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बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता : एक दस्तावेजी पुस्तक - शिवचन्द प्रसाद

[समीक्षित पुस्तक : बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता (आलोचना)। सम्पादक : अवनीश सिंह चौहान। प्रकाशक : प्रकाश बुक डिपो,बड़ा बाज़ार, बरेली, उ.प्र.- 243003, दूरभाष: 0581-2572217। प्रथम संस्करण - 2013। पृष्ठ - 200 । मूल्य: 150 /-]

गाना और रोना मानव की सहज एवं जन्मजात प्रवृत्ति है परन्तु प्रत्येक गाने और रोने को गीत नहीं कहा जाता हैं भावों की उदात्तता और विचारों की विराटता ही गीत को सार्थक बनाते हैं। इसी को प्रसाद की ‘घनीभूत पीड़ा’ और पंत जी ‘वियोगी की आह’ कहते हैं। इसी से आदि कवि को ‘रामायण’ का मूल-सूत्र (मां निषाद प्रतिष्ठां...) मिला था। इसी को कवि का रोना और गाना कहा गया। इसी को आधार बनाकर नागार्जुन उस संस्कृत के महाकवि से पूछते हैं-‘कलिदास ! सच-सच बतलाना इन्दुमती के विरह शोक में अज रोया या तुम रोये थे ? अर्थात अनुभूतियों की मार्मिक, संगीतमयी काव्यात्मक अभिव्यंजना ही गीत का आधार ग्रहण करती है। यह कार्य इतना सरल नहीं है, जितना कि लगता है। डॉ. केदारनाथ सिंह इसे ‘तनी रस्सी पर चलने जैसा कठिन’ बताते हैं। इस कठिन कार्य को सफल बनाया है, प्रसिद्ध गीतकार बुद्धिनाथ मिश्र ने जिनके ‘एक बार और जाल फेंक रे मछेरे ! जाने किस मछली में बंधन की चाह हो’ ने गीतों की दुनिया में धूम मचा दिया था। इसके अतिरिक्त मिश्र जी ने ‘जाड़े में महाड़’, ‘शिखरिणी’ और ‘ऋतुराज एक पल का’ आदि गीत-संग्रह ‘ देकर गीत-विधा का कृतार्थ किया है। निबंध, कहानी, रिपोर्ताज, वार्ता, नाटक, संगीत, हास्य, नृत्य-नाटिका आदि भी मिश्र जी की लेखनी के उपजीव्य बने हैं। इसके अतिरिक्त राजभाषा अधिकारी के रूप में भी आप को अपार सफलता मिली है। दूरदर्शन धारावाहिक ‘क्यों और कैसे’ का पट-कथा लेखन भी आपके ही हाथों सम्पन्न हुआ है। ‘दुष्यन्त कुमार अलंकरण’ (भोपाल), पुश्किन पुरस्कार (सोवियत संघ), निराला सम्मान (उन्नाव) और सहस्राब्धि सम्मान (लखनऊ) से विभूषित ऐसे सशक्त और प्रखर रचनाकार बुद्धिनाथ मिश्र के सम्पूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व पर सम्यक् प्रकाश डालने का कार्य डॉ0 अवनीश सिंह चौहान ने ‘बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता’ ग्रंथ सम्पादित कर किया है। 

संस्मरण यादों के बहाने, आलेख, बातचीत, बकलमखुद, यात्रा-वृत्तांत, समीक्षा और संचयन शीर्षकों के द्वारा दो सौ पृष्ठों के इस ग्रंथ में मिश्र जी के किसी भी पक्ष को छोड़ा नहीं गया है। संपादक की यह कोशिश रही है कि छोटी से छोटी घटनाएं भी प्रसंगवश अपना स्थान ग्रहण करें। उदयप्रताप सिंह, महेश्वर तिवारी, लालसा लाल तरंग, ऋचा पाठक, विवेकीराय, श्रीराम परिहार, यज्ञ मालवीय, वेदप्रकाश अमिताभ के संस्मरण, वशिष्ठ अनूप मधुकर अस्थाना, मदनमोहन उपेन्द्र, प्रेमशंकर रघुवंशी, प्रह्लाद अग्रवाल के आलेख विवेच्य के पक्षों का गहन एवं विद्वतापूर्ण तर्क-संगत विश्लेषण प्रस्तुत करते हैं। इसी प्रकार जयप्रकाश मानस, बाल्मीकि विमल और एकलव्य द्वारा मिश्र जी से लिए गए साक्षात्कार भी उनकी रचना प्रक्रिया को समझने में अत्यन्त सहायक हैं। 

अगले क्रम में स्वयं मिश्र जी के आलेख और यात्रा वृत्तांत संग्रहित हैं और उनके चारों संग्रहों पर विविध विद्वानों की पाण्डित्य पूर्ण समीक्षाएं गीतकार के वैशिष्ट्य को उद्घाटित करती हैं संचयन खण्ड में ‘जाल फेंक रे मछेरे’, ‘मुमकिन है’, ‘जिजीविषा’, ‘इन्द्र-धनु कांपने लगा’ गीत संग्रह हैं। 

कोई भी कवि-कलाकार गीतकार क्यों प्रशंसनीय और लोकप्रिय होता है तथा उसका सृजन क्यों और कैसे शाश्वत होकर प्रसिद्धि और ख्याति के चरमोत्कर्ष पहुंचता है, इसका आधार ‘लोक’ की है। रचना लोकमानस के जितना ही आधिक निकट होती है उसमें उनकी ही जीवन्तता और सशक्तता होती है। इस दृष्टि से बुद्धिनाथ मिश्र सर्वथा जीवन्त, सशक्त और लोकप्रिय गीतकार हैं क्योंकि उनके गीतों में सम्पृक्तता और लोक चिंता है। इसके लिए उनके ‘शिखरिणी’ संग्रह की भूमिका, जोकि उक्त पुस्तक के ब-कलम खंड में दी गयी है, पर दृष्टिपात् करना आवश्यक है, जहां वे लिखते हैं- 

‘‘मेरा यह सन् 1950 से 1958 के बीच देवधा गांव जो विदापत, नचारी, समदाओन, बटवानी फाग गाता था या 1962 से 1965 के बीच वह रेवतीपुर (गाजीपुर) गांव जो बिरहा, कजरी और बारहमासा गाता था, न जाने कहा चला गया। ....दिन हो या रात, संध्या हो या प्रभात ग्रामीण जीवन का हर क्षण गीतमय संगीतमय था। सब कुछ सुर में था इसलिए बड़ी से बड़ी विपत्ति आदमी को तोड़ नहीं पाती थी। गरीबी थी मगर जीवन का रस इतना प्रबल था कि आर्थिक दरिद्रता को मानसिक सम्पन्नता बोलने नहीं देती थी। गुलामी के दिनों में गांव मुक्त था। स्वतंत्रता के बाद गांव के होठों की हंसी छिन गयी, वह शहरों का बेबस गुलाम बनकर रह गया। मेरे मन मे ंबसा गांव आज भी जिन्दा है, इसलिए मैं गीत लिखता हूं। उस गांव ने मुझे कविता की व्यापक शक्ति से परिचय कराया था और सामान्य जनों की तरह ‘कवि’ शब्द को उपहास का विषय मानते हुए भी मैंने एकलव्य की तरह कविता की गीत शक्ति का एकान्तसंधान किया था।’’-(पृ. 15) 

यही कारण है कि उत्तर आधुनिका को बाजारवाद ने जब लोकगीतों की शवयात्रा निकालनी शुरू कर दी और पाश्चात्य संस्कृति फूहड़ नग्नता देश पर थोपनी शुरू कर दी तब उस गीतकार से रहा नहीं गया और उसे लिखना पड़ा- 

‘‘दीनाभद्री आल्ह-चनैनी, बिहुल लोरिक भूत हुए। 
नये प्रेत सौ-सौ चैनल/बोली बोलें सड़कों पर।’’ 

या 

‘‘होड़ लगी है, कौन रूपसी कितना बदन उघारे।’’ 

अथवा 

बेजुबान झोपड़ियां/बौराये नाले/ 
बरग के तलवों में/और पड़े छाले। 
अंखुआये कुठलों में/मड़ुवा के दाने 
कमल को भेंट हुए/ताल के मखाने। 
बालो पंडित जी की मड़ई/डुबो गयी 
अबकी बार फिर बागमंती/फिर आंगन धो गयी।’’ 

‘‘सुन्नर बाभिन्मंजर जोते/इन्नर राजा हो! 
आंगन-आंगन छौना लेटे/इन्नर राजा हो! 
कितनी बार-भगत गुहराये/देवी का चौरा ? 
भरी जवानी जरई सूखे/इन्नर राजा हो।’’-(पृ. 169) 

इसी लोक सम्पृक्ति ने लिखवाया- 

‘‘भूल आयी हंसिया मैं गांव के सिवाने 
चोरी-चोरी आयी यहां उसी के बहाने।’’ 
वे रिश्ते नाते गांवों के/लोकगीत वे मेले/ 
सबसे सबका टूटा नाता/पड़े रह गये झूले/ 
फुरसत नहीं किसी को बरगद छैंया सुस्ताने की/ 
पनघट को ढूंढे वह बेला गागर छलकाने की।’’ 

चुनाव के रास्ते गांव में पहुंचा महानगरीय छल-छद्म ग्रामीण सौम्यता को बर्बरतापूर्वक रौंदता जा रहा है। जाति-क्षेत्र-सम्प्रदाय आदि खेमों बंटता जा रहा गांव रिश्वत और भ्रष्टाचार का ताण्डव नृत्य, भाई-भाई के बीच खड़ी होती दीवार आदि विकृतियां ग्राम्य परिवेश को जहरीला बना रही हैं, तभी कवि दुःखी मन से लिखता है- 

‘‘तुलसी की पौध रौंदते/शहरों से जो लौटे पांव। 
शीशे सा दरक गया है/लपटों में यह सारा गांव। 

कोयल, पपीहा, महोख, मोर आदि पक्षियों की रोर मात्र जनमानस की खुशहाली के प्रतीक नहीं हैं बल्कि सबसे बड़ी खुशहाली उनके अभावों से मुक्ति है। यही कारण है कि गीतकार उस तथाकथित बसंत पर प्रश्न-चिन्ह खड़ा करता है- 

‘‘बंसबिट्टी मे कोयल बोले, 
महुआ डाल महोखा। 
आया कहां वसंत इधर है, 
तुम्हें हुआ है धोखा।’’-(पृ. 40) 
अब रही बात बसंत की तो वह तो दिल्ली मात्र के लिए मेहरबान है- 
‘‘पतझड़ चारों ओर/सिर्फ इस नगरी बसे बसंत। 
जमींदार है दिल्ली/बाकी रैयत सारा देश।-(168) 

प्रसिद्ध गीतकार रमेश रंजक ने भी राजधानी पर कुछ ऐसा ही व्यंग्य किया था- 

‘‘मुंह देखा आचरण यहां का 
बोझिल वातावरण यहां का 
देशी होंठों से करते हैं बातें सदा विदेश की 
ये महान नगरी है मेरे देश की।’’ 

और जनता क्या कहती है- 

संसद है अयाशौघर, जनता कहती 
इसमें रहते तीनों बंदर, जनता कहती। 

गीतकार सत्ता के गलियारे को बड़े निकट से देखता था। जनता ने जिस रूप में दिल्ली को देखा, उसी रूप में गीतकार ने भी देखा- 

‘‘देखी तेरी दिल्ली मैंने, देखे तेरे लोग। 
तरह-तरह के रोगी भोगें, राजभोग के भोग।’’ (51) 

बुद्धिनाथ मिश्र सत्य के प्रबल समर्थक और सत्यान्वेषी हैं। यद्यपि वे मानते हैं कि सच के लिए खतरे तो उठाने ही होंगे (‘‘मैं समर्पित बीज सा धरती गड़ा हूं/लोग संसद के कंगूरे चढ़ गए हैं।’’) फिर भी वे सच का साथ नहीं छोड़ते हैं- 

‘‘छोटा है भूगोल भले ही, 
भारत का इतिहास बड़ा है। 
नहीं तख्त के लिए आज तक 
हमने सच के लिए लड़ा है।’’ (186) 

झूठ की परकाष्ठा तो देखिए- 

पूछ रहा मुझसे प्रतिक्रिया/अपने आरक्षण की। 
जिसको लिखकर मैंने पाई/कीमत राशन की।’’ 

जब कि सच तो सच होता है, वह मुखौटा नहीं हुआ करता- 

‘‘सख्त हैं सच की तरह होते नहीं दोहरे। 
आइनों से हैं बहुत नाराज कुछ चेहरे।’’(156) 

मिश्र जी इन दुहरे आचरण वालों को समाधान करते हुए चेतावनी भी देते हैं- 

‘‘लेकर नाम देश सेवा का जाने क्या क्या करते हो जी 
फट जाएगा पेट तुम्हारा इतना काहे भरते होजी।’’(168) 

इस सम्पादित पुस्तक के अध्ययन से पता चलता है कि बुद्धिनाथ मिश्र घनघोर आस्थावादी और आशावादी गीतकार है।। इन्होंने उस समय गीत का अलख जगाया जब गीतों के मर जाने के फतवे जारी हो रहे थे। ऐसे समय में शम्भूनाथ सिंह, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, गुलाब सिंह, महेश्वर तिवारी, कैलाश गौतम, वीरेन्द्र मिश्र, रमेश रंजक, शांतिसुमन, रमानाथ अवस्थी, उमाकांत मालवीय आदि गीतकारों ने गीत-नवगीत विधा की जीवन्तता बनाया बनाया रखा और गीत विरोधियों का लेखनी के माध्यम जबाब देते रहे। तभी तो मिश्र जी आत्मसंघर्ष का स्मरण करते हुए लिखते हैं- 

‘‘साधना अब भी जरा सी है अधूरी पार्थ 
और तप तू और तप/ज्यों जेठ का दिनमान। 
काल लेता है परीक्षा, तू न घबराना।’’(19) 

और- 

टूटेगा नहीं मगर सिलसिला विचारों का 
लहरों के गीत समय शंख गुनगुनायेंगे।’’(61) 

यद्यपि बुद्धिनाथ मिश्र भवानी प्रसाद मिश्र की ‘जिस तरह तू बोलता है, उस तरह तू लिख और उस के बाद भी इससे बड़ा तू दिख’ पंक्ति को सिद्दत के साथ चरितार्थ करते हैं तथापि दो विन्दुओं पर उनसे सहमत होना मुश्किल है- 

पाठ्यक्रमों में कथित प्रगतिशील कविताओं की घुसपैठ ने हिन्दी साहित्य के भविष्य छात्रों के मन में कविता के प्रति अरुचि और आतंक पैदा कर दिया।’’ (92) इस प्रकार प्रगतिशीलता का दूसरा नाम है- अरुचि और आतंक ? मिश्र एक तो इन पर क्रुद्ध हैं और इससे ज्यादे क्रुद्ध हैं- कवि सम्मेलन के नाम पर आये दिन हो रहे ‘कपि सम्मेलनों’ की बंदर बांट पर। दूसरे वाले विषय पर तो नाराजगी उचित है पर पहले वाले पर कोप समझ में नहीं आता। समझने के क्रम में मिश्र जी की एक बात सामने आती है, वह यह कि सुधार के लिए उनकी निगाहें एक मात्र बजरंगियों के त्रिशूल पर टिकी हैं’ वे इस मैल को धोने के लिए डिटर्जेंट हो सकते हैं। 

ऐसी स्थिति में प्रगतिवाद या मार्क्सवाद ‘अरुचि’ और आतंक का पर्याय बनता है तो आश्चर्य ही क्या है ? खैर! यह वैचारिक भिन्नता है जो एक दूसरे पर थोपी नहीं जा सकती या इसे सामयिक अन्तर्विरोध भी कहा जा सकता है क्योंकि इस दृष्टि से देखा जाए तो मिश्र जी प्रतिपक्ष को भरपूर सम्मान देते है’’ 

‘‘प्यार दो भरपूर अग्रज का उन्हें तुम 
वे नमाजी भी तुम्हारे ही सगे हैं।’’ 

चर्चित रचनाकार बुद्धिनाथ मिश्र की कलम का सफ़र और उनके जीवनानुभवों / परस्थितियों पर को विधिवत प्रस्तुत करने का कार्य डॉ. अवनीश सिंह चौहान ने ‘बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता’ ग्रंथ सम्पादित कर किया है। कुल मिलाकर यह एक दस्तावेजी पुस्तक है। रचनाकार एवं सम्पादक को हार्दिक बधाई। 

[समीक्षक : डॉ. शिवचन्द प्रसाद, एसो. प्रो. (हिन्दी), राजकीय महाविद्यालय, खैर, अलीगढ़]