'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

कहियत भिन्न न भिन्न / कुमार रवींद्र

 कुमार रवींद्र 
पूर्व कथन - 

युग-युग से
सदियों से
होती है रामकथा
वाल्मीकि, कालिदास, तुलसी ने
कही कथा अवतारी राम की
और कई कवियों ने -
अमर हुए
धन्य हुए
'उत्तररामचरित' रचा भावुक भवभूति ने -
राम हुए मानव फिर|
घर-घर में रची-बसी रामकथा -
गाथा आदर्शों की
शाश्वत मर्यादा की
उन मानव मूल्यों की
जो सारे युग के हैं
सारी मानवता के|
बसे हुए राम हैं जन-मन में
जन-जन के उन अन्तर्द्वीपों में
जहाँ ज्योति जलती है अन्तरंग
सूर्योदय ही रहता है अनंत |
मन में फिर खिलते हैं
सूर्य-कमल -
होता है दूर घना अंधकार
रोज़ नये प्रश्न वहाँ उगते हैं
और धूप होती है|
ऐसा ही है प्रसंग
राम के एकाकी जीवन का -
उस गहरे एकांत का
जिसमें पीड़ाएँ हैं
और घने अन्तर्द्वन्द्व |
दृश्य यों उभरता है -
दृश्य - एक

[अयोध्या का राजभवन | राम का निजी कक्ष | अर्द्धरात्रि | कक्ष के बाह्य अन्तराल में राम खड़े हैंचुपचाप , विचारमग्न ]

राम -
(आत्मालाप) यह कैसा सूनापन
कैसा एकांत है |
अंधकार गहरा है
बाहर भी, अन्दर भी
गाढ़ा यह अँधियारा
अब मेरी साँसों का सम्बल है|
उमड़ रहीं कैसी ये स्मृतियाँ हैं -
आकृतियाँ
जैसे हों सपनों की छायाएँ|
दूर कहीं सूर्योदय की झिलमिल -
उसमें ये आकृतियाँ खेल रहीं
और यहाँ परछाईं उनकी ही दिखती है |
कैसी यह माया है|
सीते! हे वल्लभे !
दूर किसी छवियों की घाटी में
मंद-मंद मुसकातीं
तुम जादू रचती हो आज भी|
अंधी है गुफा एक
जिसमें मैं सदियों से बैठा हूँ
एकाकी प्रियाहीन |
निर्मम है -निष्ठुर है मेरा एकांत यह|
यात्राएँ करता मन दिशाहीन
अंदर-ही-अंदर

[नेपथ्य में लवकुश के रामायण-पाठ का स्वर उभरता है - साथ में पारदर्शिका , जिसमें आकृतियाँ उभरती-मिटती हैं]

लवकुश - कथा यह श्रीराम की ...
जयति-जय श्रीराम-लक्ष्मण-जानकी |

ताड़का-वध
मख-समापन
यात्रा मिथिला नगर की ओर
मार्ग में आश्रम दिखा जनशून्य -
शिला होकर रह रही थी वहाँ
ऋषिपत्नी अहल्या
शापभ्रष्टा -
उसे तारा
मुक्ति दी उस शिलापन से |

नये युग की आस्था का
है अलौकिक क्रांति का अध्याय यह तो ...
राम तब राजा नही थे |

[पारदर्शिका में गौतम ऋषि के आश्रम में शिला हुई अहल्या के राम के स्पर्श से पुनः प्राण पानेका , प्रतिष्ठित होने का प्रसंग मूक छवियों में उभरता है | राम का विचार-स्वर फिर उभरता है]

राम ( आत्मालाप) - हाँ, अहल्या ...
वह समय ही और था ...
साधारण होने का वह था वरदान-पर्व|
महलों से बाहर जो
खुला-खुला जीवन है
अनुभव ने उसके दी
मुझको थी नई दृष्टि -
जुड़ने की
धरती से
धरती के सारे संवादों से|
मिली नई ऊर्जा थी;
उससे ही तोड़ सका था मैं
पथरीली धरती वह
जिसमें तुम मूर्छित थीं पड़ी हुईं -
वर्षों की वह मूर्च्छा
और शिला होने का शाप वह
क्षण भर में टूटे थे|

वह था स्पर्श एक नई क्रांति-दृष्टि का|
एक नया युग उससे जन्मा था :
अनुभव वह राम का जन-जन का अनुभव था
और ...
उसी ऊर्जा से भरा हुआ
जानकी-स्वयंबर में पहुँचा था मैं|

( लवकुश क कथा-गायन का स्वर फिर उभरता है )

लवकुश - मिथिलानगरी का धनुर्यज्ञ वह
अद्भुत था|
शिवचाप अलैकिक
उस सत्ता का था प्रतीक
जो थी अजेय|

उससे था बँधा भविष्य
धरा की पुत्री का -
भंजन उसका आवश्यक था|

राजा सीरध्वज जनक प्रजा के पोषक थे -
थे कृषक स्वयं|

कृषि-यज्ञ भूमि से उपजी थी कन्या अमोल
थी शस्यभूमि-पुत्री सीता
राजा की प्रिय पोषित बेटी|
थे राम स्वयं भी यज्ञपुत्र ...

[ पारदर्शिका में मिथिलानगरी में आयोजित सीता-स्वयंबर एवं धनुर्यज्ञ के दृश्य उभरते हैं]

सारी धरती की सत्ताएँ -
पुरुषार्थ और बल-गौरव सब -
अगणित योद्धा आये समर्थ -
शिवधनुष रहा फिर भी अविजित|
राजा सीरध्वज हुए विकल -
भूमिजा रहेगी बिन-ब्याही -
शिवधनुष हुआ इसका बंधन|

फिर राम उठे जीवनी-शक्ति से भरे हुए -
फिर हुआ अचानक चमत्कार -
मानव की
आस्था के आगे
दैवी सत्ता हो गई क्षीण -
दो खण्ड हुआ शिवचाप और ...
सीता बंधन से हुई मुक्त|
वह भूमिसुता का मुक्तिपर्व
प्रेरक प्रसंग|

[ पारदर्शिका में सीता राम के गले में वरमाला डालती दिखाई देती हैं - स्वस्तिवाचन एवं शंखध्वनि के साथ पारदर्शिका धुँधली पड़ जाती है | लवकुश का गायन भी डूब जाता है | राम का विचार-स्वर फिर उठता है]

राम (आत्मालाप) - मुक्तिपर्व वह मेरा भी था ..
धरती की पुत्री से वह अभिन्न भाव
मुझे जोड़ गया और अधिक
जन-जन से -
सत्ता हो गई क्षीण|
साधारण होने की इच्छा बलवती हुई;
और फिर हुआ सुयोग -
सत्ता से दूर कटे
वन के वे प्रारम्भिक वर्ष
सुखकर थे|
सीता थी साथ
और लक्ष्मण भी -
साथी मिला -नेह मिला
हमको वनपुत्रों का|
कैसा था अद्भुत वह संस्कार -
अनुरागी होकर भी वीतराग होने का|
वह अरण्यवास अब लगता है सपने-सा|
अब तो है सत्य यही एकाकी जीवन -
सत्ता से बँधा हुआ
महलों में बंदी मन -
प्रियाहीन साँसों की यह बोझिल यात्रा ही
अब मेरी नियति हुई|

सीते! मैं क्या करूँ ?
तुम बिन ये संध्याएँ बार-बार होती हैं -
निष्ठुर है सूर्योदय
आकुल सूर्यास्त भी
और घनी रातों के अंधकार|
नित्यसखी मेरी तुम ...
क्यों निष्ठुर शिला हुईं -
और मुझे छोड़ गईं यों
एकाकी निर्मम एकान्त में -
है असह्य ...
हा सीते ...

[ अर्धमूर्च्छित अवस्था में राम वहीँ पड़ी आसन्दी पर निढाल हो जाते हैं]

दृश्य - दो

[ वही कक्ष - उसके अंदर के अन्तराल में सीता की स्वर्ण-प्रतिमा | उसके सम्मुख बैठे राम आत्मालाप में व्यस्त]

राम (आत्मालाप)- बार-बार जागृति है
और वही है ... निर्मम चेतना
साँसों की प्रियाहीन |

रक्त में, शिराओं में बसी हुई आकुल उत्तेजना
कब होगी शांत, हाय !

एक ओर सारी स्थितियाँ ये
निष्चेतन क्रियाहीन
वैसी ही जैसी यह प्रतिमा है -
संज्ञाशून्य
और इधर तड़पन यह -
रोज़ विवश जीने की यातना |
सीते! हा सीते !
तुम कहाँ गयीं ?

ऋषियों की तपोभूमि, यज्ञभूमि ...
नैमिष का वह अरण्य...
मुझको भी कर गये अरण्य, हाय !
लौटा हूँ मैं असार-निराधार
अभिशापित-निस्सहाय |

कैसा था यज्ञ, हाय !
मेरी जो शक्ति थी, ऊर्जा थी, प्राण थी
समां गयी धरती में

हाय ! यही ...
केवल शव शेष रहा
और ...
इसे लेकर मैं
भटक रहा बूढ़ी संज्ञाओं के घेरे में |

[ राम की इस आंतरिक अकुलाहट में कक्ष के अवकाश में नैमिषारण्य की यज्ञभूमि का दृश्य उभरता है | यज्ञभूमि में सभाभवन | राम बीच में एक आसन पर बैठे हैं | पास के आसनों पर भरत-लक्ष्मण-शत्रुघ्न , गुरु वशिष्ठ और तीनों माताएँ आसीन हैं | एक ओर ऋषि वाल्मीकि और उनका ऋषिकुल आसीन है | उनके साथ लवकुश हाथ में वीणा लिये मुनिकुमारों के वेश में खड़े हैं |चारों ओर राज्य-सभासद और प्रजाजन बैठे-खड़े हैं | बीच के अन्तराल में तपस्विनी वेश में सीता नतमस्तक खड़ी हैं | वाल्मीकि राम को सम्बोधित करते हैं]

वाल्मीकि - बोलो श्रीराम !
सीता की शुद्धि का प्रमाण तुम्हें चाहिए
अब भी क्या ?
मुझको जो सत्य मिला
ऋत के अन्वेषण से
अपने उस ज्योतिर्मय अनुभव से कहता हूँ
सीता है परम शुद्ध -
धरती की बेटी यह धरती सी है पवित्र
सीता अपवित्र कभी होती है, बोलो राम !
तुम तो हो स्वयं ज्ञान के स्वरूप -
अपना मन देखो तुम
क्या कहता ?
सीता को स्वीकारो, देता आदेश मैं |

[ राम मौन रहते हैं | गुरु वशिष्ठ उन्हें मौन देखकर कहते हैं]

वशिष्ठ - राम, मौन क्यों हो तुम ?
ऋषिवर की वाणी में सत्य बोलता है
स्वीकार करो -
वाल्मीकि आश्रम में जनमे ये लवकुश
पुत्र हैं तुम्हारे ही |
सीता की शुद्धि हुई स्वतः प्रमाणित यों |
लोक के प्रवाद का प्रश्न जहाँ तक रहता
होंगे हम सब साक्षी |
सीता को स्वीकारो
है अभिन्न यह तुमसे |

[ राम की मुखाकृति में भावों का आन्दोलन होता है | उससे उबरकर वे बोलते हैं]

राम - मुनिश्रेष्ठ ! गुरुवर !
आप दोनों ही परमपूज्य
दोनों का मुझ पर अधिकार है |
आपकी अवज्ञा करे राम
नहीं संभव है |
किन्तु ...
तर्क नहीं करता मैं आपसे
नम्र है निवेदन बस |

व्यक्ति राम के निर्णय का है यह प्रश्न नहीं -
राजा से ऊपर भी होती है मर्यादा|
ऋषियों की, शास्त्रों की वाणी
है अगम्य
मन्दबुद्धि राम उसे क्या समझे ?
मन का विश्लेषण है बड़ा कठिन -
उसका भी क्या कहूँ ?
जग-प्रवाद माना अब मौन हुआ
और शायद आगे भी शांत रहे
किन्तु प्रश्न यह है मर्यादा का -
सत्ता की अपनी मर्यादा का |
सत्ता की वाणी की
राजा के वचनों की अपनी मर्यादा है |
जनता का उसमें विश्वास हो
यह भी आवश्यक है -
मेरा तो सत्य यही मर्यादा |
क्षमा करें गुरुजन
मैं क्या करूँ ?
है पवित्र जानकी - परम शुद्ध
किन्तु लोक भी उसे स्वीकारे
और वह पूजित हो जन-जन में
यह भी आवश्यक है |
सत्त्व रहे उसका
और...
हो रक्षा मेरी भी वाणी की
ऐसा कुछ हो जाए |
अब उसके हाथों में मेरी मर्यादा है
उसकी भी है अपनी मर्यादा |
मैंने अन्याय किया उसके प्रति
निर्णय अब उसका हो |

[ दृश्य धुँधला जाता है | राम के आत्मालाप का स्वर फिर उभरता है]

राम( आत्मालाप) - यों...
निर्णय सीता पर छोड़ हुआ मैं न्यायी -
होकर तटस्थ
मैंने सोचा हो गया न्याय |
जो थी अभिन्न
उससे ही मैं हो गया अलग |
निर्मम था मैं
सीता थी व्याकुल-मर्माहत |

[ दृश्य फिर उभर आता है | सीता आहत दृष्टि से राम की ओर देखती हैं | फिर धरती पर अपनी अश्रुपूरित दृष्टि टिकाए बोलती हैं]

सीता - कैसी अस्पृश्य हुई मैं !
राजा की वाणी है
यह मेरे राम की नहीं -
पहले मैं त्याज्य थी
अब हूँ मैं अस्वीकृत
कैसे यह मन मेरा जीवित है ?
अब भी यह ह्रदय नहीं फटता है
मैं धरती-पुत्री हूँ
निराधार मुझको है शेष रहा
माँ का ही बस आश्रय |
किसकी मैं साक्षी दूँ ?
मन में जो युग-युग से पलता है नेह-भाव
उसकी क्या ?
वह है स्वीकार नहीं राजा को - लोक को
मेरी मर्यादा तो पहले ही खंडित है |
देव नहीं साक्षी हो पायेंगे -
वे सारे हैं तटस्थ
मर्यादित राजा-से
लोक-लाज, नियम सभी हैं विरुद्ध
अब तो दें साक्षी माँ धरती ही -
यदि मन से और वचन-कर्मों से
चिन्तन से, देह से
भावों से, रक्त की शिराओं से
सारी इच्छाओं से
हर पल चेष्टाओं से
मैं हूँ बस राम की
तो धरती माँ आकर
मुझको स्वीकार करें
... ... ..
अस्वीकृत होते जो
उनका है आश्रय यह धरती की गोद ही |
माँ मेरी ...
लौटा लो मुझको अब अपने उस गर्भ में
जहाँ व्यथा पलती है ममतामयि
और जो सिरजती है प्राणों को |
शिला हुआ मन मेरा
शिला करो मेरी यह देह भी ...

[ सभागृह का वह भाग भीषण गड़गड़ाहट के साथ फट जाता है , जहाँ सीता खड़ीं थीं | एक अग्नि-ज्वाल सा उठता है | उसमें एक पारदर्शी आकृति उभरती हैं , जो सीता को बाँहों में समेट लेती है | सीता की आकृति भी पारदर्शी होकर उसी आकृति में समां जाती है | दृश्य एकाएक धुँधला जाता है | राम का आत्मालाप फिर जगता है]

राम(आत्मालाप) - स्तम्भित और ठगा
देखता रहा था मैं
या का समाना वह धरती में
कैसी थी मूढ़ता !
उस क्षण ही राम मरा -
शेष रहा राजा बस |
यों था सम्पन्न हुआ अश्वमेध यज्ञ वह
पूर्णाहुति बनी प्रिया -
आहुति हो गया राम |
लौटा ले मातृहीन बेटों को
और स्वर्ण-सीता को |
तबसे यह साँसों का क्रम है
खण्डहर में घूम रही शापित आत्माओं सा |
सूर्योदय कबका है डूब चुका -
शेष बचा है गहरा अन्धकार
और घनी मूर्च्छाएँ ....

[ फिर मूर्च्छित हो जाते हैं]

दृश्य -तीन

[ वही रात्रि -वही कक्ष | राम अर्द्धमूर्च्छित अवस्था में शैया पर लेटे हैं | अन्तर्कक्ष से आकृतियाँ और छवियाँ उभरती हैं , एक-एककर राम के चारों ओर नृत्य करती हैं , उनके अन्तर्मन में प्रवेश कर स्वप्न एवं दृश्य बनती हैं | पहले मारीच की प्रेताकृति आती है - स्वर्णमृग के रूप में | मारीच लुभानेवाली चेष्टाएँ करता है ]

मारीच - 'हा लक्ष्मण ... हा सीते...'
कहो राम !
कैसा था अभिनय वह मेरा ?
छली गयी सीता थी मेरे इसी रूप से
और इसी स्वर से भी |
सत्य और छल की हैं आकृतियाँ अलग नहीं
दोनों में अन्तर भी अधिक नहीं |
मैं तो था राक्षस
छल-छद्मों से भरा हुआ
पर तुम तो थे प्रभु और थे परात्पर भी
फिर भी क्यों छले गये मेरे इस भ्रम से तुम ?
राम, स्वर्ण होने का मेरा वह आग्रह
शारीरिक वह समृद्धि
नकली थे - नष्ट हुए |
मैं भी था मुक्त हुआ सारे आवरणों से |
तुम सच में प्रभु थे तब |
किन्तु ...
वह अलौकिकता ...
स्वर्णिम आकारों से वीतराग होने की वह क्षमता
जो मुझको पूज्य थी
हाय, अब कहाँ गयी ?
होते ही राजा तुम
सोने के उस छल से ग्रस्त हुए -
कैसा सम्मोहन यह !
सोने की प्रतिमा में सीता को खोज रहे -
कितने दयनीय हुए तुम |
क्या कहूँ ?
मेरा छल जीत गया
सत्य हुआ मेरा भ्रम, हाय राम !

[ मारीच की आकृति कहते-कहते विलीन हो जाती है | उसी धुँधलेपन से रावण की महाकार छायाकृति निकलती है | रावण के चेहरे पर , आँखों में व्यंग्यभरी मुसकान है]

रावण - कहो राम, कैसे हो ?
यह क्या हो गया तुम्हें ?
मूर्च्छा में डूबे हो -
कैसा आश्चर्य यह !
शासन की गरिमा से भरे हुए
कैसा आश्चर्य रचा है तुमने सत्ता का -
कहती है प्रजा वही करते हो |
... ... ...
जानकी दिखाई नहीं देती है -
छोड़ गयी तुमको क्या ?
दोष मुझे मत देना -
मैंने तो हरा नहीं उसे |

[ व्यंग्यभरा अट्टहास करता है | राम उद्विग्न-व्यग्र होते हैं]

अच्छा, यह सीता है कक्ष में ...
कैसी आकर्षक है अब भी !
सोने की प्रतिमा-सी लगती है -
अरे, यह तो है उसकी प्रतिमा ही |

[ फिर हँसता है]

सोने की लंका थी मेरी
और मैं भी था उद्भट सम्राट
किन्तु ...
सीता थी रही वहाँ प्राणवान और सजग |
सोने की शिला यहाँ क्यों हुई ?
समझा ...
राजा हो... सोने का सम्मोहन हुआ तुम्हें
इसीलिए सीता को सोने की शिला किया |
अद्भुत है तुम्हारा स्पर्श, भाई|
शिला प्राणवान हुई और हुई ऋषि-पत्नी -
करके विपरीत क्रिया
पत्नी को सोने की शिला किया |
सच, तुम हो पुरुषोत्तम |
यदि तुमको सोने का इतना ही मोह था
मुझसे कह देते
सीता के बदले में सोने की लंका मैं दे देता |

[ एक दीर्घ उच्छ्वास भरता है]

अहह राम !
दुर्लभ थी जानकी
और मुझे विद्युत् की किरणों-सी दहती थी |
मन मेरा प्रेमी था दुर्लभ हर वस्तु का |
हरण किया था उसका मोहग्रस्त होकर ही -
किन्तु ...
वह समर्पित थी तुमको ही एकनिष्ठ -
पूरी तरह |
मेरा सब पौरुष ... सारी प्रभुताएँ -
मेरी समृद्धि सभी
सारे आकर्षण, सम्मोहन वे
जिससे थीं मन्त्रमुग्ध खिंची चली आतीं
सब देव, असुर, नाग, यक्ष कन्याएँ -
वह सारा व्यर्थ गया |
क्रोध मुझे आता था
भक्ति भी उपजती थी उसके प्रति |
और फिर आये थे राम तुम |
देख तुम्हें जाना था मैंने ...
तुम दोनों हो अभिन्न
उपजा संदेह था अपने प्रति -
था पहली बार लगा मुझको
प्रीति है अलौकिक और दुर्लभ कमनीय भी |
काश, मुझे मिल पाती ...
जीवन यह व्यर्थ गया प्रीति बिन |
मन ही मन मैंने आसीसा था
तुम .. दोनों को -
श्रद्धा से भरे हुए वे क्षण
मुझको थे पूजनीय |

[ फिर एक दीर्घ निश्वास लेता है | राम के चेहरे पर गहरी व्यथा अंकित है]

[ विह्वल स्वर में] किन्तु राम, तुमने यह क्या किया -
सीता को त्याग दिया |
कैसे तुम कर पाए यह कुकृत्य -
तुम दोनों थे अभिन्न |
बोलो तो ...
इतना उद्योग किया -
हाँ, अलंघ्य सागर पर बाँध सेतु
मुझ अजेय रावण को मारा था
क्या केवल ...
अपनी अहं-तुष्टि हेतु ?
ब्राह्मण के पूरे-के-पूरे कुल की हत्या का
पाप लिया सिर पर था
क्या केवल सीता को यों कलंक देने को ?
इतनी हत्याएँ...
इतना वह नर-संहार किसलिए ?
मात्र इक बहाना थी सीता क्या ?
मुझको थी वन्दनीय जानकी -
रहने उसे देते मेरे पास ही |
नहीं राम, जनरंजन
मात्र इक छलावा है |
यदि मैंने भोग को बनाया था अंतिम सत्य
तो तुमने निर्मम त्याग को |
दोनों हैं अर्द्धसत्य और आत्मघाती भी |
और प्रजा ...
रहती है आदिम ,,, संस्कारहीन |

[ जोरों से हँसता है]
हा-हा-हा ...
धन्य राम !
हो गये परात्पर तुम -
मर्यादापुरुषोत्तम
किन्तु कटे धरती से
हाँ, उसकी बेटी से
और अब मूर्च्छाओं में डूबे
रचते एकांत नये
हा-हा-हा ...
कैसी मर्यादा यह अपरिमेय-अन्तहीन !

[ हँसते हुए रावण की प्रेताकृति विलुप्त हो जाती है | उसके अट्टहास की गूँज थोड़ी देर तक कक्ष के अन्तराल में टकराती रहती है | राम अत्यंत विचलित-उद्वेलित लगते हैं | अन्तर्कक्ष से कटे सिर को हाथ में पकड़े शूद्र तपस्वी शम्बूक की रुण्ड-छायाकृति आगे आती है]

शम्बूक - ईश्वर... प्रभु होने की इच्छा ...!
राम, यही मेरा अपराध हुआ |
तुम थे प्रभु जन्म से
किन्तु मैं जन्मना था अन्त्यज ...
पाना था चाहा...
एक अंश छोटा-सा प्रभुता का
जिसके तुम पूर्णपुरुष |
किन्तु मुझे दण्ड मिला मृत्यु का |
कैसा था न्याय यह
हाँ, राजा राम का |
मात्र जन्म ही है क्या
जीवन का चरम बिंदु - अंतिम आधार वही ?
हाँ सीता भी तो
अज्ञातकुलशीला थी -
धरती की पुत्री थी
किन्तु उसे मिले जनक
और फिर तुम भी तो ...
अपनाया उसको था तुमने आकाश बन |
किन्तु वह ...
तुम्हारा अपनाना भी ...
मिथ्या हुआ |
मुझसे भी अधिक हुई अपमानित जानकी |
वह जो वीर्यशुल्का थी - वीर-प्रसू
उसका यों तिरस्कार ...
सत्ता का आग्रह क्या अँधा ही होता है ?
राम !
यह प्रजा ...
जिसकी इच्छा से तुम चले
अब भी है वैसी ही -
संकुचित-अपाहिज-अज्ञानी - अनुदार भी |
बस प्रभु ही आश्रय हैं इसके |
प्रभुता को पूजती -
चलते तुम इसकी अंधी इच्छाओं से |
राजा तुम हुए - दृष्टि खो बैठे -
सीता का त्याग किया
हत्या की मेरी फिर |
अस्वीकृति, हाय ! सिर्फ अस्वीकृति ...
कैसा यह राजधर्म !

[ एक खिन्न मुस्कान के साथ]
राम !
यह अलौकिक होने का आग्रह...
होता है ऐसा ही...

[ कहते-कहते वह भी अन्तराल में धुँधला जाता है | राम अर्द्धजाग्रत होते हैं | उनके चेहरे पर विचलन का भाव साफ़ दिखाई देता है]

राम(आत्मालाप) - हाय ! प्रश्न...
केवल प्रश्न...
मन मेरा अंतरीप हो गया
जिस पर हैं चट्टानें-ही-चट्टानें
नोकीली-धारदार -
घायल यात्राएं हैं बार-बार वहीँ-वहीँ |
बर्फीले पर्वत की चोटी पर बैठा हूँ
एकाकी -
जल-प्लावन होता है दभी ओर-
अन्धकार बढ़ता ही जा रहा -
युगों-पूर्व सूर्योदय वन में जो देखा था
बिला गया जाने किस अंधकूप घाटी में
और ये अनास्था की आकृतियाँ
घेर रही हैं मुझको -
क्या करूँ ?
क्षण-क्षण यह कालचक्र
तोड़ रहा है मुझको -
घूम रहा, कुचल रहा है निष्ठुर यह
मेरी आस्थाओं को
सारी ही मृदुल-मधुर दैवी संज्ञाओं को |
काश, शिला हो पाता
या...
फिर हो पाता एक बार फिर से साधारण मैं |
कहता शम्बूक सही -
निष्ठुर है और क्रूर हृदयहीन
प्रभु होने का आग्रह |
काश !...
वही होता जो कहता दशग्रीव है -
जीवित तो रहती फिर सीता |
किन्तु... कालचक्र नहीं पीछे है मुड़ पाता |
प्रभु हो या कोई भी
सारे असमर्थ हैं |
आस्थाएँ सत्ता से जुड़कर
हो जातीं दीन-हीन हास्यास्पद
या...होतीं वे कपटी स्वर्णमृग |
सीते ! हा सीते !
यह सच है
मैं अन्यायी-ढोंगी हूँ -
रावण ने साधू बन तुम्हें ठगा -
मैंने प्रभु होकर भी वही किया -
ठगा तुम्हें प्रभुता से, न्याय से |
प्रेमी था ...
किन्तु बना राजा मैं
और तुम्हें त्याग कर सोचता रहा
यही श्रेष्ठ राजधर्म है |
और अंत में ...
हाय ! विवश किया
करो आत्महत्या तुम |
कैसी मर्यादा यह - कैसा आदर्श यह !
अब मैं हास्यास्पद हूँ |
हँसते हैं वे भी अब मुझ पर
जो पशु थे
या थे फिर दम्भी और धूर्त-चतुर |
मैं भी तो उन-सा ही ...
नहीं...नहीं...उनसे भी गर्हित हूँ |
उनके अन्याय से प्रताड़ित थे अन्य लोग
मैंने अन्याय किया है तुमसे
जो नितांत अपनी थीं |
दम्भ यह, दुराग्रह यह प्रभुता का
क्षम्य नहीं ...
दुष्कर अपराध है दण्डनीय |
कहते सब मुझको सर्वज्ञ हैं -
मैं भी था ऐसा ही सोचता |
किन्तु आज रावण ने दिखा दिया
कितना अल्पज्ञ मैं |
कहता शम्बूक सही
मैंने बस अस्वीकृति को ही स्वीकारा है
जीवन भर
और वही अस्वीकृति
अब मेरा बन्धन है |
क्या करूँ हाय ...
सीते ! मैं क्या करूँ ?
मार्ग नहीं दिखता है एकाकी, जानकी !
आओ, तुम लौट आओ ...
वैदेही ! ... ...

[ कहते-कहते आत्म-विह्वल हो संज्ञाशून्य हो जाते हैं]

दृश्य -चार

[वही कक्ष -वही रात्रि| कुछ समय उपरान्त राम अर्द्ध-सुप्तावस्था में शैया पर लेटे हैं| अन्तर्कक्ष में स्थित सीता की मूर्ति में अचानक हलचल होती है| उसमें से एक-एककर छायाकृतियाँ बाहर आती हैं|राम के स्वप्न से एकाकार हो जाती हैं | पहली आकृति अहल्या की है]

अहल्या - राघव !
यह कैसी निश्चेतना
कैसी यह मूर्च्छा है ?
संशय का स्वर यह ...
और यह पलायन... किससे ...?
यह कैसा छल ... बोलो !
साक्षी हूँ मैं तो
उसी नये सूरज की
आस्था की उन पहली किरणों की
जिनमें था
जीवन का अप्रतिम उल्लास अमल
और नये युग की थी
व्यापक उद्घोषणा |
शब्द आज भी मेरी साँसों में गूँज रहे|
राघव वे शब्द नहीं
हैं वे तो ऋचामन्त्र युग के परिवर्तन के|
तुमने था कहा -
'सूर्य हूँ मैं वह
जिसका स्पर्श तोड़ दे जड़ता -
सारी वह वर्षों की जकड़न
जिसमें तुम बंदी हो ऋषिपत्नी |
उठो...अहिल्ये उठो...
मेरा आदेश यह
तुम हो अपवित्र नहीं|'
कैसी तब बिजुरी-सी कड़की थी |
और...
मेरी उस पाषाणी देह में प्राण लौट आये थे |
राम, वही आस्था है आज भी
युग का सत्य |
भूल गये तब तुमने
मुझसे था क्या कहा -
'नारी की देह है अलौकिक -
होती अपवित्र नहीं ;
मन का ही कलुष पाप होता है'
और उन्हीं वचनों की आस्था से
अब तक मैं जीवित हूँ |
तुम तो थे युगपुरुष
और थे नियंता स्वीकारों के |
सीता का अस्वीकार....
विस्मित हूँ मैं अब भी -
तुमने कैसे किया !
राम, मैं अहल्या थी
तुमने दी गति मुझको -
जीवन-आधार दिया ...
होता विश्वास नहीं
सीता हो गयी शिला
और तुम ...
हो गये कुलिश-कठोर
अपनी ही प्रिया के प्रति -
तुमने था कहा कभी, याद तुम्हें ?
'ममता-अनुराग ही बस शाश्वत सत्य है'
और आज ...
नहीं राम, यह सब है सत्य नहीं
केवल दुःस्वप्न है|
जागो राम... जागो !

[ राम अर्द्धनिद्रा में बड़बड़ाते हैं और अहल्या की आकृति उनके स्वप्न में विलीन हो जाती है]

राम -(अर्द्धमूर्च्छा में)
सब कुछ है स्वप्नवत -
आस्था भी...अनास्था भी
प्रश्न यहीं पर ठहरा ...
उत्तर... है कोई नहीं

[ अंतर्कक्ष से शबरी की आकृति निकलती है , राम के निकट पहुँचकर उनका माथा सहलाते हुएकहती है ]

शबरी - मेरे प्रभु !
तुम त्राता, तुम ही उद्धारक हो|
तुम हो सर्वशक्तिमान
शाश्वत सर्वज्ञ हो|
जागो प्रभु, मूर्च्छा यह ठीक नहीं
ऋषियों से मैंने यह जाना था
प्रभु होते मूर्च्छित जब
सृष्टि प्रलय होती है|
शबरी थी ... मैं थी कुलहीन...
किन्तु ...
ऋषियों की सेवा में रहकर मैं सिद्ध हुई;
वे सब तो चले गये ब्रह्मलोक
और मैं अकेली ही
शेष रही उस मतंगवन में
रात-दिन प्रतीक्षा में
आएँगे मेरे प्रभु|

और... फिर आये तुम|
जाति-बाह्य शबरी के हाथों से बेर खाये -
वह मेरी जूठन भी तुमने स्वीकार की
तुम थे अवतार-पुरुष;
तुम हो अवतार-पुरुष ...
छलो नहीं अपने को इस तरह |
घटना शम्बूक की अनास्था की घटना है -
तप का था दम्भ उसे,
प्रभु कैसे होता वह -
तप तो मन के विकार-दम्भों के
जलने की प्रक्रिया है |
तुमने दी मुक्ति उसे उस तप से
जिससे वह दम्भों का पोषण था कर रहा |
इसीलिए था उसका दुष्प्रभाव -
ब्राह्मण के बेटे की अकालमृत्यु |
जागो प्रभु...जागो ...

[ शबरी की आकृति भी राम के स्वप्न में विलीन हो जाती है | राम फिर मूर्च्छा में बड़बड़ाते हैं]

राम (अर्द्धमूर्च्छा में)-
दुष्प्रभाव दम्भों का
या ...
मेरी मर्यादा का...
दोनों हैं एक ही...
अन्तर है कोई नहीं -
प्रभु की हो क्रीड़ा या मानव की साधना,
दोनों का है प्रभाव है एक ही -
दोनों हतभाग्य हैं |

[ सीता की स्वर्ण-प्रतिमा से शूर्पणखा की छायाकृति निकलती है | वह लुभावने हाव-भाव ,चेष्टाएँ करती है | राम के चेहरे पर जुगुप्सा और आतंक का मिला-जुला भाव उभरता है | शूर्पणखाउनके चारों ओर मादक काम-नृत्य करती है | फिर हँसते हुए उन्हें सम्बोधित करती है]

शूर्पणखा - वाह राम !
अब भी हो दर्शनीय
जैसे तुम पहले थे |
वैसा ही रूप
वही देह की गठन अब भी,
सम्मोहन -आकर्षण वही, राम !
यह कैसा जादू है !
हाँ, थोडा अन्तर है -
तुम लगते हो किंचित थके हुए और भ्रमित,
थोड़े दयनीय भी |
पर...
मैं अब भी प्रस्तुत हूँ;
तुम भी निर्बाध हुए|
जीवन है स्वप्नवत क्षणभंगुर -
आओ, हम उसका पूरा आनन्द लें|
जब तक हैं ये शिराएँ तपने को सुख से
तब तक ही जीवन है|
बहतीं हैं अन्दर जो धाराएँ
आतुर उत्ताप की
वही सत्य |
आओ, देव-दुर्लभ आनन्द लें |
सीता थी साधारण...
मामूली कृषिभूमि कन्या थी |
सत्ता के संग नहीं चल पायी |
तुमने निष्काषित कर सीता को ठीक किया -
कैसा वह मोह था
जिससे तुम बँधे रहे सीता से |
अब भी सम्मोहन वह ज़िन्दा है,
देता है व्यथा तुम्हें |
वह तो अब छाया है मृत्यु की;
उससे मत बँधे रहो |
अपने को मुक्त करो निष्फल मर्यादा से |
सुन्दर है
कितना कमनीय है जीवन यह -
देहों का आकर्षण !
आओ, जियो मेरे साथ
जीवन के सुख सारे|
जागो...प्रिय ! जागो !...

[ राम की आँखें काँपकर खुल जाती हैं | भय और आतंक उनके चेहरे पर अंकित है ]

राम( आत्मालाप) -
यह कैसा भीषण दुःस्वप्न था -
मन में क्या यह विकार जीवित था ?
सीते ! मैं पतित हुआ ...
और हुआ दण्डनीय |
लगता है भय मुझको अपनी मूर्च्छाओं से |
साध्वी अहल्या और शबरी की आकृतियाँ
थीं मेरे मन का ही प्रक्षेपण -
आयीं थीं आस्था बन |
रावण, मारीच और तापस शम्बूक भी
मेरी पहचानी आकृतियाँ हैं
और कहीं जीवित हैं मुझमें|
किन्तु ... यह शूर्पणखा ...
हाय ! मुझको धिक्कार है |
सीते ! मैं अपराधी ...
वंचक हूँ -
कैसी यह विकृति है मन की |
सोचो तो
जीवन भर मैं था यों छला गया
अपने ही आप से |
सोचता रहा - मन में कोई विकार हैं नहीं;
मैं केवल सीता का;
यह भी भ्रम ही निकला |
रघुवंशी मर्यादा ...
मेरी सब नीति-प्रीति...
मिथ्या हो गयी सभी -
कैसी यम-यातना !
सीते ! दो मुक्ति मुझे पापी इस जीवन से |
मैं हूँ हत्यारा उस निष्ठां का
जिसमें तुम जीवित थीं |
अब क्या है शेष बचा ?
धिक् ! धिक् ! यह राम नहीं जीने के योग्य रहा |

[भावातिरेक में राम फिर मूर्च्छित हो जाते हैं]

दृश्य-पाँच

[ राम शैया पर मूर्च्छित पड़े हैं | ब्राह्म मुहूर्त्त हो रहा है | सीता की प्रतिमा से एक तेज प्रकाश-पुंज निकल रहा है | प्रतिमा एक जीवित आकार ले लेती है | मंद-मंद वीणा का स्वर उभरता है - नूपुरों की मोहक रुनुक-झुनक सुनाई देती है | चारों ओर दैवी पुष्पों की सुगंध फ़ैल जाती है | सीता अपने सम्पूर्ण दैवी सौन्दर्य के साथ प्रकट हो जाती हैं | वे राम के मस्तक को गोद में लेकर उन्हें प्यार करती हैं - मधुर-मधुर वाणी में बोलती हैं]

सीता - राघव ! रघुनन्दन !
प्रिय मेरे राम !
यों मत आत्म-विह्वल हो;
आत्म-ग्लानि से भरकर
अपने को क्षीण मत करो
शूर्पणखा, जिसे देख विचलित हो तुम इतने
मेरी ही सृष्टि थी -
मेरा ही रूप थी |
लीला यह सृष्टि की
सिर्फ क्या तुम्हारी है ...
मैं भी तो हूँ लीला रच सकती -
संगिनी तुम्हारी हूँ
माया हूँ राम की ...
व्यापी हूँ राम को |
छोटा-सा खेल किया
और तुम व्यथित हुए हो इतना |

[ हँसती है | उस मन्द स्मित और दैवी हँसी से वातावरण का सारा तनाव छँट जाता है | राम के चेहरे पर भी मुसकान उभर आती है]

शूर्पणखा भी तो है नारी ही,
मुग्धा भी |
काम और वासना
जीवन के आवश्यक अंग हैं;
देह भी अलौकिक है
और कहीं सत्य भी |
शूर्पणखा का आग्रह देह का था
वह भी अभूतपूर्व -
संतुलित नहीं था ...
इसीलिए अनुचित था |
उसका वह देहराग मुझमें भी -
मानवी हूँ मैं ...
धरती से उपजी हूँ
इस नाते शूर्पणखा मुझमें भी जीवित है |
विस्मित क्यों होते हो राम यों ?
अपनी इस लीला में सब कुछ है सम्मिलित -
राक्षस भी देव भी;
आत्मा भी देह भी -
है न रघुवंशमणि !
शूर्पणखा भी तो आई थी बनकर प्रेमिका ही -
मेरी सहधर्मा थी -
नारी के हम दोनों दो पहलू हैं अलग-अलग
किन्तु कहीं एक भी ...
पूरक हैं आपस में -
मुझको है प्रिय यह भी -
दोनों स्वीकार्य हों |
मेरा ही अर्द्धभाग आया बन शूर्पणखा
और तुम ...
कातर मोहग्रस्त हुए |
प्रतिकृति से डरो नहीं -
वह तो थी प्रति-सीता
राम का विलोम ज्यों रावण है
वैसे ही सीता का है विलोम शूर्पणखा -
दोनों ही सत्य हैं
और हैं उपस्थित हर व्यक्ति में;
हममें भी |

[ राम मुस्कराते हैं | मन्द स्मिति के साथ सीता कहती हैं]

बोलो रघुनन्दन !
आँखे खोलो !
यह जो तुम देख रहे
स्वप्न नहीं सत्य है|

[ राम आँख खोलकर सीता को मन्त्रमुग्ध निहारते हैं]

इस तरह निरीह हुए, राम, तुम
त्रस्त हुए स्वयं
और मुझको भी त्रस्त किया;
हम दोनों हैं अभिन्न
फिर यह सन्ताप क्यों ?

[ राम सीता को आलिंगन बद्ध करते हुए कहते हैं]

राम- सच में...
हाँ, सीते !
सच में यह तुम हो |
आयीं तुम लौट, प्रिये ! सचमुच ही |
कैसे दुःस्वप्नों ने घेरा था
तुम बिन यह राम रहा प्राणहीन;
सीता बिन राम तो निरर्थक है - सत्त्वहीन |
सीता हो साथ तभी राम नाम सार्थक है|
आओ प्रिये !
हम दोनों चलते हैं वन को फिर -
कैसे थे सम्मोहक दिन वे वनवास के |
कैसी थीं अपनी क्रीड़ाएँ -
कोमल और सरल-चित्त अनुरागी |
याद तुम्हें...
उस दिन...मन्दाकिनी के तट पर
हमने जब बालू पर
नाम लिखे थे अपने साथ-साथ
तभी लहर आयी थी
और घुल गये थे मौन
अक्षर वे संग-संग...
और हम
बच्चों की भाँति रहे थे हँसते
और फिर...
बाद में हँसे थे यह सोचकर
कैसे हम मूर्ख हैं
बालू पर बना रहे थे अपने स्वप्न-महल |
हँसना वह अनायास बिना-बात
सम्भव अब नहीं रहा
आओ, चलें !

[ सीता और राम दोनों साथ-साथ हंसते हैं]

सीता - हाँ, राघव !
सचमुच वे दिन थे अनुराग भरे -
स्वर्गिक भी |
यौवन की क्रीड़ाएँ ऐसी ही होती हैं
भोली...
और अनायास |
नटखट थे तुम भी तो -
कई बार वन में
छिप जाते थे पेड़ों के झुरमुट में
और मैं...बावरी
खोज-खोज तुम्हें हार जाती थी,
पास-पास घूम-घूम लौट-लौट जाती थी
और तुम...
पीछे ही खड़े-खड़े मुस्काते रहते थे
और फिर...
पूरी तरह व्याकुल कर...
अकस्मात पीछे से बाँहों में घेरकर...
और मैं झगड़ती थी
बच्चों-सी खीझकर |
सच राघव, वे थे अति सुन्दर दिन |
राम - सीते !
याद तुम्हें वह दिन क्या
जब जयंत आया था सूने में
और तुम्हें पाकर एकाकी...
सीता (भय-मिश्रित स्वर में)-

नहीं राम... नहीं...नहीं...
ऐसी घटनाओं की याद मत दिलाओ अब |
उत्पाती राक्षस या देवों की
कमी नहीं जीवन में
चाहे हम कहीं रहें |
राम - हाँ, सीते !
यह सच है |
वन से हम लौटे थे गरिमा से भरे हुए
उत्कंठित...
अपनी इस नगरी में...
किन्तु यहाँ क्या मिला ?
स्वप्न हुए भंग सभी
और हम हुए... अलग |
कैसी थी दुरभिसन्धि सत्ता की
मैं भी हो गया क्रूर राक्षस था |
सीते... ...!
हम लौट नहीं पाएँगे क्या... हाय !
अपने उन अनुरागी सपनों में

[ राम का स्वर फिर विह्वल हो जाता है | क्षणार्ध के बाद वे फिर पूर्व-सन्दर्भों की याद करते हुए कहते हैं]

सोचो तो, जानकी ...
कल की सी बात अभी लगती है -
याद मुझे
वह पहली दृष्टि-मिलन की वेला |
वाटिका-सरोवर के पास...
गौरी के मन्दिर में
सखियों संग तुम जाती थीं
और मैं...
करता था पुष्प-चयन,
तभी मिली थीं आँखें
और लगा था
जैसे तुम नितान्त अपनी हो |
वह क्षण...
सीता - राघव ! हाँ, राघव...!
वह क्षण ही तो हुआ मुझे सम्मोहक -
किंचित उत्पीड़क भी,
जब तक शिव-चाप रहा बाधक-सा |
मेरा सौभाग्य था
कोई नहीं साध सका उसे
और...
फिर गौरी का वर ही फलीभूत हुआ|
तुमने किस लाघव से
दुर्दम उस चाप को उठाया था
और फिर... पल भर में
हाय ! वह पल भर था मुझको यम-यातना ...
खण्डित था चाप पड़ा धरती पर |
सीता के गर्व का
अलौकिक वह पहला क्षण
अब भी है लगता बहुमूल्य मुझे
राम हुए थे मेरे
उस क्षण में |
राम - हाँ, सीते...!
और उसी क्षण में
सीता भी राम की हुई थी |
सच में... अमूल्य वह क्षण तो
पूरे...जीवन की निधि है |
और वह... पाणि-परस पहला -
मीठी रसधारा वह राशि-राशि
अब भी है बहती
रग-रग में... रक्त की शिराओं में
लय बनकर
सुख बनकर
आदिम स्पर्श वह प्राणों का दाता है
आज भी |
किन्तु प्रिये !
वे सब हैं सुधियों के अन्तरीप |
सूर्योदय के वे पहचाने क्षण
कब के हैं बीत चुके |
और आज ...
पर... सीते !
यह क्षण भी अपना है साथ-साथ -
लगता है पिछले उस आदिम क्षण का ही
विस्तार है |
आओ, इसे बाँध लें
अपने इस अनुरागी बन्धन में |

[ एकाएक स्वर में दैवी आवेश आ जाता है]

समय-चक्र !
हे यम के कालचक्र !
टू रुक जा...
देता आदेश तुझे राम है |
होती हो... हो जाये सृष्टि-प्रलय
शेष रहे केवल यह क्षण |
सीता - नहीं राम !
शाश्वतता शुभ की भी श्रेय नहीं|
घूम रहा कालचक्र
परिवर्तन होता है - यही नियम|
सोचो तो
शाश्वत सूर्योदय भी क्या होगा श्रेयस्कर ?
अंधकार जीवन की नियति नहीं
किन्तु...
वहीं सूर्योदय की इच्छा पलती है
और... इसीलिए राम...
अँधियारे में जीना होता अनिवार्य है|
राम, सुनो
यह लीला अवतारी
जिसमें हम दोनों हैं मुख्य पात्र
अब हो समाप्त यहीं|
हर पीढ़ी का होता अपना है एक सत्य
किन्तु वही सत्य जब
टिककर बैठ जाता है
हो जाता बोझ है -
त्याज्य सर्प-केंचुल सा|
हमने जो सत्य जिया
आवश्यक नहीं वही ...
सत्य हो लवकुश का|
राम तुम परात्पर हो... प्रभु हो... नियन्ता हो
और मैं हूँ वह आदिशक्ति
जिससे तुम रचते सृष्टि-लीला यह|
बार-बार हम दोनों आते हैं धरती पर -
मानव बन
मानव की पीड़ा के भोक्ता बन -
संस्कार करते हैं अपनी इस सृष्टि का|
आये थे जैसे हम सहज भाव
किसी यज्ञ-आहुति से
वैसे ही जायेंगे|
मैं उपजी धरती से -
मूल तत्त्व और भाव धरती का;
तुम हो स्वयं यज्ञपुरुष -
वरुणपुत्र -
हवि से थे प्रकट हुए क्षीर बन
अंश-सहित|
सृष्टि इस जन्म की -
हेतु भी समाप्त हुआ -
अब इसे समेटो, प्रिय !
कालरात्रि बीत रही राम यह -
देखो है आ रही
नई सूर्य-रश्मि लिये
विमल प्रभाती भी|
दिन यह जो आया है
होगा यह और अधिक उत्पीड़क|
इसकी उत्तेजना मानव बन सहन करो |
साधारण हो जाओ
भोगो ये पीड़ाएँ
और...
लीलाधाम लौट चलो|
साधारण होना ही होता है ईश्वरत्व|

[ गवाक्ष से उषा की लालिमा कक्ष में दिखाई देती है | तभी उस एकान्त को भंग करती शंख और घण्टों की ध्वनि उठती है , स्वस्ति-वाचन गूँजता है | सारा वातावरण चन्दन और अगरु-गन्ध से भर जाता है | सीता की आकृति पारदर्शी हो राम की देह में समा जाती है | अंतर्कक्ष में में सीता की स्वर्ण-प्रतिमा खण्ड-खण्ड हो बिखर जाती है | राम के मन में सीता के अंतिम शब्द गूँज बनकर बार-बार घूमते हैं]

साधारण होना ही होता है... ईश्वरत्व|
हाँ, राम !
साधारण होना ही...
होता है... ईश्वरत्व
ईश्वरत्व...ईश्वरत्व...

[' ईश्वरत्व ' शब्द कक्ष की छत से टकराकर , दीवारों से टकरा-टकरा कर और अन्त में वातायन से एक मन्त्रध्वनि बनकर बिखर-बिखर जाता है - दूर तक आक्षितिज फैलता जाता है]

दृश्य - छह
उत्तर-कथन - फिर दिन आया -
आकाश सूर्य हो गया -तपा
आस्थाएँ पीड़ित हुईं
किन्तु वे रहीं शान्त |
अंधे भविष्य की दिनचर्या भी हुई मौन...
मानव का निश्चय हुआ सजग
आग्रह सारे हो गये क्लान्त
हो गयीं शिथिल सब इच्छाएँ|
अद्भुत घटनाएँ हुईं -
सभी पीड़ाओं की -
पर मौन शान्त मन उनसे अस्थिर हुआ नहीं|
हो गयी दृष्टि निरपेक्ष सहज |
काया-मन से भी परे सूक्ष्म
जो तत्त्व-प्राण
वह देख रहा होकर तटस्थ
सम्बन्धों की दिनचर्या को|
हो गयीं कूर्म मन की गतियाँ -
हट गये क्षितिज
विस्तार हुआ अपलक अनन्त संज्ञाओं का|
दिन बीता
किरणें दूब रहीं सरयू-जल में
हैं राम खड़े वातायन में
सम्पूर्ण मौन -
चलती अन्दर है मौन क्रिया आस्थाओं की -
होता है वार्तालाप जानकी-संग ...
हर पल|

[ राम अन्धकार से घिरे उस मौन संलाप को सहज प्रसन्न मुद्रा में सुन रहे हैं - सीता की छायाकृति से संलाप कर रहे हैं]

राम - हाँ, सीते !
दिन यह था सच में ही अद्भुत पीड़ाओं का|
और उन्हें जीकर मैं
साधारण हो गया पूर्ववत|
सारा ही आडम्बर - अहंकार
प्रभुता का
सड़े हुए लुगड़े सा झड़ गया|
कितना हो गया सहज सूर्योदय होना अब|
समय-चक्र पूरा है घूम चुका
और थकी स्मृतियाँ
देखो, अब कैसी हैं शान्त पड़ीं -
भोले जल-शिशुओं सी|
किन्तु...
कैसा दुर्धर्ष-हठी
था अशान्त जल-प्लावन
जिसमें मैं डूबा था|
लौट गया आकर वह
आदिम सूर्यास्तों का अहंकार -
कैसा था आकुल वह चक्रवात!
गूँज कहीं दूर
किसी गहरे अवकाश में
अब भी है काँप रही|
हाँ, सीते !
यह दिन था मर्मान्तक कष्टों का|
सीता - राम मुझे ज्ञात है -
आये थे कालपुरुष...
मृत्यु-दूत...

[ पारदर्शिका में दृश्य उभरता है | अयोध्या के सभा-भवन में राम का अन्तर्कक्ष | राम गहरे मौन में डूबे बैठे हैं | लक्ष्मण भी पास बैठे हैं | राम एकाएक कहते हैं]

राम - हाँ, लक्ष्मण !
कल सीता आयी थी रात में|
मेरा विश्वास करो...
स्वप्न में नहीं - सचमुच ही|

[ लक्ष्मण कुछ कहें , इससे पूर्व ही प्रतिहारी आकर सन्देश देता है]

प्रतिहारी - क्षमा करें, देव !
एक विप्रवर द्वार पर उपस्थित हैं |
राम - लक्ष्मण !
तुम स्वयं जाओ
सादर ले आओ उन्हें|

[ लक्ष्मण जाते हैं | कुछ क्षणों में ही एक विप्रवेशधारी व्यक्ति को पूरे सम्मान के साथ लेकर आते हैं]

ब्राह्मण - राघव ! एकान्त मुझे चाहिए...
पूरा एकान्त
जब तक मैं रहूँ यहाँ
कोई भी नहीं आये... ऐसा आदेश दें|
राम - जाओ सौमित्र !
रहो द्वार पर उपस्थित
स्वयं प्रहरी बन
और...

[ राम की बात काटकर ब्राह्मण बोलता है]

ब्राह्मण - जो भी व्यक्ति आएगा...
अन्दर इस कक्ष में
जब तक हम वर्तारत
मृत्युदण्ड का होगा भागी वह |
रघुपति का ऐसा आदेश है|

[ लक्ष्मण बाहर जाते हैं | राम और ब्राह्मण में , जो वास्तव में कालपुरुष हैं , वार्तालाप चलता है | नेपथ्य में ऋषि दुर्वासा का भयंकर रोषपूर्ण स्वर सुनाई देता है]

दुर्वासा - दुर्विनीत लक्ष्मण !
तू... रोक रहा है... मुझको|
दुर्मति, तुझे ज्ञात नहीं
ब्रह्मा या विष्णु या महेश भी
रोक नहीं सकते हैं मेरी गति|
है अबाध मेरा हर ओर गमन|
कैसा है राम यह !
कैसी है उसकी यह मर्यादा !
मेरा भी तिरस्कार -
स्वागत को स्वयं नहीं आया वह
और... अब
रोक रहा तू मुझे जाने से|
राजा का विरुद यही
कोई भी व्यक्ति उसे मिल सकता जब चाहे|
पूरी इस नगरी को ध्वस्त अभी करता हूँ -
प्रजा सहित राजा यह दण्डनीय|

[ पारदर्शिका ओझल हो जाती है | राम कहते हैं]

राम - वैदेही...!
और फिर ...
लक्ष्मण स्वयं आये थे कक्ष में
उत्पीड़क वह प्रसंग -
लक्ष्मण को मृत्यु-दण्ड...
गुरुवर की आज्ञा से
त्यागा था मैंने सौमित्र को
और...
उसी क्षण जाकर सरयू-तीर
लक्ष्मण ने त्याग दिए प्राण थे
और मैं हुआ था...
स्वजनघाती फिर|
सीता - हाँ, राघव !
लक्ष्मण को पहले ही जाना था|
जीवन भर पाला था दास्य भाव ही उसने -
उसके बिन
कैसे वह जीवित रह पाता|
उसने थीं झेलीं वे सारी पीड़ाएँ
जो हमने भोगी थीं -
उनके अतिरिक्त भी|
जीवन भर रहा था अभिन्न हम दोनों से|
उग्र रूप वह था रुद्रावतार -
याद मुझे...
आये थे परशुराम...
और फिर...
जब था वनवास मिला
और जब आये थे भरत भाई चित्रकूट...
पंचवटी में मैंने भी की थी, हाँ
उससे वंचना...
कैसा वह तड़पा था -
वह प्रसंग असहनीय !
लक्ष्मण अनुरागी था -
मेरा प्रिय देवर था...
राम - हाँ, सीते !
लक्ष्मण तो था मेरा अन्तर्मन -
मुझमें जो उग्र प्रश्न उगते थे
उनका था साक्षी वह|
शेष-तुल्य
वह ही आधार था अपने इस जीवन का
सीता - राम ! चलो, लौट चलो !
राम - हाँ, सीते !
अब तो है चलना ही -
सरयू है टेर रही |

[अंधकार गहरा जाता है| वातायन से दिखती सरयू के जल में हलचल होती है| एक मधुर संगीत-ध्वनि आती है| नदी में आवाहन-मन्त्र गूँजते हैं]

आवाहन-स्वर -
आओ राम...
जल हो लो -
जल ही है मूल तत्त्व सृष्टि का
जल ही संयोजन है
जल ही है संकुचन
जल से ही जीवन है
जल से ही मृत्यु है
जल ही है सूर्य और जल ही है कालरात्रि
जल से ही सृष्टि उदित होती है
जल में ही होती है वह विलीन
जल में ही शयन
और लीलाकमल जल में ही
जल ही है आत्म-तत्त्व
जल ही है विश्वरूप
आओ राम !...
आओ राम !... आओ राम !

[एक निरन्तर प्रवहमान स्वर-वलय बनता है| राम की आकृति उससे घिरकर स्वर-उर्मियों में समा जाती है| मंगल-ध्वनि गूँजती है]

उत्तर-गान - लीलायुग पूरा हुआ एक -
अवतार-पुरुष ने जलसमाधि ली सरयू में |
ईश्वर के मानव होने का
संकल्प हुआ यों पूर्णकाम -
धरती की आस्था हुई सजग|
युगपुरुष राम ने
सूर्योदय का मन्त्र रचा -
वह मन्त्र हुआ संकल्प नयी आस्थाओं का
युग-युग तक जिससे
स्वप्नशील होगा मानव|
यह सिया-राम की पुण्यकथा -
आदर्शों की...
मर्यादा की गौरवगाथा;
मानव-पीड़ा का
उससे उपजी आस्था का यह सामवेद
युग-युग कल्याणी होगा|
जब-जब मानव के मन में
दुविधा उपजेगी
जब-जब सूर्यास्त हवाओं में गहराएगा
जब-जब विषाद की लहरें
मन को तोड़ेंगी
जब-जब होगा विश्वास त्रस्त
आसुरी शक्तियाँ
जब-जब भी होंगी सचेष्ट
जब-जब मायामृग लौटेंगे
जब-जब धरती बंजर होगी - अकुलायेगी
जब-जब भी होंगे शिला प्राण
तब-तब ...
यह कथा मुखर होगी -
फिर से होगा अवतार
सूर्य के सपनों का |

[श्रेणी : नाटक। लेखक : कुमार रवींद्र ]