नहीं सूझता, आंखों पर पर्दा पड़ जाता है। इन पर दया आती है, पर करूं क्या? धन के बिना धर्म भी तो नहीं होता।

चौथा दृश्य

स्थान : मधुबन। सबलसिंह का चौपाल।

समय : आठ बजे रात। फाल्गुन का आरंभ।

चपरासी : हुजूर, गांव में सबसे कह आया है। लोग जादू के तमाशे की खबर सुनकर उत्सुक हो रहे हैं।

सबल : स्त्रियों को भी बुलावा दे दिया है न ?

चपरासी : जी हां, अभी सब-की-सब घरवालों को खाना खिलाकर आई जाती हैं।

सबल : तो इस बरामदे में एक पर्दा डाल दो। स्त्रियों को पर्दे के अंदर बिठाना। घास-चारे, दूध-लकड़ी आदि का प्रबंध हो गया न ?

चपरासी : हुजूर, सभी चीजों का ढेर लगा हुआ है। जब यह चीजें बेगार में ली जाती थीं तब एक-एक मुट्ठी घास के लिए गाली और मार से काम लेना पड़ता था।हुजूर ने बेगार बंद करके सारे गांव को बिन दामों गुलाम बना लिया है। किसी ने भी दाम लेना मंजूर नहीं किया। सब यही कहते हैं कि सरकार हमारे मेहमान हैं। धन्य-भाग ! जब तक चाहें सिर और आंखों पर रहैं। हम खिदमत के लिए दिलोजान से हाजिर हैं। दूध तो इतना आ गया है कि शहर में चार रूपये को भी न मिलता।

सबल : यह सब एहसान की बरकत है। जब मैंने बेगार बंद करने का प्रस्ताव किया तो तुम लोग, यहां तक कि कंचनसिंह भी, सभी मुझे डराते थे।सबको भय था। कि असामी शोख हो जाएंगे, सिर पर चढ़ जाएंगी। लेकिन मैं जानता था। कि एहसान का नतीजा कभी बुरा नहीं होता। अच्छा, महराज से कहो कि मेरा भोजन भी जल्द बना देंब

चपरासी चला जाता है।

सबल : (मन में) बेगार बंद करके मैंने गांव वालों को अपना भक्त बना लिया। बेगार खुली रहती तो कभी-न-कभी राजेश्वरी को भी बेगार करनी ही पड़ती, मेरे आदमी जाकर उसे दिक करते। अब यह नौबत कभी न आएगी। शोक यही है कि यह काम मैंने नेक इरादों से नहीं किया, इसमें मेरा स्वार्थ छिपा हुआ है। लेकिन अभी तक मैं निश्चय नहीं कर सका कि इसका

अंत क्या होगा? राजेश्वरी के उद्वार करने का विचार तो केवल भ्रांत है। मैं उसकी अनुपम रूप-छटा, उसके सरल व्यवहार और उसके निर्दोष अंग-विन्यास पर आसक्त हूँ। इसमें रत्ती-भर भी संदेह नहीं है। मैं कामवासना की चपेट में आ गया हूँ और किसी तरह मुक्त नहीं हो सकता। खूब जानता हूँ कि यह महाघोर पाप है ! आश्चर्य होता है कि इतना संयमशील होकर भी मैं इसके दांव में कैसे आ पड़ा। ज्ञानी को अगर जरा भी संदेह हो जाय तो वह तो तुरंत विष खा ले। लेकिन अब परिस्थिति पर हाथ मलना व्यर्थ है। यह विचार करना चाहिए कि इसका अंत क्या होगा? मान लिया कि

मेरी चालें सीधी पड़ती गई और वह मेरा कलमा पढ़ने लगी तो? कलुषित प्रेम ! पापाभिनय ! भगवन् ! उस घोर नारकीय अग्निकुंड में मुझे मत डालना। मैं अपने मुख को और उस सरलह्रदय बालिका की आत्मा को इस कालिमा से वेष्ठित नहीं करना चाहता। मैं उससे केवल पवित्र प्रेम करना चाहता हूँ, उसकी मीठी-मीठी बातें सुनना चाहता हूँ, उसकी मधुर मुस्कान की छटा देखना चाहता हूँ, और कलुषित प्रेम क्या हैजो हो, अब तो नाव नदी में डाल दी है, कहीं-न-कहीं पार लगेगी ही। कहां ठिकाने लगेगी ? सर्वनाश के घाट पर ? हां, मेरा सर्वनाश इसी बहाने होगी। यह पाप?पिशाच मेरे कुल का भक्षण कर जाएगी। ओह ! यह निर्मूल शंकाएं हैं। संसार में एक-से-एक कुकर्मी व्यभिचारी पड़े हुए हैं, उनका सर्वनाश नहीं होता। कितनों ही को मैं जानता हूँ जो विषय-भोग में लिप्त हो रहे हैं। ज्यादा-से-ज्यादा उन्हें यह दंड मिलता है कि जनता कहती है, बिगड़ गया, कुल में दाफजलगा दिया । लेकिन उनकी मान-प्रतिष्ठा में जरा भी अंतर नहीं पड़ता। यह पाप मुझे करना पड़ेगा। कदाचित मेरे भाग्य में यह बदा हुआ है। हरि इच्छा। हां, इसका प्रायश्चित करने में कोई कसर न रखूंगी। दान, व्रत, धर्म, सेवा इनके पर्दे में मेरा अभिनय होगी। दान, व्रत, परोपकार, सेवा ये सब मिलकर कपट-प्रेम की कालिमा को नहीं धो सकते। अरे, लोग अभी से तमाशा देखने आने लगे। खैर, आने दूं। भोजन में देर हो जाएगी। कोई चिंता नहीं बारह बजे सब गिल्म खत्म हो जाएंगी। चलूं सबको बैठाऊँ। (प्रकट) तुम लोग यहां आकर फर्श पर बैठो, स्त्रियां पर्दे में चली जाएं। (मन में) है, वह भी है ! कैसा सुंदर अंग-विन्यास है ! आज गुलाबी साड़ी पहने हुए है। अच्छा, अब की तो कई आभूषण भी हैं। गहनों से उसके शरीर की शोभा ऐसी बढ़ गई है मानो वृक्ष में फूल लगे हों।

दर्शक यथास्थान बैठ जाते हैं, सबलसिंह चित्रों को दिखाना शुरू करते हैं।

पहला चित्र : कई किसानों का रेलगाड़ी में सवार होने के लिए धक्कम-धक्का करना, बैठने का स्थान न मिलना, गाड़ी में खड़े रहना, एक कुली को जगह के लिए घूस देना, उसका इनको एक मालगाड़ी में बैठा देना। एक स्त्री का छूट जाना और रोना। गार्ड का गाड़ी को न रोकना।

हलधर : बेचारी की कैसी दुर्गति हो रही है। लो, लात-घूंसे चलने लगे। सब मार खा रहे हैं।

फत्तू : यहां भी घूस दिए बिना नहीं चलता। किराया दिया, घूस उसपर सेब लात-घूंसे खाए उसकी कोई गिनती नहीं बड़ा अंधेर है। रूपये बड़े जतन से रखे हुए हैं। कैसा जल्दी निकाल रहा है कि कहीं गाड़ी न खुल जाए।

राजेश्वरी : (सलोनी से) हाय-हाय, बेचारी छूट गई ! गोद में लड़का भी है। गाड़ी नहीं रूकी। सब बड़े निर्दयी हैं। हाय भगवन्, उसका क्या हाल होगा?

सलोनी : एक बेर इसी तरह मैं भी छूट गई थी। हरदुआर जाती थी।

राजेश्वरी : ऐसी गाड़ी पर कभी न सवार हो, पुण्य तो आगे-पीछे मिलेगा, यह विपत्ति अभी से सिर पर आ पड़ीब

दूसरा चित्र : गांव का पटवारी खाट पर बस्ता खोले बैठा है। कई किसान आस-पास खड़े हैं। पटवारी सभी से सालाना नजर वसूल कर रहा है।

हलधर : लाला का पेट तो फूलके कुप्पा हो गया है। चुटिया इतनी बड़ी है जैसे बैल की पगहिया।

फत्तू : इतने आदमी खड़े गिड़गिड़ा रहे हैं, पर सिर नहीं उठाते, मानो कहीं के राजा हैं ! अच्छा, पेट पर हाथ धरकर लोट गया। पेट अगर रहा है, बैठा नहीं जाता। चुटकी बजाकर दिखाता है कि भेंट लाओ। देखो, एक किसान कमर से रूपया निकालता है। मालूम होता है, बीमार रहा है, बदन पर मिरजई भी नहीं है। चाहे तो छाती के हाड़ गिन लो।वाह, मुंशीजी ! रूपया फेंक दिया, मुंह फेर लिया, अब बात न करेंगी। जैसे बंदरिया रूठ जाती है और बंदर की ओर पीठ फेरकर बैठ जाती है।

बेचारा किसान कैसे हाथ जोड़कर मना रहा है, पेट दिखाकर कहता है, भोजन का ठिकाना नहीं, लेकिन लाला साहब कब सुनते हैं।

हलधर : बड़ी गलाकाटू जात है।

फत्तू : जानता है कि चाहे बना दूं, चाहे बिगाड़ दूं। यह सब हमारी ही दशा तो दिखाई जा रही है।

तीसरा चित्र : थानेदार साहब गांव में एक खाट पर बैठे हैं।

चोरी के माल की तगतीश कर रहे हैं। कई कांस्टेबल वर्दी पहने हुए खड़े हैं। घरों में खानातलाशी हो रही है। घर की

सब चीजें देखी जा रही हैं। जो चीज जिसको पसंद आती है, उठा लेता है। औरतों के बदन पर के गहने भी उतरवा लिए

जाते हैं।

फत्तू : इन जालिमों से खुदा बचाए।

एक किसान : आए हैं अपने पेट भरनेब बहाना कर दिया कि चोरी के माल का पता लगाने आए हैं।

फत्तू : अल्लाह मियां का कहर भी इन पर नहीं गिरता। देखो बेचारों की खानातलाशी हो रही है।

हलधर : खानातलाशी काहे की है, लूट है। उस पर लोग कहते हैं कि पुलिस तुम्हारे जान?माल की रक्षा करती है।

फत्तू : इसके घर में कुछ नहीं निकला।

हलधर : यह दूसरा घर किसी मालदार किसान का है। देखो हांडी

में सोने का कंठा रखा हुआ है। गोप भी है। महतो इसे पहनकर नेवता खाने जाते होंगे।चौकीदार ने उड़ा लिया। देखो, औरतें आंगन में खड़ी की गई हैं। उनके गहने उतारने को कह रहा है।

फत्तू : बेचारा महतो थानेदार के पैरों पर फिर रहा है और अंजुली भर रूपये लिए खड़ा है।

राजेश्वरी : (सलोनी से) पुलिसवाले जिसकी इज्जत चाहें ले लें।

सलोनी : हां, देखते तो साठ बरस हो गए। इनके उसपर तो जैसे कोई है ही नहीं

राजेश्वरी : रूपये ले लिए, बेचारियों की जान बचीब मैं तो इन सभी के सामने कभी न खड़ी हो सयं चाहे कोई मार ही डाले।

सलोनी : तस्वीरें न जाने कैसे चलती हैं।

राजेश्वरी : कोई कल होगी और क्या !

हलधर : अब तमाशा बंद हो रहा है।

एक किसान : आधी रात भी हो गई। सबेरे ऊख काटनी है।

सबल : आज तमाशा बंद होता है। कल तुम लोगों को और भी अच्छे?अच्छे चित्र दिखाए जाएंगे, जिससे तुम्हें मालूम होगा कि बीमारी से अपनी रक्षा कैसे की जा सकती है। घरों की और गांवों की सगाई कैसे होनी चाहिए, कोई बीमार पड़ जाए तो उसकी देख?रेख कैसे करनी चाहिए । किसी के घर में आगजलग जाए तो उसे कैसे बुझाना चाहिए । मुझे आशा है कि आज की तरह तुम लोग कल भी आओगी।

सब लोग चले जाते हैं।

पांचवां दृश्य

प्रात: काल का समय। राजेश्वरी अपनी गाय को रेवड़ में ले जा रही है। सबलसिंह से मुठभेड़।

सबल : आज तीन दिन से मेरे चंद्रमा बहुत बलवान हैं। रोज एक बार तुम्हारे दर्शन हो जाते हैं। मगर आज मैं केवल देवी के दर्शनों ही से संतुष्ट न हूँगी। कुछ वरदान भी लूंगा।

राजेश्वरी असमंजस में पड़कर इधर-उधर ताकती है और सिर झुकाकर खड़ी हो जाती है।

सबल : देवी, अपने उपासकों से यों नहीं लजाया करती। उन्हें धीरज देती हैं, उनकी दु: ख-कथा। सुनती हैं, उन पर दया की दृष्टि फेरती हैं। राजेश्वरी, मैं भगवान को साक्षी देकर कहता हूँ कि मुझे तुमसे जितनी श्रद्वा और प्रेम है उतनी किसी उपासक को अपनी इष्ट देवी से भी न होगी। मैंने जिस दिन से तुम्हें देखा है, उसी दिन से अपने ह्दय-मंदिर में तुम्हारी पूजा करने लगा हूँ। क्या मुझ पर जरा भी दया न करोगी ?

राजेश्वरी : दया आपकी चाहिए, आप हमारे ठाकुर हैं। मैं तो आपकी चेरी हूँ। अब मैं जाती हूँ। गाय किसी के खेत में पैठ जाएगी। कोई देख लेगा तो अपने मन में न जाने क्या कहेगी।

सबल : तीनों तरफ अरहर और ईख के खेत हैं, कोई नहीं देख सकता। मैं इतनी जल्द तुम्हें न जाने दूंगा। आज महीनों के बाद मुझे यह सुअवसर मिला है, बिना वरदान लिए न छोडूंगा। पहले यह बतलाओ कि इस काक-मंडली में तुम जैसी हंसनी क्यों कर आ पड़ी ? तुम्हारे माता-पिता क्या करते हैं ?

राजेश्वरी : यह कहानी कहने लगूंगी तो बड़ी देर हो जाएगी। मुझे यहां कोई देख लेगा तो अनर्थ हो जाएगी।

सबल : तुम्हारे पिता भी खेती करते हैं ?

राजेश्वरी : पहले बहुत दिनों तक टापू में रहै। वहीं मेरा जन्म हुआ। जब वहां की सरकार ने उनकी जमीन छीन ली तो यहां चले आए। तब से खेती-बारी करते हैं। माता का देहांत हो गया। मुझे याद आता है, कुंदन का-सा रंग था। बहुत सुंदर थीं।

सबल : समझ गया। (तृष्णापूर्ण नेत्रों से देखकर) तुम्हारा तो इन गंवारों में रहने से जी घबराता होगी। खेती-बारी की मेहनत भी तुम जैसी कोमलांगी सुंदरी को बहुत अखरती होगी।

राजेश्वरी : (मन में) ऐसे तो बड़े दयालु और सज्जन आदमी हैं, लेकिन निगाह अच्छी नहीं जान पड़ती। इनके साथ कुछ कपट-व्यवहार करना चाहिए । देखूं किस रंग पर चलते हैं। (प्रकट) क्या करूं भाग्य में जो लिखा था। वह हुआ।

सबल : भाग्य तो अपने हाथ का खेल है। जैसे चाहो वैसा बन सकता है। जब मैं तुम्हारा भक्त हूँ तो तुम्हें किसी बात की चिंता न करनी चाहिए । तुम चाहो तो कोई नौकर रख लो।उसकी तलब मैं दे दूंगा, गांव में रहने की इच्छा न हो तो शहर चलो, हलधर को अपने यहां रख लूंगा, तुम आराम से रहना। तुम्हारे लिए मैं सब कुछ करने को तैयार हूँ, केवल तुम्हारी दया-दृष्टि चाहता हूँ। राजेश्वरी, मेरी इतनी उम्र गुजर गई लेकिन परमात्मा जानते हैं कि आज तक मुझे न मालूम हुआ कि प्रेम क्या वस्तु है। मैं इस रस के स्वाद को जानता ही न था।, लेकिन जिस दिन से तुमको देखा है, प्रेमानंद का अनुपम सुख भोग रहा हूँ। तुम्हारी सूरत एक क्षण के लिए भी आंखों से नहीं उतरती। किसी काम में जी नहीं लगता, तुम्हीं चित्त में बसी रहती हो, बगीचे में जाता हूँ तो मालूम होता है कि फूललों में तुम्हारी ही सुगंधि है, श्यामा की चहक सुनता हूँ तो मालूम होता है कि तुम्हारी ही मधुर ध्वनि है। चंद्रमा को देखता हूँ तो जान पड़ता है कि वह तुम्हारी ही मूर्ति है। प्रबल उत्कंठा होती है कि चलकर तुम्हारे चरणों पर सिर झुका दूं। ईश्वर के लिए यह मत समझो कि मैं तुम्हें कलंकित कराना चाहता हूँ। कदापि नहीं ! जिस दिन यह कुभाव, यह कुचेष्टा, मन में उत्पन्न होगी उस दिन ह्रदय को चीरकर बाहर फेंक दूंगा। मैं केवल तुम्हारे दर्शन से अपनी आंखों को तृप्त करना, तुम्हारी सुललित वाणी से अपने श्रवण को मुग्ध करना चाहता हूँ। मेरी यही परमाकांक्षा है कि तुम्हारे निकट रहूँ, तुम मुझे अपना प्रेमी और भक्त समझो और मुझसे किसी प्रकार का पर्दा या संकोच न करो। जैसे किसी साफर के निकट के वृक्ष उससे रस खींचकर हरे-भरे रहते हैं उसी प्रकार तुम्हारे समीप रहने से मेरा जीवन आनंदमय हो जाएगी।

चेतनदास भजन गाते हुए दोनों प्राणियों को देखते चले जाते हैं।

राजेश्वरी : (मन में) मैं इनसे कौशल करना चाहती थी पर न जाने इनकी बातें सुनकर क्यों ह्रदय पुलकित हो रहा है। एक-एक शब्द मेरे ह्रदय में चुभ जाता है। (प्रकट) ठाकुर साहब, एक दीन मजूरी करने वाली स्त्री से ऐसी बातें करके उसका सिर आसमान पर न चढ़ाइए। मेरा जीवन नष्ट हो जाएगी। आप धर्मात्मा हैं, जसी हैं, दयावान हैं। आज घर-घर आपके जस का बखान हो रहा है, आपने अपनी प्रजा पर जो दया की है उसकी महिमा मैं नहीं गा सकती। लेकिन ये बातें अगर किसी के कान में पड़ गई तो यही परजा, जो आपके पैरों की धूल माथे पर चढ़ाने को तरसती है, आपकी बैरी हो जाएगी, आपके पीछे पड़ जाएगी। अभी कुछ नहीं बिगड़ा है। मुझे भूल जाइए। संसार में एक-से-एक सुंदर औरतें हैं। मैं गंवारिन हूँ। मजूरी करना मेरा काम है। इन प्रेम की बातों को सुनकर मेरा चित्त ठिकाने न रहेगी। मैं उसे अपने बस में न रख सयंगी। वह चंचल हो जाएगा और न जाने उस अचेत दशा में क्या कर बैठे। उसे फिर नाम की, कुल की, निंदा की लाज न रहेगी। प्रेम बढ़ती हुई नदी है। उसे आप यह नहीं कह सकते कि यहां तक चढ़ना, इसके आगे नहीं चढ़ाव होगा तो वह किसी के रोके न रूकेगी। इसलिए मैं आपसे विनती करती हूँ कि यहीं तक रहने दीजिए। मैं अभी तक अपनी दशा में संतुष्ट हूँ। मुझे इसी दशा में रहने दीजिए। अब मुझे देर हो रही है, जाने दीजिए।

सबल : राजेश्वरी, प्रेम के मद से मतवाला आदमी उपदेश नहीं सुन सकता। क्या तुम समझती हो कि मैंने बिना सोचे-समझे इस पथ पर पग रखा है। मैं दो महीनों से इसी हैस?बैस में हूँ। मैंने नीति का, सदाचरण का, धर्म का, लोकनिंदा का आश्रय लेकर देख लिया, कहीं संतोष न हुआ तब मैंने यह पथ पकड़ा। मेरे जीवन को बनाना-बिगाड़ना अब तुम्हारे ही हाथ है। अगर तुमने मुझ पर तरस न खाया तो अंत यही होगा कि मुझे आत्महत्या जैसा भीषण पाप करना पडे।गा, क्योंकि मेरी दशा असह्य हो गई है। मैं इसी गांव में घर बना लूंगा, यहीं रहूँगा, तुम्हारे लिए भी मकान, धन-संपत्ति, जगह-जमीन किसी पदार्थ की कमी न रहेगी। केवल तुम्हारी स्नेह-दृष्टि चाहता हूँ।

राजेश्वरी : (मन में) इनकी बातें सुनकर मेरा चित्त चंचल हुआ जाता है। आप-ही-आप मेरा ह्रदय इनकी ओर खिंचा जाता है। पर यह तो सर्वनाश का मार्ग है। इससे मैं इन्हें कटु वचन सुनाकर यहीं रोक देती हूँ। (प्रकट) आप विद्वान हैं, सज्जन हैं, धर्मात्मा हैं, परोपकारी हैं, और मेरे मन में आपका जितना मान है वह मैं कह नहीं सकती। मैं अब से थोड़ी देर पहले आपको देवता समझती थी। पर आपके मुंह से ऐसी बातें सुनकर दु: ख होता है। आपसे मैंने अपना हाल साफ-साफ कह दिया । उस पर भी आप वही बातें करते जाते हैं। क्या आप समझते हैं कि मैं अहीर जात और किसान हूँ तो मुझे अपने धरम-करम का कुछ विचार नहीं है और मैं धन और संपत्ति पर अपने धरम को बेच दूंगी ? आपका यह भरम है। आपको मैं इतनी सिरिद्वा से न देखती होती तो इस समय आप यहां इस तरह बेधड़क मेरे धरम का सत्यानाश करने की बातचीत न करते। एक पुकार पर सारा गांव यहां आ जाता और आपको मालूम हो जाता कि देहात के गंवार अपनी औरतों की लाज कैसे रखते हैं। मैं जिस दशा में भी हूँ संतुष्ट हूँ, मुझे किसी वस्तु की तृषना नहीं है। आपका धन आपको मुबारक रहै। आपकी कुशल इसी में है कि अभी आप यहां से चले जाइए। अगर गांव वालों के कानों में इन बातों की जरा भी भनक पड़ी तो वह मुझे तो किसी तरह जीता न छोड़ेंगे, पर आपके भी जान के दुश्मन हो जाएंगी। आपकी दया, उपकार, सेवा एक भी आपको उनके कोप से न बचा सकेगी।

चली जाती है।

सबल : (आप-ही-आप) इसकी सम्मत्ति मेरे चित्त को हटाने की जगह और भी बल के साथ अपनी ओर खींचती है। ग्रामीण स्त्रियां भी इतनी दृढ़ और आत्माभिमानी होती हैं, इसका मुझे ज्ञान न था।अबोध बालक को जिस काम के लिए मना करो, वही अदबदाकर करता है। मेरे चित्त की दशा उसी बालक के समान है। वह अवहेलना से हतोत्साह नहीं, वरन् और भी उत्तेजित होता है।

प्रस्थान।

छठा दृश्य

स्थान : मधुबन गांव।

समय : गागुन का अंत, तीसरा पहर, गांव के लोग बैठे बातें कर रहे हैं।

एक किसान : बेगार तो सब बंद हो गई थी। अब यह दहलाई की बेगार क्यों मांगी जाती है ?

फत्तू : जमींदार की मर्जी। उसी ने अपने हुक्म से बेगार बंद की थी। वही अपने हुक्म से जारी करता है।

हलधर : यह किस बात पर चिढ़ गए ? अभी तो चार-ही-पांच दिन होते हैं, तमाशा दिखाकर कर गए हैं। हम लोगों ने उनके सेवा-सत्कार में तो कोई बात उठा नहीं रखी।

फत्तू : भाई, राजा ठाकुर हैं, उनका मिजाज बदलता रहता है। आज किसी पर खुश हो गए तो उसे निहाल कर दिया, कल नाखुश हो गए तो हाथी के पैरों तले कुचलवा दिया । मन की बात है।

हलधर : अकारन ही थोड़े किसी का मिजाज बदलता है। वह तो कहते थे, अब तुम लोग हाकिम-हुक्काम किसी को भी बेगार मत देना। जो कुछ होगा मैं देख लूंगा। कहां आज यह हुकुम निकाल दिया । जरूर कोई बात मर्जी के खिलाफ हुई है।

फत्तू : हुई होगी। कौन जाने घर ही में किसी ने कहा हो, असामी अब सेर हो गए, तुम्हें बात भी न पूछेंगे।इन्होंने कहा हो कि सेर कैसे हो जाएंगे, देखो अभी बेगार लेकर दिखा देते हैं। या कौन जाने कोई काम-काज आ पड़ा हो, अरहर भरी रखी हो, दलवा कर बेच देना चाहते हों।

कई आदमी : हां, ऐसी ही कोई बात होगी। जो हुकुम देंगे वह बजाना ही पड़ेगा, नहीं तो रहेंगे कहां!

एक किसान : और जो बेगार न दें तो क्या करें ?

फत्तू : करने की एक ही कही। नाक में दम कर दें, रहना मुसकिल हो जाए। अरे और कुछ न करें लगान की रसीद ही न दें तो उनका क्या बना लोगे ? कहां फरियाद ले जाओगे और कौन सुनेगा ? कचहरी कहां तक दौड़ोगे ? फिर वहां भी उनके सामने तुम्हारी कौन सुनेगा !

कई आदमी : आजकल मरने की छुट्टी ही नहीं है, कचहरी कौन दौड़ेगा ? खेती तैयार खड़ी है, इधर ऊख बोना है, फिर अनाज मांड़ना पड़ेगा। कचहरी के धक्के खाने से तो यही अच्छा है कि जमींदार जो कहे, वही बजाएं।

फत्तू : घर पीछे एक औरत जानी चाहिए । बुढ़ियों को छांटकर भेजा जाए।

हलधर : सबके घर बुढ़िया कहां ?

फत्तू : तो बहू-बेटियों को भेजने की सलाह मैं न दूंगा।

हलधर : वहां इसका कौन खटका है ?

फत्तू : तुम क्या जानो, सिपाही हैं, चपरासी हैं, क्या वहां सब-के-सब देवता ही बैठे हैं। पहले की बात दूसरी थी।

एक किसान : हां, यह बात ठीक है। मैं तो अम्मां को भेज दूंगा।

हलधर : मैं कहां से अम्मां लाऊँ ?

फत्तू : गांव में जितने घर हैं क्या उतनी बुढ़िया न होंगी। गिनो एक-दो-तीन, राजा की मां चार, उस टोले में पांच, पच्छिम ओर सात, मेरी तरफ नौ: कुल पच्चीस बुढ़ियां हैं।

हलधर : घर कितने होंगे ?

फत्तू : घर तो अबकी मरदुमसुमारी में तीस थे।कह दिया जाएगा, पांच घरों में कोई औरत ही नहीं है, हुकुम हो तो मर्द ही हाजिर हों।

हलधर : मेरी ओर से कौन बुढ़िया जाएगी ?

फत्तू : सलोनी काकी को भेज दो। लो वह आप ही आ गई।

सलोनी आती है।

फत्तू : अरे सलोनी काकी, तुझे जमींदार की दलहाई में जाना पड़ेगा।

सलोनी : जाय नौज, जमींदार के मुंह में लूका लगे, मैं उसका क्या चाहती हूँ कि बेगार लेगी। एक धुर जमीन भी तो नहीं है। और बेगार तो उसने बंद कर दी थी ?

फत्तू : जाना पड़ेगा, उसके गांव में रहती हो कि नहीं ?

सलोनी : गांव उसके पुरखों का नहीं है, हां नहीं तो। फतुआ, मुझे चिढ़ा मत, नहीं कुछ कह बैठूंगी।

फत्तू : जैसे गा-गाकर चक्की पीसती हो उसी तरह गा-गाकर दाल दलना। बता कौन गीत गाओगी ?

सलोनी : डाढ़ीजार, मुझे चिढ़ा मत, नहीं तो गाली दे दूंगी। मेरी गोद का खेला लौंडा मुझे चिढ़ाता है।

फत्तू : कुछ तू ही थोड़े जाएगी। गांव की सभी बुढ़ियां जाएंगी।

सलोनी : गंगा-असनान है क्या ? पहले तो बुढ़ियां छांटकर न जाती थीं।मैं उमिर-भर कभी नहीं गई। अब क्या बहुओं को पर्दा लगा है। गहने गढ़ा-गढ़ा कर तो वह पहनें, बेगार करने बुढ़ियां जाएं।

फत्तू : अबकी कुछ ऐसी ही बात आ पड़ी है। हलधर के घर कोई बुढ़िया नहीं है। उसकी घरवाली कल की बहुरिया है, जा नहीं सकती। उसकी ओर से चली जा।

सलोनी : हां, उसकी जगह पर चली जाऊँगी। बेचारी मेरी बड़ी सेवा करती है। जब जाती हूँ तो बिना सिर में तेल डाले और हाथ-पैर दबाए नहीं आने देती। लेकिन बहली जुता देगा न ?

फत्तू : बेगार करने रथ पर बैठकर जाएगी।

हलधर : नहीं काकी, मैं बहली जुता दूंगा। सबसे अच्छी बहली में तुम बैठना।

सलोनी : बेटा, तेरी बड़ी उम्मिर हो, जुग-जुग जी। बहली में ढोल-मजीरा रख देना। गाती बजाती जाऊँगी।

सातवां दृश्य

समय : संध्या।

स्थान : मधुबन। ओले पड़ गए हैं। गांव के स्त्री-पुरूष खेतों में जमा हैं।

फत्तू : अल्लाह ने परसी?-परसायी थाली छीन ली।

हलधर : बना-बनाया खेल बिगड़ गया।

फत्तू : छावत लागत छह बरस और छिन में होत उजाड़ब कई साल के बाद तो अबकी खेती जरा रंग पर आई थी। कल इन खेतों को देखकर कैसी गज-भर की छाती हो जाती थी। ऐसा जान पड़ता था।, सोना बिछा दिया गया है। बित्ते-बित्ते भर की बालें लहराती थीं, पर अल्लाह ने मारा सब सत्यानाश कर दिया । बाग में निकल जाते थे तो बौर की महक से चित्त खिल उठता था।पर आज बौर की कौन कहे पत्ते तक झड़ गए।

एक वृद्व किसान : मेरी याद में इतने बड़े-बड़े ओले कभी न पड़े थे।

हलधर : मैंने इतने बड़े ओले देखे ही न थे, जैसे चट्टान काट-काटकर लुढ़का दिया गया हो,

फत्तू : तुम अभी हो कै दिन के ? मैंने भी इतने बड़े ओले नहीं

देखे।

एक वृद्व किसान : एक बेर मेरी जवानी में इतने बड़े ओले गिरे थे कि सैकड़ों ढोर मर गए। जिधर देखो मरी हुई चिड़ियां गिरी मिलती थीं।कितने ही पेड़ फिर पड़े। पक्की छतें तक गट गई थीं।बखारों में अनाज सड़ गए, रसोई में बर्तन चकनाचूर हो गए। मुदा अनाज की मड़ाई हो चुकी थी। इतना नुकसान नहीं हुआ था।

सलोनी : मुझे तो मालूम होता है कि जमींदार की नीयत बिगड़ गई है, तभी ऐसी तबाही हुई है।

राजेश्वरी : काकी, भगवान न जाने क्या करने वाले हैं। बार-बार मने करती थी कि अभी महाजन से रूपये न लो।लेकिन मेरी कौन सुनता है। दौड़े-दौड़े गए दो सौ रूपये उठा लाए, जैसे धरोहर हो, देखें अब कहां से देते हैं। लगान उसपर से देना है। पेट तो मजूरी करके मर जाएगा, लेकिन महाजन से कैसे गला छूटेगा ?

हलधर : भला पूछा तो काकी, कौन जानता था। कि क्या सुदनी हैं। आगम देख के तब रूपये लिए थे।यह आगत न आ जाती तो एक सौ रूपये का तो अकेले तेलहन निकल जाता। छाती-भर गेहूँ खड़ा था।

फत्तू : अब तो जो होना था। वह हो गया। पछताने से क्या हाथ आएगा ?

राजेश्वरी : आदमी ऐसा काम ही क्यों करे कि पीछे से पछताना पड़े।

सलोनी : मेरी सलाह मानो, सब जने जाकर ठाकुर से फरियाद करो कि लगान की माफीहो जाए। दयावान आदमी हैं। मुझे तो बिस्सास है कि मांग कर देंगे। दलहाई की बेगार में हम लोगों से बड़े प्रेम से बातें करते रहै। किसी को छटांक-भर भी दाल न दलने दीब पछताते रहे कि नाहक तुम लोगों को दिक किया। मुझसे बड़ी भूल हुई मैं तो फिर कहूँगी कि आदमी नहीं देवता हैं।

फत्तू : जमींदार के माफकरने से थोड़े माफीहोती है¼ जब सरकार माफकरे तब न ? नहीं तो जमींदार को मालगुजारी घर से चुकानी पड़ेगी। तो सरकार से इसकी कोई आशा नहीं अमले लोग तहकीकात करने को भेजे जाएंगी। वह असामियों से खूब रिसवत पाएंगे तो नुकसान दिखाएंगे, नहीं तो लिख देंगे ज्यादा नकसान नहीं हुआ। सरकार बहुत करेगी चार आने की छूट कर देगी। जब बारह आने देने ही पड़ेंगे तो चार आने और सही। रिसवत और कचहरी की दौड़ से तो बच जाएंगी। सरकार को अपना खजाना भरने से मतलब है कि परजा को पालने सेब सोचती होगी, यह सब न रहेंगे तो इनके और भाई तो रहेंगे ही। जमीन परती थोड़े पड़ी रहेगी।

एक वृद्व किसान : सरकार एक पैसा भी न छोड़ेगी। इस साल कुछ छोड़ भी देगी तो अगले साल सूद समेत वसूल कर लेगी।

फत्तू : बहुत निगाह करेगी तो तकाबी मंजूर कर देगी। उसका भी सूद लेगी। हर बहाने से रूपया खींचती है। कचहरी में झूठी कोई दरखास देने जाओ तो बिना टके खर्च किए सुनाई नहीं होती। अफीम सरकार बेचे, दाई, गांजा, भांग, मदक, चरस सरकार बेचे। और तो और नोन तक बेचती है। इस तरह रूपया न खींचे तो अफसरों की बड़ी-बड़ी तलब कहां से दे ! कोई एक लाख पाता है, कोई दो लाख, कोई तीन लाख। हमारे यहां जिसके पास लाख रूपये होते हैं वह लखपती कहलाता है, मारे घमंड के सीधे ताकता नहीं सरकार के नौकरों की एक-एक साल की तलब दो-दो लाख होती है। भला वह लगान की एक पाई भी न छोड़ेगी।

हलधर : बिना सुराज मिले हमारी दसा न सुधरेगी। अपना राज होता तो इस कठिन समय में अपनी मदद करता।

फत्तू : मदद करेंगे ! देखते हो जब से दाई, अफीम की बिक्री बंद हो गई है अमले लोग नसे का कैसा बखान करते गिरते हैं। कुरान शरीफ में नसा हराम लिखा है, और सरकार चाहती है कि देस नसेबाज हो जाए। सुना है, साहब ने आजकल हुकुम दे दिया है कि जो लोग खुद अफीम-सराब पीते हों और दूसरों को पीने की सलाह देते हों, उनका नाम खैरखाहों में लिख लिया जाए। जो लोग पहले पीते थे, अब छोड़ बैठे हैं, या दूसरों को पीना मना करते हैं, उनका नाम बागियों में लिखा जाता है।

हलधर : इतने सारे रूपये क्या तलबों में ही उठ जाते हैं ?

राजेश्वरी : गहने बनवाते हैं।

फत्तू : ठीक तो कहती हैं। क्या सरकार के जोई-बच्चे नहीं हैं ? इतनी बड़ी फौज बिना रूपये के ही रखी है ! एक-एक तोप लाखों में आती है। हवाई जहाज कई-कई लाख के होते हैं। सिपाहियों को सर्च के लिए हवा-गाड़ी चाहिए । जो खाना यहां रईसों को मयस्सर नहीं होता वह सिपाहियों को खिलाया जाता है। साल में छ: महीने सब बड़े-बड़े हाकिम पहाड़ों की सैर करते हैं। देखते तो हो छोटे-छोटे हाकिम भी बादशाहों की तरह ठाट से रहते हैं, अकेली जान पर दस-पंद्रह नौकर रखते हैं, एक पूरा बंगला रहने को चाहिए । जितना बड़ा हमारा गांव है उससे ज्यादा जमीन एक बंगले के हाते में होती है। सुनते हैं, दस रूपये-बीस रूपये बोतल की शराब पीते हैं। हमको-तुमको भरपेट रोटियां नहीं नसीब होतीं, वहां रात-दिन रंग चढ़ा रहता है। हम-तुम रेलगाड़ी में धक्के खाते हैं। एक-एक डब्बे में जहां दस की जगह है वहां बीस, पच्चीस, तीस, चालीस ठूंस दिए जाते हैं। हाकिमों के वास्ते सभी सजी-सजाई गाड़ियां रहती हैं, आराम से गद्दी पर लेटे हुए चले जाते हैं। रेलगाड़ी को जितना हम किसानों से मिलता है उसका एक हिस्सा भी उन लोगों से न मिलता होगी। मगर तिस पर भी हमारी कहीं पूछ नहीं जमाने की खूबी है !

हलधर : सुना है, मेमें अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाती।

फत्तू : सो ठीक है, दूध पिलाने से औरत का शरीर ढीला हो जाता है, वह फुरती नहीं रहती। दाइयां रख लेते हैं। वही बच्चों को पालती-पोसती हैं। मां खाली देखभाल करती रहती हैं। लूट है लूट!

सलोनी : दरखास दो¼ मेरा मन कहता है, छूट हो जाएगी।)

फत्तू : कह तो दिया, दो-चार आने की छूट हुई भी तो बरसों लग जाएंगी। पहले पटवारी कागद बनाएगा, उसको पूजो¼ तब कानूगो जांच करेगा, उसको पूजो¼ तब तहसीलदार नजर सानी करेगा, उसको पूजो¼ तब डिप्टी के सामने कागद पेस होगा, उसको पूजो¼ वहां से तब बड़े साहब के इजलास में जाएगा, वहां अहलमद और अरदली और नाजिर सभी को पूजना पड़ेगा। बड़े साहब कमसनर को रपोट देंगे, वहां भी कुछ-न-कुछ पूजा करनी पड़ेगी। इस तरह मंजूरी होते?होते एक जुग बीत जाएगी। इन सब झंझटों से तो यही अच्छा है कि:

रहिमन चुप तै बैठिए देखि दिनन को फेर।

जब नीके दिन आइहैं बनत न लगिहै बेर।।

हलधर : मुझे तो साठ रूपये लगान देने हैं। बैल-बधिया बिक जाएंगे तब भी पूरा न पड़ेगा।

किसान : बचेंगे किसके ! अभी साल-भर खाने को चाहिए । देखो, गेहूँ के दाने कैसे बिखरे पड़े हैं जैसे किसी ने मसल दिए हों।

हलधर : क्या करना होगा?

राजेश्वरी : होगा क्या, जैसी करनी वैसी भरनी होगी। तुम तो खेत में बाल लगते ही बावले हो गए। लगान तो था। ही, उसपर से महाजन का बोझ भी सिर पर लाद लिया।

फत्तू : तुम मैके चली जाना। हम दोनों जाकर कहीं मजूरी करेंगी। अच्छा काम मिल गया तो साल-भर में डोंगा पार है।

राजेश्वरी : हां, और क्या, गहने तो मैंने पहने हैं, गाय का दूध मैंने खाया है, बरसी मेरे ससुर की हुई है, अब जो भरौती के दिन आए तो मैं मैके भाग जाऊँ। यह मेरा किया न होगी। तुम लोग जहां जाना, वहीं मुझे भी लेते चलना। और कुछ न होगा तो पकी-पकाई रोटियां तो मिल जाएंगी।

सलोनी : बेटी, तूने यह बात मेरे मन की कही। कुलवंती नारी के यही लच्छन हैं। मुझे भी अपने साथ लेती चलना।

गाती है।

चलो पटने की देखो बहार, सहर गुलजार रे।

फत्तू : हां, दाई, खूब गा, गाने का यही अवसर है। सुख में तो सभी गाते हैं।

सलोनी : और क्या बेटा, अब तो जो होना था।, हो गया। रोने से लौट थोड़े ही आएगी।

गाती है।

उसी पटने में तमोलिया बसत है।

बीड़ों की अजब बहार रे।

पटना शहर गुलजार रे।।

फत्तू : काकी का गाना तानसेन सुनता तो कानों पर हाथ रखता। हां, दाई !

सलोनी : (गाती है)

उसी पटने में बजजवा बसत है।।

कैसी सुंदर लगी है बजार रे।

पटना सहर गुलजार रे।।

फत्तू : बस एक कड़ी और गा दे काकी ! तेरे हाथ जोड़ता हूँ। जी बहल गया।

सलोनी : जिसे देखो गाने को ही कहता है, कोई यह नहीं पूछता कि बुढ़िया कुछ खाती-पीती भी है या आसिरवादों से ही जीती है।

राजेश्वरी : चलो, मेरे घर काकी, क्या खाओगी ?

सलोनी : हलधर, तू इस हीरे को डिबिया में बंद कर ले, ऐसा न हो किसी की नजर लग जाए। हां बेटी, क्या खिलाएगी ?

राजेश्वरी : जो तुम्हारी इच्छा हो,

सलोनी : भरपेट ?

राजेश्वरी : हां, और क्या ?

सलोनी : बेटी, तुम्हारे खिलाने से अब मेरा पेट न भरेगी। मेरा पेट भरता था। जब रूपये का पसेरी-भर घी मिलता था।अब तो पेट ही नहीं भरता। चार पसेरी अनाज पीसकर जांत पर से उठाती थी। चार पसेरी की रोटियां पकाकर चौके से निकलती थी। अब बहुएं आती हैं तो चूल्हे के सामने जाते उनको ताप चढ़ आती है, चक्की पर बैठते ही सिर में पीड़ा होने लगती है। खाने को तो मिलता नहीं, बल-बूता कहां से आए। न जाने उपज ही नहीं होती कि कोई ढो ले जाता है। बीस मन का बीघा उतरता था।बीस रूपये भी हाथ में आ जाते थे, तो पछाई बैलों की जोड़ी द्वार पर बंध जाती थी। अब देखने को रूपये तो बहुत मिलते हैं पर ओले की तरह देखते-देखते फल जाते हैं। अब तो भिखारी को भीख देना भी लोगों को अखरता है।

फत्तू : सच कहना काकी, तुम काका को मुट्ठी में दबा लेती थी कि नहीं ?

सलोनी : चल, उनका जोड़ दस-बीस गांव में न था।तुझे तो होस आता होगा, कैसा डील-डौल था।चुटकी से सुपारी गोड़ देते थे।

गाती है।

चलो-चलो सखी अब जाना,

पिया भेज दिया परवाना। (टेक)

एक दूत जबर चल आया, सब लस्कर संग सजाया री।

किया बीच नगर के थाना,

गढ़ कोट-किले गिरवाए, सब द्वार बंद करवाए री।

अब किस विधि होय रहाना।

जब दूत महल में आवे, तुझे तुरत पकड़ ले जावे री।

तेरा चले न एक बहाना।

पिया भेज दिया परवाना।

अंक - दो 
पहला दृश्य

स्थान : चेतनदास की कुटी, गंगातट।

समय : संध्या।

सबल : महाराज, मनोवृत्तियों के दमन करने का सबसे सरल उपाय क्या है ?

चेतनदास : उपाय बहुत हैं, किंतु मैं मनोवृत्तियों के दमन करने का उपदेश नहीं करता। उनको दमन करने से आत्मा संकुचित हो जाती है। आत्मा को ज्ञानेन्द्रियों द्वारा ही ज्ञान प्राप्त होता है। यदि इन्द्रियों का दमन कर दिया जाए तो मनुष्य की चेतना-शक्ति लुप्त हो जाएगी। योगियों ने इच्छाओं को रोकने के लिए कितने यत्न लिखे हैं। हमारे योगग्रंथ उन उपदेशों से परिपूर्ण हैं। मैं इन्द्रियों का दमन करना अस्वाभाविक, हानिकर और आपत्तिजनक समझता हूँ।

सबल : (मन में) आदमी तो विचारशील जान पड़ता है। मैं इसे रंगा हुआ समझता था।(प्रकट) यूरोप के तभवज्ञानियों ने कहीं-कहीं इस विचार का पुष्टीकरण किया है, पर अब तक मैं उन विचारों को भ्रांतिकारक समझता था।आज आपके श्रीमुख से उनका समर्थन सुनकर मेरे कितने ही निश्चित सिद्वांतों को आघात पहुंच रहा है।

चेतनदास : इंद्रियों द्वारा ही हमको जगत् का ज्ञान प्राप्त होता है। वृत्तियों का दमन कर देने से ज्ञान का एकमात्र द्वार ही बंद हो जाता है। अनुभवहीन आत्मा कदापि उच्च पद नहीं प्राप्त कर सकती। अनुभव का द्वार बंद करना विकास का मार्ग बंद करना है, प्रकृति के सब नियमों के कार्य में बाधा डालना है। आत्मा मोक्षपद प्राप्त कर सकती है। जिसने अपने ज्ञान द्वारा इंद्रियों को मुक्त रखा हो, त्याग का महत्व आडान में नहीं है। जिसने मधुर संगीत सुना ही न हो उसे संगीत की रूचि न हो तो कोई आश्चर्य नहीं आश्चर्य तो तब है जब वह संगीतकला का भली-भांति आस्वादन करने, उसमें लिप्त होने के बाद वृत्तियों को उधर से हटा ले। वृत्तियों का दमन करना वैसा ही है जैसे बालको को खड़े होने या दौड़ने से रोकना। ऐसे बालक को चोट चाहे न लगे पर वह अवश्य ही अपंग हो जाएगी।

सबल : (मन में) कितने स्वाधीन और मौलिक विचार हैं। (प्रकट) तब तो आपके विचार में हमें अपनी इच्छाओं को अबाध्य कर देना चाहिए ।

चेतनदास : मैं तो यहां तक कहता हूँ कि आत्मा के विकास में पापों का भी मूल्य है। उज्ज्वल प्रकाश सात रंगों के सम्मिश्रण से बनता है। उसमें लाल रंग का महत्व उतना ही है जितना नीले या पीले रंग का। उत्तम भोजन वही है जिसमें षट्रसों का सम्मिश्रण हो, इच्छाओं को दमन करो, मनोवृत्तियों को रोको, यह मिथ्या तभववादियों के ढकोसले हैं। यह सब अबोध बालकों को डराने के जू-जू हैं। नदी के तट पर न जाओ, नहीं तो डूब जाओगे, यह मूर्ख माता-पिता की शिक्षा है। विचारशील प्राणी अपने बालको को नदी के तट पर केवल ले ही नहीं जाते वरन् उसे नदी में प्रविष्ट कराते हैं, उसे तैरना सिखाते हैं।

सबल : (मन में) कितनी मधुर वाणी है। वास्तव में प्रेम चाहे कलुषित ही क्यों न हो, चरित्र-निर्माण में अवश्य अपना स्थान रखता है। (प्रकट) तो पाप कोई घृणित वस्तु नहीं ?

चेतनदास : कदापि नहीं संसार में कोई वस्तु घृणित नहीं है, कोई वस्तु त्याज्य नहीं है। मनुष्य अहंकार के वश होकर अपने को दूसरों से श्रेष्ठ समझने लगता है। वास्तव में धर्म और अधर्म, सुविचार और कुविचार, पाप और पुण्य, यह सब मानव जीवन की मध्यवर्ती अवस्थाएं मात्र हैं।

सबल : (मन में) कितना उदार ह्रदय है ! (प्रकट) महाराज, आपके उपदेश से मेरे संतप्त मन को बड़ी शांति प्राप्त हुई (प्रस्थान)।

चेतनदास : (आप-ही-आप) इस जिज्ञासा का आशय खूब समझता हूँ। तुम्हारी अशांति का रहस्य खूब जानता हूँ। तुम फिसल रहे थे, मैंने एक धक्का और दे दिया । अब तुम नहीं संभल सकते।

दूसरा दृश्य

समय : संध्या।

स्थान : सबलसिंह की बैठक।

सबल : (आप-ही-आप) मैं चेतनदास को धूर्त समझता था।, पर यह तो ज्ञानी महात्मा निकले। कितना तेज और शौर्य है ! ज्ञानी उनके दर्शनों को लालायित है। क्या हर्ज है ! ऐसे आत्म-ज्ञानी पुरूषों के दर्शन से कुछ उपदेश ही मिलेगी।

कंचनसिंह का प्रवेश।

कंचन : (तार दिखाकर) दोनों जगह हार हुई पूना में घोड़ा कट गया। लखनऊ में जाकी घोड़े से फिर पड़ा।

सबल : यह तो तुमने बुरी खबर सुनाई। कोई पांच हजार का नुकसान हो गया।

कंचन : गल्ले का बाजार चढ़ गया। अगर अपना गेहूँ दस दिन और न बेचता तो दो हजार साफ निकल आते।

सबल : पर आगम कौन जानता था।

कंचन : असामियों से एक कौड़ी वसूल होने की आशा नहीं सुना है कई असामी घर छोड़कर भागने की तैयारी कर रहे हैं। बैल-बधिया बेचकर जाएंगी। कब तक लौटेंगे, कौन जानता है। मरें, जिएं, न जाने क्या हो ! यत्न न किया गया तो ये सब रूपये भी मारे जाएंगी। पांच हजार के माथे जाएगी। मेरी राय है कि उन पर डिगरी कराके जायदादें नीलाम करा ली जाएं। असामी सब-के-सब मातबर हैं¼ लेकिन ओलों ने तबाह कर दिया ।

सबल : उनके नाम याद हैं ?

कंचन : सबके नाम तो नहीं, लेकिन दस-पांच नाम छांट लिए हैं। जगरांव का लल्लू, तुलसी, भूगोर, मधुबन का सीता, नब्बी, हलधर, चिरौंजी।

सबल : (चौंककर) हलधर के जिम्मे कितने रूपये हैं ?

कंचन : सूद मिलाकर कोई दो सौ पचास होंगी।

सबल : (मन में) बडी विकट समस्या है` मेरे ही हाथों उसे यह कष्ट पहुंचे ! इसके पहले मैं इन हाथों को ही काट डालूंगा। उसकी एक दया-दृष्टि पर ऐसे-ऐसे कई ढाई सौ न्यौछावर हैं। वह मेरी है, उसे ईश्वर ने मेरे लिए बनाया है, नहीं तो मेरे मन में उसकी लगन क्यों होती। समाज के अनर्गल नियमों ने उसके और मेरे बीच यह लोहे की दीवार खड़ी कर दी है। मैं इस दीवार को खोद डालूंगा। इस कांटे को निकालकर फूलको गले में डाल लूंगा। सांप को हटाकर मणि को अपने ह्रदय में रख लूंगा। (प्रकट) और असामियों की जायदाद नीलाम करा सकते हो, हलधर की जायदाद नीलाम कराने के बदले मैं उसे कुछ दिनों हिरासत की हवा खिलाना चाहता हूँ। वह बदमाश आदमी है, गांव वालों को भडकाता है कुछ दिन जेल में रहेगा तो उसका मिजाज ठंडा हो जाएगा।

कंचन : हलधर देखने में तो बडा सीधा और भोला आदमी मालूम होता है

सबल : बना हुआ है तुम अभी उसके हथकंडों को नहीं जानते। मुनीम से कह देना, वह सब कार्रवाई कर देगी। तुम्हें अदालत में जाने की जरूरत नहीं।

कंचनसिंह का प्रस्थान।

सबल : (आप-ही-आप) ज्ञानियों ने सत्य ही कहा - ' है कि काम के वश में पड़कर मनुष्य की विद्या, विवेक सब नष्ट हो जाते हैं। यदि वह नीच प्रकृति है तो मनमाना अत्याचार करके अपनी तृष्णा को पूरी करता है¼ यदि विचारशील है तो कपट-नीति से अपना मनोरथ सिद्व करता है। इसे प्रेम नहीं कहते, यह है काम-लिप्सा। प्रेम पवित्र, उज्ज्वल, स्वार्थ-रहित, सेवामय, वासना-रहित वस्तु है। प्रेम वास्तव में ज्ञान है। प्रेम से संसार सृष्टि हुई, प्रेम से ही उसका पालन होता है। यह ईश्वरीय प्रेम है। मानव-प्रेम वह है जो जीव-मात्र को एक समझे, जो आत्मा की व्यापकता को चरितार्थ करे, जो प्रत्येक अणु में परमात्मा का स्वरूप देखे, जिसे अनुभूत हो कि प्राणी-मात्र एक ही प्रकाश की ज्योति है। प्रेम उसे कहते हैं। प्रेम के शेष जितने रूप हैं, सब स्वार्थमय, पापमय हैं। ऐसे कोढ़ी को देखकर जिसके शरीर में कीड़े पड़ गए हों अगर हम विडल हो जाएं और उसे तुरंत गले लगा लें तो वह प्रेम है। सुंदर, मनोहर स्वरूप को देखकर सभी का चित्त आकर्षित होता है, किसी का कम, किसी का ज्यादा। जो साधनहीन हैं, द्रियाहीन हैं, या पौरूषहीन हैं वे कलेजे पर हाथ रखकर रह जाते हैं और दो-एक दिन में भूल जाते हैं। जो सम्पन्न हैं, चतुर हैं, साहसी हैं, उद्योगशील हैं, वह पीछे पड़ जाते हैं और अभीष्ट लाभ करके ही दम लेते हैं। यही कारण है कि प्रेम-वृत्ति अपने सामर्थ्य के बाहर बहुत कम जाती है। बाजार की लड़की कितनी ही सर्वगुणपूर्ण हो पर मेरी वृत्ति उधर जाने का नाम न लेगी। वह जानती है कि वहां मेरी दाल न गलेगी। राजेश्वरी के विषय में मुझे संशय न था।वहां भय, प्रलोभन, नृशंसता, किसी युक्ति का प्रयोग किया जा सकता था।अंत में, यदि ये सब युक्तियां विफल होतीं तो।

अचलसिंह का प्रवेश।

अचल : दादाजी, देखिए नौकर बड़ी गुस्ताखी करता है। अभी मैं फुटबाल देखकर आया हूँ, कहता हूँ, जूता उतार दे, लेकिन वह लालटेन साफ कर रहा है, सुनता ही नहीं आप मुझे कोई अलग एक नौकर दे दीजिए, जो मेरे काम के सिवा और किसी का काम न करे।

सबल : (मुस्कराकर) मैं भी एक गिलास पानी मागूं तो न दे ?

अचल : आप हंसकर टाल देते हैं, मुझे तकलीफ होती है। मैं जाता हूँ, इसे खूब पीटता हूँ।

सबल : बेटा, वह काम भी तो तुम्हारा ही है। कमरे में रोशनी न होती तो उसके सिर होते कि अब तक लालटेन क्यों नहीं जलाई। क्या हर्ज है, आज अपने ही हाथ से जूते उतार लो।तुमने देखा होगा, जरूरत पड़ने पर लेडियां तक अपने बक्स उठा लेती हैं। जब बम्बे मेल आती है तो जरा स्टेशन पर देखो।

अचल : आज अपने जूते उतार लूं, कल को जूतों में रोगन भी आप ही लगा लूं, वह भी तो मेरा ही काम है, फिर खुद ही कमरे की सगाई भी करने लगूं¼ अपने हाथों टब भी भरने लगूं, धोती भी छांटने लगूं।

सबल : नहीं, यह सब करने को मैं नहीं कहता, लेकिन अगर किसी दिन नौकर न मौजूद हो तो जूता उतार लेने में कोई हानि नहीं है।

अचल : जी हां, मुझे यह मालूम है¼ मैं तो यहां तक मानता हूँ कि एक मनुष्य को अपने दूसरे भाई से सेवा-टहल कराने का कोई अधिकार ही नहीं है। यहां तक कि साबरमती आश्रम में लोग अपने हाथों अपना चौका लगाते हैं, अपने बर्तन मांजते हैं और अपने कपड़े तक धो लेते हैं। मुझे इसमें कोई उज्र या इंकार नहीं है, मगर तब आप ही कहने लगेंगे: बदनामी होती है, शर्म की बात है, और अम्मांजी की तो नाक ही कटने लगेगी। मैं जानता हूँ नौकरों के अधीन होना अच्छी आदत नहीं है। अभी कल ही हम लोग कण्व स्थान गए थे।हमारे मास्टर थे और पंद्रह लड़के ग्यारह बजे दिन को धूप में चले। छतरी किसी के पास नहीं रहने दी गई। हां, लोटा-डोर साथ था।कोई एक बजे वहां पहुंचे। कुछ देर पेड़ के नीचे दम लिया। तब ताला। में स्नान किया। भोजन बनाने की ठहरी। घर से कोई भोजन करके नहीं गया था।फिर क्या था, कोई गांव से जिंस लाने दौड़ा, कोई उपले बटोरने लगा, दो-तीन लड़के पेड़ों पर चढ़कर लकड़ी तोड़ लाए, कुम्हार के घर से हांडियां और घड़े आए। पत्तों के पत्तल हमने खुद बनाए। आलू का भर्ता और बाटियां बनाई गई।खाते-पकाते चार बज गए। घर लौटने की ठहरी। छ: बजते-बजते यहां आ पहुंचे। मैंने खुद पानी खींचा, खुद उपले बटोरे। एक प्रकार का आनंद और उत्साह मालूम हो रहा था।यह ट्रिप (क्षमा कीजिएगा अंग्रेजी शब्द निकल गया। ) चक्कर इसीलिए तो लगाया गया था। जिसमें हम जरूरत पड़ने पर सब काम अपने हाथों से कर सकें, नौकरों के मोहताज न रहैं।

सबल : इस चक्कर का हाल सुनकर मुझे बड़ी खुशी हुई अब ऐसे गस्त की ठहरे तो मुझसे भी कहना, मैं भी चलूंगा। तुम्हारे अध्यापक महाशय को मेरे चलने में कोई आपत्ति तो न होगी ?

अचल : (हंसकर) वहां आप क्या कीजिएगा, पानी खींचिएगा ?

सबल : क्यों, कोई ऐसा मुश्किल काम नहीं है।

अचल : इन नौकरों में दो-चार अलग कर दिए जाएं तो अच्छा हो, इन्हें देखकर खामखाह कुछ-न-कुछ काम लेने का जी चाहता है। कोई आदमी सामने न हो तो आल्मारी से खुद किता। निकाल लाता हूँ, लेकिन कोई रहता है तो खुद नहीं उठता, उसी को उठाता हूँ। आदमी कम हो जाएंगे तो यह आदत छूट जाएगी।

सबल : हां, तुम्हारा यह प्रस्ताव बहुत अच्छा है। इस पर विचार करूंगा। देखो, नौकर खाली हो गया, जाओ जूते खुलवा लो।

अचल : जी नहीं, अब मैं कभी नौकर से जूता उतरवाऊँगा ही नहीं, और न पहनूंगी। खुद ही पहन लूंगा, उतार लूंगा। आपने इशारा कर दिया वह काफी है।

चला जाता है।

सबल : (मन में) ईश्वर तुम्हें चिरायु करें, तुम होनहार देख पड़ते हो, लेकिन कौन जानता है, आगे चलकर क्या रंग पकड़ोगी। मैं आज के तीन महीने पहले अपनी सच्चरित्रता पर घमंड करता था।वह घमंड एक क्षण में चूर?चूर हो गया। खैर होगा अगर और अब देनदारों पर दावा न हो, केवल हलधर ही पर किया जाए तो घोर अन्याय होगी। मैं चाहता हूँ दावे सभी पर किए जाएं, लेकिन जायदाद किसी की नीलाम न कराई जाए। असामियों को जब मालूम हो जाएगा कि हमने घर छोड़ा और जायदाद गई तो वह कभी न जाएंगी। उनके भागने का एक कारण यह भी होगा कि लगान कहां से देंगे।मैं लगान मुआग कर दूं तो कैसा हो, मेरा ऐसा ज्यादा नुकसान न होगी। इलाके में सब जगह तो ओले गिरे नहीं हैं। सिर्ग दो-तीन गांवों में गिरे हैं, पांच हजार रूपये का मुआमला है। मुमकिन है इस मुआफी की खबर गवर्नमेंट को भी हो जाए और मुआफी का हुक्म दे दे, तो मुझे मुर्ति में यश मिल जाएगा और अगर सरकार न भी मुआग करे तो इतने आदमियों का भला हो जाना ही कौन छोटी बात है ! रहा हलधर, उसे कुछ दिनों के लिए अलग कर देने से मेरी मुश्किल आसान हो जाएगी। यह काम ऐसे गुप्त रीति से होना चाहिए कि किसी को कानोंकान खबर न हो, लोग यही समझें कि कहीं परदेश निकल गया होगा। तब मैं एक बार फिर राजेश्वरी से मिलूं और तकदीर का गैसला कर लूं। तब उसे मेरे यहां आकर रहने में कोई आपत्ति न होगी। गांव में निरावलंब रहने से तो उसका चित्त स्वयं घबरा जाएगी। मुझे तो विश्वास है कि वह यहां सहर्ष चली आएगी। यही मेरा अभीष्ट है। मैं केवल उसके समीप रहना, उसकी मृदु मुस्कान, उसकी मनोहर वाणी।

ज्ञानी का प्रवेश।

ज्ञानी : स्वामीजी से आपकी भेंट हुई ?

सबल : हां।

ज्ञानी : मैं उनके दर्शन करने जाऊँ ?

सबल : नहीं।

ज्ञानी : पाखंडी हैं न ? यह तो मैं पहले ही समझ गई थी

सबल : नहीं, पाखंडी नहीं हैं, विद्वान् हैं, लेकिन मुझे किसी कारण से उनमें श्रद्वा नहीं हुई पवित्रात्मा का यही लक्षण है कि वह दूसरों के ह्रदय में श्रद्वा उत्पन्न कर दे। अभी थोड़ी देर पहले मैं उनका भक्त था पर इतनी देर में उनके उपदेशों पर विचार करने से ज्ञात हुआ कि उनसे तुम्हें ज्ञानोपदेश नहीं मिल सकता और न वह आशीर्वाद ही मिल सकता है, जिससे तुम्हारी मनोकामना पूरी हो!

तीसरा दृश्य

स्थान : मधुबन गांव।

समय : बैशाख, प्रात: काल।

फत्तू : पांचों आदमियों पर डिगरी हो गई। अब ठाकुर साहब जब चाहें उनके बैल-बधिये नीलाम करा लें।

एक किसान : ऐसे निर्दयी तो नहीं हैं। इसका मतलब कुछ और ही है।

फत्तू : इसका मतलब मैं समझता हूँ। दिखाना चाहते हैं कि हम जब चाहें असामियों को बिगाड़ सकते हैं। असामियों को घमंड न हो, फिर गांव में हम जो चाहें करें, कोई मुंह न खोले।

सबलसिंह के चपरासी का प्रवेश।

चपरासी : सरकार ने हुक्म दिया है कि असामी लोग जरा भी चिंता न करें। हम उनकी हर तरह मदद करने को तैयार हैं। जिनके लोगों ने अभी तक लगान नहीं दिया है उनकी माफी हो गई। अब सरकार किसी से लगान न हुई। अगले साल के लगान के साथ यह बकाया न वसूल की जायेगी। यह छूट सरकार की ओर से नहीं हुई है। ठाकुर साहब ने तुम लोगों की परवरिश के खयाल से यह रिआयत की है। लेकिन जो असामी परदेश चला जाएगा उसके साथ यह रिआयत न होगी। छोटे ठाकुर साहब ने देनदारों पर डिगरी कराई है। मगर उनका हुक्म भी यही है कि डिगरी जारी न की जाएगी। हां, जो लोग भागेंगे उनकी जायदाद नीलाम करा ली जाएगी। तुम लोग दोनों ठाकुरों को आशीर्वाद दो।

एक किसान : भगवान दोनों भाइयों की जुगुल जोड़ी सलामत रखें।

दूसरा : नारायन उनका कल्यान करें। हमको जिला लिया, नहीं तो इस विपत्ति में कुछ न सूझता था।

तीसरा : धन्य है उनकी उदारता को। राजा हो तो ऐसा दीनपालक हो, परमात्मा उनकी बढ़ती करे।

चौथा : ऐसा दानी देश में और कौन है। नाम के लिए सरकार को लाखों रूपये चंदा दे आते हैं, हमको कौन पूछता है। बल्कि वह चंदा भी हमीं से ड़डे मार-मारकर वसूल कर लिया जाता है।

पहला : चलो, कल सब जने डेवढ़ी की जय मना आएं।

दूसरा : हां, कल त्तेरे चलो।

तीसरा : चलो देवी के चौरे पर चलकर जय-जयकार मनाएं।

चौथा : कहां है हलधर, कहो ढोल-मजीरा लेता चले।

फत्तू हलधर के घर जाकर खाली हाथ लौट आता है।

पहला किसान : क्या हुआ ? खाली हाथ क्यों आए ?

फत्तू : हलधर तो आज दो दिन से घर ही नहीं आया।

दूसरा किसान : उसकी घरवाली से पूछा, कहीं नातेदारी में तो नहीं गया।

फत्तू : वह तो कहती है कि कल सबेरे खांचा लेकर आम तोड़ने गए थे।तब से लौटकर नहीं आए।

सब-के-सब हलधर के द्वार पर आकर जमा हो जाते हैं। सलोनी और फत्तू घर में जाते हैं।

सलोनी : बेटा, तूने उसे कुछ कहा-सुना तो नहीं। उसे बात बहुत लगती है, लड़कपन से जानती हूँ। गुड़ के लिए रोए, लेकिन मां झमककर गुड़ का पिंड़ा सामने फेंक दे तो कभी न उठाए। जब वह गोद में प्यार से बैठाकर गुड़ तोड़-तोड़ खिलाए तभी चुप हो,

फत्तू : यह बेचारी गऊ है, कुछ नहीं कहती-सुनती।

सलोनी : जरूर कोई-न-कोई बात हुई होगी, नहीं तो घर क्यों न आता ? इसने गहनों के लिए ताना दिया होगा, चाहे महीन साड़ी मांगी हो, भले घर की बेटी है न, इसे महीन साड़ी अच्छी लगती है।

राजेश्वरी : काकी, क्या मैं इतनी निकम्मी हूँ कि देश में जिस बात की मनाही है वही करूंगी।

फत्तू बाहर आता है।

मंगई : मेरे जान में तो उसे थाने वाले पकड़ ले गए।

फत्तू : ऐसा कुमारगी तो नहीं है कि था ने वालों की आंख पर चढ़ जाए।

हरदास : थाने वालों की भली कहते हो, राह चलते लोगों को पकड़ाकरते हैं। आम लिए देखा होगा¼ कहा - ' होगा, चल थाने पहुंचा आ।

फत्तू : ऐसा दबैल तो नहीं है, लेकिन थाने ही पर जाता तो अब तक लौट आना चाहिए था।

मंगई : किसी के रूपये-पैसे तो नहीं आते थे।

फत्तू : और किसी के नहीं, ठाकुर कंचनसिंह के दो सौ रूपये आते हैं।

मंगई : कहीं उन्होंने गिरफ्तारी करा लिया हो,

फत्तू : सम्मन तक तो आया नहीं, नालिस कब हुई, डिगरी कब हुई औरों पर नालिस हुई तो सम्मन आया, पेशी हुई, तजबीज सुनाई गई।

हरदास : बड़े आदमियों के हाथ में सब कुछ है, जो चाहें करा देंब राज उन्हीं का है, नहीं तो भला कोई बात है कि सौ-पचास रूपये के लिए आदमी गिरफ्तारी कर लिया जाए, बाल-बच्चों से अलगकर दिया जाए, उसका सब खेती-बारी का काम रोक दिया जाए।

मंगई : आदमी चोरी या और कोई कुन्याव करता है तब उसे कैद की सजा मिलती है। यहां महाजन बेकसूर हमें थोड़े-से रूपयों के लिए जेहल भेज सकता है। यह कोई न्याव थोड़े ही है।

हरदास : सरकार न जाने ऐसे कानून क्यों बनाती है। महाजन के रूपये आते हैं, जयदाद से ले, गिरफ्तारी क्यों करे।

मंगई : कहीं डमरा टापू वाले न बहका ले गए हों।

फत्तू : ऐसा भोला नहीं है कि उनकी बातों में आ जाए।

मंगई : कोई जान-बूझकर उनकी बातों में थोड़े ही आता है। सब ऐसी-ऐसी पक्री पढ़ाते हैं कि अच्छे-अच्छे धोखे में आ जाते हैं। कहते हैं, इतना तलब मिलेगा, रहने को बंगला मिलेगा, खाने को वह मिलेगा जो यहां रईसों को भी नसीब नहीं, पहनने को रेशमी कपड़े मिलेंगे, और काम कुछ नहीं, बस खेत में जाकर ठंढे-ठंढे देख-भाल आए।

फत्तू : हां, यह तो सच है। ऐसी-ऐसी बातें सुनकर वह आदमी क्यों न धोखे में आ जाए जिसे कभी पेट-भर भोजन न मिलता हो, घास-भूसे से पेट भर लेना कोई खाना है। किसान पहर रात से पहर रात तक छाती गाड़ता है तब भी रोटी-कपड़े को नहीं होता, उस पर कहीं महाजन का डर, कहीं जमींदार की धौंस, कहीं पुलिस की डांट-डपट, कहीं अमलों की नजर-भेंट, कहीं हाकिमों की रसद-बेगारब सुना है जो लोग टापू में भरती हो जाते हैं उनकी बड़ी दुर्गत होती है। झोंपड़ी रहने को मिलती है और रात-दिन काम करना पड़ता है। जरा भी देर हुई तो अफसर कोड़ों से मारता है। पांच साल तक आने का हुकुम नहीं है, उस पर तरह-तरह की सखती होती रहती है। औरतों की बड़ी बेइज्जती होती है, किसी की आबई बचने नहीं पाती। अफसर सब गोरे हैं, वह औरतों को पकड़ ले जाते हैं। अल्लाह न करे कि कोई उन दलालों के गंदे में गंसे ! पांच-छ: साल में कुछ रूपये जरूर हो जाते हैं¼ पर उस लतखोरी से तो अपने देश की ईखी ही अच्छी। मुझे तो बिस्सास ही नहीं आता कि हलधर उनके गांसे में आ जाए।

हरदास : साधु लोग भी आदमियों को बहका ले जाते हैं।

फत्तू : हां, सुना तो है, मगर हलधर साधुओं की संगत में नहीं बैठाब गांजे-चरस की भी चाट नहीं कि इसी लालच से जा बैठता हो,

मंगई : साधु आदमियों को बहकाकर क्या करते हैं ?

फत्तू : भीख मंगवाते हैं और क्या करते हैं। अपना टहल करवाते हैं, बर्तन मंजवाते हैं, गांजा भरवाते हैं। भोले आदमी समझते हैं, बाबाजी सिद्व हैं, प्रसन्न हो जाएंगे तो एक चुटकी राख में मेरा भला हो जाएगा, मुकुत बन जाएगी वह घाते मेंब कुछ कामचोर निखट्टू ऐसे भी हैं जो केवल मीठे पदार्थो के लालच में साधुओं के साथ पड़े रहते हैं। कुछ दिनों में यही टहलुवे संत बन बैठते हैं और अपने टहल के लिए किसी दूसरे को मूंड़ते हैं। लेकिन हलधर न तो पेटू ही है, न कामचोर ही है।

हरदास : कुछ तुम्हारा मन कहता है वह किधर गया होगा? तुम्हारा उसके साथ आठों पहर का उठना-बैठना है।

फत्तू : मेरी समझ में तो वह परदेश चला गया। दो सौ रूपये कंचनसिंह के आते थे।ब्याज समेत ढाई सौ रूपये होंगे।लगान की धौंस अलग। अभी दुधमुंहा बालक है, संसार का रंग-ढ़ंग नहीं देखा, थोड़े में ही फूल उठता है और थोडे। में ही हिम्मत हार बैठता है। सोचा होगा, कहीं परदेश चलूं और मेहनत-मजूरी करके सौ-दो सौ ले आऊँ। दो-चार दिन में चिट्ठी-पत्तर आएगी।

मंगई : और तो कोई चिंता नहीं, मर्द है, जहां रहेगा, वहीं कमा खाएगा, चिंता तो उसकी घरवाली की है। अकेले कैसे रहेगी ?

हरदास : मैके भेज दिया जाए।

मंगई : पूछो, जाएगी ?

फत्तू : पूछना क्या है, कभी न जाएगी। हलधर होता तो जाती। उसके पीछे कभी नहीं जा सकती।

राजेश्वरी : (द्वार पर खड़ी होकर) हां काका, ठीक कहते हो, अभी मैके चली जाऊँ तो घर और गांव वाले यही न कहेंगे कि उनके पीछे गांव में दस-पांच दिन भी कोई देख-भाल करने वाला नहीं रहा तभी तो चली आई। तुम लोग मेरी कुछ चिंता न करो। सलोनी काकी को घर में सुला लिया करूंगी। और डर ही क्या है ? तुम लोग तो हो ही।

चौथा दृश्य

स्थान : हलधर का घर, राजेश्वरी और सलोनी आंगन में लेटी हुई हैं।

समय : आधी रात।

राजेश्वरी : (मन में) आज उन्हें गए दस दिन हो गए। मंगल-मंगल आठ, बुध नौ, वृहस्पत दस। कुछ खबर नहीं मिली, न कोई चिट्ठी न पत्तर। मेरा मन बारम्बार यही कहता है कि यह सब सबलसिंह की करतूत है। ऐसे दानी-धर्मात्मा पुरूष कम होंगे, लेकिन मुझ नसीबों जली के कारन उनका दान-धर्म सब मिट्टी में मिला जाता है। न जाने किस मनहूस घड़ी में मेरा जनम हुआ ! मुझमें ऐसा कौन-सा गुन है ? न मैं ऐसी सुंदरी हूँ, न इतने बनाव-सिंगार से रहती हूँ, माना इस गांव में मुझसे सुंदर और कोई स्त्री नहीं है। लेकिन शहर में तो एक-से-एक पड़ी हुई हैं। यह सब मेरे अभाग का फल है। मैं अभागिनी हूँ। हिरन कस्तूरी के लिए मारा जाता है। मैना अपनी बोली के लिए पकड़ी जाती है। फूलअपनी सुगंध के लिए तोड़ा जाता है। मैं भी अपने रूप-रंग के हाथों मारी जा रही हूँ।

सलोनी : क्या नींद नहीं आती बेटी ?

राजेश्वरी : नहीं काकी, मन बड़ी चिंता में पड़ा हुआ है। भला क्यों काकी, अब कोई मेरे सिर पर तो रहा नहीं, अगर कोई पुरूष मेरा धर्म बिगाड़ना चाहे तो क्या करूं ?

सलोनी : बेटी, गांव के लोग उसे पीसकर पी जाएंगी।

राजेश्वरी : गांव वालों पर बात खुल गई तब तो मेरे माथे पर कलंक लग ही जाएगी।

सलोनी : उसे दंड देना होगी। उससे कपट-प्रेम करके उसे विष पिला देना होगी। विष भी ऐसा कि फिर वह आंखें न खोले। भगवान को, चंद्रमा को, इन्द्र को जिस अपराध का दंड मिला था। क्या, हम उसका बदला न लेंगी। यही हमारा धरम है। मुंह से मीठी-मीठी बातें करो पर मन में कटार छिपाए रखो।

राजेश्वरी : (मन में) हां, अब यही मेरा धरम है। अब छल और कपट से ही मेरी रक्षा होगी। वह धर्मात्मा सही, दानी सही, विद्वान सही, यह भी जानती हूँ कि उन्हें मुझसे प्रेम है, सच्चा प्रेम है। वह मुझे पाकर मुग्ध हो जाएंगे, मेरे इशारों पर नाचेंगे, मुझ पर अपने प्राण न्यौछावर करेंगी। क्या मैं इस प्रेम के बदले कपट कर सयंगी ? जो मुझ पर जान देगा, मैं उसके साथ कैसे दगा करूंगी ? यह बात मरदों में ही है कि जब वह किसी दूसरी स्त्री पर मोहित हो जाते हैं तो पहली स्त्री के प्राण लेने से भी नहीं हिचकते। भगवान्, यह मुझसे कैसे होगा? (प्रकट) क्यों काकी, तुम अपनी जवानी में तो बड़ी सुंदर रही होगी ?

सलोनी : यह तो नहीं जानती बेटी, पर इतना जानती हूँ कि तुम्हारे काका की आंखों में मेरे सिवा और कोई स्त्री जंचती ही न थी। जब तक चार-पांच लड़कों की मां न हो गई, पनघट पर न जाने दिया ।

राजेश्वरी : बुरा न मानना काकी, यों ही पूछती हूँ, उन दिनों कोई दूसरा आदमी तुम पर मोहित हो जाता और काका को जेहल भिजवा देता तो तुम क्या करतीं ?

सलोनी : करती क्या, एक कटारी अंचल के नीचे छिपा लेती। जब वह मेरे उसपर प्रेम के फूलों की वर्षा करने लगता, मेरे सुख-विलास के लिए संसार के अच्छे-अच्छे पदार्थ जमा कर देता, मेरे एक कटाक्ष पर, एक मुस्कान पर, एक भाव पर फूला न समाता, तो मैं उससे प्रेम की बातें करने लगती। जब उस पर नशा छा जाता, वह मतवाला हो जाता तो कटार निकालकर उसकी छाती में भोंक देती।

राजेश्वरी : तुम्हें उस पर तनिक भी दया न आती ?

सलोनी : बेटी, दया दीनों पर की जाती है कि अत्याचारियों पर? धर्म प्रेम के उसपर है, उसी भांति जैसे सूरज चंद्रमा के उसपर है। चंद्रमा की ज्योति देखने में अच्छी लगती है, लेकिन सूरज की ज्योति से संसार का पालन होता है।

राजेश्वरी : (मन में) भगवान्, मुझसे यह कपट-व्यवहार कैसे निभेगा ! अगर कोई दुष्ट, दुराचारी आदमी होता तो मेरा काम सहज था।उसकी दुष्टता मेरे क्रोध को भड़का देती है। भय तो इस पुरूष की सज्जनता से है। इससे बड़ा भय उसके निष्कपट प्रेम से है। कहीं प्रेम की तरंगों में बह तो न जाऊँगी, कहीं विलास में तो मतवाली न हो जाऊँगी। कहीं ऐसा तो न होगा कि महलों को देखकर मन में इस झोंपड़े का निरादर होने लगे, तकियों पर सोकर यह टूटी खाट गड़ने लगे, अच्छे-अच्छे भोजन के सामने इस रूखे-सूखे भोजन से मन फिर जाए,लौंडियों के हाथों पान की तरह गेरे जाने से यह मेहनत?मजूरी अखरने लगे। सोचने लगूं ऐसा सुख पाकर क्यों उस पर लात मारूं ? चार दिन की जिंदगानी है उसे छल-कपट, मरने-मारने में क्यों गंवाऊँ? भगवान की जो इच्छा थी वह हुआ और हो रहा है। (प्रकट) काकी, कटार भोंकते हुए तुम्हें डर न लगता ?

सलोनी : डर किस बात का ? क्या मैं पछी से भी गई-बीती हूँ। चिड़िया को सोने के पिंजरे में रखो, मेवे और मिठाई खिलाओ, लेकिन वह पिंजरे का द्वार खुला पाकर तुरंत उड़ जाती है। अब बेटी, सोओ, आधी रात से उसपर हो गई। मैं तुम्हें गीत सुनाती हूँ।

गाती है।

मुझे लगन लगी प्रभु पावन की।

राजेश्वरी : (मन में) इन्हें गाने की पड़ी है। कंगाल होकर जैसे आदमी को चोर का भय नहीं रहता, न आगम की कोई चिंता, उसी भांति जब कोई आगे-पीछे नहीं रहता तो आदमी निश्ंचित हो जाता है। (प्रकट) काकी, मुझे भी अपनी भांति प्रसन्न-चित्त रहना सिखा दो।

सलोनी : ऐ, नौज बेटी ! चिंता धन और जन से होती है। जिसे चिंता न हो वह भी कोई आदमी है। वह अभागा है, उसका मुंह देखना पाप है। चिंता बड़े भागों से होती है। तुम समझती होगी, बुढ़िया हरदम प्रसन्न रहती है तभी तो गाया करती है। सच्ची बात यह है कि मैं गाती नहीं, रोती हूँ। आदमी को बड़ा आनंद मिलता है तो रोने लगता है। उसी भांति जब दुख अथाह हो जाता है, तो गाने लगता है। इसे हंसी मत समझो, यह पागलपन है। मैं पगली हूँ। पचास आदमियों का परिवार आंखों के सामने से उठ गया। देखें भगवान इस मिट्टी की कौन गत करते हैं।

गाती है।

मुझे लगन लगी प्रभु पावन की।

ए जी पावन की, घर लावन की।

छोड़ काज अरू लाज जगत की।

निश दिन ध्यान लगावन की।। मुझे

सुरत उजाली खुल गई ताली।

गगन महल में जावन की।। मुझे

झिलमिल कारी जो निहारी।

जैसे बिजली सावन की।

मुझे लगन लगी प्रभु पावन की।।

बेटी, तुम हलधर का सपना तो नहीं देखती हो ?

राजेश्वरी : बहुत बुरे-बुरे सपने देखती हूँ। इसी डर के मारे तो मैं और नहीं सोती। आंख झपकी और सपने दिखाई देने लगे।

सलोनी : कल से तुलसी माता को दिया चढ़ा दिया करो। एतवार-मंगल को पीपल में पानी दे दिया करो। महावीर सामी को लड्डू की मनौती कर दो। कौन जाने देवताओं के प्रताप से लौट आए। अच्छा, अब महावीर जी का नाम लेकर सो जाव। रात बहुत हो गई है, दो घड़ी में भोर हो जाएगी।

सलोनी करवट बदलकर सोती है और खर्राटे भरने लगती है।

राजेश्वरी : (आप-ही-आप) बुढ़िया सो रही है, अब मैं चलने की तैयारी करूं। छत्री लोग रन पर जाते थे तो खूब सजकर जाते थे।मैं भी कपड़े-लत्ते से लैस हो जाऊँ। वह पांचों हथियार लगाते थे।मेरे हथियार मेरे गहने हैं। वही पहन लेती हूँ। वह केसर का तिलक लगाते थे, मैं सिंदूर का टीका लगा लेती हूँ। वह मलिच्छों का संहार करने जाते थे, मुझे देवता का संहार करना है। भगवती तुम मेरी सहाय होलेकिन छत्री लोग तो हंसते हुए घर से विदा होते थे।मेरी आंखों में आंसू भरे आते हैं। आज यह घर छूटता

है ! इसे सातवें दिन लीपती थी, त्योहारों पर पोतनी मिट्टी से पोतती थी। कितनी उमंग से आंगन में फुलवारी लगाती थी। अब कौन इनकी इतनी सेवा करेगी। दो ही चार दिनों में यहां भूतों का डेरा हो जाएगी। हो जाए ! जब घर का प्राणी ही नहीं रहा तो घर लेकर क्या करूं ? आह, पैर बाहर नहीं निकलते, जैसे दीवारें खींच रही हों। इनसे गले मिल लूं। गाय-भैंस कितने साध से ली थीं।अब इनसे भी नाता टूटता है। दोनों गाभिन हैं। इनके बच्चों को भी न खेलाने पाई। बेचारी हुड़क-हुड़ककर मर जाएंगी। कौन इन्हें मुंह अंधेरे भूसा-खली देगा, कौन इन्हें तला। में नहलाएगी। दोनों मुझे देखते ही खड़ी हो गई।मेरी ओर मुंह बढ़ा रही है, पूछ रही हैं कि आज कहां की तैयारी है ?

हाय ! कैसे प्रेम से मेरे हाथों को चाट रही हैं ! इनकी आंखों में कितना प्यार है ! आओ, आज चलते-चलतेतुम्हें अपने हाथों से दाना खिला दूं ! हा भगवान् ! दाना नहीं खातीं, मेरी ओर मुंह करके ताकती हैं। समझ रही हैं कि यह इस तरह बहला कर हमें छोड़े जाती है। इनके पास से कैसे जाऊँ ? रस्सी तुड़ा रही हैं, हुंकार मार रही हैं। वह देखो, बैल भी उठ बैठे। वह गए, इन बेचारों की सेवा न हो सकी। वह इन्हें घंटों सहलाया करते थे।लोग कहते हैं तुम्हें आने वाली बातें मालूम हो जाती हैं। कुछ तुम ही बताओ, वह कहां हैं, कैसे हैं, कब आएंगे ? क्या अब कभी उनकी सूरत देखनी न नसीब होगी ? ऐसा जान पड़ता है, इनकी आंखों में आंसू भरे हैं। जाओ, अब तुम सभी को भगवान के भरोसे छोड़ती हूँ। गांव वालों को दया आएगी तो तुम्हारी सुधि लेंगे, नहीं तो यहीं भूखे रहोगी। फत्तू मियां तुम्हारी सेवा करेंगी। उनके रहते तुम्हें कोई कष्ट न होगी। वह दो आंखें भी न करेंगे कि अपने बैलों को दाना और खली दें, तुम्हारे सामने सूखा भूसा डाल देंब लो, अब विदा होती हूँ। भोर हो रहा है, तारे मद्विम पड़ने लगे। चलो मन, इस रोने-बिसूरने से काम न चलेगा ! अब तो मैं हूँ और प्रेम-कौशल का रनछेत्र है। भगवती का और उनसे भी अधिक अपनी दृढ़ता का भरोसा है।

पांचवां दृश्य

स्थान : सबलसिंह का दीवानखाना, खस की टक्रियां लगी हुई, पंखा चल रहा है। सबल शीतलपाटी पर लेटे हुए डेमोक्रेसी नामक ग्रंथ पढ़ रहे हैं, द्वार पर एक दरबान बैठा झपकियां ले रहा है।

समय : दोपहर, मध्यान्ह की प्रचंड धूप।

सबल : हम अभी जनसत्तात्मक राज्य के योग्य नहीं हैं, कदापि नहीं हैं। ऐसे राज्य के लिए सर्वसाधारण में शिक्षा की प्रचुर मात्रा होनी चाहिए । हम अभी उस आदर्श से कोसों दूर हैं। इसके लिए महान स्वार्थ-त्याग की आवश्यकता है। जब तक प्रजा-मात्र स्वार्थ को राष्ट' पर बलिदान करना नहीं सीखती, इसका स्वप्न देखना मन की मिठाई खाना है। अमरीका, प्रांस, दक्षिणी अमरीका आदि देशों ने बड़े समारोह से इसकी व्यवस्था की, पर उनमें से किसी को भी सफलता नहीं हुई वहां अब भी धन और सम्पत्ति वालों के ही हाथों में अधिकार है। प्रजा अपने प्रतिनिधि कितनी ही सावधानी से क्यों न चुने, पर अंत में सत्ता गिने-गिनाए आदमियों के ही हाथों में चली जाती है। सामाजिक और राजनैतिक व्यवस्था ही ऐसी दूषित है कि जनता का अधिकांश मुट्ठी भर आदमियों के वंशवर्ती हो गया है। जनता इतनी निर्बल, इतनी अशक्त है कि इन शक्तिशाली पुरूषों के सामने सिर नहीं उठा सकती। यह व्यवस्था अपवादमय, विनष्टकारी और अत्याचारपूर्ण है। आदर्श व्यवस्था यह है कि सबके अधिकार बराबर हों, कोई जमींदार बनकर, कोई महाजन बनकर जनता पर रोब न जमा सके यह ऊँच-नीच का घृणित भेद उठ जाए। इस सबल?निबल संग्राम में जनता की दशा बिगड़ती चली जाती है। इसका सबसे भयंकर परिणाम यह है कि जनता आत्मसम्मान-विहीन होती जाती है, उसमें प्रलोभनों का प्रतिकार करने, अन्याय का सिर कुचलने की सामर्थ्य नहीं रही। छोटे-छोटे स्वार्थ के लिए बहुधा भयवश कैसे-कैसे अनर्थ हो रहे हैं। (मन में) कितनी यथार्थ बात लिखी है। आज ऐसा कोई असामी नहीं है जिसके घर में मैं अपने दुष्टाचरण का तीर न चला सकूं। मैं कानून के बल से, भय के बल से, प्रलोभन के बल से अपना अभीष्ट पूरा कर सकता हूँ। अपनी शक्ति का ज्ञान हमारे दुस्साहस को, कुभावों को और भी उत्तेजित कर देता है। खैर ! हलधर को जेल गए हुए आज दसवां दिन है, मैं गांव की तरफ नहीं गया। न जाने राजेश्वरी पर क्या गुजर रही है। कौन मुंह लेकर जाऊँ ? अगर कहीं गांव वालों को यह चाल मालूम हो गई होगी तो मैं वहां मुंह भी न दिखा सयंगी। राजेश्वरी को अपनी दशा चाहे कितनी कष्टप्रद जान पड़ती हो, पर उसे हलधर से प्रेम है। हलधर का द्रोही बनकर मैं उसके प्रेम-रस को नहीं पा सकता। क्यों न कल चला जाऊँ, इस उधेड़-बुन में कब तक पड़ा रहूँगी। अगर गांव वालों पर यह रहस्य खुल गया होगा तो मैं विस्मय दिखाकर कह सकता हूँ कि मुझे खबर नहीं है, आज ही पता लगाता हूँ। सब तरह उनकी दिलजोई करनी होगी और हलधर को मुक्त कराना पड़ेगा। सारी बाजी इसी दांव पर निर्भर है। मेरी भी क्या हालत है, पढ़ता हूँ डेमोक्रेसी औरअपने को धोखा देना व्यर्थ है।

यह प्रेम नहीं है, केवल काम-लिप्सा है। प्रेम दुर्लभ वस्तु है, यह उस अधिकार का जो मुझे असामियों पर है, दुरूपयोग मात्र है।

दरबान आता है।

सबल : क्या है ? मैंने कह दिया है इस वक्त मुझे दिक मत किया करो। क्या मुखतार आए हैं ? उन्हें और कोई वक्त ही नहीं मिलता ?

दरबान : जी नहीं, मुखतार नहीं आए हैं। एक औरत है।

सबल : औरत है ? कोई भिखारिन है क्या ? घर में से कुछ लाकर देदो। तुम्हें जरा भी तमीज नहीं है, जरा-सी बात के लिए मुझे दिक किया।

दरबान : हुजूर, भिखारिन नहीं है। अभी फाटक पर एक्के पर से उतरी है। खूब गहने पहने हुई है। कहती है, मुझे राजा साहब से कुछ कहना है।

सबल : (चौंककर) कोई देहातिन होगी। कहां है ?

दरबान : वहीं मौलसरी के नीचे बैठी है।

सबल : समझ गया, ब्राह्मणी है, अपने पति के लिए दवा मांगने आई है। (मन में) वही होगी। दिल कैसा धड़कने लगा। दोपहर का समय है। नौकर-चाकर सब सो रहे होंगे।दरबान को बरफ लाने के लिए बाजार भेज दूं। उसे बगीचे वाले बंगले में ठहराऊँ। (प्रकट) उसे भेज दो और तुम जाकर बाजार से बरफ लेते आओ।

दरबान चला जाता है। राजेश्वरी आती हैं। सबलसिंह तुरंत उठकर उसे बगीचे वाले बंगले में ले जाते हैं।

राजेश्वरी : आप तो टट्टी लगाए आराम कर रहे हैं और मैं जलती हुई धूप में मारी-मारी फिर रही हूँ। गांव की ओर जाना ही छोड़ दिया । सारा शहर भटक चुकी तो मकान का पता मिला।

सबल : क्या कहूँ, मेरी हिमाकत से तुम्हें इतनी तकलीफ हुई, बहुत लज्जित हूँ। कई दिन से आने का इरादा करता था। पर किसी-न-किसी कारण से रूक जाना पड़ता था। बरफ आती होगी, एक गिलास शर्बत पी लो तो यह गरमी दूर हो जाए।

राजेश्वरी : आपकी कृपा है, मैंने बरफ कभी नहीं पी है। आप जानते हैं, मैं यहां क्या करने आई हूँ ?

सबल : दर्शन देने के लिए।

राजेश्वरी : जी नहीं, मैं ऐसी नि: स्वार्थ नहीं हूँ। आई हूँ आपके घर में रहने¼ आपका प्रेम खींच लाया है। जिस रस्सी में बंधी हुई थी वह टूट गई। उनका आज दस-ग्यारह दिन से कुछ पता नहीं है। मालूम होता है कहीं देस-विदेस भाग गए। फिर मैं किसकी होकर रहती। सब छोड़-छाड़कर आपकी सरन आई हूँ, और सदा के लिए। उस ऊजड़ गांव से जी भर गया।

सबल : तुम्हारा घर है, आनंद से रहो, धन्य भाग कि मुझे आज यह अवसर मिला। मैं इतना भाग्यवान हूँ, मुझे इसका विश्वास ही न था।मेरी तो यह हालत हो रही है:

हमारे घर में वह आएं, खुदा की कुदरत है।

कभी हम उनको कभी अपने घर को देखते हैं।

ऐसा बौखला गया हूँ कि कुछ समझ में ही नहीं आता, तुम्हारी कैसे खिदमत करूं।

राजेश्वरी : मुझे इसी बंगले में रहना होगा?

सबल : ऐसा होता तो क्या पूछना था।, पर यहां बखेड़ा है, बदनामी होगी। मैं आज ही शहर में एक अच्छा मकान ठीक कर लूंगा। सब इंतजाम वहीं हो जाएगी।

राजेश्वरी : (प्रेम कटाक्ष से देखकर) प्रेम करते हो और बदनामी से डरते हो, यह कच्चा प्रेम है।

सबल : (झेंपकर) अभी नया रंगरूट हूँ न ?

राजेश्वरी : (सजल नेत्रों से) मैंने अपना सर्वस आपको दे दिया । अब मेरी लाज आपके हाथ है।

सबल : (उसके दोनों हाथ पकड़कर तस्कीन देते हुए) राजेश्वरी, मैं तुम्हारी इस कृपा को कभी न भूलूंगा। मुझे भी आज से अपना सेवक, अपना चाकर, जो चाहे समझो।

राजेश्वरी : (मुस्कराकर) आदमी अपने सेवक की सरन नहीं जाता, अपने स्वामी की सरन आता है। मालूम नहीं आप मेरे मन के भावों को जानते हैं या नहीं, पर ईश्वर ने आपको इतनी विद्या और बुद्वि दी है, आपसे कैसे छिपा रह सकता है। मैं आपके प्रेम, केवल आपके प्रेम के वश होकर आई हूँ। पहली बार जब आपकी निगाह मुझ पर पड़ी तो उसने मुझ पर मंत्र-सा फूंक दिया । मुझे उसमें प्रेम की झलक दिखाई दीब तभी से मैं आपकी हो गई। मुझे भोगविलास की इच्छा नहीं, मैं केवल आपको चाहती हूँ। आप मुझे झोंपड़ी में रखिए, मुझे गजी-गाढ़ा पहनाइए, मुझे उनमें भी सरग का आनंद मिलेगी। बस आपकी प्रेम-दिरिष्ट मुझ पर बनी रहै।

सबल : (गर्व के साथ) मैं जिंदगी-भर तुम्हारा रहूँगा और केवल तुम्हारा। मैंने उच्च कुल में जन्म पाया। घर में किसी चीज की कमी नहीं थी। मेरा पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ, जैसा रईसों के लड़कों का होता है। घर में बीसियों युवती महरियां, महराजिनें थीं।उधर नौकर-चाकर भी मेरी कुवृत्तियों को भड़काते रहते थे।मेरे चरित्र-पतन के सभी सामान जमा थे।रईसों के अधिकांश युवक इसी तरह भ्रष्ट हो जाते हैं। पर ईश्वर की मुझ पर कुछ ऐसी दया थी कि लकड़पन ही से मेरी प्रवृत्ति विद्याभ्यास की ओर थी और उसने युवावस्था में भी साथ न छोड़ाब मैं समझने लगा था।, प्रेम कोई वस्तु ही नहीं, केवल कवियों की कल्पना है। मैंने एक-से-एक यौवनवती सुंदरियां देखी हैं, पर कभी मेरा चित्त विचलित नहीं हुआ। तुम्हें देखकर पहली बार मेरी ह्रदयवीणा के तारों में चोट लगी। मैं इसे ईश्वर की इच्छा के सिवाय और क्या कहूँ। तुमने पहली ही निगाह में मुझे प्रेम का प्याला पिला दिया, तब से आज तक उसी नशे में मस्त था। बहुत उपाय किए, कितनी ही खटाइयां खाई पर यह नशा न उतरा। मैं अपने मन के इस रहस्य को अब तक नहीं समझ सका। राजेश्वरी, सच कहता हूँ, मैं तुम्हारी ओर से निराश था।समझता था, अब यह जिंदगी रोते ही कटेगी, पर भाग्य को धन्य है कि आज घर बैठे देवी के दर्शन हो गए और जिस वरदान की आशा थी, वह भी मिल गया।

राजेश्वरी : मैं एक बात कहना चाहती हूँ, पर संकोच के मारे नहीं कह सकती।

सबल : कहो-कहो मुझसे क्या संकोच ! मैं कोई दूसरा थोड़े ही हूँ।

राजेश्वरी : न कहूँगी, लाज आती है।

सबल : तुमने मुझे चिंता में डाल दिया, बिना सुने मुझे चैन न आएगी।

राजेश्वरी : कोई ऐसी बात नहीं है, सुनकर क्या कीजिएगा!

सबल : (राजेश्वरी के दोनों हाथ पकड़कर) बिना कहे न जाने दूंगा, कहना पड़ेगा।

राजेश्वरी : (असमंजस में पड़कर) मैं सोचती हूँ, कहीं आप यह समझें कि जब यह अपने पति की होकर न रही तो मेरी होकर क्या रहेगी। ऐसी चंचल औरत का क्या ठिकाना?

सबल : बस करो राजेश्वरी, अब और कुछ मत कहो, तुमने मुझे इतना नीच समझ लिया। अगर मैं तुम्हें अपना ह्रदय खोलकर दिखा सकता तो तुम्हें मालूम होता कि मैं तुम्हें क्या समझता हूँ। वह घर, उस घर के प्राणी, वह समाज, तुम्हारे योग्य न थे। गुलाब की शोभा बाग में है, घूरे पर नहीं। तुम्हारा वहां रहना उतना अस्वाभाविक था। जितना सुअर के माथे पर सेंदुर का टीका होता है या झोंपड़ी में झाड़। वह जलवायु तुम्हारे सर्वथा। प्रतिकूल थी। हंस मरूभूमि में नहीं रहता। इसी तरह अगर मैं सोचूं, कहीं तुम यह न समझो कि जब यह अपनी विवाहिता स्त्री का न हुआ तो मेरा क्या होगा, तो ?

राजेश्वरी : (गंभीरता से) मुझमें और आप में बड़ा अंतर है।

सबल : यह बातें फिर होंगी, इस वक्त आराम करो, थक गई होगी। पंखा खोले देता हूँ। सामने वाली कोठरी में पानी-वानी सब रखा हुआ है। मैं अभी आता हूँ।

छठा दृश्य

सबलसिंह का भवन। गुलाबी और ज्ञानी फर्श पर बैठी हुई हैं। बाबा चेतनदास गालीचे पर मसनद लगाए लेटे हुए हैं। रात के आठ बजे हैं।

गुलाबी : आज महात्माजी ने बहुत दिनों के बाद दर्शन दिए ।

ज्ञानी : मैंने समझा था। कहीं तीर्थ करने चले गए होंगी।

चेतनदास : माताजी मेरे को अब तीर्थयात्रा से क्या प्रयोजन ? ईश्वर तो मन में है, उसे पर्वतों के शिखर और नदियों के तट पर क्यों खोजूं ? वह घट-घटव्यापी है, वही तुममें है, वही मुझमें है, उसी की अखिल ज्योति है। यह विभिन्नता केवल बहिर्जगत में है, अंतर्जगत में कोई भेद नहीं है। मैं अपनी कुटी में बैठा हुआ ध्यानावस्था में अपने भक्तों से साक्षात् करता रहा हूँ। यह मेरा नित्य का नियम है।

गुलाबी : (ज्ञानी से) महात्माजी अंतरजामी हैं। महाराज, मेरा लड़का मेरे कहने में नहीं है। बहू ने उस पर न जाने कौन-सा मंत्र डाल दिया है कि मेरी बात ही नहीं पूछता। जो कुछ कमाता है वह लाकर बहू के हाथ में देता है, वह चाहे कान पकड़कर उठाए या बैठाए, बोलता ही नहीं। कुछ ऐसा उतजोग कीजिए कि वह मेरे कहने में हो जाए, बहू की ओर से उसका चित्त फिर जाए। बस यही मेरी लालसा है।

चेतनदास : (मुस्कराकर) बेटे को बहू के लिए ही तो पाला पोसा था।अब वह बहू का हो रहा तो तेरे को क्यों ईर्ष्या होती है ?

ज्ञानी : महाराज, वह स्त्री के पीछे इस बेचारी से लड़ने पर तैयार हो जाता है।

चेतनदास : वह कोई बात नहीं है। मैं उसे मोम की भांति जिधर चाहूँ फेर सकता हूँ, केवल इसको मुझ पर श्रद्वा रखनी चाहिए । श्रद्वा, श्रद्वा, श्रद्वा¼ यही अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष की प्राप्ति का मूलमंत्र है। श्रद्वा से ब्रã मिल जाता है। पर श्रद्वा उत्पन्न कैसे हो ? केवल बातों ही से श्रद्वा उत्पन्न नहीं हो सकती। वह कुछ देखना चाहती है। बोलो, क्या दिखाऊँ ? तुम दोनों मन में कोई बात ले लो।मैं अपने योगबल से अभी बतला दूंगा। ज्ञानी देवी, पहले तुम मन में कोई बात लो।

ज्ञानी : ले लिया, महाराज!

चेतनदास : (ध्यान करके) बड़ी दूर चली गई। मोतियों का हार है न ?

ज्ञानी : हां महाराज, यही बात थी।

चेतनदास : गुलाबी, अब तुम कोई बात लो।

गुलाबी : ले ली, महाराज!

चेतनदास : (ध्यान करके, मुस्कराकर) बहू से इतना द्वेष? वह मर

जाए?

गुलाबी : हां, महाराज, यही बात थी। आप सचमुच अंतरजामी हैं।

चेतनदास : कुछ और देखना चाहती हो ? बोलो, क्या वस्तु यहां मंगवाऊँ ? मेवा, मिठाई, हीरे, मोती इन सब वस्तुओं के ढेर लगा सकता हूँ। अमरूद के दिन नहीं हैं, जितना अमरूद चाहो मंगवा दूं। भेजो प्रभूजी, भेजो, तुरत भेजो:

मोतियों का ढेर लगता है।

गुलाबी : आप सिद्व हैं।

ज्ञानी : आपकी चमत्कार-शक्ति को धन्य है!

चेतनदास : और क्या देखना चाहती हो ? कहो, यहां से बैठे-बैठे अंतरध्यान हो जाऊँ और फिर यहीं बैठा हुआ मिलूं। कहो, वहां उस वृक्ष के नीचे तुम्हें नेपथ्य में गाना सुनाऊँ। हां, यही अच्छा है। देवगण तुम्हें गाना सुनाएंगे, पर तुम्हें उनके दर्शन न होंगे।उस वृक्ष के नीचे चली जाओ।

दोनों जाकर पेड़ के नीचे खड़ी हो जाती हैं। गाने की ध्वनि आने लगती है।

बाहिर ढूंढ़न जा मत सजनी,

पिया घर बीच बिराज रहे री।-

गगन महल में सेज बिछी है

अनहद बाजे बाज रहे री।-

अमृत बरसे, बिजली चमके

घुमर-घुमर घन गाज रहे री।-

ज्ञानी : ऐसे महात्माओं के दर्शन दुर्लभ होते हैं।

गुलाबी : पूर्वजन्म में बहुत अच्छे कर्म किए थे।यह उसी का फल है।

ज्ञानी : देवताओं को भी बस में कर लिया है।

गुलाबी : जोगबल की बड़ी महिमा है। मगर देवता बहुत अच्छा नहीं गाते। गला दबाकर गाते हैं क्या ?

ज्ञानी : पगला गई है क्या ! महात्माजी अपनी सिद्वि दिखा रहे हैं कि तुम्हारे लिए देवताओं की संगीत-मंडली खड़ी की है।

गुलाबी : ऐसे महात्मा को राजा साहब धूर्त कहते हैं।

ज्ञानी : बहुत विद्या पढ़ने से आदमी नास्तिक हो जाता है। मेरे मन में तो इनके प्रति भक्ति और श्रद्वा की एक तरंग-सी उठ रही है। कितना देवतुल्य स्वरूप है।

गुलाबी : कुछ भेंट-भांट तो लेंगे नहीं ?

ज्ञानी : अरे राम-राम ! महात्माओं को रूपये-पैसे का क्या मोह?

देखती तो हो कि मोतियों के ढेर सामने लगे हुए हैं, किस चीज की कमी है ?

दोनों कमरे में आती हैं। गाना बंद होता है।

ज्ञानी : अरे ! महात्माजी कहां चले गए?यहां से उठते तो नहीं देखा ।

गुलाबी : उनकी माया कौन जाने ! अंतरध्यान हो गए होंगी।

ज्ञानी : कितनी अलौकिक लीला है!

गुलाबी : अब मरते दम तक इनका दामन न छोडूंगी। इन्हीं के साथ रहूँगी और सेवा-टहल करती रहूँगी।

ज्ञानी : मुझे तो पूरा विश्वास है कि मेरा मनोरथ इन्हीं से पूरा होगी।

सहसा चेतनदास मसनद लगाए बैठे दिखाई देते हैं।

गुलाबी : (चरणों पर गिरकर) धन्य हो महाराज, आपकी लीला अपरम्पार है।

ज्ञानी : (चरणों पर गिरकर) भगवान्, मेरा उद्वार करो।

चेतनदास : कुछ और देखना चाहती है ?

ज्ञानी : महाराज, बहुत देख चुकी। मुझे विश्वास हो गया कि आप मेरा मनोरथ पूरा कर देंगी।

चेतनदास : जो कुछ मैं कहूँ वह करना होगी।

ज्ञानी : सिर के बल करूंगी।

चेतनदास : कोई शंका की तो परिणाम बुरा होगी।

ज्ञानी : (कांपती हुई) अब मुझे कोई शंका नहीं हो सकती। जब आपकी शरण आ गई तो कैसी शंका ?

चेतनदास : (मुस्कराकर) अगर आज्ञा दूं, कुएं में कूद पड़!

ज्ञानी : तुरंत कूद पडूंगी। मुझे विश्वास है कि उससे भी मेरा कल्याण होगी।

चेतनदास : अगर कहूँ, अपने सब आभूषण उतारकर मुझे दे दे तो मन में यह तो न कहेगी, इसीलिए यह जाल फैलाया था।, धूर्त है।

ज्ञानी : (चरणों में गिरकर) महाराज, आप प्राण भी मांगें तो आपकी भेंट करूंगी।

चेतनदास : अच्छा अब जाता हूँ। परीक्षा के लिए तैयार रहना।

सातवां दृश्य

समय : प्रात: काल, ज्येष्ठ।

स्थान : गंगा का तट। राजेश्वरी एक सजे हुए कमरे में मसनद लगाए बैठी है। दो-तीन लौंडियां इधर-उधर दौड़कर काम कर रही हैं। सबलसिंह का प्रवेश।

सबल : अगर मुझे उषा का चित्र खींचना हो तो तुम्हीं को नमूना बनाऊँ। तुम्हारे मुख पर मंद समीरण से लहराते हुए केश ऐसी शोभा दे रहे हैं मानो...

राजेश्वरी : दो नागिनें लहराती चली जाती हों, किसी प्रेमी को डसने के लिए।

सबल : तुमने हंसी में उड़ा दिया, मैंने बहुत ही अच्छी उपमा सोची थी।

राजेश्वरी : खैर, यह बताइए तीन दिन तक दर्शन क्यों नहीं दिया ।

सबल : (असमंजस में पड़कर) मैंने समझा शायद मेरे रोज आने से किसी को संदेह हो जाए।

राजेश्वरी : मुझे इसकी कुछ परवाह नहीं है। आपको यहां नित्य आना होगी। आपको क्या मालूम है कि यहां किस तरह तड़प?तड़पकर दिन काटती हूँ।

सबल : राजेश्वरी, मैं अपनी दशा कैसे दर्शाऊँ। बस, यही समझ लो जैसे पानी बिना मछली के तड़पती हो, न सैर करने को जी चाहता है, न घर से निकलने का, न किसी से मिलने-जुलने को यहां तक कि सिनेमा देखने को भी जी नहीं चाहता। जब यहां आने लगता हूँ तो ऐसी प्रबल उत्कंठा होती है कि उड़कर आ पहुंचूं। जब यहां से चलता हूँ तो ऐसा जान पड़ता है कि मुकदमा हार आया हूँ। राजेश्वरी, पहले मेरी केवल यही इच्छा थी कि तुम्हें आंखों से देखता रहूँ, तुम्हारी मधुर वाणी सुनता रहूँ। तुम्हें अपनी देवी बनाकर पूजना चाहता था।, पर जैसे ज्वर में जल से तृप्ति नहीं होती, जैसे नई सभ्यता में विलास की वस्तुओं से तृप्ति नहीं होती, वैसे ही प्रेम का भी हाल है¼ वह सर्वस्व देना और सर्वस्व लेना चाहता है। इतना यत्न करने पर भी घर के लोग मुझे चिंतित नेत्रों से देखने लगे हैं। उन्हें मेरे स्वभाव में कोई ऐसी बात नजर आती है जो पहले नहीं आती थी। न जाने इसका क्या अंत होगा!

राजेश्वरी : इसका जो अंत होगा वह मैं जानती हूँ और उसे जानते हुए मैंने इस मार्ग पर पांव रखा है। पर उन चिंताओं को छोड़िए। जब ओखली में सिर दिया है तो मूसलों का क्या डर ! मैं यही चाहती हूँ कि आप दिन में किसी समय अवश्य आ जाया करें। आपको देखकर मेरे चित्त की ज्वाला शांत हो जाती है, जैसे जलते हुए घाव पर मरहम लग जाए। अकेले मुझे डर भी लगता है कि कहीं वह हलजोत किसान मेरी टोह लगाता हुआ आ न पहुंचे। यह भय सदैव मेरे ह्रदय पर छाया रहता है। उसे क्रोध आता है तो वह उन्मत्त हो जाता है। उसे जरा भी खबर मिल गई तो मेरी जान की खैरियत नहीं है।

सबल : उसकी जरा भी चिंता मत करो। मैंने उसे हिरासत में रखवा दिया है। वहां छह महीने तक रखूंगा। अभी तो एक महीने से कुछ ही उसपर हुआ है। छह महीने के बाद देखा जाएगी। रूपये कहां हैं कि देकर छूटेगा!

राजेश्वरी : क्या जाने उसके गाय-बैल कहां गए ? भूखों मर गए होंगी।

सबल : नहीं, मैंने पता लगाया था।वह बुङ्ढा मुसलमान फत्तू उसके सब जानवरों को अपने घर ले गया है और उनकी अच्छी तरह सेवा करता है।

राजेश्वरी : यह सुनकर चिंता मिट गई। मैं डरती थी कहीं सब जानवर मर गए हों तो हमें हत्या लगे।

सबल : (घड़ी देखकर) यहां आता हूँ तो समय के पर-से लग जाते हैं। मेरा बस चलता तो एक-एक मिनट के एक-एक घंटे बना देता।

राजेश्वरी : और मेरा बस चलता तो एक-एक घंटे के एक-एक मिनट बना देती। जब प्यास-भर पानी न मिले तो पानी में मुंह ही क्यों लगाए। जब कपड़े पर रंग के छींटे ही डालने हैं तो उसका उजला रहना ही अच्छा। अब मन को समेटना सीखूंगी।

सबल : प्रिय

राजेश्वरी : (बात काटकर) इस पवित्र शब्द को अपवित्र न कीजिए।

सबल : (सजल नयन होकर) मेरी इतनी याचना तुम्हें स्वीकार करनी पड़ेगी। प्रिये, मुझे अनुभव हो रहा है कि यहां रहकर हम आनंदमय प्रेम का स्वर्ग-सुख न भोग सकेंगी। क्यों न हम किसी सुरम्य स्थान पर चलें जहां विघ्न और बाधाओं, चिंताओं और शंकाओं से मुक्त होकर जीवन व्यतीत हो, मैं कह सकता हूँ कि मुझे जलवायु परिवर्तन के लिए किसी स्वास्थ्यकर स्थान की जरूरत है¼ जैसे गढ़वाल, आबू पर्वत या रांची)

राजेश्वरी : लेकिन ज्ञानी देवी को क्या कीजिएगा? क्या वह साथ न चलेंगी?

सबल : बस यही एक रूकावट है। ऐसा कौन-सा यत्न करूं कि वह मेरे साथ चलने पर आग्रह न करे। इसके साथ ही कोई संदेह भी न हो।

राजेश्वरी : ज्ञानी सती हैं, वह किसी तरह यहां न रहेंगी। यूं आप दस-पांच दिन, या एक-दो महीने के लिए कहीं जाएं तो वह साथ न जाएंगी, लेकिन जब उन्हें मालूम होगा कि आपका स्वास्थ्य अच्छा नहीं है तब वह किसी तरह न रूकेंगी। और यह बात भी है कि ऐसी सती स्त्री को मैं दु: खी नहीं करना चाहती। मैं तो केवल आपका प्रेम चाहती हूँ। उतना ही जितना ज्ञानी से बचे। मैं उनका अधिकार नहीं छीनना चाहती। मैं उनके पैरों की धूल के बराबर भी नहीं हूँ। मैं उनके घर में चोर की भांति घुसी हूँ। उनसे मेरी क्या बराबरी। आप उन्हें दु: खी किए बिना मुझ पर जितनी कृपा कर सकते हैं उतनी कीजिए।

सबल : (मन में) कैसे पवित्र विचार हैं ! ऐसा नारी-रत्न पाकर मैं उसके सुख से वंचित हूँ। मैं कमल तोड़ने के लिए क्यों पानी में घुसा जब जानता था कि वहां दलदल है। मदिरा पीकर चाहता हूँ कि उसका नशा न हो।

राजेश्वरी : (मन में) भगवन्, देखूं अपने व्रत का पालन कर सकती हूँ या नहीं कितने पवित्र भाव हैं¼ कितना अगाध प्रेम!

सबल : (उठकर) प्रिये, कल इसी वक्त फिर आऊँगा। प्रेमालिंगन के लिए चित्त उत्कंठित हो रहा है।

राजेश्वरी : यहां प्रेम की शांति नहीं, प्रेम की दाह है। जाइए। देखूं, अब यह पहाड़-सा दिन कैसे कटता है। नींद भी जाने कहां भाग गई!

सबल : (छज्जे के जीने से लौटकर) प्रिये, गजब हो गया, वह देखो, कंचनसिंह जा रहे हैं। उन्होंने मुझे यहां से उतरते देख लिया। अब क्या करूं ?

राजेश्वरी : देख लिया तो क्या हरज हुआ ? समझे होंगे आप किसी मित्र से मिलने आए होंगे।जरा मैं भी उन्हें देख लूं।

सबल : जिस बात का मुझे डर था। वही हुआ। अवश्य ही उन्हें कुछ टोह लग गई है। नहीं तो इधर उनके आने का कोई काम न था।यह तो उनके पूजा?पाठ का समय है। इस वक्त कभी बाहर नहीं निकलते। हां, गंगास्नान करने जाते हैं, मगर घड़ी रात रहै। इधर से कहां जाएंगी। घरवालों को संदेह हो गया।

राजेश्वरी : आपसे स्वरूप बहुत मिलता हुआ है। सुनहरी ऐनक खूब खिलती है।

सबल : अगर वह सिर झुकाए अपनी राह चले जाते तो मुझे शंका न होती¼ पर वह इधर-उधर, नीचे-उपर इस भांति ताकते जाते थे जैसे शोहदे कोठों की ओर झांकते हैं। यह उनका स्वभाव नहीं है। बड़े ही धर्मज्ञ, सच्चरित्र, ईश्वरभक्त पुरूष हैं। सांसारिकता से उन्हें घृणा है। इसीलिए अब तक विवाह नहीं किया।

राजेश्वरी : अगर यह हाल है तो यहां पूछताछ करने जरूर आएंगी।

सबल : मालूम होता है इस घर का पता पहले लगा लिया है। इस समय पूछताछ करने ही आए थे।मुझे देखा तो लौट गए। अब मेरी लज्जा, मेरा लोक-सम्मान, मेरा जीवन तुम्हारे अधीन है। तुम्हीं मेरी रक्षा कर सकती हो।

राजेश्वरी : क्यों न कोई दूसरा मकान ठीक कर लीजिए।

सबल : इससे कुछ न होगी। बस यही उपाय है कि जब वह यहां आएं तो उन्हें चकमा दिया जाए। कहला भेजो, मैं सबलसिंह को नहीं जानती। वह यहां कभी नहीं आते। दूसरा उपाय यह है कि उन्हें कुछ दिनों के लिए यहां से टाल दूं। कह देता हूँ कि जाकर लायलपुर से गेहूँ खरीद लाओ। तब तक हम लोग यहां से कहीं और चल देंगी।

राजेश्वरी : यही तरकीब अच्छी है।

सबल : अच्छी तो है, पर हुआ बड़ा अनर्थ। अब पर्दा ढका रहना कठिन है।

राजेश्वरी : (मन में) ईश्वर, यही मेरी प्रतिज्ञा के पूरे होने का अवसर है। मुझे बल प्रदान करो। (प्रकट) यह सब मुसीबतें मेरी लाई हुई हैं। मैं क्या जानती थी कि प्रेम-मार्ग में इतने कांटे हैं।

सबल : मेरी बातों का ध्यान रखना। मेरे होश ठिकाने नहीं हैं। चलूं, देखूं, मुआमला अभी कंचनसिंह ही तक है या ज्ञानी को भी खबर हो गई।

राजेश्वरी : आज संध्या समय आइए। मेरा जी उधर ही लगा रहेगा।

सबल : अवश्य आऊँगा। अब तो मन लागि रह्यो होनी हो सो होई। मुझे अपनी कीर्ति बहुत प्यारी है। अब तक मैंने मान-प्रतिष्ठा ही को जीवन का आधार समझ रखा था।, पर अब अवसर आया तो मैं इसे प्रेम की वेदी पर उसी तरह चढ़ा दूंगा जैसे उपासक पुष्पों को चढ़ा देता है, नहीं जैसे कोई ज्ञानी पार्थिव वस्तुओं को लात मार देता है।

जाता है।

आठवां दृश्य

समय : संध्या, जेठ का महीना।

स्थान : मधुबन। कई आदमी फत्तू के द्वार पर खड़े हैं।

मंगई : फत्तू, तुमने बहुत चक्कर लगाया, सारा संसार छान डाला।

सलोनी : बेटा, तुम न होते तो हलधर का पता लगना मुसकिल था।

हरदास : पता लगना तो मुसकिल नहीं था।, हां जरा देर में लगता।

मंगई : कहां-कहां गए थे ?

फत्तू : पहले तो कानपुर गया। वहां के सब पुतलीघरों को देखा । कहीं पता न लगी। तब लोगों ने कहा, बंबई चले जाव। वहां चला गया। मुदा उतने बड़े शहर में कहां-कहां ढूंढ़ता। चार-पांच दिन पुतलीघरों में देखने गया, पर हिया। छूट गया। शहर काहे को है पूरा मुलुक है। जान पड़ता है संसार भर के आदमी वहीं आकर जमा हो गए हैं। तभी तो यहां गांव में आदमी नहीं मिलते। सच मानो, कुछ नहीं तो एक हजार मील तो होंगी। रात-दिन उनकी चिमनियों से धुआं निकला करता है। ऐसा जान पड़ता है, राक्षसों की गौज मुंह से आग निकालती आकाश से लड़ने जा रही है। आखिर निराश होकर वहां से चला आया। गाड़ी में एक बाबूजी से बातचीत होने लगी। मैंने सब राम?कहानी उन्हें सुनाई। बड़े दयावान आदमी थे।कहा , किसी अखबार में छपा दो कि जो उनका पता बता देगा उसे पचास रूपये इनाम दिया जाएगी। मेरे मन में भी बात जम गई। बाबूजी ही से मसौदा बनवा लिया और यहां गाड़ी से उतरते ही सीधे अखबार के दफ्तर में गया। छपाई का दाम देकर चला आया। पांचवें दिन वह चपरासी यहां आया जो मुझसे खड़ा बातें कर रहा था।उसने रत्ती-रत्ती सब पता बता दिया । हलधर न कलकत्ता गया है न बंबई, यहीं हिरासत में है। वही कहावत हुई, गोद में लड़का सहर में ढ़िढोरा।

मंगई : हिरासत में क्यों है ?

फत्तू : महाजन की मेहरबानी और क्या?माघ-पूस में कंचनसिंह के यहां से कुछ रूपये लाया था। बस नादिहंदी के मामले में गिरफ्तारी करा दिया ।

हरदास : उनके रूपये तो यहां और कई आदमियों पर आते हैं, किसी को गिरफ्तारी नहीं कराया। हलधर पर ही क्यों इतनी टेढ़ी निगाह की?

फत्तू : पहले सबको गिरफ्तारी कराना चाहते थे, पर बाद को सबलसिंह ने मना कर दिया । दावा दायर करने की सलाह थी। पर बड़े ठाकुर तो दयावान जीव हैं, दावा भी मुल्तवी कर दिया, इधर लगान भी मुआग कर दी। मुझसे जब चपरासी ने यह हाल कहा तो जैसे बदन में आग जल गई। सीधे कंचनसिंह के पास गया और मुंह में जो कुछ आया कह सुनाया। सोच लिया था।, दो-चार का सिर तोड़ के रख दूंगा, जो होगा देखा जाएगी। मगर बेचारे ने जबान तक नहीं खोली। जब मैंने कहा , आप बड़े धर्मात्मा की पूंछ बनते हैं, सौ-दो सौ रूपयों के लिए गरीबों को जेहल में डालते हैं, उस आदमी का तो यह हाल हुआ, उसकी घरवाली का कहीं पता नहीं, मालूम नहीं कहीं डूब मरी या क्या हुआ, यह सब पाप किसके सिर पड़ेगा, खुदाताला को क्या मुंह दिखाओगे तो बेचारे रोने लगे। लेकिन जब रूपयों की बात आई तो उस रकम में एक पैसा भी छोड़ने की हामी नहीं भरी।

सलोनी : इतनी दौड़धूप तो कोई अपने बेटे के लिए भी न करता। भगवान इसका फल तुम्हें देंगी।

हरदास : महाजन के कितने रूपये आते हैं ?

फत्तू : कोई ढाई सौ होंगे।थोड़ी?थोड़ी मदद कर दो तो आज ही हलधर को छुड़ा लूं। मैं बहुत जेरबारी में पड़ गया हूँ। नहीं तो तुम लोगों से न मांगता।

मंगई : भैया, यहां रूपये कहां, जो कुछ लेई-पूंजी थी वह बेटी के गौने में खर्च हो गई। उस पर पत्थर ने और भी चौपट कर दिया ।

सलोनी : बने के साथी सब होते हैं, बिगड़े का साथी कोई नहीं होता।

मंगई : जो चाहे समझो, पर मेरे पास कुछ नहीं है।

हरदास : अगर दस-बीस दे भी दें तो कौन जल्दी मिले जाते हैं। बरसों में मिलें तो मिलें। उसमें सबसे पहले अपनी जमा लेंगे, तब कहीं औरों को मिलेगी।

मंगई : भला इस दौड़-धूप में तुम्हारे कितने रूपये लगे होंगे ?

फत्तू : क्या जाने, मेरे पास कोई हिसाब-किताब थोड़े ही है!

मंगई : तब भी अंदाज से ?

फत्तू : कोई एक सौ बीस रूपये लगे होंगी।

मंगई : (हरदास को कनखियों से देखकर) बेचारा हलधर तो बिना मौत मर गया। सौ रूपये इन्होंने चढ़ा दिए, ढाई सौ रूपये महाजन के होते हैं, गरी। कहां तक भरेगा ?

फत्तू : मुसीबत में जो मदद की जाती है वह अल्लाह की राह में की जाती है। उसे कर्ज नहीं समझा जाता।

हरदास : तुम अपने सौ रूपये तो सीधे कर लोगे ?

सलोनी : (मुंह चिढ़ाकर) हां, दलाली के कुछ पैसे तुझे भी मिल जाएंगी। मुंह धो रखना। हां बेटा, उसे छुड़ाने के लिए ढाई सौ रूपये की क्या गिकर करोगे ? कोई महाजन खड़ा किया है ?

फत्तू : नहीं, काकी, महाजनों के जाल में न पडूंगा। कुछ तुम्हारी बहू के गहने-पाते हैं वह गिरो रख दूंगा। रूपये भी उसके पास कुछ-न-कुछ निकल ही आएंगे। बाकी रूपये अपने दोनों नाटे बेचकर खड़े कर लूंगा।

सलोनी : महीने ही भर में तो तुम्हें फिर बैल चाहने होंगी।

फत्तू : देखा जाएगी। हलधर के बैलों से काम चलाऊँगा।

बेटा : बेटा, तुम तो हलधर के पीछे तबाह हो गए।

फत्तू : काकी, इन्हीं दिनों के लिए तो छाती गाड़-गाड़ कमाते हैं।

और लोग थाने-अदालतों में रूपये बर्बाद करते हैं। मैंने तो एक पैसा भी बर्बाद नहीं किया। हलधर कोई गैर तो नहीं है, अपना ही लड़का है। अपना लड़का इस मुसीबत में होता तो उसकोछुड़ाना पड़ता न ! समझ लूंगा कि अपनी बेटी के निकाह में लग गए।

सलोनी : (हरदास की ओर देखकर) देखा, मर्द ऐसे होते हैं। ऐसे सपूतों के जन्म से माता का जीवन सुफल होता है। तुम दोनों हलधर के पट्टीदार हो, एक ही परदादा के परपोते हो, पर तुम्हारा लोहू सफेद हो गया है। तुम तो मन में खुश होगे कि अच्छा हुआ वह गया, अब उसके खेतों पर हम कब्जा कर हुई।

हरदास : काकी, मुंह न खुलवाओ। हमें कौन हलधर से वाह-वाही लूटनी है, न एक के दो वसूल करने हैं। हम क्यों इस झमेले में पडें। यहां न ऊधो का लेना, न माधो का देना, अपने काम-से-काम है। फिर हलधर ने कौन यहां किसी की मदद कर दी ? प्यासों मर भी जाते तो पानी को न पूछता। हां, दूसरों के लिए चाहे घर लुटा देते हों।

मंगई : हलधर की बात ही क्या है, अभी कल का लड़का है। उसके बाप ने भी कभी किसी की मदद की ? चार दिन की आई बहू है, वह भी हमें दुसमन समझती है।

सलोनी : (फत्तू से) बेटा, सांझ हुई, दीयाबत्ती करने जाती हूँ। तुम थोड़ी देर में मेरे पास आना, कुछ सलाह करूंगी।

फत्तू : अच्छा एक गीत तो सुनाती जाओ। महीनों हो गए तुम्हारा गाना नहीं सुना।

सलोनी : इन दोनों को अब कभी अपना गाना न सुनाऊँगी।

हरदास : लो, हम कानों में उंगली रखे लेते हैं।

सलोनी : हां, कान खोलना मत।

गाती है।

ढूंढ़ गिरी सारा संसार, नहीं मिला कोई अपना।

भाई भाई बैरी है गए, बाप हुआ जमदूत।

दया-धरम का उठ गया डेरा, सज्जनता है सपना।

नहीं मिला कोई अपना।

जाती है।

नौवां दृश्य

स्थान : मधुवन, हलधर का मकान, गांव के लोग जमा हैं।

समय : ज्येष्ठ की संध्या।

हलधर : (बाल बढ़े हुए, दुर्बल, मलिन मुख) फत्तू काका, तुमने मुझे नाहक छुड़ाया, वहीं क्यों न घुलने दिया । अगर मुझे मालूम होता कि घर की यह दशा है तो उधर से ही देश-विदेश की राह लेता, यहां अपना काला मुंह दिखाने न आता। मैं इस औरत को पतिव्रता समझता था।देवी समझकर उसकी पूजा करता था।पर यह नहीं जानता था। कि वह मेरे पीठ फेरते ही यों पुरखों के माथे पर कलंक लगाएगी। हाय!

सलोनी : बेटा, वह सचमुच देवी थी। ऐसी पतिबरता नारी मैंने नहीं देखी। तुम उस पर संदेह करके उस पर बड़ा अन्याय कर रहे हो, मैं रोज रात को उसके पास सोती थी। उसकी आंखें रात-की-रात खुली रहती थीं।करवटें बदला करती। मेरे बहुत कहने-सुनने पर भी कभी-कभी भोजन बनाती थी, पर दो-चार कौर भी न खाया जाता। मुंह जूठा करके उठ आती। रात-दिन तुम्हारी ही चर्चा, तुम्हारी ही बातें किया करती थी। शोक और दु: ख में जीवन से निराश होकर उसने चाहे प्राण दे दिए हों पर वह कुल को कलंक नहीं लगा सकती। बरम्हा भी आकर उस पर यह दोख लगाएं तो मुझे उन पर बिसवास न आएगी।

फत्तू : काकी, तुम तो उसके साथ सोती ही बैठती थीं, तुम जितना जानती हो उतना मैं कहां से जानूंगा, लेकिन इससे गांव में सत्तर बरस की उमिर गुजर गई, सैकड़ों बहुएं आई पर किसी में वह बात नहीं पाई जो इसमें है। न ताकना, न झांकना, सिर झुकाए अपनी राह जाना, अपनी राह आना। सचमुच ही देवी थी।

हलधर : काका, किसी तरह मन को समझाने तो दो। जब अंगूठी पानी में फिर गई तो यह सोचकर क्यों न मन को धीरज दूं कि उसका नग कच्चा था।हाय, अब घर में पांव नहीं रखा जाता।ऐसा जान पड़ता है कि घर की जान निकल गई।

सलोनी : जाते-जाते घर को लीप गई है। देखो अनाज मटकों में रखकर इनका मुंह मिट्टी से बंद कर दिया है। यह घी की हांड़ी है। लबालब भरी हुई बेचारी ने संच कर रखा था।क्या कुल्टाएं गिरस्ती की ओर इतना ध्यान देती हैं ? एक तिनका भी तो इधर-उधर पड़ा नहीं दिखाई देता।

हलधर : (रोकर) काकी, मेरे लिए अब संसार सूना हो गया। वह गंगा की गोद में चली गई। अब फिर उसकी मोहिनी मूरत देखने को न मिलेगी। भगवान बड़ा निर्दयी है। इतनी जल्दी छीन लेना था। तो दिया ही क्यों था।

फत्तू : बेटा, अब तो जो कुछ होना था। वह हो चुका, अब सबर करो और अल्लाताला से दुआ करो कि उस देवी को निजात दे। रोने-धोने से क्या होगा ! वह तुम्हारे लिए थी ही नहीं उसे भगवान ने रानी बनने के लिए बनाया था।कोई ऐसी ही बात हो गई थी कि वह कुछ दिनों के लिए इस दुनिया में आई थी। वह मियाद पूरी करके चली गई। यही समझकर सबर करो।

हलधर : काका, नहीं सबर होता। कलेजे में पीड़ा हो रही है। ऐसा जान पड़ता है, कोई उसे जबरदस्ती मुझसे छीन ले गया हो, हां, सचमुच वह मुझसे छीन ली गयी है, और यह अत्याचार किया है सबलसिंह और उनके भाई ने। न मैं हिरासत में जाता, न घर यों तबाह होता। उसका वध करने वाले, उसकी जान लेने वाले यही दोनों भाई हैं ? नहीं, इन दोनों भाइयों को क्यों बदनाम करूं, सारी विपत्ति इस कानून की लाई हुई है, जो गरीबों को धनी लोगों की मुट्ठी में कर देता है। फिर कानून को क्यों कहूँ। जैसा संसार वैसा व्यवहारब

फत्तू : बस, यही बात है, जैसा संसार वैसा व्यवहार। धनी लोगों

के हाथ में अख्तियार है। गरीबों को सताने के लिए जैसा

कानून चाहते हैं, बनाते हैं। बैठो, नाई बुलवाए देता हूँ, बाल बनवा लो।

हलधर : नहीं काका, अब इस घर में न बैठूंगा। किसके लिए घर-बार

के झमेले में पडूं। अपना पेट है, उसकी क्या चिंता ! इस अन्यायी संसार में रहने का जी नहीं चाहता। ढाई सौ रूपयो के पीछे मेरा सत्यानास हो गया। ऐसा परबस होकर जिया ही तो क्या ! चलता हूँ, कहीं साधु-वैरागी हो जाऊँगा, मांगता-खाता फिरूंगा।

हरदास : तुम तो साधु-बैरागी हो जाओगे, यह रूपये कौन भरेगा ?

फत्तू : रूपये-पैसे की कौन बात है, तुमको इससे क्या मतलब? यह

तो आपस का व्यवहार है, हमारी अटक पर तुम काम आए,

तुम्हारी अटक पर हम काम आएंगी। कोई लेन-देन थोड़ा ही किया है !

सलोनी : इसकी बिच्छू की भांति डंक मारने की आदत है।

हलधर : नहीं, इसमें बुरा मानने की कोई बात नहीं है। फत्तू काका, मैं तुम्हारी नेकी को कभी नहीं भूल सकता। तुमने जो कुछ किया वह अपना बाप भी न करता। जब तक मेरे दम-में-दम है तुम्हारा और तुम्हारे खानदान का गुलाम बना रहूँगी। मेरा घर-द्वार, खेती-बारी, बैल-बधिये, जो कुछ है सब तुम्हारा है, और मैं तुम्हारा गुलाम हूँ। बस, अब मुझे बिदा करो, जीता रहूँगा तो फिर मिलूंगा, नहीं तो कौन किसका होता है। काकी, जाता हूँ, सब भाइयों को राम-राम !

फत्तू : (रास्ता रोककर गद्गद कंठ से) बेटा, इतना दिल छोटा न करो। कौन जाने, अल्लाताला बड़ा कारसाज है, कहीं बहू का पता लग ही जाये। इतने अधीर होने की कोई बात नहीं है।

हरदास : चार दिन में तो दूसरी सगाई हो जाएगी।

हलधर : भैया, दूसरी सगाई अब उस जनम में होगी। इस जनम में तो अब ठोकर खाना ही लिखा है। अगर भगवान को यह न मंजूर होता तो क्या मेरा बना-बनाया घर उजड़ जाता ?

फत्तू : मेरा तो दिल बार-बार कहता है कि दो-चार दिन में राजेश्वरी का पता जरूर लग जाएगी। कुछ खाना बनाओ, खाओ, सबेरे चलेंगे, फिर इधर-उधर टोह लगाएंगी।

हरदास : पहले जाके ताला। में अच्छी तरह असनान कर लो।चलूं, जानवर हार से आ गए होंगे।(सब चले जाते हैं।)

हलधर : यह घर गाड़े खाता है, इसमें तो बैठा भी नहीं जाता । इस वक्त काम करके आता था। तो उसकी मोहनी सूरत देखकर चित्त कैसा खिल जाता था।कंचन, तूने मेरा सुख हर लिया, तूने मेरे घर में आग जल दी। ओहो, वह कौन उजली साड़ी पहने उस घर में खड़ी है। वही है, छिपी हुई थी। खड़ी है, आती नहीं (उस घर के द्वार पर जाकर) राम ! राम ! कितना भरम हुआ, सन की गांठ रखी हुई है अब उसके दर्शन फिर नसीब न होंगे।जीवन में अब कुछ नहीं रहा। हा, पापी, निर्दयी ! तूने मेरा सर्वनाश कर दिया, मुट्ठी भर रूपयों के पीछे ! इस अन्याय का मजा तुझे चखाऊँगा। तू भी क्या समझेगा कि गरीबों का गला काटना कैसा होता है

लाठी लेकर घर से निकल जाता है।

दसवां दृश्य

स्थान : गुलाबी का घर।

समय : प्रात: काल।

गुलाबी : जो काम करन बैठती है उसी की हो रहती है। मैंने घर में झाडू लगाई, पूजा के बासन धोए, तोते को चारा खिलाया, गाय खोली, उसका गोबर उठाया, और यह महारानी अभी पांच सेर गेहूँ लिये जांत पर औंघ रही हैं। किसी काम में इसका जी नहीं लगता। न जाने किस घमंड में भूली रहती है। बाप के पास ऐसा कौन-सा दहेज था। कि किसी धनिक के घर जाती । कुछ नहीं, यह सब तुम्हारे सिर चढ़ाने का फल है। औरत को जहां मुंह लगाया कि उसका सिर गिराब फिर उसके पांव जमीन पर नहीं पड़ते। इस जात को तो कभी मुंह लगाए ही नहीं चाहे कोई बात भी न हो¼ पर उसका मान मरदन नित्य करता रहै।

भृगु : क्या करूं अम्मां, सब कुछ करके तो हार गया। कोई बातसुनती ही नहीं ज्योंही गरम पड़ता हूँ, रोने लगती है। बस दया आ जाती है।

गुलाबी : मैं रोती हूँ तब तो तेरा कलेजा पत्थर का हो जाता है, उसे रोते देखकर क्यों दया आ जाती है।

भृगु : अम्मां, तुम घर की मालकिन हो, तुम रोती हो तो हमारा दु: ख देखकर रोती हो, तुम्हें कौन कुछ कह सकता है ?

गुलाबी : तू ही अपने मन से समझ, मेरी उमिर अब नौकरी करने की

है। यह सब तेरे ही कारण न करना पड़ता है ? तीन महीने

हो गए, तूने घर के खरच के लिए एक पैसा भी न दिया । मैं न जाने किस-किस उपाय से काम चलाती हूँ।तू कमाता है तो क्या करता है ? जवान बेटे के होते मुझे छाती गाड़नी पड़े, तो दिनों को रोऊँ कि न रोऊँ। उस पर घर में कोई बात पूछने वाला नहीं पूछो महरानी से महीने-भर हो गए, कभी सिर में तेल डाला, कभी पैर दबाए। सीधे मुंह बात तो करतीं नहीं, भला सेवा क्या करेंगी। रोऊँ न तो क्या करूं ? मौत भी नहीं आ जाती कि इस जंजाल से छूट जाती। जाने कागद कहां खो गया।

भृगु : अम्मां ऐसी बातें न करो। तुम्हारे बिना यह गिरस्ती कौन

चलाएगा? तुम्हीं ने पाल-पोसकर इतना बड़ा किया है। जब तक जीती हो इसी तरह पाले जाओ। फिर तो यह चक्की गले पड़ेगी ही।

गुलाबी : अब मेरा किया नहीं होता।

भृगु : तो मुझे परदेस जाने दो। यहां मेरा किया कुछ न होगी।

गुलाबी : आखिर मुनीबी में तुझे कुछ मिलता है कि नहीं वह सब कहां उड़ा देता है ?

भृगु : कसम ले लो जो इधर तीन महीने में कौड़ी से भेंट हुई हो,

जब से ओले पड़े हैं, ठाकुर साहब ने लेन-देन सब बंद कर दिया है।

गुलाबी : तेरी मारगत बाजार से सौदा-सुलफ आता है कि नहीं घर में जिस चीज का काम पड़ता है वह मैं तुझी से मंगवाने को कहती हूँ। पांच-छ: सौ का सौदा तो भीतर ही का आता होगी। तू उसमें कुछ काटपेच नहीं करता ?

भृगु : मुझे तो अम्मां, यह सब कुछ नहीं आता।

गुलाबी : चल, झूठे कहीं के मेरे सौदे में तो तू अपनी चाल चल ही जाता है, वहां न चलेगी। दस्तूरी पाता है, भाव में कसता है। तौल में कसता है। उस पर मुझसे उड़ने चला है। सुनती हूँ दलाली भी करते हो, यह सब कहां उड़ जाता है ?

भृगु : अम्मां, किसी ने तुमसे झूठमूठ कह दिया होगी। तुम्हारा सरल स्वभाव है, जिसने जो कुछ कह दिया वही मान जाती हो, तुम्हारे चरण छूकर कहता हूँ जो कभी दलाली की हो, सौदे-सुलुफ में दो-चार रूपये कभी मिल जाते हैं तो भंग-बूटी, पान-पत्ते का खर्च चलता है।

गुलाबी : जाकर चुड़ैल से कह दे पानी-वानी रखे, नहाऊँ नहीं तो ठाकुर के यहां कैसे जाऊँगी ? सारे दिन चक्की के नाम को रोया करेगी क्या ?

भृगु : अम्मां, तुम्हीं जाकर कहो, मेरा कहना न मानेगी।

गुलाबी : हां, तू क्यों कहेगा ! तुझे तो उसने भेड़ बना लिया है। ऊंगलियों पर नचाया करती है। न जाने कौन-सा जादू डाल दिया है कि तेरी मति ही हर गई। जा, ओढ़नी ओढ़ के बैठब

बहू के पास जाती है।

क्यों रे, सारे दिन चक्की के नाम को रोएगी या और भी कोई काम है ?

चम्पा : क्या चार हाथ-पैर कर लूं ? क्या यहां सोयी हूँ!

गुलाबी : चुप रह, डाकून कहीं की, बोलने को मरी जाती है। सेर-भर गेहूँ लिए बैठी है। कौन लड़के-बाले रो रहे हैं कि उनके तेल- उबटन में लगी रहती है। घड़ी रात रहे क्यों नहीं उठती? बांझिन, तेरा मुंह देखना पाप है।

चम्पा : इसमें भी किसी का बस है ? भगवान नहीं देते तो क्या अपने हाथों से गढ़ लूं ?

गुलाबी : फिर मुंह नहीं बंद करती चुड़ैल। जीभ कतरनी की तरह चला करती है। लजाती नहीं तेरे साथ की आई बहुरियां दो-दो लड़कों की मां हो गई हैं और तू अभी बांठ बनी है। न जाने कब तेरा पैरा इस घर से उठेगी। जा, नहाने को पानी रख दे, नहीं तो भले परांठे चखाऊँगी। एक दिन काम न करूं तो मुंह में मक्खी आने-जाने लगे। सहज में ही यह चरबौतियां नहीं उड़ती।

बहू : जैसी रोटियां तुम खिलाती हो ऐसी जहां छाती गाडूंगी वहीं मिल जाएंगी। यहां गद्दी-मसनद नहीं लगी है।

गुलाबी : (दांत पीसकर) जी चाहता है सट से तालू से जबान खींच लें। कुछ नहीं, मेरी यह सब सांसत भगुवा करा रहा है, नहीं तो तेरी मजाल थी कि मुझसे यों जबान चलाती । कलमुंहे को और घर न मिलता था। जो अपने सिर की बला यहां पटक गया। अब जो पाऊँ तो मुंह झौंस दूं।

चम्पा : अम्मांजी, मुझे जो चाहो कह लो, तुम्हारा दिया खाती हूँ, मारो या काटो, दादा को क्यों कोसती हो ? भाग बखानो कि बेटे के सिर पर मौर चढ़ गया, नहीं तो कोई बात भी न पूछता। ऐसा हुस्न नहीं बरसता था। कि देख के लट्टू हो जाता।

गुलाबी : भगवान को डरती हूँ, नहीं तो कच्चा ही खा जाती। न जाने कब इस अभागिन बांझ से संग छूटेगी।

चली जाती है। भृगु आता है।

चम्पा : तुम मुझे मेरे घर क्यों नहीं पहुंचा देते, नहीं एक दिन कुछ खाकर सो रहूँगी तो पछताओगे। टुकुर-टुकुर देखा करते हो, पर मुंह नहीं खुलता कि अम्मां, वह भी तो आदमी है, पांच सेर गहूँ पीसना क्या दाल-भात का कौर है ?

भृगु : -तुम उसकी बातों का बुरा क्यों मानती हो, मुंह ही से न कहती है कि और कुछ। समझ लो कुतिया भूंक रही है। दुधार गाय की लात भी सही जाती है। आज नौकरी करना छोड़ दें तो सारी गृहस्थी का बोझ मेरे ही सिर पड़ेगा कि और किसी के सिर ? धीरज धरे कुछ दिन पड़ी रहो, चार थान गहने हो जाएंगे, चार पैसे गांठ में हो जाएंगी। इतनी मोटी बात भी नहीं समझती हो, झूठ-मूठ उलझ जाती हो,

चम्पा : मुझसे तो ताने सुनकर चुप नहीं रहा जाता। शरीर में ज्वाला-सी उठने लगती है।

भृगु : उठने दिया करो, उससे किसी के जलने का डर नहीं है। बस उसकी बातों का जवाब न दिया करो। इस कान सुना और उस कान उड़ा दिया ।

चप्पा : सोनार कंठा कब देगा ?

भृगु : दो-तीन दिन में देने को कहा है। ऐसे सुंदर दाने बनाए हैं कि देखकर खुश हो जाओगी। यह देखो

चम्पा : क्या है ?

भृगु : न दिखाऊँगा, न।

चम्पा : मुट्ठी खोलो।यह गिन्नी कहां पाई ? मैं न दूंगी।

भृगु : पाने की न पूछो, एक असामी रूपये लौटाने आया था।खाते में दो रूपये सैकड़े का दर लिखा है, मैंने ढाई रूपये सैकड़े की दर से वसूल किया।

बाहर चला जाता है।

चम्पा : (मन में) बुढ़िया सीधी होती तो चैन-ही-चैन था।

अंक - तीन

प्रथम दृश्य

स्थान : कंचनसिंह का कमरा।

समय : दोपहर, खस की टट्टी लगी हुई है, कंचनसिंह सीतलपाटी बिछाकर लेटे हुए हैं, पंखा चल रहा है।

कंचन : (आप-ही-आप) भाई साहब में तो यह आदत कभी नहीं थी। इसमें अब लेश-मात्र भी संदेह नहीं है कि वह कोई अत्यंत रूपवती स्त्री है। मैंने उसे छज्जे पर से झांकते देखा था।, भाई साहब आड़ में छिप गए थे।अगर कुछ रहस्य की बात न होती तो वह कदापि न छिपते, बल्कि मुझसे पूछते, कहां जा रहे हो, मेरा माथा उसी वक्त ठनका था। जब मैंने उन्हें नित्यप्रति बिना किसी कोचवान के अपने हाथों टमटम हांकते सैर करने जाते देखा । उनकी इस भांति घूमने की आदत न थी। आजकल न कभी क्लब जाते हैं न और किसी से मिलते?जुलते हैं। पत्रों से भी रूचि नहीं जान पड़ती। सप्ताह में एक-न -एक लेख अवश्य लिख लेते थे, पर इधर महीनों से एक पंक्ति भी कहीं नहीं लिखी, यह बुरा हुआ। जिस प्रकार बंधा हुआ पानी खुलता है तो बड़े वेग से बहने लगता है अथवा रूकी वायु चलती है तो बहुत प्रचण्ड हो जाता है, उसी प्रकार संयमी पुरूष जब विचलित होता है, यह अविचार की चरम सीमा तक चला जाता है। न किसी की सुनता है, न किसी के रोके रूकता है, न परिणाम सोचता है। उसके विवेक और बुद्वि पर पर्दा-सा पड़ जाता है। कदाचित् भाई साहब को मालूम हो गया है कि मैंने उन्हें वहां देख लिया। इसीलिए वह मुझसे माल खरीदने के लिए पंजाब जाने को कहते हैं। मुझे कुछ दिनों के लिए हटा देना चाहते हैं। यही बात है, नहीं तो वह माल-वाल की इतनी चिंता कभी न किया करते थे।मुझे तो अब कुशल नहीं दीखती। भाभी को कहीं खबर मिल गई तो वह प्राण ही दे देंगी। बड़े आश्चर्य की बात है कि ऐसे विद्वान, गंभीर पुरूष भी इस मायाजाल में फंस जाते हैं। अगर मैंने अपनी आंखों न देखा होता तो भाई साहब के संबंध में कभी इस दुष्कल्पना का विश्वास न आता।

ज्ञानी का प्रवेश।

ज्ञानी : बाबूजी, आज सोए नहीं ?

कंचन : नहीं, कुछ हिसाब-किताब देख रहा था।भाई साहब ने लगान न मुआफ कर दिया होता तो अबकी मैं ठाकुरद्वारे में जरूर हाथ लगा देता। असामियों से कुछ रूपये वसूल होते, लेकिन उन पर दावा ही न करने दिया ।

ज्ञानी : वह तो मुझसे कहते थे दो-चार महीनों के लिए पहाड़ों की सैर करने जाऊँगा। डारुक्टर ने कहा है, यहां रहोगे तो तुम्हारा स्वास्थ्य बिगड़ जाएगी। आजकल कुछ दुर्बल भी तो हो गये हैं। बाबूजी एक बात पूछूं, बताओगे। तुम्हें भी इनके स्वभाव में कुछ अंतर दिखायी देता है ? मुझे तो बहुत अंतर मालूम होता है। वह कभी इतने नम्र और सरल नहीं थे।अब वह एक-एक बात सावधान होकर कहते हैं कि कहीं मुझे बुरा न लगे। उनके सामने जाती हूँ तो मुझे देखते ही मानो नींद से चौंक पड़ते हैं और इस भांति हंसकर स्वागत करते हैं जैसे कोई मेहमान आया हो, मेरा मुंह जोहा करते हैं कि कोई बात कहे और उसे पूरी कर दूं। जैसे घर के लोग बीमार का मन रखने का यत्न करते हैं या जैसे किसी शोक-पीड़ित मनुष्य के साथ लोगों का व्यवहार सदय हो जाता है, उसी प्रकार आजकल पके हुए गोड़े की तरह मुझे ठेस से बचाया जाता है। इसका रहस्य कुछ मेरी समझ में नहीं आता। खेद तो मुझे यह है कि इन सारी बातों में दिखावट और बनावट की बू आती है। सच्चा क्रोध उतना ह्दयभेदी नहीं होता जितना कृत्रिम प्रेम।

कंचन : (मन में) वही बात है। किसी बच्चे से हम अशर्फी ले लेते हैं कि खो न दे तो उसे मिठाइयों से फुसला देते हैं। भाई साहब ने भाभी से अपना प्रेम-रत्न छीन लिया है और बनावटी स्नेह और प्रणय से इनको तस्कीन देना चाहते हैं। इस प्रेम-मूर्ति का अब परमात्मा ही मालिक है। (प्रकट) मैंने तो इधर ध्यान नहीं दिया । स्त्रियां सूक्ष्मदर्शी होती हैं

खिदमतगार आता है। ज्ञानी चली जाती है।

कंचन : क्या काम है ?

खिदमतगार : यह सरकारी लिगागा आया है। चपरासी बाहर खड़ा है।

कंचन : (रसीद की बही पर हस्ताक्षर करके) यह सिपाही को दो। (खिदमतगार चला जाता है।) अच्छा, गांव वालों ने मिलकर हलधर को छुड़ा लिया। अच्छा ही हुआ। मुझे उससे कोई दुश्मनी तो थी नहीं मेरे रूपये वसूल हो गए। यह कार्रवाई न की जाती तो कभी रूपये न वसूल होते। इसी से लोग कहते हैं कि नीचों को जब तक खूब न दबाओ उनकी गांठ नहीं खुलती। औरों पर भी इसी तरह दावा कर दिया गया होता तो बात-की-बात में सब रूपये निकल आते। और कुछ न होता तो ठाकुरद्वारे में हाथ तो लगा ही देता। भाई साहब को समझाना तो मेरा काम नहीं, उनके सामने रोब, शर्म और संकोच से मेरी जबान ही न खुलेगी। उसी के पास चलूं, उसके रंग-ढ़ंग देखूं, कौन है, क्या चाहती है, क्यों यह जाल फैलाया है ? अगर धन के लोभ से यह माया रची है तो जो कुछ उसकी इच्छा हो देकर यहां से हटा दूं। भाई साहब को और समस्त परिवार को सर्वनाश से बचा लूं। (फिर खिदमतगार आता है।) क्या बार-बार आते हो ? क्या काम है? मेरे पास पेशगी देने के लिए रूपये नहीं हैं।

खिदमतगार : हुजूर, रूपये नहीं मांगता। बड़े सरकार ने आपको याद किया है।

कंचन : (मन में) मेरा तो दिल धक-धक कर रहा है, न जाने क्यों बुलाते हैं ! कहीं पूछ न बैठें, तुम मेरे पीछे क्यों पड़े हुए हो,

उठकर ठाकुर सबलसिंह के कमरे में जाते हैं।

सबल : तुमको एक विशेष कारण से तकलीफ दी है। इधर कुछ दिनों से मेरी तबीयत अच्छी नहीं रहती, रात को नींद कम आती है और भोजन से भी अरूचि हो गई है।

कंचन : आपका भोजन आधा भी नहीं रहा।

सबल : हां, वह भी जबरदस्ती खाता हूँ। इसलिए मेरा विचार हो रहा है कि तीन-चार महीनों के लिए मंसूरी चला जाऊँ।

कंचन : जलवायु के बदलने से कुछ लाभ तो अवश्य होगा।

सबल : तुम्हें रूपयों का प्रबंध करने में ज्यादा असुविधा तो न होगी ?

कंचन : उसपर तो केवल पांच हजार रूपये होंगे।चार हजार दो सौ पचास रूपये मूलचंद ने दिये हैं, पांच सौ रूपये श्रीराम ने, और ढाई सौ रूपये हलधर ने।

सबल : (चौंककर) क्या हलधर ने भी रूपये दे दिए ?

कंचन : हां, गांव वालों ने मदद की होगी।

सबल : तब तो वह छूटकर अपने घर पहुंच गया होगा?

कंचन : जी हां।

सबल : (कुछ देर तक सोचकर) मेरे सफर की तैयारी में कै दिन लगेंगे?

कंचन : क्या जाना बहुत जरूरी है ? क्यों न यहीं कुछ दिनों के लिए देहात चले जाइए। लिखने-पढ़ने का काम भी बंद कर दीजिए।

सबल : डारुक्टरों की सलाह पहाड़ों पर जाने की है। मैं कल किसी वक्त यहां से मंसूरी चला जाना चाहता हूँ।

कंचन : जैसी इच्छा।

सबल : मेरे साथ किसी नौकर-चाकर के जाने की जरूरत नहीं है। तुम्हारी भाभी चलने के लिए आग्रह करेंगी। उन्हें समझा देना कि तुम्हारे चलने से खर्च बहुत बढ़ जाएगी। नौकर, महरी, मिसराइन, सभी को जाना पड़ेगा और इस वक्त इतनी गुंजाइश नहीं ।

कंचन : अकेले तो आपको बहुत तकलीफ होगी।

सबल : (खीझकर) क्या संसार में अकेले कोई यात्रा नहीं करता ? अमरीका के करोड़पति तक एक हैंडबैग लेकर भारत की यात्रा पर चल खड़े होते हैं, मेरी कौन गिनती है। मैं उन रईसों में नहीं हूँ जिनके घर में चाहे भोजन का ठिकाना न हो, जायदाद बिकी जाती हो, पर जूता नौकर ही पहनाएगा, शौच के लिए लोटा लेकर नौकर ही जाएगा। यह रियासत नहीं हिमाकत है।

कंचनसिंह चले जाते हैं।

सबल : (मन में) वही हुआ जिसकी आशंका थी। आज ही राजेश्वरी से चलने को कहूँ और कल प्रात: काल यहां से चल दूं। हलधर कहीं आ पड़ा और उसे संदेह हो गया तो बड़ी मुश्किल होगी। ज्ञानी आसानी से न मानेगी । उसे देखकर दया आती है। किंतु आज ह्रदय को कड़ा करके उसे भी रोकना पड़ेगा।

अंचल का प्रवेश।

अचल : दादाजी, आप पहाड़ों पर जा रहे हैं, मैं भी साथ चलूंगा।

सबल : बेटा, मैं अकेले जा रहा हूँ, तुम्हें तकलीफ होगी।

अचल : इसीलिए तो मैं और चलना चाहता हूँ। मैं चाहता हूँ कि खूब तकलीफ हो, सब काम अपने हाथों करना पड़े, मोटा खाना मिले और कभी मिले, कभी न मिले। तकलीफ उठाने से आदमी की हिम्मत मजबूत हो जाती है, वह निर्भय हो जाता है। जरा-जरा-सी बातों से घबराता नहीं, मुझे जरूर ले चलिए।

सबल : मैं वहां एक जगह थोड़े ही रहूँगा। कभी यहां, कभी वहां।

अचल : यह तो और भी अच्छा है। तरह-तरह की चीजें, नये-नये दृश्य देखने में आएंगी। और मुल्कों में तो लड़कों को सरकार की तरफ से सैर करने का मौका दिया जाता है। किताबों में भी लिखा है कि बिना देशाटन किए अनुभव नहीं होता, और भूगोल जानने का तो इसके सिवा कोई अन्य उपाय नहीं है । नक्शों और माडलों के देखने से क्या होता है ! मैं इस मौके को न जाने दूंगा।

सबल : बेटा, तुम कभी-कभी व्यर्थ में जिद करने लगते हो, मैंने कह दिया कि मैं इस वक्त अकेले ही जाना चाहता हूँ, यहां तक कि किसी नौकर को भी साथ नहीं ले जाता। अगले वर्ष मैं तुम्हें इतनी सैरें करा दूंगा कि तुम ऊब जाओगी। (अचल उदास होकर चला जाता है।) अब सफर की तैयारी करूं। मुख्तसर ही सामान ले जाना मुनासिब होगी। रूपये हों तो जंगल में भी मंगल हो सकता है। आज शाम को राजेश्वरी से भी चलने की तैयारी करने को कह दूंगा, प्रात: काल हम दोनों यहां से चले जाएं। प्रेम-पाश में फंसकर देखा, नीति का, आत्मा का, धर्म का कितना बलिदान करना पड़ता है, और किस-किस वन की पत्तियां तोड़नी पड़ती हैं ।

दूसरा दृश्य

स्थान : राजेश्वरी का सजा हुआ कमरा।

समय : दोपहर।

लौंडी : बाईजी, कोई नीचे पुकार रहा है।

राजेश्वरी : (नींद से चौंककर) क्या कहा - ', आग जली है ?

लौंडी : नौज, कोई आदमी नीचे पुकार रहा है।

राजेश्वरी : पूछा नहीं कौन है, क्या कहता है, किस मतलब से आया है ? संदेशा लेकर दौड़ चली, कैसे मजे का सपना देख रही थी।

लौंडी : ठाकुर साहब ने तो कह दिया है कि कोई कितना ही पुकारे, कोई हो, किवाड़ न खोलना, न कुछ जवाब देना। इसीलिए मैंने कुछ पूछताछ नहीं की।

राजेश्वरी : मैं कहती हूँ जाकर पूछो, कौन है ?

महरी जाती है और एक क्षण में लौट आती है।

लौंडी : अरे बाईजी, बड़ा गजब हो गया। यह तो ठाकुर साहब के छोटे भाई बाबू कंचनसिंह हैं। अब क्या होगा?

राजेश्वरी : होगा क्या, जाकर बुला ला।

लौंडी : ठाकुर साहब सुनेंगे तो मेरे सिर का बाल भी न छोड़ेंगे।

राजेश्वरी : तो ठाकुर साहब को सुनाने कौन जाएगा ! अब यह तो नहीं हो सकता कि उनके भाई द्वार पर आएं और मैं उनकी बात तक न पूछूं। वह अपने मन में क्या कहेंगे ! जाकर बुला ला और दीवानखाने में बिठला। मैं आती हूँ।

लौंडी : किसी ने पूछा तो मैं कह दूंगी, अपने बाल न नुचवाऊँगी।

राजेश्वरी : तेरा सिर देखने से तो यही मालूम होता है कि एक नहीं कई बार बाल नुच चुके हैं। मेरी खातिर से एक बार और नुचवा लेना । यह लो, इससे बालों के बढ़ाने की दवा ले लेना।

लौंडी चली जाती है।

राजेश्वरी : (मन में) इनके आने का क्या प्रयोजन है ? कहीं उन्होंने जाकर इन्हें कुछ कहा-सुना तो नहीं ? आप ही मालूम हो जाएगी। अब मेरा दांव आया है। ईश्वर मेरे सहायक हैं । मैं किसी भांति आप ही इनसे मिलना चाहती थी। वह स्वयं आ गए। (आईने में सूरत देखकर) इस वक्त किसी बनाव चुनाव की जरूरत नहीं, यह अलसाई मतवाली आंखें सोलहों सिंगार के बराबर हैं। क्या जानें किस स्वभाव का आदमी है। अभी तक विवाह नहीं किया है, पूजा-पाठ, पोथी-पत्रे में रात-दिन लिप्त रहता है। इस पर मंत्र चलना कठिन है। कठिन हो सकता है, पर असाध्य नहीं है। मैं तो कहती हूँ, कठिन भी नहीं है। आदमी कुछ खोकर तब सीखता है। जिसने खोया ही नहीं वह क्या सीखेगी। मैं सचमुच बड़ी अभागिन हूँ। भगवान् ने यह रूप दिया था। तो ऐसे पुरूष का संग क्यों दिया जो बिल्कुल दूसरों की मुट्ठी में था। ! यह उसी का फल है कि जिनके सज्जनों की मुझे पूजा करनी चाहिए थी, आज मैं उनके खून की प्यासी हो रही हूँ। क्यों न खून की प्यासी होऊँ ? देवता ही क्यों न हो, जब अपना सर्वनाश कर दे तो उसकी पूजा क्यों करूं ! यह दयावान हैं, धर्मात्मा हैं, गरीबों का हित करते हैं पर मेरा जीवन तो उन्होंने नष्ट कर दिया । दीन-दुनिया कहीं का न रखा। मेरे पीछे एक बेचारे भोले-भाले, सीधे-सादे आदमी के प्राणों के घातक हो गए। कितने सुख से जीवन कटता था।अपने घर में रानी बनी हुई थी। मोटा खाती थी, मोटा पहनती थी, पर गांव-भर में मरजाद तो थी। नहीं तो यहां इस तरह मुंह में कालिख लगाए चोरों की तरह पड़ी हूँ जैसे कोई कैदी कालकोठरी में बंद हो, आ गए कंचनसिंह, चलूं। (दीवानखाने में आकर) देवरजी को प्रणाम करती हूँ।

कंचन : (चकित होकर मन में) मैं न जानता था कि यह ऐसी सुंदरी रमणी है। रम्भा के चित्र से कितनी मिलती-जुलती है ! तभी तो भाई साहब लोट-पोट हो गए। वाणी कितनी मधुर है। (प्रकट) मैं बिना आज्ञा ही चला आया, इसके लिए क्षमा मांगता हूँ। सुना है भाई साहब का कड़ा हुक्म है कि यहां कोई न आने पाए।

राजेश्वरी : आपका घर है, आपके लिए क्या रोक-टोक ! मेरे लिए तो जैसे आपके भाई साहब, वैसे आपब मेरे धन्य भाग कि आप जैसे भक्त पुरूष के दर्शन हुए ।

कंचन : (असमंजस में पड़कर मन में) मैंने काम जितना सहज समझा था। उससे कहीं कठिन निकला। सौंदर्य कदाचित् बुद्वि-शक्तियों को हर लेता है। जितनी बातें सोचकर चला था। वह सब भूल गई, जैसे कोई नया पत्ता अखाड़े में उतरते ही अपने सारे दांव-पेंच भूल जाए। कैसै बात छेड़ू ? (प्रकट) आपको यह तो मालूम ही होगा कि भाई साहब आपके साथ कहीं बाहर जाना चाहते हैं ?

राजेश्वरी : (मुस्कराकर) जी हां, यह निश्चय हो चुका है।

कंचन : अब किसी तरह नहीं रूक सकता ?

राजेश्वरी : हम दोनों में से कोई एक बीमार हो जाए तो रूक सके

कंचन : ईश्वर न करें, ईश्वर न करें, पर मेरा आशय यह था। कि आप भाई साहब को रोकें तो अच्छा हो, वह एक बार घर से जाकर फिर मुश्किल से लौटेंगी। भाभी जी को जब से यह बात मालूम हुई है वह बार-बार भाई साहब के साथ चलने पर जिद कर रही हैं। अगर भैया छिपकर चले गए तो भाभी के प्राणों ही पर बन जाएगी।

राजेश्वरी : इसका तो मुझे भी भय है, क्योंकि मैंने सुना है, ज्ञानी देवी उनके बिना एक छन भी नहीं रह सकती। पर मैं भी तो आपके भैया ही के हुक्म की चेरी हूँ, जो कुछ वह कहेंगे उसे मानना पड़ेगा। मैं अपना देश, कुल, घर-बार छोड़कर केवल उनके प्रेम के सहारे यहां आई हूँ। मेरा यहां कौन है ? उस प्रेम का सुख उठाने से मैं अपने को कैसे रोकूं ? यह तो ऐसा ही होगा कि कोई भोजन बनाकर भूखों तड़पा करे, घर छाकर धूप में जलता रहै। मैं ज्ञानीदेवी से डाह नहीं करती, इतनी ओछी नहीं हूँ कि उनसे बराबरी करूं । लेकिन मैंने जो यह लोक-लाज, कुल-मरजाद तजा है वह किसलिए !

कंचन : इसका मेरे पास क्या जवाब है ?

राजेश्वरी : जवाब क्यों नहीं है, पर आप देना नहीं चाहते।

कंचन : दोनों एक ही बात है, भय केवल आपके नाराज होने का है।

राजेश्वरी : इससे आप निश्चिंत रहिए। जो प्रेम की आंच सह सकता है, उसके लिए और सभी बातें सहज हो जाती हैं।

कंचन : मैं इसके सिवा और कुछ न कहूँगा कि आप यहां से न जाएं।

राजेश्वरी : (कंचन की ओर तिरछी चितवनों से ताकते हुए) यह आपकी इच्छा है ?

कंचन : हां, यह मेरी प्रार्थना है। (मन में) दिल नहीं मानता, कहीं मुंह से कोई बात निकल न पड़े।

राजेश्वरी : चाहे वह रूठ ही जाएं ?

कंचन : नहीं-नहीं, अपने कौशल से उन्हें राजी कर लो।

राजेश्वरी : (मुस्कराकर) मुझमें यह गुण नहीं है।

कंचन : रमणियों में यह गुण बिल्ली के नखों की भांति छिपा रहता है। जब चाहें उसे काम में ला सकती हैं।

राजेश्वरी : उनसे आपके आने की चरचा तो करनी ही होगी।

कंचन : नहीं, हरगिज नहीं मैं तुम्हें ईश्वर की कसम दिलाता हूँ। भूलकर भी उनसे यह जिक्र न करना, नहीं तो मैं जहर खा लूंगा, फिर तुम्हें मुंह न दिखाऊँगा।

राजेश्वरी : (हंसकर) ऐसी धमकियों का तो प्रेम-बर्ताव में कुछ अर्थ नहीं होता, लेकिन मैं आपको उन आदमियों में नहीं समझती। मैं आपसे कहना नहीं चाहती थी, पर बात पड़ने पर कहना ही पड़ा कि मैं आपके सरल स्वभाव और आपकी निष्कपट बातों पर मोहित हो गई हूँ। आपके लिए मैं सब कष्ट सहने को तैयार हूँ। पर आपसे यही बिनती है कि मुझ पर कृपादृष्टि बनाए रखिएगा और कभी-कभी दर्शन देते रहिएगी।

राजेश्वरी गाती है।

क्या सो रहा मुसाफिर बीती है रैन सारी।

अब जाग के चलन की कर ले सभी तैयारी।

तुझको है दूर जाना, नहीं पास कुछ खजाना,

आगे नहीं ठिकाना होवे बड़ी खुआरी। (टेक)

पूंजी सभी गमाई, कुछ ना करी कमाई,

क्या लेके घर को जाई करजा किया है भारी।

क्या सो रहा।

कंचन चला जाता है।

तीसरा दृश्य

स्थान : सबलसिंह का घर। सबलसिंह बगीचे में हौज के किनारे मसहरी के अंदर लेटे हुए हैं।

समय : ग्यारह बजे रात।

सबल : (आप-ही-आप) आज मुझे उसके बर्ताव में कुछ रूखाई-सी मालूम होती थी। मेरा बहम नहीं है, मैंने बहुत विचार से देखा । मैं घंटे भर तक बैठा चलने के लिए जोर देता रहा, पर उसने एक बार नहीं करके फिर हां न की। मेरी तरफ एक बार भी उन प्रेम की चितवनों से नहीं देखा जो मुझे मस्त कर देती हैं। कुछ गुमसुम-सी बैठी रही। कितना कहा कि तुम्हारे न चलने से घोर अनर्थ होगी। यात्रा की सब तैयारियां कर चुका हूँ, लोग मन में क्या कहेंगे कि पहाड़ों की सैर का इतना चाव था, और इतनी जल्द ठण्डा हो गया? लेकिन मेरी सारी अनुनय-विनय एक तरफ और उसकी नहीं एक तरफ। इसका कारण क्या है? किसी ने बहका तो नहीं दिया । हां, एक बात याद आई। उसके इस कथन का क्या आशय हो सकता है कि हम चाहे जहां जाएं, टोहियों से बच न सकेंगे। क्या यहां टोहिये आ गए ? इसमें कंचन की कुछ कारस्तानी मालूम होती है। टोहियेपन की आदत उन्हीं में है। उनका उस दिन उचक्कों की भांति इधर-उधर, उपर-नीचे ताकते जाना निरर्थक नहीं था।इन्होंने कल मुझे रोकने की कितनी चेष्टा की थी। ज्ञानी की निगाह भी कुछ बदली हुई देखता हूँ। यह सारी आग कंचन की लगाई हुई है । तो क्या कंचन वहां गया था। ? राजेश्वरी के सम्मुख जाने की इसे क्योंकर हिम्मत हुई किसी महफिल में तो आज तक गया नहीं बचपन ही से औरतों को देखकर झेंपता है। वहां कैसे गया ? जाने क्योंकर पाया। मैंने तो राजेश्वरी से सख्त ताकीद कर दी थी कि कोई भी यहां न आने पाए। उसने मेरी ताकीद की कुछ परवाह न की। दोनों नौकरानियां भी मिल गई।यहां तक कि राजेश्वरी ने इनके जाने की कुछ चर्चा ही नहीं की। मुझसे बात छिपाई, पेट में रखा। ईश्वर, मुझे यह किन पापों का दण्ड मिल रहा है ? अगर कंचन मेरे रास्ते में पड़ते हैं तो पड़ें, परिणाम बुरा होगी। अत्यंत भीषण। मैं जितना ही नर्म हूँ उतना ही कठोर भी हो सकता हूँ। मैं आज से ताक में हूँ। अगर निश्चय हो गया कि इसमें कंचन का कुछ हाथ है तो मैं उसके खून का प्यासा हो जाऊँगा। मैंने कभी उसे कड़ी निगाह से नहीं देखा । पर उसकी इतनी जुर्रत ! अभी यह खून बिल्कुल ठंडा नहीं हुआ है, उस जोश का कुछ हिस्सा बाकी है, जो कटे हुए सिरों और तड़पती हुई लाशों का दृश्य देखकर मतवाला हो जाता था।इन बाहों में अभी दम है, यह अब भी तलवार और भाले का वार कर सकती हैं। मैं अबोध बालक नहीं हूँ कि मुझे बुरे रास्ते से बचाया जाए, मेरी रक्षा की जाए। मैं अपना मुखतार हूँ जो चाहूँ करूं। किसी को चाहे वह मेरा भाई ही क्यों न हो, मेरी भलाई और हित?कामना का ढोंग रचने की जरूरत नहीं अगर बात यहीं तक है तो गनीमत है, लेकिन इसके आगे बढ़ गई है तो फिर इस कुल की खैरियत नहीं इसका सर्वनाश हो जाएगा और मेरे ही हाथों। कंचन को एक बार सचेत कर देना चाहिए ।

ज्ञानी आती है।

ज्ञानी : क्या अभी तक सोए नहीं ? बारह तो बज गए होंगे।

सबल : नींद को बुला रहा हूं, पर उसका स्वभाव तुम्हारे जैसा है। आप-ही-आप आती है, पर बुलाने से मान करने लगती है। तुम्हें नींद क्यों नहीं आई ?

ज्ञानी : चिंता का नींद से बिगाड़ है।

सबल : किस बात की चिंता है ?

ज्ञानी : एक बात है कि कहूँ। चारों तरफ चिंताएं ही चिंताएं हैं। इस वक्त तुम्हारी यात्रा की चिंता है। तबीयत अच्छी नहीं, अकेले जाने को कहते हो, परदेश वाली बात है, न जाने कैसी पड़े कैसी न पड़े। इससे तो यही अच्छा था। कि यहीं इलाज करवाते।

सबल : (मन-ही-मन) क्यों न इसे खुश कर दूं जब जरा-सी बात फेर देने से काम निकल सकता है। (प्रकट) इस जरा-सी बात के लिए इतनी चिंता करने की क्या जरूरत ?

ज्ञानी : तुम्हारे लिए जरा-सी हो, पर मुझे तो असूझ मालूम होता है।

सबल : अच्छा तो लो, न जाऊँगी।

ज्ञानी : मेरी कसम ?

सबल : सत्य कहता हूँ। जब इससे तुम्हें इतना कष्ट हो रहा है तो न जाऊँगी।

ज्ञानी : मैं इस अनुग्रह को कभी न भूलूंगी। आपने मुझे उबार लिया, नहीं तो न जाने मेरी क्या दशा होती। अब मुझे कुछ दंड भी दीजिए। मैंने आपकी आज्ञा का उल्लंघन किया है और उसका कठिन दंड चाहती हूँ।

सबल : मुझे तुमसे इसकी शंका ही नहीं हो सकती।

ज्ञानी : पर यह अपराध इतना बड़ा है कि आप उसे क्षमा नहीं कर सकते।

सबल : (कौतूहल से) क्या बात है, सुनूं ?

ज्ञानी : मैं कल आपके मना करने पर भी स्वामी चेतनदास के दर्शनों को चली गई थी।

सबल : अकेले ?

ज्ञानी : गुलाबी साथ थी।

सबल : (मन में) क्या करे बेचारी किसी तरह मन तो बहलाये। मैंने एक तरह इससे मिलना ही छोड़ दिया । बैठे-बैठे जी ऊब गया होगा। मेरी आज्ञा ऐसी कौन महत्व की वस्तु है। जब नौकर-चाकर जब चाहते हैं उसे भंग कर देते हैं और मैं उनका कुछ नहीं कर सकता, तो इस पर क्यों गर्म पड़ू।ब मैं खुली आंखों धर्म और नीति को भंग कर रहा हूँ, ईश्वरीय आज्ञा से मुंह मोड़ रहा हूँ तो मुझे कोई अधिकार नहीं कि इसके साथ जरा-सी बात के लिए सख्ती करूं। (प्रकट) यह कोई अपराध नहीं, और न मेरी आज्ञा इतनी अटल है कि भंग ही न की जायब अगर तुम इसे अपराध समझती हो तो मैं इसे सहर्ष क्षमा करता हूँ।

ज्ञानी : स्वामी, आपके बर्ताव में आजकल क्यों इतना अंतर हो गया है? आपने क्यों मुझे बंधनों से मुक्त कर दिया है, मुझ पर पहले की भांति शासन क्यों नहीं करते ? नाराज क्यों नहीं होते, कटु शब्द क्यों नहीं कहते, पहले की भांति रूठते क्यों नहीं, डांटते क्यों नहीं ? आपकी यह सहिष्णुता देखकर मेरे अबोध मन में भांति-भांति की शंका उठने लगती है कि यह प्रेम-बंधन का ढीलापन न हो,

सबल : नहीं प्रिये, यह बात नहीं है। देश-देशांतर के पत्र-पत्रिकाओं को देखता हूँ तो वहां की स्त्रियों की स्वाधीनता के सामने यहां का कठोर शासन कुछ अच्छा नहीं लगता। अब स्त्रियां कौन्सिलों में जा सकती हैं, वकालत कर सकती हैं, यहां तक कि भारत में भी स्त्रियों को अन्याय के बंधन से मुक्त किया जा रहा है, तो क्या मैं ही सबसे गया-बीता हूँ कि वही पुरानी लकीर पीटे जाऊँ।

ज्ञानी : मुझे तो उस राजनैतिक स्वाधीनता के सामने प्रेम-बंधन कहीं सुखकर जान पड़ता है। मैं वह स्वाधीनता नहीं चाहती।

सबल : (मन में) भगवन्, इस अपार प्रेम का मैंने कितना घोर अपमान किया है ? इस सरल ह्रदया के साथ मैंने कितनी अनीति की है? आंखों में आंसू क्यों भरे आते हैं ? मुझ जैसा कुटिल मनुष्य इस देवी के योग्य नहीं था।(प्रकट) प्रिये, तुम मेरी ओर से लेश-मात्र भी शंका न करो। मैं सदैव तुम्हारा हूँ और रहूँगा। इस समय गाना सुनने का जी चाहता है । वही अपना प्यारा गीत गाकर मुझे सुना दो।

ज्ञानी सरोद लाकर सबलसिंह को दे देती है। गाने लगती है।

अब तो मेरा राम नाम दूसरा न कोई।

माता छोड़ी पिता छोड़े छोड़े सगा सोई,

संतन संग बैठि-बैठि लोक लाज खोई। अब तो..

चौथा दृश्य

स्थान : गंगा तट। बरगद के घने वृक्ष के नीचे तीन-चार आदमी लाठियां और तलवारें लिए बैठे हैं।

समय : दस बजे रात।

एक डाकू : दस बजे और अभी तक लौटी नहीं

दूसरा : तुम उतावले क्यों हो जाते हो, जितनी ही देर में लौटेगी उतना ही सन्नाटा होगा, अभी इक्के-दुक्के रास्ता चल रहा है।

तीसरा : इसके बदन पर कोई पांच हजार के गहने तो होंगे ?

चौथा : सबलसिंह कोई छोटा आदमी नहीं है। उसकी घरवाली बन-ठनकर निकलेगी तो दस हजार से कम का माल नहीं

पहला : यह शिकार आज हाथ आ जाए तो कुछ दिनों चैन से बैठना नसीब हो, रोज-रोज रात-रात भर घात में बैठे रहना अच्छा नहीं लगता। यह सब कुछ करके भी शरीर को आराम न मिला तो बात ही क्या रही।

दूसरा : भाग्य में आराम वदा होता तो यह कुकरम न करने पड़ते। कहीं सेठों की तरह गद्दी-मसनद लगाए बैठे होते । हमें चाहे कोई खजाना ही मिल जाए पर आराम नहीं मिल सकता।

तीसरा : कुकरम क्या हमीं करते हैं, यही कुकरम तो संसार कर रहा है। सेठजी रोजगार के नाम से डाका मारते हैं, अमले घूस के नाम से डाका मारते हैं, वकील मेहनताना के नाम से डाका मारता है। पर उन डकैतों के महल खड़े हैं, हवागाड़ियों पर सैर करते गिरते हैं, पेचवान लगाए मखमली गद्दियों पर पड़े रहते हैं। सब उनका आदर करते हैं, सरकार उन्हें बड़ी-बड़ी पदवियां देती है। हमीं लोगों पर विधाता की निगाह क्यों इतनी कड़ी रहती है?

चौथा डाकू : काम करने का ढ़ग है। वह लोग पढ़े-लिखे हैं इसलिए हमसे चतुर हैं। कुकरम भी करते हैं और मौज भी उड़ाते हैं। वही पत्थर मंदिर में पुजता है और वही नालियों में लगाया जाता है।

पहला : चुप, कोई आ रहा है।

हलधर का प्रवेश। (गाता है)

सात सखी पनघट पर आई कर सोलह सिंगार,

अपना दु: ख रोने लगीं, जो कुछ बदा लिलार।

पहली सखी बोली, सुनो चार बहनो मेरा पिया सराबी है,

कंगन की कौड़ी पास न रखता, दिल का बड़ा नवाबी है।

जो कुछ पाता सभी उड़ाता, घर की अजब खराबी है।

लोटा-थाली गिरवी रख दी, फिरता लिये रिकाबी है।

बात-बात पर आंख बदलता, इतना बड़ा मिजाजी है।

एक हाथ में दोना कुल्हड़, दूजे बोतल गुलाबी है।

पहला डाकू : कौन है ? खड़ा रह।

हलधर : तुम तो ऐसा डपट रहे हो जैसे मैं कोई चोर हूँ। कहो क्या कहते हो ?

दूसरा डाकू : (साथियों से) जवान तो बड़ा गठीला और जीवट का है। (हलधर से) किधर चले ? घर कहां है ?

हलधर : यह सब आल्हा पूछकर क्या करोगे ? अपना मतलब कहो।

तीसरा डाकू : हम पुलिस के आदमी हैं, बिना तलाशी लिए किसी को जाने नहीं देते।

हलधर : (चौकन्ना होकर) यहां क्या धरा है जो तलाशी को धमकाते हो, धन के नाते यही लाठी है और इसे मैं बिना दस-पांच सिर गोड़े दे नहीं सकता।

चौथा डाकू : तुम समझ गए हम लोग कौन हैं, या नहीं ?

हलधर : ऐसा क्या निरा बुद्वू ही समझ लिया है ?

चौथा डाकू : तो गांठ में जो कुछ हो दे दो, नाहक रार क्यों मचाते हो ?

हलधर : तुम भी निरे गंवार हो, चील के घोंसले में मांस ढूंढ़ते हो,

पहला डाकू : यारो, संभलकर, पालकी आ रही है।

चौथा डाकू : बस टूट पड़ो जिसमें कहार भाग खड़े हों।

ज्ञानी की पालकी आती है। चारों डाकू तलवारें लिए कहारों पर जा पड़ते हैं। कहार पालकी पटककर भाग खड़े होते हैं। गुलाबी बरगद की आड़ों में छिप जाती है।

एक डाकू : ठकुराइन, जान की खैर चाहती हो तो सब गहने चुपके से उतार के रख दो। अगर गुल मचाया या चिल्लाई तो हमें जबरदस्ती तुम्हारा मुंह बंद करना पड़ेगा और हम तुम्हारे उसपर हाथ नहीं उठाना चाहते।

दूसरा डाकू : सोचती क्या हो, यहां ठाकुर सबलसिंह नहीं बैठे हैं जो बंदूक लिए आते हों। चटपट उतारो।

तीसरा : (पालकी का परदा उठाकर) यह यों न मानेगी, ठकुराइन है न, हाथ पकड़कर बांध दो, उतार लो सब गहने।

हलधर लपककर उस डाकू पर लाठी चलाता है और वह हाय मारकर बेहोश हो जाता है। तीनों बाकी डाकू उस पर टूट पड़ते हैं। लाठियां चलने लगती हैं।

हलधर : वह मारा, एक और गिरा।

पहला डाकू : भाई, तुम जीते हम हारे, शिकार क्यों भगाए देते हो ? माल में आधा तुम्हारा ।

हलधर : तुम हत्यारे हो, अबला स्त्रियों पर हाथ उठाते हो, मैं अब तुम्हें जीता न छोडूंगा।

डाकू : यार, दस हजार से कम का माल नहीं है। ऐसा अवसर फिर न मिलेगा। थानेदार को सौ-दो सौ रूपये देकर टरका देंगे।बाकी सारा अपना है।

हलधर : (लाठी तानकर) जाते हो या हड्डी तोड़ के रख दूं ?

दोनों डाकू भाग जाते हैं। हलधर कहारों को बुलाता है जो एक मंदिर में छिपे बैठे हैं। पालकी उठती है।

ज्ञानी : भैया, आज तुमने मेरे साथ जो उपकार किया है इसका फल तुम्हें ईश्वर देंगे, लेकिन मेरी इतनी विनती है कि मेरे घर तक चलो।तुम देवता हो, तुम्हारी पूजा करूंगी।

हलधर : रानी जी, यह तुम्हारी भूल है। मैं न देवता हूँ न दैत्य। मैं भी घातक हूँ। पर मैं अबला औरतों का घातक नहीं, हत्यारों ही का घातक हूँ। जो धन के बल से गरीबों को लूटते हैं, उनकी इज्जत बिगाड़ते हैं, उनके घर को भूतों का डेरा बना देते हैं। जाओ, अब से गरीबों पर दया रखना। नालिस, कुड़की, जेहल, यह सब मत होने देना।

नदी की ओर चला जाता है। गाता है।

दूजी सखी बोली सुनो सखियो, मेरा पिया जुआरी है।

रात-रात भर गड़ पर रहता, बिगड़ी दसा हमारी है।

घर और बार दांव पर हारा, अब चोरी की बारी है।

गहने-कपड़े को क्या रोऊँ, पेट की रोटी भारी है।

कौड़ी ओढ़ना कौड़ी बिछौना, कौड़ी सौत हमारी है।

ज्ञानी : (गुलाबी से) आज भगवान ने बचा लिया नहीं तो गहने भी जाते और जान की भी कुशल न थी।

गुलाबी : यह जरूर कोई देवता है, नहीं तो दूसरों के पीछे कौन अपनी जान जोखिम में डालता ?

पांचवां दृश्य

स्थान : मधुबन।

समय : नौ बजे रात, बादल घिरा हुआ है, एक वृक्ष के नीचे बाबा चेतनदास मृगछाले पर बैठे हुए हैं। फत्तू, मंगई, हरदास आदि धूनी से जरा हट कर बैठे हैं।

चेतनदास : संसार कपटमय है। किसी प्राणी का विश्वास नहीं जो बड़े ज्ञानी, बड़े त्यागी, धर्मात्मा प्राणी हैं: उनकी चित्तवृत्ति को ध्यान से देखो तो स्वार्थ से भरा पाओगी। तुम्हारा जमींदार धर्मात्मा समझा जाता है, सभी उसके यश कीर्ति की प्रशंसा करते हैं। पर मैं कहता हूँ कि ऐसा अत्याचारी, कपटी, धूर्त, भ्रष्टाचरण मनुष्य संसार में न होगी।

मंगई : बाबा, आप महात्मा हैं, आपकी जबान कौन पकड़े, पर हमारे ठाकुर सचमुच देवता हैं। उनके राज में हमको जितना सुख है उतना कभी नहीं था।

हरदास : जेठी की लगान माफकर दी थी। अब असामियों को भूसे-चारे के लिए बिना ब्याज के रूपये दे रहे हैं।

फत्तू : उनमें और चाहे कोई बुराई हो पर असामियों पर हमेशा परवरस की निगाह रखते हैं।

चेतनदास : यही तो उसकी चतुराई है कि अपना स्वार्थ भी सिद्व कर लेता है और अपकीर्ति भी नहीं होने देता। रूपये से, मीठे वचन से, नम्रता से लोगों को वशीभूत कर लेता है।

मंगई : महाराज, आप उनका स्वभाव नहीं जानते जभी ऐसा कहते हैं। हम तो उन्हें सदा से देखते आते हैं। कभी ऐसी नीयत नहीं देखी कि किसी से एक पैसा बेसी ले लें। कभी किसी तरह की बेगार नहीं ली, और निगाह का तो ऐसा साफ आदमी कहीं देखा ही नहीं

हरदास : कभी किसी पर निगाह नहीं डाली।

चेतनदास : भली प्रकार सोचो, अभी हाल ही में कोई स्त्री यहां से निकल गई है ?

फत्तू : (उत्सुक होकर) हां महाराज, अभी थोड़े ही दिन हुए।

चेतनदास : उसके पति का भी पता नहीं है?

फत्तू : हां महाराज, वह भी गायब है।

चेतनदास : स्त्री परम सुंदरी है ?

फत्तू : हां महाराज, रानी मालूम होती है।

चेतनदास : उसे सबलसिंह ने घर डाल लिया है।

फत्तू : घर डाल लिया है ?

मंगई : झूठ है।

हरदास : विश्वास नहीं आता।

फत्तू : और हलधर कहां है ?

चेतनदास : इधर-उधर मारा-मारा फिरता है। डकैती करने लगा है। मैंने उसे बहुत खोजा पर भेंट नहीं हुई

सलोनी गाती हुई आती है।

मुझे जोगिनी बना के कहां गए रे जोगिया।

फत्तू : सलोनी काकी, इधर आओ ! राजेश्वरी तो सबलसिंह के घर बैठ गई।

सलोनी : चल झूठे, बेचारी को बदनाम करता है।

मंगई : ठाकुर साहब में यह लत है ही नहीं ।

सलोनी : मर्दों की मैं नहीं चलाती, न इनके सुभाव का कुछ पता मिलता है, पर कोई भरी गंगा में राजेश्वरी को कलंक लगाए तो भी मुझे विश्वास न आएगी। वह ऐसी औरत नहीं ।

फत्तू : विश्वास तो मुझे भी नहीं आता, पर यह बाबा जी कह रहे हैं।

सलोनी : आपने आंखों देखा है ?

चेतनदास : नित्य ही देखता हूँ। हां, कोई दूसरा देखना चाहे तो कठिनाई होगी। उसके लिए किराए पर एक मकान लिया गया है, तीन लौंडिया सेवा टहल के लिए हैं, ठाकुर प्रात: काल जाता है और घड़ीभर में वहां से लौट आता है। संध्या समय फिर जाता है और नौ-दस बजे तक रहता है। मैं इसका प्रमाण देता हूँ। मैंने सबलसिंह को समझाया, पर वह इस समय किसी की नहीं सुनता। मैं अपनी आंखों यह अत्याचार नहीं देख सकता। मैं संन्यासी हूँ। मेरा धर्म है कि ऐसे अत्याचारियों का, ऐसे पाखंडियों का संहार करूं। मैं पृथ्वी को ऐसे रंगे हुए सियारों से मुक्त कर देना चाहता हूँ। उसके पास धन का बल है तो हुआ करे। मेरे पास न्याय और धर्म का बल है। इसी बल से मैं उसको परास्त करूंगा। मुझे आशा थी कि तुम लोगों से इस पापी को दंड देने में मुझे यथेष्ट सहायता मिलेगी। मैं समझता था। कि देहातों में आत्माभिमान का अभी अंत नहीं हुआ है, वहां के प्राणी इतने पतित नहीं हुए हैं कि अपने उसपर इतना घोर, पैशाचिक अनर्थ देखकर भी उन्हें उत्तेजना न हो, उनका रक्त न खौलने लगे। पर अब ज्ञात हो रहा है कि सबल ने तुम लोगों को मंत्रमुग्ध कर दिया है। उसके दयाभाव ने तुम्हारे आत्मसम्मान को कुचल डाला है। दया का आघात अत्याचार के आघात से कम प्राणघातक नहीं होता। अत्याचार के आघात से क्रोध उत्पन्न होता है, जी चाहता है मर जायें या मार डालें। पर दया की चोट सिर को नीचा कर देती है, इससे मनुष्य की आत्मा और भी निर्बल हो जाती है, उसके अभिमान का अंत हो जाता है। वह नीच, कुटिल, खुशामदी हो जाता है। मैं तुमसे फिर पूछता हूँ, तुममें कुछ लज्जा का भाव है या नहीं?

एक किसान : महाराज, अगर आपका ही कहना ठीक हो तो हम क्या कर सकते हैं ? ऐसे दयावान पुरूष की बुराई हमसे न होगी। औरत आप ही खराब हो तो कोई क्या करे ?

मंगई : बस, तुमने मेरे मन की बात कही।

हरदास : वह सदा से हमारी परवरिस करते आए हैं। हम आज उनसे बागी कैसे हो जाएं ?

दूसरा किसान : बागी हो भी जाएं तो रहें कहां ? हम तो उनकी मुट्ठी में हैं। जब चाहें हमें पीस डालें। पुस्तैनी अदावत हो जाएगी।

मंगई : अपनी लाज तो ढांकते नहीं बनती, दूसरों की लाज कोई क्या ढांकेगा ?

हरदास : स्वामीजी, आप सन्नासी हैं, आप सब कुछ कर सकते हैं। हम गृहस्थ लोग जमींदारों से बिगाड़ करने लगें तो कहीं ठिकाना न लगे।

मंगई : हां और क्या, आप तो अपने तपोबल से ही जो चाहें कर सकते हैं। अगर आप सराप भी दे दें तो कुकर्मी खड़े-खड़े भस्म हो जाएं ब

सलोनी : जा, चुल्लू-भर पानी में डूब मर कायर कहीं का। हलधर तेरे सगे चाचा का बेटा है। जब तू उसका नहीं तो और किसका होगा? मुंह में कालिख नहीं लगा लेता, उसपर से बातें बनाता है। तुझे तो चूड़ियां पहनकर घर में बैठना चाहिए था।मर्द वह होते हैं जो अपनी आन पर जान दे देते हैं। तू हिजड़ा है। अब जो मुंह खोला तो लूका लगा दूंगी।

मंगई : सुनते हो फत्तू काका, इनकी बातें, जमींदार से बैर बढ़ाना इनकी समझ में दिल्लगी है। हम पुलिस वालों से चाहे न डरें, अमलों से चाहे न डरें, महाजन से चाहे बिगाड़ कर लें, पटवारी से चाहे कहा -सुनी हो जाए, पर जमींदार से मुंह लगना अपने लिए गढ़ा खोदना है। महाजन एक नहीं हजारों हैं, अमले आते-जाते रहते हैं, बहुत करेंगे सता लेंगे, लेकिन जमींदार से तो हमारा जनम-मरन का व्योहार है। उसके हाथ में तो हमारी रोटियां हैं। उससे ऐंठकर कहां जाएंगे ? न काकी, तुम चाहे गालियां दो, चाहे ताने मारो, पर सबलसिंह से हम लड़ाई नहीं ठान सकते।

चेतनदास : (मन में) मनोनीत आशा न पूरी हुई हलधर के कुटुम्बियों में ऐसा कोई न निकला जो आवेग में आकर अपमान का बदला लेने को तैयार हो जाता। सब-के-सब कायर निकले। कोई वीर आत्मा निकल आती जो मेरे रास्ते से इस बाधा को हटा देती, फिर ज्ञानी अपनी हो जाती। यह दोनों उस काम के तो नहीं हैं, पर हिम्मती मालूम होते हैं। बुढ़िया दीन बनी हुई है, पर है पोढ़ी, नहीं तो इतने घमंड से बातें न करती। मियां गांठ का पूरा तो नहीं, पर दिल का दिलेर जान पड़ता है। उत्तेजना में पड़कर अपना सर्वस्व खो सकता है। अगर दोनों से कुछ धन मिल जाए तो सबइंस्पेक्टर को मिलाकर, कुछ मायाजाल से, कुछ लोभ से काबू में कर लूं। कोई मुकदमा खड़ा हो जायेब कुछ न होगा भांडा तो फूलट जाएगी। ज्ञानी उन्हें अबकी भांति देवता तो न समझती रहेगी। (प्रकट) इस पापी को दंड देने का मैंने प्रण कर लिया है। ऐसे कायर व्यक्ति भी होते हैं, यह मुझे ज्ञात न था। हरीच्छा ! अब कोई दूसरी ही युक्ति काम में लानी चाहिए ।

सलोनी : महाराज, मैं दीन-दुखिया हूँ, कुछ कहना छोटा मुंह बड़ी बात है, पर मैं आपकी मदद के लिए हर तरह हाजिर हूँ। मेरी जान भी काम आए तो दे सकती हूँ।

फत्तू : स्वामीजी, मुझसे भी जो हो सकेगा करने को तैयार हूँ। हाथों में तो अब मकदूर नहीं रहा, पर और सब तरह हाजिर हूँ।

चेतनदास : मुझे इस पापी का संहार करने के लिए किसी की मदद की आवश्यकता न होती। मैं अपने योग और तप के बल से एक क्षण में उसे रसातल को भेज सकता हूँ, पर शास्त्रों में ऐसे कामों के लिए योगबल का व्यवहार करना वर्जित है। इसी से विवश हूँ। तुम धन से मेरी कुछ सहायता कर सकते हो ?

सलोनी : (फत्तू की ओर सशंक दृष्टि से ताकते हुए) महाराज, थोड़े-से रूपये धाम करने को रख छोड़े थे।वह आपके भेंट कर दूंगी। यह भी तो पुण्य ही का काम है।

फत्तू : काकी, तेरे पास कुछ रूपये उसपर हों तो मुझे उधर दे दे।

सलोनी : चल, बातें बनाता है। मेरे पास रूपये कहां से आएंगे ? कौन घर के आदमी कमाई कर रहे हैं। चालीस साल बीत गए बाहर से एक पैसा भी घर में नहीं आया।

फत्तू : अच्छा, नहीं देती है मत दे। अपने तीनों सीसम के पेड़ बेच दूंगा।

चेतनदास : अच्छा, तो मैं जाता हूँ विश्राम करने। कल दिन-भर में तुम लोग प्रबंध करके जो कुछ हो सके इस कार्य के निमित्त दे देना। कल संध्या को मैं अपने आश्रम पर चला जाऊँगा।

प्रस्थान।

छठा दृश्य

स्थान : शहर वाला किराये का मकान।

समय : आधी रात। कंचनसिंह और राजेश्वरी बातें कर रहे हैं।

राजेश्वरी : देवरजी, मैंने प्रेम के लिए अपना सर्वस्व लगा दिया । पर जिस प्रेम की आशा थी वह नहीं मयस्सर हुआ। मैंने अपना सर्वस्व दिया है तो उसके लिए सर्वस्व चाहती भी हूँ। मैंने समझा था।, एक के बदले आधी पर संतोष कर लूंगी। पर अब देखती हूँ तो जान पड़ता है कि मुझसे भूल हो गयी। दूसरी बड़ी भूल यह हुई कि मैंने ज्ञानी देवी की ओर ध्यान नहीं दिया था।उन्हें कितना दु: ख, कितना शोक, कितनी जलन होगी, इसका मैंने जरा भी विचार नहीं किया था। आपसे एक बात पूछूं, नाराज तो न होंगे?

कंचन : तुम्हारी बात से मैं नाराज हूँगा !

राजेश्वरी : आपने अब तक विवाह क्यों नहीं किया ?

कंचन : इसके कई कारण हैं। मैंने धर्मग्रंथों में पढ़ा था। कि गृहस्थ जीवन मनुष्य की मोक्ष-प्राप्ति में बाधक होता है। मैंने अपना तन, मन, धन सब धर्म पर अर्पण कर दिया था।दान और व्रत को ही मैंने जीवन का उद्देश्य समझ लिया था।उसका मुख्य कारण यह था। कि मुझे प्रेम का कुछ अनुभव न था।मैंने उसका सरस स्वाद न पाया था।उसे केवल माया की एक कुटलीला समझा करता था।, पर अब ज्ञात हो रहा है कि प्रेम में कितना पवित्र आनंद और कितना स्वर्गीय सुख भरा हुआ है। इस सुख के सामने अब मुझे धर्म, मोक्ष और व्रत कुछ भी नहीं जंचते। उसका सुख भी चिंतामय है, इसका दु: ख भी रसमय।

राजेश्वरी : (वक्र नेत्रों से ताककर) यह सुख कहां प्राप्त हुआ ?

कंचन : यह न बताऊँगा।

राजेश्वरी : (मुस्कराकर) बताइए चाहे न बताइए, मैं समझ गई। जिस वस्तु को पाकर आप इतने मुग्ध हो गए हैं वह असल में प्रेम नहीं है। प्रेम की केवल झलक है। जिस दिन आपको प्रेम-रत्न मिलेगा उस दिन आपको इस आनंद का सच्चा अनुभव होगा।

कंचन : मैं यह रत्न पाने योग्य नहीं हूँ। वह आनंद मेरे भाग्य में ही नहीं है।

राजेश्वरी : है और मिलेगा। भाग्य से इतने निराश न हूजिए। आप जिस दिन, जिस घड़ी, जिस पल इच्छा करेंगे वह रत्न आपको मिल जाएगा। वह आपकी इच्छा की बाट जोह रहा है।

कंचन : (आंखों में आंसू भरकर) राजेश्वरी, मैं घोर धर्म-संकट में हूँ। न जाने मेरा क्या अंत होगा। मुझे इस प्रेम पर अपने प्राण बलिदान करने पड़ेंगे।

राजेश्वरी : (मन में) भगवान, मैं कैसी अभागिनी हूँ। ऐसे निश्छल सरल पुरूष की हत्या मेरे हाथों हो रही है। पर करूं क्या, अपने अपमान का बदला तो लेना ही होगी। (प्रकट) प्राणेश्वर, आप इतने निराश क्यों होते हैं। मैं आपकी हूँ और आपकी रहूँगी। संसार की आंखों में मैं चाहे जो कुछ हूँ, दूसरों के साथ मेरा बाहरी व्यवहार चाहे जैसा हो, पर मेरा ह्रदय आपका है। मेरे प्राण आप पर न्योछावर हैं। (आंचल से कंचन के आंसू पोंछकर) अब प्रसन्न हो जाइए। यह प्रेमरत्न आपकी भेंट है।

कंचन : राजेश्वरी, उस प्रेम को भोगना मेरे भाग्य में नहीं है। मुझ जैसा भाग्यहीन पुरूष और कौन होगा जो ऐसे दुर्लभ रत्न की ओर हाथ नहीं बढ़ा सकता। मेरी दशा उस पुरूष की-सी है जो क्षुधा से व्याकुल होकर उन पदार्थों की ओर लपके जो किसी देवता की अर्चना के लिए रखे हुए हों। मैं वही अमानुषी कर्म कर रहा हूँ। मैं पहले यह जानता कि प्रेम-रत्न कहां मिलेगा तो तुम अप्सरा भी होतीं तो आकाश से उतार लाता। दूसरों की आंख पड़ने के पहले तुम मेरी हो जातीं, फिर कोई तुम्हारी ओर आंख उठाकर भी न देख सकता। पर तुम मुझे उस वक्त मिलीं जब तुम्हारी ओर प्रेम की दृष्टि से देखना भी मेरे लिए अधर्म हो गया। राजेश्वरी, मैं महापापी, अधर्मी जीव हूँ। मुझे यहां इस एकांत में बैठने का, तुमसे ऐसी बातें करने का अधिकार नहीं है। पर प्रेमाघात ने मुझे संज्ञाहीन कर दिया है। मेरा विवेक लुप्त हो गया है। मेरे इतने दिन का ब्रडाचर्य और धर्मनिष्ठा का अपहरण हो गया है। इसका परिणाम कितना भयंकर होगा, ईश्वर ही जानेब अब यहां मेरा बैठना उचित नहीं है। मुझे जाने दो। (उठ खड़ा होता है।)

राजेश्वरी : (हाथ पकड़कर) न जाने पाइएगा। जब इस धर्म का पचड़ा छेड़ा है तो उसका निपटारा किए जाइए। मैं तो समझती थी जैसे जगन्नाथ पुरी में पहुंचकर छुआछूत का विचार नहीं रहता, उसी भांति प्रेम की दीक्षा पाने के बाद धर्म-अधर्म का विचार नहीं रहता। प्रेम आदमी को पागल कर देता है। पागल आदमी के काम और बात का, विचार और व्यवहार का कोई ठिकाना नहीं ।

कंचन : इस विचार से चित्त को संतोष नहीं होता। मुझे अब जाने दो। अब और परीक्षा में मत डालो।

राजेश्वरी : अच्छा बतलाते जाइए कब आइएगा?

कंचन : कुछ नहीं जानता क्या होगी। (रोते हुए) मेरे अपराध क्षमा करना।

जीने से उतरता है। द्वार पर सबलसिंह आते दिखाई देते हैं। कंचन एक अंधेरे बरामदे में छिप जाता है।

सबल : (उसपर जाकर) अरे ! अभी तक तुम सोयी नहीं ?

राजेश्वरी : जिनके आंखों में प्रेम बसता है वहां नींद कहाँ?

सबल : यह उन्निद्रा प्रेम में नहीं होती। कपट-प्रेम में होती है।

राजेश्वरी : (सशंक होकर) मुझे तो इसका कभी अनुभव नहीं हुआ। आपने इस समय आकर बड़ी कृपा की।

सबल : (क्रोध से) अभी यहां कौन बैठा हुआ था ?

राजेश्वरी : आपकी याद।

सबल : मुझे भ्रम था। कि याद संदेह नहीं हुआ करती है। आज यह नयी बात मालूम हुई । मैं तुमसे विनय करता हूँ, बतला दो, अभी कौन यहां से उठकर गया है ?

राजेश्वरी : आपने देखा है तो क्यों पूछते हैं ?

सबल : शायद मुझे भ्रम हुआ हो।

राजेश्वरी : ठाकुर कंचनसिंह थे।

सबल : तो मेरा गुमान ठीक निकला। वह क्या करने आया था। ?

राजेश्वरी : (मन में) मालूम होता है मेरा मनोरथ उससे जल्द पूरा होगा जितनी मुझे आशा थी। (प्रकट) यह प्रश्न आप व्यर्थ करते हैं। इतनी रात गए जब कोई पुरूष किसी अन्य स्त्री के पास जाता है तो उसका एक ही आशय हो सकता है।

सबल : उसे तुमने आने क्यों दिया ?

राजेश्वरी : उन्होंने आकर द्वार खटखटाया, कहारिन जाकर खोल आई। मैंने तो उन्हें यहां आने पर देखा ।

सबल : कहारिन उससे मिली हुई है ?

राजेश्वरी : यह उससे पूछिए।

सबल : जब तुमने उसे बैठे देखा तो दुत्कार क्यों न दिया ?

राजेश्वरी : प्राणेश्वर, आप मुझसे ऐसे सवाल पूछकर दिल न जलाएं। यह कहां की रीति है कि जब कोई आदमी अपने पास आए तो उसको दुत्कार दिया जाए, वह भी जब आपका भाई हो, मैं इतनी निष्ठुर नहीं हो सकती। उनसे मिलने में तो भय जब होता कि जब मेरा अपना चित्त चंचल होता, मुझे अपने उसपर विश्वास न होता। प्रेम के गहरे रंग में सराबोर होकर अब मुझ पर किसी दूसरे रंग के चढ़ने की सम्भावना नहीं है। हां, आप बाबू कंचनसिंह को किसी बहाने से समझा दीजिये कि अब से यहां न आएं। वह ऐसी प्रेम और अनुराग की बातें करने लगते हैं कि उसके ध्यान से ही लज्जा आने लगती है। विवश होकर बैठती हूँ, सुनती हूँ।

सबल : (उन्मत्त होकर) पाखंडी कहीं का, धर्मात्मा बनता है, विरक्त बनता है, और कर्म ऐसे नीच ! तू मेरा भाई सही, पर तेरा वध करने में कोई पाप नहीं है। हां, इस राक्षस की हत्या मेरे ही हाथों होगी। ओह ! कितनी नीच प्रकृति है, मेरा सगा भाई और यह व्यवहार ! असह्य है, अक्षम्य है। ऐसे पापी के लिए नरक ही सबसे उत्तम स्थान है। आज ही इसी रात को तेरी जीवनलीला समाप्त हो जाएगी। तेरा दीपक बुझ जाएगा। हां धूर्त, क्या कामलोलुपता के लिए यही एक ठिकाना था। ! तुझे मेरे ही घर में आग लगानी थी। मैं तुझे पुत्रवत् प्यार करता था।तुझे(क्रोध से होंठ चबाकर) तेरी लाश को इन्हीं आंखों से तड़पते हुए देखूंगी।

नीचे चला जाता है।

राजेश्वरी : (आप-ही-आप) ऐसा जान पड़ता है, भगवान् स्वयं यह सारी लीला कर रहे हैं, उन्हीं की प्रेरणा से सब कुछ होता हुआ मालूम होता है। कैसा विचित्र रहस्य है। मैं बैलों को मारा जाना नहीं देख सकती थी, चींटियों को पैरों तले पड़ते देखकर मैं पांव हटा लिया करती थी, पर अभाग्य मुझसे यह हत्याकांड करा रहा है। मेरे ही निर्दय हाथों के इशारे से यह कठपुतलियां नाच रही हैं!

करूण स्वरों में गाती है।

ऊधो, कर्मन की गति न्यारी।

गाते-गाते प्रस्थान।

सातवां दृश्य

स्थान : दीवानखाना।

समय : तीन बजे रात। घटा छायी हुई है। सबलसिंह तलवार हाथ में लिये द्वार पर खड़े हैं।

सबल : (मन में) अब सो गया होगा। मगर नहीं, आज उसकी आंखों में नींद कहां ! पड़ा-पड़ा प्रेमाग्नि में जल रहा होगा, करवटें बदल रहा होगा। उस पर यह हाथ न उठ सकेंगे। मुझमें इतनी निर्दयता नहीं है। मैं जानता हूँ वह मुझ पर प्रतिघात न करेगा। मेरी तलवार को सहर्ष अपनी गर्दन पर ले लेगी। हां ! यही तो उसका प्रतिघात होगा। ईश्वर करे, वह मेरी ललकार पर सामने खड़ा हो जाए। तब यह तलवार वज्र की भांति उसकी गर्दन पर र्गिरे। अरक्षित, निश्शस्त्र पुरूष पर मुझसे आघात न होगा। जब वह करूण दीन नेत्रों से मेरी ओर ताकेगा: तो मेरी हिम्मत छूट जाएगी।

धीरे-धीरे कंचनसिंह के कमरे की ओर बढ़ता है।

हा ! मानव-जीवन कितना रहस्यमय है। हम दोनों ने एक ही मां के उदर से जन्म लिया, एक ही स्तन का दूध पिया, सदा एक साथ खेले, पर आज मैं उसकी हत्या करने को तैयार हूँ। कैसी विडम्बना है ! ईश्वर करे उसे नींद आ गई हो, सोते को मारना धर्म-विरूद्व हो, पर कठिन नहीं है। दीनता दया को जागृत कर देती है(चौंककर) अरे ! यह कौन तलवार लिये बढ़ा चला आता है । कहीं छिपकर देखूं, इसकी क्या नीयत है। लम्बा आदमी है, शरीर कैसा गठा हुआ है। किवाड़ के दरारों से निकलते हुए प्रकाश में आ जाये तो देखूं कौन है ? वह आ गया। यह तो हलधर मालूम होता है, बिल्कुल वही है, लेकिन हलधर के दाढ़ी नहीं थी। सम्भव है दाढ़ी निकल आयी हो, पर है हलधर, हां वही है, इसमें कोई संदेह नहीं है। राजेश्वरी की टोह किसी तरह मिल गयी। अपमान का बदला लेना चाहता है। कितना भयंकर स्वरूप हो गया है। आंखें चमक रही हैं। अवश्य हममें से किसी का खून करना चाहता है। मेरी ही जान का गाहक होगी। कमरे में झांक रहा है। चाहूँ तो अभी पिस्तौल से इसका काम तमाम कर दूं। पर नहीं खूब सूझी। क्यों न इससे वह काम लूं जो मैं नहीं कर सकता। इस वक्त कौशल से काम लेना ही उचित है। (तलवार छिपाकर) कौन है, हलधर ?

हलधर तलवार खींचकर चौकन्ना हो जाता है।

सबल : हलधर, क्या चाहते हो ?

हलधर : (सबल के सामने आकर) संभल जाइएगा, मैं चोट करता हूँ।

सबल : क्यों मेरे खून के प्यासे हो रहे हो ?

हलधर : अपने दिल से पूछिए।

सबल : तुम्हारा अपराधी मैं नहीं हूँ, कोई दूसरा ही है।

हलधर : क्षत्री होकर आप प्राणों के भय से झूठ बोलते नहीं लजाते ?

सबल : मैं झूठ नहीं बोल रहा हूँ।

हलधर : सरासर झूठ है। मेरा सर्वनाश आपके हाथों हुआ है। आपने मेरी इज्जत मिट्टी में मिला दी । मेरे घर में आग लगा दी और अब आप झूठ बोलकर अपने प्राण बचाना चाहते हैं। मुझे सब खबरें मिल चुकी हैं। बाबा चेतनदास ने सारा कच्चा चित्ता मुझसे कह सुनाया है। अब बिना आपका खून पिए इस तलवार की प्यास न बुझेगी।

सबल : हलधर, मैं क्षत्रिय हूँ और प्राणों को नहीं डरता। तुम मेरे साथ कमरे तक आओ। मैं ईश्वर को साक्षी देकर कहता हूँ कि मैं कोई छल-कपट न करूंगा। वहां मैं तुमसे सब वृत्तांत सच-सच कह दूंगा। तब तुम्हारे मन में जो आए, वह करना।

हलधर चौकन्नी दृष्टि से ताकता हुआ सबल के साथ उसके दीवानखाने में जाता है।

सबल : तख्त पर बैठ जाओ और सुनो। यह सारी आग कंचनसिंह की लगाई हुई है। उसने कुटनी द्वारा राजेश्वरी को घर से निकलवा लिया है। उसके गोरूंदों ने राजेश्वरी का उससे बखान किया होगा वह उस पर मोहित हो गया और तुम्हें जेल पहुंचाकर अपनी इच्छा पूरी की जबसे मुझे यह समाचार मिला है, मैं उसका शत्रु हो गया हूँ। तुम जानते हो, मुझे अत्याचार से कितनी घृणा है। अत्याचारी पुरूष चाहे वह मेरा पुत्र ही क्यों न हो, मेरी दृष्टि में हिंसक जंतु के समान है और उसका वध करना मैं अपना कर्तव्य समझता हूँ। इसीलिए मैं यह तलवार लेकर कंचनसिंह का वध करने जा रहा था।इतने में तुम दिखायी पड़े। मुझे अब मालूम हुआ कि जिसे मैं बड़ा धर्मात्मा, ईश्वरभक्त, सदाचारी, त्यागी समझता था। वह वास्तव में एक परले दर्जे का व्याभिचारी, विषयी मनुष्य है। इसीलिए उसने अब तक विवाह नहीं किया। उसने कर्मचारियों को घूस देकर तुम्हें चुपके-चुपके गिरफ्तारी करा लिया और अब राजेश्वरी के साथ विहार करता है। अभी आधी रात को वहां से लौटकर आया है। मैंने तुमसे सारा वृत्तांत कह सुनाया, अब तुम्हारी जो इच्छा हो करो।

हलधर लपककर कंचनसिंह के कमरे की ओर चलता है।

सबल : ठहरो-ठहरो, यों नहीं सम्भव है तुम्हारी आहट पाकर जाग उठे। नौकर-सिपाही उसका चिल्लाना सुनकर जाग पड़ें। प्रात: काल वह गंगा नहाने जाता है। उस वक्त अंधेरा रहता है। वहीं तुम उसे गंगा की भेंट कर सकते हो, घात लगाए रहो, अवसर आते ही एक हाथ में काम तमाम कर दो और लाश को वहीं बहा दो। तुम्हारा मनोरथ पूरा होने का इससे सुगम उपाय नहीं है।

हलधर : (कुछ सोचकर) मुझे धोखा तो नहीं देना चाहते ? इस बहाने से मुझे टाल दो और फिर सचेत हो जाओ और मुझे पकड़वा देने का इंतजाम करो।

सबल : मैंने ईश्वर की कसम खायी है, अगर अब भी तुम्हें विश्वास न आए तो जो चाहे करो।

हलधर : अच्छी बात है, जैसा आप कहते हैं वैसा ही होगा। अगर इस समय धोखा देकर बच भी गए तो फिर क्या कभी दाव ही न आएगा ? मेरे हाथों से बचकर अब नहीं जा सकते। मैं चाहूँ तो एक क्षण में तुम्हारे कुल का नाश कर दूं, पर मैं हत्यारा नहीं हूँ। मुझे धन की लालसा नहीं है। मैं तो केवल अपने अपमान का बदला लेना चाहता हूँ। आपको भी सचेत किए देता हूँ। मैं अभी और टोह लगाऊँगा। अगर पता चला कि आपने मेरा घर उजाड़ा है तो मैं आपको भी जीता न छोडूंगा। मेरा तो जो होना था। हो चुका, पर मैं अपने उजाड़ने वालों को कुकर्म का सुख न भोगने दूंगा।

चला जाता है।

सबल : (मन में) मैं कितना नीच हो गया हूँ। झूठ, दगा गरे। किसी पाप से भी मुझे हिचक नहीं होती। पर जो कुछ भी हो, हलधर बड़े मौके से आ गया अब बिना लाठी टूटे ही सांप मरा जाता है।

प्रस्थान

आठवां दृश्य

स्थान : नदी का किनारा।

समय : चार बजे भोर, कंचन पूजा की सामग्री लिए आता है और एक तख्त पर बैठ जाता है, फिटन घाट के उसपर ही रूक जाती है।

कंचन : (मन में) यह जीवन का अंत है ! यह बड़े-बड़े इरादों और मनसूबों का परिणाम है। इसीलिए जन्म लिया था।यही मोक्षपद है। यह निर्वाण है। माया-बंधनों से मुक्त रहकर आत्मा को उच्चतम पद पर ले जाना चाहता था।यह वही महान पद है। यही मेरी सुकीर्तिरूपी धर्मशाला है, यही मेरा आदर्श कृष्ण मंदिर है ! इतने दिनों के नियम और संयम, सत्संग और भक्ति, दान और व्रत ने अंत में मुझे वहां पहुंचाया जहां कदाचित् भ्रष्टाचार और कुविचार, पाप और कुकर्म ने भी न पहुंचाया होता। मैंने जीवन यात्रा का कठिनतम मार्ग लिया, पर हिंसक जीव-जंतुओं से बचने का, अथाह नदियों को पार करने का, दुर्गम घाटियों से उतरने का कोई साधन अपने साथ न लिया। मैं स्त्रियों से रहता था।, इन्हें जीवन का कांटा समझता था।, इनके बनाव-श्रृंगार को देखकर मुझे घृणा होती थी। पर आज वह स्त्री जो मेरे भाई की प्रेमिका है, जो मेरी माता के तुल्य है, प्रेम में इतनी शक्ति है, मैं यह न जानता था। ! हाय, यह आग अब बुझती नहीं दिखायी देती। यह ज्वाला मुझे भस्म करके ही शांत होगी। यही उत्तम है। अब इस जीवन का अंत होना ही अच्छा है। इस आत्मपतन के बाद अब जीना धिक्कार है। जीने से यह ताप और ज्वाला दिन-दिन प्रचंड होगी। घुल-घुलकर, कुढ़-कुढ़कर मरने से, घर में बैर का बीज बोने से, जो अपने पूज्य हैं उनसे वैमनस्य करने से यह कहीं अच्छा है कि इन विपत्तियों के मूल ही का नाश कर दूं। मैंने सब तरह परीक्षा करके देख लिया। राजेश्वरी को किसी तरह नहीं भूल सकता, किसी तरह ध्यान से नहीं उतार सकता।

चेतनदास का प्रवेश।

कंचन : स्वामी जी को दंडवत् करता हूँ।

चेतनदास : बाबा, सदा सुखी रहो, इधर कई दिनों से तुमको नहीं देखा । मुख मलिन है, अस्वस्थ तो नहीं थे ?

कंचन : नहीं महाराज, आपके आशीर्वाद से कुशल से हूँ। पर कुछ ऐसे झंझटों में पड़ा रहा कि आपके दर्शन न कर सका । बड़ा सौभाग्य था कि आज प्रात: काल आपके दर्शन हो गए। आप तीर्थयात्रा पर कब जाने का विचार कर रहे हैं ?

चेतनदास : बाबा, अब तक तो चला गया होता, पर भगतों से पिंड नहीं छूटता। विशेषत: मुझे तुम्हारे कल्याण के लिए तुमसे कुछ कहना था। और बिना कहे मैं न जा सकता था।यहां इसी उद्देश्य से आया हूँ। तुम्हारे उसपर एक घोर संकट आने वाला है । तुम्हारा भाई सबलसिंह तुम्हें वध कराने की चेष्टा कर रहा है। घातक शीघ्र ही तुम्हारे उसपर आघात करेगी। सचेत हो जाओ।

कंचन : महाराज, मुझे अपने भाई से ऐसी आशंका नहीं है।

चेतनदास : यह तुम्हारा भ्रम है। प्रेम र्ईर्ष्या में मनुष्य अस्थिरचित्त, उन्मत्त हो जाता है।

कंचन : यदि ऐसा ही हो तो मैं क्या कर सकता हूँ ? मेरी आत्मा तो स्वयं अपने पाप के बोझ से दबी हुई है।

चेतनदास : यह क्षत्रियों की बातें नहीं हैं। भूमि, धन और नारी के लिए संग्राम करना क्षत्रियों का धर्म है। उन वस्तुओं पर उसी का वास्तविक अधिकार है जो अपने बाहुबल से उन्हें छीन सके इस संग्राम में दया और धर्म, विवेक और विचार, मान और प्रतिष्ठा, सभी कायरता के पर्याय हैं। यही उपदेश कृष्ण भगवान ने अर्जुन को दिया था।, और वही उपदेश मैं तुम्हें दे रहा हूँ। तुम मेरे भक्त हो इसलिए यह चेतावनी देना मेरा कर्तव्य था।योद्वाओं की भांति क्षेत्र में निकलो और अपने शत्रु के मस्तक को पैरों से कुचल डालो, उसका गेंद बनाकर खेलो अथवा अपनी तलवार की नोक पर उछालो।यही वीरों का धर्म है। जो प्राणी क्षत्रिय वंश में जन्म लेकर संग्राम से मुह मोड़ता है, वह केवल कापुरूष ही नहीं, पापी है, विधर्मी है, दुरात्मा है। कर्मक्षेत्र में कोई किसी का पुत्र नहीं, भाई नहीं, मित्र नहीं, सब एक दूसरे के शत्रु हैं। यह समस्त संसार कुछ नहीं, केवल एक वृहत्, विराट् शत्रुता है। दर्शनकारों और धर्माचायोऊ ने संसार को प्रेममय कहा है। उनके कथनानुसार ईश्वर स्वयं प्रेम है। यह भ्रांति का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है जिसने संसार को वेष्ठित कर रखा है। भूल जाओ कि तुम किसी के भाई हो, जो तुम्हारे उसपर आघात करे उसका प्रतिघात करो, जो तुम्हारी ओर वक्र नेत्रों से ताके उसकी आंखें निकाल लो। राजेश्वरी तुम्हारी है, प्रेम के नाते उस पर तुम्हारा ही अधिकार है। अगर तुम अपने कर्तव्य-पथ से हटकर उसे उस पुरूष के हाथों में छोड़ दोगे जिससे उसे पहले चाहे प्रेम रहा हो, पर अब वह उससे घृणा करती है, तो तुम न्याय, नीति और धर्म के घातक सिद्व होगे और जन्म-जन्मान्तरों तक इसका दंड भोगते रहोगे

चेतनदास का प्रस्थान

कंचन : (मन में) मन, अब क्या कहते हो ? क्षत्रिय धर्म का पालन करके भाई से लड़ोगे, उसके प्राणों पर आघात करोगे या क्षत्रिय धर्म को भंग करके आत्महत्या करोगे ? जी तो मरने को नहीं चाहता। अभी तक भक्ति और धर्म के जंजाल में पड़ा रहा, जीवन का कुछ सुख नहीं देखा । अब जब उसकी आशा हुई तो यह कठिन समस्या सामने आ खड़ी हुई हो क्षत्रियधर्म के विरूद्व, पर भाई से मैं किसी भांति विग्रह नहीं कर सकता। उन्होंने सदैव मुझसे पुत्रवत् प्रेम किया है। याद नहीं आता कि कोई अमृदु शब्द उनके मुंह से सुना हो । वह योग्य हैं, विद्वान् हैं, कुशल हैं। मेरे हाथ उन पर नहीं उठ सकते। अवसर न मिलने की बात नहीं है। भैया का शत्रु मैं हो ही नहीं सकता। क्षत्रियों के ऐसे धर्म सिद्वांत न होते तो जरा-जरा-सी बात पर खून की नदियां क्योंकर बहतीं और भारत क्यों हाथ से जाता ? नहीं, कदापि नहीं, मेरे हाथ उन पर नहीं उठ सकते। साधुगण झूठ नहीं बोलते, पर यह महात्माजी उन पर भी मिथ्या दोषारोपण कर गए। मुझे विश्वास नहीं आता कि वह मुझ पर इतने निर्दय हो जायेंगी। उनके दया और शील का पारावार नहीं वह मेरी प्राणहत्या का संकेत नहीं दे सकते। एक नहीं, हजार राजेश्वरियां हों, पर भैया मेरे शत्रु नहीं हो सकते। यह सब मिथ्या है। मेरे हाथ उन पर नहीं उठ सकते। हाय, अभी एक क्षण में यह घटना सारे नगर में फैल जाएगी । लोग समझेंगे, पांव फिसल गया होगा। राजेश्वरी क्या समझेगी ? उसे मुझसे प्रेम है, अवश्य शोक करेगी, रोयेगी और अब से कहीं ज्यादा प्रेम करने लगेगी। और भैया ? हाय, यही तो मुसीबत है। अब मैं उन्हें मुंह नहीं दिखा सकता। मैं उनका अपराधी हूं। मैंने धर्म-हत्या की है। अगर वह मुझे जीता चुनवा दें तो भी मुझे आह भरने का अधिकार नहीं है। मेरे लिए अब यही एक मार्ग रह गया है। मेरे बलिदान से ही अब शांति होगी । पर भैया पर मेरे हाथ न उठेंगी। पानी गहरा है। भगवान्, मैंने पाप किये हैं, तुम्हें मुंह दिखाने योग्य नहीं हूँ। अपनी अपार दया की छांह में मुझे भी शरण देना। राजेश्वरी, अब तुझे कैसे देखूंगा?

पीलपाये पर खड़ा होकर अथाह जल में कूद पड़ता है। हलधर का तलवार और पिस्तौल लिये आना।

हलधर : बड़े मौके से आया। मैंने समझा था। देर हो गयी। पाखंडी कुकर्मी कहीं का। रोज गंगा नहाने आता है, पूजा करता है, तिलक लगाता है, और कर्म इतने नीच। ऐसे मौके से मिले हो कि एक ही बार में काम तमाम कर दूंगा। और परायी स्त्रियों पर निगाह डालो ! (पीलपाये की आड़ में छिपकर सुनता है) पापी भगवान् से दया की याचना कर रहा है। यह नहीं जानता है कि एक क्षण में नर्क के द्वार पर खड़ा होगा। राजेश्वरी, अब तुम्हें कैसे देखूंगा ? अभी प्रेत हुए जाते हो फिर उसे जी भरकर देखना। (पिस्तौल का निशाना लगाता है।) अरे ! यह तो आप-ही-आप पानी में कूद पड़ा, क्या प्राण देना चाहता है ? (पिस्तौल किनारे की ओर फेंककर पानी में कूद पड़ता है और कंचनसिंह को गोद में लिए एक क्षण में बाहर आता है। मन में) अभी पानी पेट में बहुत कम गया है। इसे कैसे होश में लाऊँ ? है तो यह अपना बैरी, पर जब आप ही मरने पर उतारू है तो मैं इस पर क्या हाथ उठाऊँ। मुझे तो इस पर दया आती है।

कंचनसिंह को लेटाकर उसकी पीठ में घुटने लगाकर उसकी बांहों को हिलाता है। चेतनदास का प्रवेश।

चेतनदास : (आश्चर्य से) यह क्या दुर्घटना हो गयी ? क्या तूने इनको पानी में डूबा दिया ?

हलधर : नहीं महाराज, यह तो आप नदी में कूद पड़े । मैं तो बाहर निकाल लाया हूँ ?

चेतनदास : लेकिन तू इन्हें वध करने का इरादा करके आया था।मूर्ख, मैंने तुझे पहले ही जता दिया था। कि तेरा शत्रु सबलसिंह है, कंचनसिंह नहीं पर तूने मेरी बात का विश्वास न किया। उस धूर्त सबल के बहकाने में आ गया। अब फिर कहता हूँ कि तेरा शत्रु वही है, उसी ने तेरा सर्वनाश किया है, वही राजेश्वरी के साथ विलास करता है।

हलधर : मैंने इन्हें राजेश्वरी का नाम लेते अपने कानों से सुना है।

चेतनदास : हो सकता है कि राजेश्वरी जैसी सुंदरी को देखकर इसका चित्त भी चंचल हो गया हो, सबलसिंह ने संदेहवश इसके प्राण हरण की चेष्टा की हो, बस यही बात है।

हलधर : स्वामी जी क्षमा कीजिएगा, मैं सबलसिंह की बात में आ गया। अब मुझे मालूम हो गया कि वही मेरा बैरी है। र्इश्वर ने चाहा तो वह भी बहुत दिन तक अपने पाप का सुख न भोगने पायेंगा।

चेतनदास : (मन में) अब कहां जाता है ? आज पुलिस वाले भी घर की तलाशी हुई। अगर उनसे बच गया तो यह तो तलवार निकाले बैठा ही है। ईश्वर की इच्छा हुई तो अब शीघ्र ही मनोरथ पूरे होंगे। ज्ञानी मेरी होगी और मैं इस विपुल सम्पत्ति का स्वामी हो जाऊँगा। कोई व्यवसाय, कोई विद्या, मुझे इतनी जल्द इतना सम्पत्तिशाली न बना सकती थी।

प्रस्थान।

कंचन : (होश में आकर) नहीं, तुम्हारा शत्रु मैं हूँ। जो कुछ किया है, मैंने किया है । भैया निर्दोष हैं, तुम्हारा अपराधी मैं हूँ। मेरे जीवन का अंत हो, यही मेरे पापों का दंड है। मैं तो स्वयं अपने को इस पाप-जाल से मुक्त करना चाहता था।तुमने क्यों मुझे बचा लिया ? (आश्चर्य से) अरे, यह तो तुम हो, हलधर ?

हलधर : (मन में) कैसा बेछल-कपट का आदमी है। (प्रकट) आप आराम से लेटे रहें, अभी उठिए न।

कंचन : नहीं, अब नहीं लेटा जाता । (मन में) समझ में आ गया, राजेश्वरी इसी की स्त्री है। इसीलिए भैया ने वह सारी माया रची थी। (प्रकट) मुझे उठाकर बैठा दो। वचन दो कि भैया का कोई अहित न करोगे।

हलधर : ठाकुर, मैं यह वचन नहीं दे सकता।

कंचन : किसी निर्दोष की जान लोगे ? तुम्हारा घातक मैं हूँ। मैंने तुम्हें चुपके से जेल भिजवाया और राजेश्वरी को कुटनियों द्वारा यहां बुलाया।

तीन डाकू लाठियां लिये आते हैं।

एक : क्यों गुरू, पड़ा हाथ भरपूर ?

दूसरा : यह तो खासा टैयां सा बैठा हुआ है। लाओ मैं एक हाथ दिखाऊँ।

हलधर : खबरदार, हाथ न उठाना।

दूसरा : क्या कुछ हत्थे चढ़ गया क्या ?

हलधर : हां, असर्फियों की थैली है। मुंह धो रखना ।

तीसरा : यह बहुत कड़ा ब्याज लेता है। सब रूपये इसकी तोंद में से निकाल लो।

हलधर : जबान संभालकर बात करो।

पहला : अच्छा, इसे ले चलो, दो-चार दिन बर्तन मंजवायेंगे। आराम करते-करते मोटा हो गया है।

दूसरा : तुमने इसे क्यों छोड़ दिया ?

हलधर : इसने वचन दिया कि अब सूद न लूंगा।

पहला : क्यों बच्चा, गुरू को सीधा समझकर झांसा दे दिया ।

हलधर : बक-बक मत करो। इन्हें नाव पर बैठाकर डेरे पर लेते चलो।यह बेचारे सूद-ब्याज जो कुछ लेते हैं अपने भाई के हुकुम से लेते हैं। आज उसी की खबर लेने का विचार है।

सब कंचन को सहारा देकर नाव पर बैठा देते हैं और गाते हुए नाव चलाते हैं।

नारायण का नाम सदा मन के अंदर लाना चहिए !

मानुष तन है दुर्लभ जग में इसका फल पाना चहिए!

दुर्जन संग नरक का मारग उससे दूर जाना चहिए!

सत संगत में सदा बैठ के हरि के गुण गाना चहिए!

धरम कमाई करके अपने हाथों की खाना चहिए!

परनारी को अपनी माता के समान जाना चहिए!

झूठ-कपट की बात सदा कहने में शरमाना चहिए!

कथा। पुरान संत संगत में मन को बहलाना चहिए!

नारायण का नाम सदा मन के अंदर लाना चहिए!

नौवां दृश्य

स्थान : गुलाबी का मकान।

समय : संध्या, चिराग जल चुके हैं, गुलाबी संदूक से रूपये निकाल रही है।

गुलाबी : भाग जाग जाएंगे। स्वामीजी के प्रताप से यह सब रूपये दूने हो जाएंगे। पूरे तीन सौ रूपये हैं। लौटूंगी तो हाथ में छ: सौ रूपये की थैली होगी। इतने रूपये तो बरसों में भी न बटोर पाती। साधु-महात्माओं में बड़ी शक्ति होती है। स्वामीजी ने यह मंत्र दिया है। भृगु के गले में बांध दूं। फिर देखूं, यह चुड़ैल उसे कैसे अपने बस में किये रहती है। उन्होंने तो कहा है कि वह उसकी बात भी न पूछेगी। यही तो मैं चाहती हूँ । उसका मानमर्दन हो जाये, घमंड टूट जाये। (भृगु को बुलाती है।) क्यों बेटा, आजकल तुम्हारी तबीयत कैसी रहती है ? दुबले होते जाते हो?

भृगु : क्या करूं ? सारे दिन बही खोले बैठे-बैठे थक जाता हूँ। ठाकुर कंचनसिंह एक बीड़ा पान को भी नहीं पूछते। न कहीं घूमने जाता हूँ, न कोई उत्तम वस्तु भोजन को मिलती है। जो लोग लिखने-पढ़ने का काम करते हैं उन्हें दूध, मक्खन, मेवा-मिसरी इच्छानुकूल मिलनी चाहिए । रोटी, दाल, चावल तो मजदूरों का भोजन है। सांझ-सबेरे वायु-सेवन करना चाहिए । कभी-कभी थियेटर देखकर मन बहलाना चाहिए । पर यहां इनमें से कोई भी सुख नहीं यही होगा कि सूखते-सूखते एक दिन जान से चला जाऊँगी।

गुलाबी : ऐ नौज बेटा, कैसी बात मुंह से निकालते हो ? मेरे जान में तो कुछ फेर-फार है। इस चुड़ैल ने तुम्हें कुछ कर-करा दिया है। यह पक्की टोनिहारी है। पूरब की न है। वहां की सब लड़कियां टोनिहारी होती हैं।

भृगु : कौन जाने यही बात हो, कंचनसिंह के कमरे में अकेले बैठता हूँ तो ऐसा डर लगता है जैसे कोई बैठा हो, रात को आने लगता हूँ तो फाटक पर मौलसरी के पेड़ के नीचे किसी को खड़ा देखता हूँ। कलेजा थर-थर कांपने लगता है। किसी तरह चित्त को ढाढ़स देता हुआ चला आता हूँ। लोग कहते हैं, पहले वहां किसी की कबर थी।

गुलाबी : मैं स्वामीजी के पास से यह जंतर लायी हूँ। इसे गले में बांध लो, शंका मिट जाएगी। और कल से अपने लिए पाव-भर दूध भी लाया करो। मैंने खूबा अहीर से कहा है। उसके लड़के को पढ़ा दिया करो, वह तुम्हें दूध दे देगा।

भृगु : जंतर लाओ मैं बांध लूं, पर खूबा के लड़के को मैं न पढ़ा सकूंगा। लिखने-पढ़ने का काम करते-करते सारे दिन यों ही थक जाता हूँ। मैं जब तक कंचनसिंह के यहां रहूँगा, मेरी तबीयत अच्छी न होगी। मुझे कोई दुकान खुलवा दो।

गुलाबी : बेटा, दुकान के लिए तो पूंजी चाहिए । इस घड़ी तो यह तावीज बांध लो।फिर मैं और कोई जतन करूंगी। देखो, देवीजी ने खाना बना लिया ? आज मालकिन ने रात को वहीं रहने को कहा है।

भृगु जाता है और चम्पा से पूछकर आता है गुलाबी चौके में जाती है।

गुलाबी : पीढ़ा तक नहीं रखा, लोटे का पानी तक नहीं रखा । अब मैं पानी लेकर आऊँ और अपने हाथ से आसन डालूं तब खाना खाऊँ । क्यों इतने घमंड के मारे मरी जाती हो, महारानी ? थोड़ा इतराओ, इतना आकाश पर दिया न जलाओ।

चम्पा थाली लाकर गुलाबी के सामने रख देती है। वह एक कौर उठाती है और क्रोध से थाली चम्पा के सिर पर पटक देती है।

भृगु : क्या है, अम्मां ?

गुलाबी : है क्या, यह डाकून मुझे विष देने पर तुली हुई है। यह खाना है कि जहर है ? मार नमक भर दिया । भगवान् न जाने कब इसकी मिट्टी इस घर से उठाएंगी। मर गए इसके बाप-चचा। अब कोई झांकता तक नहीं जब तक ब्याह न हुआ था।, द्वार की मिट्टी खोदे डालते थे।इतने दिन इस अभागिनी को रसोई बनाते हो गए, कभी ऐसा न हुआ कि मैंने पेट भर भोजन किया हो, यह मेरे पीछे पड़ी हुई है?

भृगु : अम्मां, देखो सिर लोहूलुहान हो गया । जरा नमक ज्यादा ही हो गया तो क्या उसकी जान ले लोगी। जलती हुई दाल डाल दी। सारे बदन में छाले पड़ गए। ऐसा भी कोई क्रोध करता है।

गुलाबी : (मुंह चिढ़ाकर) हां-हां, देख, मरहम-पट्टी कर। दौड़ डाक्टर को बुला ला, नहीं कहीं मर न जाए। अभी लौंडा है, त्रिया-चरित्र देखा कर । मैंने उधर पीठ फेरी, इधर ठहाके की हंसी उड़ने लगेगी। तेरे सिर चढ़ाने से तो इसका मिजाज इतना बढ़ गया है। यह तो नहीं पूछता कि दाल में क्यों इतना नमक झोंक दिया, उल्टे और घाव पर मरहम रखने चला है। (झमककर चली जाती है।)

चम्पा : मुझे मेरे घर पहुंचा दो।

भृगु : सारा सिर लोहूलुहान हो गया । इसके पास रूपये हैं, उसी का इसे घमंड है। किसी तरह रूपये निकल जाते तो यह गाय हो जाती।

चम्पा : तब तक तो यह मेरा कचूमर ही निकाल लेंगी।

भृगु : सबर का फल मीठा होता है।

चम्पा : इस घर में अब मेरा निबाह न होगी। इस बुढ़िया को देखकर आंखों में खून उतर आता है।

भृगु : अबकी एक गहरी रकम हाथ लगने वाली है। एक ठाकुर ने कानों की बाली हमारे यहां गिरों रखी थी। वादे के दिन टल गयेब ठाकुर का कहीं पता नहीं । पूरब गया था। न जाने मर गया या क्या ! मैंने सोचा है तुम्हारे पास जो गिन्नी रखी है उसमें चार-पांच रूपये और मिलाकर बाली छुड़ा लूं । ठाकुर लौटेगा तो देखा जाएगी। पचास रूपये से कम का माल नहीं है।

चम्पा : सच !

भृगु : हां अभी तौले आता हूँ। पूरे दो तोले है।

चम्पा : तो कब ला दोगे ?

भृगु : कल लो। वह तो अपने हाथ का खेल है। आज दाल में नमक क्यों ज्यादा हुआ ?

चम्पा : सुबह कहने लगीं, खाने में नमक ही नहीं है। मैंने इस बेला नमक पीसकर उनकी थाली में उसपर से डाल दिया कि खाओ खूब जी भर के । वह एक-न -एक खुचड़ निकालती हैं तो मैं तो उन्हें जलाया करती हूँ।

भृगु : अच्छा, अब मुझे भी भूख लगी है, चलो।

चम्पा : (आप-ही-आप) सिर में जरा-सी चोट लगी तो क्या, कानों की बालियां तो मिल गयीं ? इन दामों तो चाहे कोई मेरे सिर पर दिन-भर थालियां पटका करे।

प्रस्थान।

अंक - चार
पहला दृश्य

स्थान: मधुबन। थानेदार, इंस्पेक्टर और कई सिपाहियों का प्रवेश।

इंस्पेक्टर : एक हजार की रकम एक चीज होती है।

थानेदार : बेशक !

इंस्पेक्टर : और करना कुछ नहीं दो-चार शहादतें बनाकर खाना तलाशी कर लेनी है।

थानेदार : गांव वाले तो सबलसिंह ही के खिलाफ होंगे।

इंस्पेक्टर : आजकल बड़े-से-बड़े आदमी को जब चाहें गांस लें। कोई कितना ही मुआफिज हो, अफसरों के यहां उसकी कितनी ही रसाई हो, इतना कह दीजिए कि हुजूर, यह तो सुराज का हामी है, बस सारे हुक्काम उसके जानी दुश्मन हो जाते हैं। फिर वह गरी। अपनी कितनी ही सगाई दिया करे, अपनी वफादारी के कितने ही सबूत पेश करता फिरे, कोई उसकी नहीं सुनता। सबलसिंह की इज्जत हुक्काम की नजरों में कम नहीं थी। उनके साथ दावतें खाते थे, घुड़दौड़ में शरीक होते थे, हर एक जलसे में शरीक किए जाते थे, पर मेरे एक फिकरे ने हजरत का सारा रंग फीका कर दिया । साहब ने फौरन हुक्म दिया कि जाकर उसकी तलाशी लो और कोई सबूत दस्तया। हो तो गिरफ्तारी का वारंट ले जाओ !

थानेदार : आपने क्या फिकरा जमाया था। ?

इंस्पेक्टर : अजी कुछ नहीं, महज इतना कहा था। कि आजकल यहां सुराज की बड़ी धूम है। ठाकुर सबलसिंह पंचायतें कायम कर रहे हैं। इतना सुनना था। कि साहब का चेहरा सुर्ख हो गया। बोले: दगाबाज आदमी है। मिलकर वार करना चाहता है, फौरन उसके खिलाफ सबूत पैदा करो। इसके कब्ल मैंने कहा था।, हुजूर, यह बड़ा जिनाकार आदमी है, अपने एक असामी की औरत को निकाल लाया है। इस पर सिर्फ मुस्कराए, तीवरों पर जरा भी मैल नहीं आयी। तब मैंने यह चाल चली। यह लो, गांव के मुखिया आ गए, जरा रोब जमा दूं।

मंगई, हरदास, फत्तू आदि का प्रवेश। सलोनी भी पीछे-पीछे आती है और अलग खड़ी हो जाती है।

इंस्पेक्टर : आइए शेख जी, कहिए खैरियत तो है ?

फत्तू : (मन में) सबलसिंह के नेक और दयावान होने में कोई संदेह नहीं कभी हमारे उसपर सख्ती नहीं की। हमेशा रिआयत ही करते रहे, पर आंख का लगना बुरा होता है। पुलिस वाले न जाने उन्हें किस-किस तरह सताएंगी। कहीं जेहल न भिजवा देंब राजेश्वरी को वह जबरदस्ती थोड़े ही ले गए। वह तो अपने मन से गई। मैंने चेतनदास बाबा को नाहक इस बुरे काम में मदद दी। किसी तरह सबलसिंह को बचाना चाहिए । (प्रकट) सब अल्लाह का करम है।

इंस्पेक्टर : तुम्हारे जमींदार साहब तो खूब रंग लाये। कहां तो वह पारसाई और कहां यह हरकत।

फत्तू : हुजूर, हमको तो कुछ मालूम नहीं।

इंस्पेक्टर : तुम्हारे बचाने से अब वह नहीं बच सकते। अब तो आ गए शेर के पंजे में। अपना बयान दीजिए। यहां गांव में पंचायत किसने कायम की ?

फत्तू : हुजूर, गांव के लोगों ने मिलकर कायम की, जिसमें छोटी-छोटी बातों के पीछे अदालत की ठोकरें न खानी पड़ें।

इंस्पेक्टर : सबलसिंह ने यह कहा कि अदालतों में जाना गुनाह है ?

फत्तू : हुजूर, उन्होंने ऐसी बात तो नहीं कही, हां पंचायत के फायदे बताये थे।

इंस्पेक्टर : उन्होंने तुम लोगों को बेगार बंद करने की ताकीद नहीं की ? सच बोलना, खुदा तुम्हारे सामने है।

फत्तू : (बगलें झांकते हुए) हुजूर, उन्होंने यह तो नहीं कहा । हां, यह जरूर कहा कि जो चीज दो उसका मुनासिब दाम लो।

इंस्पेक्टर : वह एक ही बात हुई अच्छा, उस गांव में शराब की दुकान थी वह किसने बंद करायी ?

फत्तू : हुजूर, ठीकेदार ने आप ही बंद कर दी, उसकी बिक्री न होती थी।

इंस्पेक्टर : सबलसिंह ने सबसे यह नहीं कहा कि जो उस दुकान पर जाये उसे पंचायत में सजा मिलनी चाहिए ।

फत्तू : (मन में) इसको जरा-जरा-सी बातों की खबर है। (प्रकट) हुजूर, मुझे याद नहीं।

इंस्पेक्टर : शेखजी, तुम कन्नी काट रहे हो, इसका नतीजा अच्छा नहीं है। दारोगा जी ने तुम्हारा जो बयान लिखा है उस पर चुपके से दस्तखत कर दो, वरना जमींदार तो न बचेंगे, तुम अलबत्ता गेहूँ के साथ घुन की तरह पिस जाओगे।

फत्तू : हुजूर का अखतियार है, जो चाहें करें, पर मैं तो वही कहूँगा जो जानता हूँ।

इंस्पेक्टर : तुम्हारा क्या नाम है ?

मंगई : (सामने आकर) मंगई।

इंस्पेक्टर : जो पूछा जाये उसका साफ-साफ जवाब देना । इधर-उधर किया तो तुम जानोगे। पुलिस का मारा पानी नहीं मांगता। यहां गांव में पंचायत किसने कायम की ?

मंगई : (मन में) मैं तो जो यह चाहेंगे वही कहूँगा। पीछे देखी जाएगी। गालियां देने लगें या पिटवाने ही लगें तो इनका क्या बना लूंगा? सबलसिंह तो मुझे बचा न देंगे। (प्रकट) ठाकुर सबलसिंह ने।

इंस्पेक्टर : उन्होंने तुम लोगों से कहा था न कि सरकारी अदालत में जाना पाप है। जो सरकारी अदालत में जाये उसका हुक्का-पानी बंद कर दो।

मंगई : (मन में) यह तो नहीं कहा था। खाली अदालतों के खर्च से बचने के लिए पंचायत खोलने की ताकीद की थी। पर ऐसा कह दूं तो अभी यह जामे से बाहर हो जाए। (प्रकट) हां हुजूर, कहा था, बात सच्ची कहूँगा। जमींदार आकबत में थोड़े ही साथ देंगे।

इंस्पेक्टर : सबलसिंह ने यह नहीं कहा था कि किसी हाकिम को बेगार मत दो ?

मंगई : (मन में) उन्होंने तो इतना ही कहा था कि मुनासिब दाम लेकर दो। (प्रकट) हां हुजूर, कहा था, कहा था।सच्ची बात कहने में क्या डर ?

इंस्पेक्टर : शराब और गांजे की दुकान तोड़वाने की तहरीर उनकी तरफ से हुई थी न ?

मंगई : बराबर हुई थी। जो शराब गांजा पिए उसका हुक्का-पानी बंद कर दिया जाता था।

इंस्पेक्टर : अच्छा, अपने बयान पर अंगूठे का निशान दो। तुम्हारा क्या नाम है जी ? इधर आओ।

हरदास : (सामने आकर) हरदास।

इंस्पेक्टर : सच्चा बयान देना जैसा मंगई ने दिया है, वरना तुम जानोगे।

हरदास : (मन में) सबलसिंह तो अब बचते नहीं, मेरा क्या बिगाड़ सकते हैं ? यह जो कुछ कहलाना चाहते हैं मैं उससे चार बात ज्यादा ही कहूँगा। यह हाकिम हैं, खुश होकर मुखिया बना दें तो साल में सौ-दो सौ रूपये अनायास ही हाथ लगते रहैं। (प्रकट) हुजूर, जो कुछ जानता हूँ वह रत्ती-रत्ती कह दूंगा।

इंस्पेक्टर : तुम समझदार आदमी मालूम होते हो, अपना नफा-नुकसान समझते हो, यहां पंचायत के बारे में क्या जानते हो ?

हरदास : हुजूर, ठाकुर सबलसिंह ने खुलवायी थी। रोज यही कहा करें कि कोई आदमी सरकारी अदालत में न जाये। सरकार के इसटाम क्यों खरीदो। अपने झगड़े आप चुका लो।फिर न तुम्हें पुलिस का डर रहेगा न सरकार का। एक तरह से तुम अदालतों को छोड़ देने से ही सुराज पा जाओगे। यह भी हुक्म दिया था। कि जो आदमी अदालत जाये उसका हुक्का-पानी बंद कर देना चाहिए ।

इंस्पेक्टर : बयान ऐसा होना चाहिए । अच्छा, सबलसिंह ने बेगार के बारे में तुमसे क्या कहा था। ?

हरदास : हुजूर, वह तो खुल्लमखुल्ला कहते थे कि किसी को बेगार मत दो, चाहे बादशाह ही क्यों न हो, अगर कोई जबरदस्ती करे तो अपना और उसका खून एक कर दो।

इंस्पेक्टर : ठीक है। शराब गांजे की दुकान कैसे बंद हुई ?

हरदास : हुजूर, बंद न होती तो क्या करती, कोई वहां खड़ा नहीं होने पाता था।ठाकुर साहब ने हुक्म दे दिया था। कि जिसे वहां खड़े, बैठे, या खरीदते पाओ उसके मुंह में कालिख लगाकर सिर पर सौ जूते लगाओ।

इंस्पेक्टर : बहुत अच्छा। अंगूठे का निशान कर दो। हम तुमसे बहुत खुश हुए।

सलोनी गाती है:

सैयां भये कोतवाल, अब डर काहे का

इंस्पेक्टर : यह पगली क्या गा रही है ? अरी पगली इधर आ।

सलोनी : (सामने आकर) सैयां भये कोतवाल, अब डर काहे का ?

इंस्पेक्टर : दारोगा जी, इसका बयान भी लिख लीजिए।

सलोनी : हां, लिख लो।ठाकुर सबलसिंह मेरी बहू को घर से भगा ले गए और पोते को जेहल भिजवा दिया ।

इंस्पेक्टर : यह फजूल बातें मैं नहीं पूछता। बता यहां उन्होंने पंचायत खोली है न ?

सलोनी : यह फजूल बातें मैं क्या जानूं ? मुझे पंचायत से क्या लेना-देना है। जहां चार आदमी रहते हैं वहां पंचायत रहती ही है। सनातन से चली आती है, कोई नयी बात है ? इन बातों से पुलिस से क्या मतलब ? तुम्हें तो देखना चाहिए, सरकार के राज में भले आदमियों की आबरू रहती है कि लुटती है। सो तो नहीं, पंचायत और बेगार का रोना ले बैठे। बेगार बंद करने को सभी कहते हैं। गांव के लोगों को आप ही अखरता है। सबलसिंह ने कह दिया तो क्या अंधेर हो गया। शराब, ताड़ी, गांजा, भांग पीने को सभी मना करते हैं। पुरान, भागवत, साधु-संत सभी इसको निखिद्व कहते हैं। सबलसिंह ने कहा- ' तो क्या नयी बात कही ? जो तुम्हारा काम है वह करो, ऊटपटांग बातों में क्यों पड़ते हो ?

इंस्पेक्टर : बुढ़िया शैतान की खाला मालूम होती है।

थानेदार : तो इन गवाहों को अब जाने दूं ?

इंस्पेक्टर : जी नहीं, अभी रिहर्सल तो बाकी है। देखो जी, तुमने मेरे रू-ब-रू जो बयान दिया है वही तुम्हें बड़े साहब के इजलास पर देना होगी। ऐसा न हो, कोई कुछ कहे, कोई कुछ, मुकदमा भी बिगड़ जाये और तुम लोग भी गलतबयानी के इल्जाम में धर लिये जाओ। दारोगाजी शुरू कीजिए। तुम लोग सब साथ-साथ वही बातें कहो जो दारोगाजी की जबान से निकलें।

दारोगा : ठाकुर सबलसिंह कहते थे कि सरकारी अदालतों की जड़ खोद डालो, भूलकर भी वहां न जाओ। सरकार का राज अदालतों पर कायम है । अदालत को तर्क कर देने से राज की बुनियाद हिल जाएगी।

सब-के-सब यही बात दुहराते हैं।

दारोगा : अपने मुआमले पंचायतों में तै कर लो।

सब-के-सब : अपने मुआमले पंचायतों में तै कर लो।

दारोगा : उन्होंने हुक्म दिया था। कि किसी अफसर को बेगार मत दो।

सब-के-सब : उन्होंने हुक्म दिया था। कि किसी अफसर को बेगार मत दो।

दारोगा : बेगार न मिलेगी तो कोई दौरा करने न आएगी। तुम लोग जो चाहना, करना। यह सुराज की दूसरी सीढ़ी है।

सब-के-सब : बेगार न मिलेगी तो कोई दौरा करने न आएगी। यह सुराज की दूसरी सीढ़ी है।

दारोगा : यह और कहो, तुम लोग जो जी चाहे करना।

इंस्पेक्टर : यही जुमला तो जान है।

सब-के-सब : तुम लोग जो जी चाहे करना।

दारोगा : उन्होंने हुक्म दिया था। कि जो नशे की चीजें खरीदे उसका हुक्का-पानी बंद कर दो।

सब-के-सब : उन्होंने हुक्म दिया था। कि जो नशे की चीजें खरीदे उसका हुक्का-पानी बंद कर दो।

दारोगा : अगर इतने पर भी न माने तो उसके घर में आग लगा दो।

सब-के-सब : अगर इतने पर भी न माने तो उसके घर में आग लगा दो।

दारोगा : उसके मुंह में कालिख लगाकर सौ जूते लगाओ

सब-के-सब : उसके मुंह में कालिख लगाकर सौ जूते लगाओ

दारोगा : जो आदमी विलायती कपड़े खरीदे उसे गधे पर सवार कराके गांव-भर में घुमाओ।

सब-के-सब : जो आदमी विलायती कपड़े खरीदे उसे गधे पर सवार कराके गांव-भर में घुमाओ।

दारोगा : जो पंचायत का हुक्म न माने उसे उल्टे लटकाकर पचास बेंत लगाओ

सब-के-सब : जो पंचायत का हुक्म न माने उसे उल्टे लटकाकर पचास बेंत लगाओ।

दारोगा : (इंस्पेक्टर से) इतना तो काफी होगा।

इंस्पेक्टर : इतना उन्हें जहन्नुम भेजने के लिए काफी है। तुम लोग देखो, खबरदार, इसमें एक हर्फ का भी उलटफेर न हो, अच्छा अब चलना चाहिए । (कानिसटिब्लों से) देखो, बकरे हों तो दो पकड़ लो।

सिपाही : बहुत अच्छा हुजूर, दो नहीं चार।

दारोगा : एक पांच सेर घी भी लेते चलो।

सिपाही : अभी लीजिए, सरकार!

दारोगा और इंस्पेक्टर का प्रस्थान। सलोनी गाती है।

सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का।

अब तो मैं पहनूं अतलस का लहंगा

और चबाऊँ पान।

द्वारे बैठ नजारा मारूं।

सैयां भये कोतवाल अब डर काहे का।

फत्तू : काकी, गाती ही रहेगी ?

सलोनी : जा तुझसे नहीं बोलती। तू भी डर गया।

फत्तू : काकी, इन सभी से कौन लड़ता ? इजलास पर जाकर जो सच्ची बात है, वह कह दूंगा।

मंगई : पुलिस के सामने जमींदार कोई चीज नहीं ।

हरदास : पुलिस के सामने सरकार कोई चीज नहीं ।

सलोनी : सच्चाई के सामने जमींदार-सरकार कोई चीज नहीं ।

मंगई : सच बोलने में निबाह नहीं है।

हरदास : सच्चे की गर्दन सभी जगह मारी जाती है।

सलोनी : अपना धर्म तो नहीं बिगड़ता। तुम कायर हो, तुम्हारा मुंह देखना पाप है। मेरे सामने से हट जाओ।

प्रस्थान।

दूसरा दृश्य

स्थान: सबलसिंह का कमरा।

समय: दस बजे दिन।

सबल : (घड़ी की तरफ देखकर) दस बज गए। हलधर ने अपना काम पूरा कर लिया। वह नौ बजे तक गंगा से लौट आते थे।कभी इतनी देर न होती थी। अब राजेश्वरी फिर मेरी हुई चाहे ओढूं, बिछाऊँ या गले का हार बनाऊँ। प्रेम के हाथों यह दिन देखने की नौबत आएगी, इसकी मुझे जरा भी शंका न थी। भाई की हत्या की कल्पना मात्र से ही रोयें खड़े हो जाते हैं। इस कुल का सर्वनाश होने वाला है। कुछ ऐसे ही लक्षण दिखाई देते हैं। कितना उदार, कितना सच्चा ! मुझसे कितना प्रेम, कितनी श्रद्वा थी। पर हो ही क्या सकता था। ? एक म्यान में दो तलवारें कैसे रह सकती थीं ? संसार में प्रेम ही वह वस्तु है, जिसके हिस्से नहीं हो सकते। यह अनौचित्य की पराकाष्ठा थी कि मेरा छोटा भाई, जिसे मैंने सदैव अपना पुत्र समझा, मेरे साथ यह पैशाचिक व्यवहार करे। कोई देचता भी यह अमर्यादा नहीं कर सकता था।यह घोर अपमान ! इसका परिणाम और क्या होता ? यही आपत्ति-धर्म था।इसके लिए पछताना व्यर्थ है (एक क्षण के बाद) जी नहीं मानता, वही बातें याद आती हैं। मैंने कंचन की हत्या क्यों कराई ? मुझे स्वयं अपने प्राण देने चाहिए थे।मैं तो दुनिया का सुख भोग चुका था। ! स्त्री-पुत्र सबका सुख पा चुका था।उसे तो अभी दुनिया की हवा तक न लगी थी। उपासना और आराधना ही उसका एकमात्र जीवनाधार थी। मैंने बड़ा अत्याचार किया।

अचलसिंह का प्रवेश।

अचल : बाबूजी, अब तक चाचाजी गंगास्नान करके नहीं आये ?

सबल : हां, देर तो हुई अब तक तो आ जाते थे।

अचल : किसी को भेजिए, जाकर देख आए।

सबल : किसी से मिलने चले गए होंगे।

अचल : मुझे तो जाने क्यों डर लग रहा है । आजकल गंगाजी बढ़ रही हैं।

सबलसिंह कुछ जवाब नहीं देते।

अचल : वह तैरने दूर निकल जाते थे।

सबल चुप रहते हैं।

अचल : आज जब वह नहाने जाते थे तो न जाने क्यों मुझे देखकर उनकी आंखें भर गयी थीं।मुझे प्यार करके कहा था।, ईश्वर तुम्हें चिरंजीवी करे। इस तरह तो कभी आशीष नहीं देते थे।

सबल रो पड़ते हैं और वहां से उठकर बाहर बरामदे में चले जाते हैं। अचल कंचनसिंह के कमरे की ओर जाता है।

सबल : (मन में) अब पछताने से क्या फायदा ? जो कुछ होना था।, हो चुका । मालूम हो गया कि काम के आवेग में बुद्वि, विद्या, विवेक सब साथ छोड़ देते हैं। यही भावी थी, यही होनहार था।, यही विधाता की इच्छा थी। राजेश्वरी, तुझे ईश्वर ने क्यों इतनी रूप-गुणशीला बनाया ? पहले पहले जब मैंने तुझसे बात की थी, तूने मेरा तिरस्कार क्यों न किया, मुझे कटु शब्द क्यों न सुनाये ? मुझे कुत्ते की भांति दुत्कार क्यों न दिया ? मैं अपने को बड़ा सत्यवादी समझा करता था।पर पहले ही झोंके में उखड़ गया, जड़ से उखड़ गया। मुलम्मे को मैं असली रंग समझ रहा था।पहली ही आंच में मुलम्मा उड़ गया। अपनी जान बचाने के लिए मैंने कितनी घोर धूर्तता से काम लिया। मेरी लज्जा, मेरा आत्माभिमान, सबकी क्षति हो गयी ! ईश्वर करे, हलधर अपना वार न कर सका हो और मैं कंचन को जीता जागता आते देखूं। मैं राजेश्वरी से सदैव के लिए नाता तोड़ लूंगा। उसका मुंह तक न देखूंगा। दिल पर जो कुछ बीतेगी झेल लूंगा।

अधीर होकर बरामदे में निकल आते हैं और रास्ते की ओर टकटकी लगाकर देखते हैं। (ज्ञानी का प्रवेश)

ज्ञानी : अभी बाबूजी नहीं आये। ग्यारह बज गए। भोजन ठंडा हो रहा है। कुछ कह नहीं गए, कब तक आयेंगे ?

सबल : (कमरे में आकर) मुझसे तो कुछ नहीं कहा ।

ज्ञानी : तो आप चलकर भोजन कर लीजिए।

सबल : उन्हें भी आ जाने दो। तब तक तुम लोग भोजन करो।

ज्ञानी : हरज ही क्या है, आप चलकर खा लें। उनका भोजन अलग रखवा दूंगी। दोपहर तो हुआ।

सबल : (मन में) आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि मैंने घर पर अकेले भोजन किया हो, ऐसे भोजन करने पर धिक्कार है। भाई का वध करके मैं भोजन करने जाऊँ और स्वादिष्ट पदार्थों का आनंद उठाऊँ। ऐसे भोजन करने पर लानत है। (प्रकट) अकेले मुझसे भोजन न किया जायेगी।

ज्ञानी : तो किसी को गंगाजी भेज दो। पता लगाये कि क्या बात है। कहां चले गए ? मुझे तो याद नहीं आता कि उन्होंने कभी इतनी देर लगायी हो, जरा जाकर उनके कमरे में देखूं, मामूली कपड़े पहनकर गए हैं या अचकन-पजामा भी पहना है।

जाती है और एक क्षण में लौट आती है।

ज्ञानी : कपड़े तो साधारण ही पहनकर गए हैं, पर कमरा न जाने क्यों भांय-भांय कर रहा है, वहां खड़े होते एक भय-सा लगता था।ऐसी शंका होती है कि वह अपनी मसनद पर बैठे हुए हैं, पर दिखाई नहीं देते। न जाने क्यों मेरे तो रोयें खड़े हो गए और रोना आ गया। किसी को भेजकर पता लगवाइए।

सबल दोनों हाथों से मुंह छिपाकर रोने लगता है।

ज्ञानी : हाय, यह आप क्या करते हैं ! इस तरह जी छोटा न कीजियेब वह अबोध बालक थोड़े ही हैं। आते ही होंगे ।

सबल : (रोते हुए) आह, ज्ञानी ! अब वह घर न आयेंगी। अब हम उनका मुंह फिर न देखेंगी।

ज्ञानी : किसी ने कोई बुरी खबर कही है क्या ? (सिसकियां लेती है।)

सबल : (मन में) अब मन में बात नहीं रह सकती। किसी तरह नहीं वह आप ही बाहर निकली पड़ती है। ज्ञानी से मुझे इतना प्रेम कभी न हुआ था।मेरा मन उसकी ओर खिंचा जाता है। (प्रकट) जो कुछ किया है मैंने ही किया है। मैं ही विष की गांठ हूँ। मैंने ईर्ष्या के वश होकर यह अनर्थ किया है। ज्ञानी, मैं पापी हूँ, राक्षस हूँ, मेरे हाथ अपने भाई के खून से रंगे हुए हैं, मेरे सिर पर भाई का खून सवार है। मेरी आत्मा की जगह अब केवल कालिमा की रेखा है ! ह्रदय के स्थान पर केवल पैशाचिक निर्दयता। मैंने तुम्हारे साथ दगा की है। तुम और सारा संसार मुझे एक विचारशील, उदार, पुण्यात्मा पुरूष समझते थे, पर मैं महान् पानी, नराधम, धूर्त हूँ। मैंने अपने असली स्वरूप को सदैव तुमसे छिपाया । देवता के रूप में मैं राक्षस था।मैं तुम्हारा पति बनने योग्य न था। मैंने एक पति-परायणा स्त्री को कपट चालों से निकाला, उसे लाकर शहर में रखा। कंचनसिंह को भी मैंने वहां दो-तीन बार बैठे देखा । बस, उसी क्षण से मैं ईर्ष्या की आग में जलने लगा और अंत में मैंने एक हत्यारे के हाथों(रोकर) भैया को कैसे पाऊँ ? ज्ञानी, इन तिरस्कार के नेत्रों से न देखो। मैं ईश्वर से कहता हूँ, तुम कल मेरा मुंह न देखोगी। मैं अपनी आत्मा को कलुषित करने के लिए अब और नहीं जीना चाहता। मैं अपने पापों का प्रायश्चित एक ही दिन में समाप्त कर दूंगा। मैंने तुम्हारे साथ दगा की, क्षमा करना।

ज्ञानी : (मन में) भगवन्! पुरूष इतने ईर्ष्यालु, इतने विश्वासघाती, इतने क्रूर, वज्र-ह्रदय होते हैं! अगर मैंने स्वामी चेतनदास की बात पर विश्वास किया होता तो यह नौबत न आने पाती। पर मैंने तो उनकी बातों पर ध्यान ही नहीं दिया । यह उसी अश्रद्वा का दण्ड है। (प्रकट) मैं आपको इससे ज्यादा विचारशील समझती थी। किसी दूसरे के मुंह से ये बातें सुनकर मैं कभी विश्वास न करती।

सबल : ज्ञानी, मुझे सच्चे दिल से क्षमा करो। मैं स्वयं इतना दु: खी हूँ कि उस पर एक जौ का बोझ भी मेरी कमर तोड़ देगी। मेरी बुद्वि इस समय भ्रष्ट हो गई है। न जाने क्या कर बैठूंब मैं आपे में नहीं हूँ। तरह-तरह के आवेग मन में उठते हैं। मुझमें उनको दबाने की सामर्थ्य नहीं है। कंचन के नाम से एक धर्मशाला और ठाकुरद्वारा अवश्य बनवाना। मैं तुमसे यह अनुरोध करता हूँ, यह मेरी अंतिम प्रार्थना है। विधाता की यह वीभत्स लीला, यह पैशाचिक तांडव जल्द समाप्त होने वाला है। कंचन की यही जीवन-लालसा थी। इन्हीं लालसाओं पर उसने जीवन के सब आनंदों, सभी पार्थिव सुखों को अर्पण कर दिया था।अपनी लालसाओं को पूरा होते देखकर उसकी आत्मा प्रसन्न होगी और इस कुटिल निर्दय आघात को क्षमा कर देगी।

अचलसिंह का प्रवेश।

ज्ञानी : (आंखें पोंछकर) बेटा, क्या अभी तुमने भी भोजन नहीं किया?

अचल : अभी चाचाजी तो आए ही नहीं आज उनके कमरे में जाते हुए न जाने क्यों भय लगता है। ऐसा मालूम होता है कि वह कहीं छिपे बैठे हैं और दिखाई नहीं देते। उनकी छाया कमरे में छिपी हुई जान पड़ती है।

सबल : (मन में) इसे देखकर चित्त कातर हो रहा है। इसे फलते-फूलते देखना मेरे जीवन की सबसे बड़ी लालसा थी। कैसा चतुर, सुशील, हंसमुख लड़का है। चेहरे से प्रतिभा टपक पड़ती है। मन में क्या-क्या इरादे थे। इसे जर्मनी भेजना चाहता था।संसार-यात्रा कराके इसकी शिक्षा को समाप्त करना चाहता था।इसकी शक्तियों का पूरा विकास करना चाहता था।, पर सारी आशाएं धूल में मिल गई।(अचल को गोद में लेकर) बेटा, तुम जाकर भोजन कर लो, मैं तुम्हारे चाचाजी को देखने जाता हूँ।

अचल : आप लोग आ जाएंगे तो साथ ही मैं भी खाऊँगी। अभी भूख नहीं है।

सबल : और जो मैं शाम तक न आऊँ ?

अचल : आधी रात तक आपकी राह देखकर तब खा लूंगा, मगर आप ऐसा प्रश्न क्यों करते हैं ?

सबल : कुछ नहीं, यों ही। अच्छा बताओ, मैं आज मर जाऊँ तो तुम क्या करोगे ?

ज्ञानी : कैसे असगुन मुंह से निकालते हो!

अचल : (सबलसिंह की गर्दन में हाथ डालकर) आप तो अभी जवान हैं, स्वस्थ हैं, ऐसी बातें क्यों सोचते हैं ?

सबल : कुछ नहीं, तुम्हारी परीक्षा करना चाहता हूँ।

अचल : (सबल की गोद में सिर रखकर) नहीं, कोई और ही कारण है। (रोकर) बाबूजी, मुझसे छिपाइए न, बताइए। आप क्यों इतने उदास हैं, अम्मां क्यों रो रही हैं ? मुझे भय लग रहा है। जिधर देखता हूँ उधर ही बेरौनकी-सी मालूम होती है, जैसे पिंजरे में से चिड़िया उड़ गई हो,

कई सिपाही और चौकीदार बंदूकें और लाठियां लिए हाते में घुस आते हैं, और थानेदार तथा। इंस्पेक्टर और सुपरिंटेंडेंट घोड़ों से उतरकर बरामदे में खड़े हो जाते हैं। ज्ञानी भीतर चली जाती है। और सबल बाहर निकल आते हैं।

इंस्पेक्टर : ठाकुर साहब, आपकी खानातलाशी होगी। यह वारंट है।

सबल : शौक से लीजिए।

सुपरिंटेंडेंट : हम तुम्हारा रियासत छीन लेगी। हम तुमको रियासत दिया है, तब तुम इतना बड़ा आदमी बना है और मोटर में बैठा घूमता है। तुम हमारा बनाया हुआ है। हम तुमको अपने काम के लिए रियासत दिया है और तुम सरकार से दुश्मनी करता है। तुम दोस्त बनकर तलवार मारना चाहता है। दगाबाज है। हमारे साथ पोलो खेलता है, क्लब में बैठता है, दावत खाता है और हमीं से दुश्मनी रखता है। यह रियासत तुमको किसने दिया ?

सबल : (सरोष होकर) मुगल बादशाहों ने। हमारे खानदान में पच्चीस पुश्तों से यह रियासत चली आती है।

सुपरिंटेंडेंट : झूठ बोलता है। मुगल लोग जिसको चाहता था। जागीर देता था।, जिससे नाराज हो जाता था। उससे जागीर छीन लेता था।जागीरदार मौरूसी नहीं होता था।तुम्हारा बुजुर्ग लोग मुगल बादशाहों से ऐसा बदखाही करता जैसा तुम हमारे साथ कर रहा है, तो जागीर छिन गया होता। हम तुमको असामियों से लगान वसूल करने के लिए कमीसन देता है और तुम हमारा जड़ खोदना चाहता है। गांव में पंचायत बनाता है, लोगों को ताड़ी-शराब पीने से रोकता है, हमारा रसद-बेगार बंद करता है। हमारा गुलाम होकर हमको आंखें दिखाता है। जिस बर्तन में पानी पीता है उसी में छेद करता है। सरकार चाहे तो एक घड़ी में तुमको मिट्टी में मिला दे सकता है। (दोनों हाथ से चुटकी बजाता है।)

सबल : आप जो काम करने आए हैं वह काम कीजिए और अपनी राह लीजिए। मैं आपसे सिविक्स और पालिटिक्स के लेक्चर नहीं सुनना चाहता।

सुपरिंटेंडेंट : हम न रहें तो तुम एक दिन भी अपनी रियासत पर काबू नहीं पा सकता।

सबल : मैं आपसे डिसकशन (बहस) नहीं करना चाहता। पर यह समझ रखिए कि अगर मान लिया जाय, सरकार ने ही हमको बनाया तो उसने अपनी रक्षा और स्वार्थ-सिद्वि के ही लिए यह पालिसी कायम की। जमींदारों की बदौलत सरकार का राज कायम है। जब-जब सरकार पर कोई संकट पड़ा है, जमींदारों ने ही उसकी मदद की है। अगर आपका खयाल है कि जमींदारों को मिटाकर आप राज्य कर सकते हैं तो भूल है। आपकी हस्ती जमींदारों पर निर्भर है।

सुपरिंटेंडेंट : हमने अभी किसानों के हमले से तुमको बचाया, नहीं तो तुम्हारा निशान भी न रहता।

सबल : मैं आपसे बहस नहीं करना चाहता।

सुपरिंटेंडेंट : हम तुमसे चाहता है कि जब रैयत के दिल में बदखाही पैदा हो तो तुम हमारा मदद करे। सरकार से पहले वही लोग बदखाही करेगा जिसके पास जायदाद नहीं है, जिसका सरकार से कोई कनेक्शन (संबंध) नहीं है। हम ऐसे आदमियों का तोड़ करने के लिए ऐसे लोगों को मजबूत करना चाहता है जो जायदाद वाला है और जिसका हस्ती सरकार पर है। हम तुमसे रैयत को दबाने का काम लेना चाहता है।

सबल : और लोग आपको इस काम में मदद दे सकते हैं, मैं नहीं दे सकता। मैं रैयत का मित्र बनकर रहना चाहता हूँ, शत्रु बनकर नहीं अगर रैयत को गुलामी में जकड़े और अंधकार में डाले रखने के लिए जमींदारों की सृष्टि की गई है तो मैं इस अत्याचार का पुरस्कार न लूंगा चाहे वह रियासत ही क्यों न हो, मैं अपने देश-बंधुओं के मानसिक और आत्मिक विकास का इच्छुक हूँ। दूसरों को मूर्ख और अशक्त रखकर अपना ऐश्वर्य नहीं चाहता।

सुपरिंटेंडेंट : तुम सरकार से बगावत करता है।

सबल : अगर इसे बगावत कहा जाता है तो मैं बागी ही हूँ।

सुपरिंटेंडेंट : हां, यही बगावत है। देहातों में पंचायत खोलना बगावत है, लोगों को शराब पीने से रोकना बगावत है, लोगों को अदालतों में जाने से रोकना बगावत है। सरकारी आदमियों का रसद बेगार बंद करना बगावत है।

सबल : तो फिर मैं बागी हूँ।

अचल : मैं भी बागी हूँ ।

सुपरिंटेंडेंट : गुस्ताख लड़का।

इंस्पेक्टर : हुजूर, कमरे में चलें, वहां मैंने बहुत-से कागजात जमा कर रखे हैं।

सुपरिंटेंडेंट : चलो।

इंस्पेक्टर : देखिए, यह पंचायतों की फेहरिस्त है और पंचों के नाम हैं।

सुपरिंटेंडेंट : बहुत काम का चीज है।

इंस्पेक्टर : यह पंचा