'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

चुने हुए हरियाणवी लोकगीत

  • गंगा जी तेरे खेत मैं.../ हरियाणवी
  • मोटी सी साड़ी ल्या दै हो / हरियाणवी
  • ओ नये नाथ सुण मेरी बात / हरियाणवी
  • कात्तिक बदी अमावस थी और ... / हरियाणवी
  • तेरा मारिया ऐसे रोऊँ / हरियाणवी
  • जाट का मैं लाडला / हरियाणवी
  • थोड़ा-सा नीर पिला दै / हरियाणवी
  • रूप तेरा चन्दा-सा खिल रिया / हरियाणवी
  • मैं बैठ्या खेत के डोले पै / हरियाणवी
  • बहुत सताई ईखड़े रै तैने / हरियाणवी
  • बाजरा कहे मैं बड़ा अलबेला / हरियाणवी
  • कोई बरसन लागी काली बादली! / हरियाणवी
  • सामण आयो रंगलो कोई / हरियाणवी
  • कोई तौ दिन हाँड़ लै गलिएँ / हरियाणवी
  • भरती हो लै रे थारे बाहर खड़े रंगरूट / हरियाणवी
  • पिया, भरती मैं हो लै ने / हरियाणवी
  • जरमन नैं गोला मारिया / हरियाणवी
  • बस देख ली आजादी हामनै .... / हरियाणवी
  • जरमन तेरा जाइयो राज / हरियाणवी
  • मैं हूर परी बाँगर की / हरियाणवी
  • मोरे क्यों गेरेस भूल / हरियाणवी
  • अरे निऊँ रौवै बूढ़ बैल / हरियाणवी
  • निऊँ कह रही धौली गाय / हरियाणवी
  • मेरा कैहा मान पिया / हरियाणवी
  • अरै मैं बुरी कंगाली धन बिन / हरियाणवी
  • हालत एक गरीब किसान की / हरियाणवी

गंगा जी तेरे खेत मैं...

गंगा जी तेरे खेत मैं री माई गडे सैं हिंडोळे चयार 
कन्हिया झूलते संग रुक्मण झूल रही ।

शिवजी के करमंडल कै, विष्णु जी का लाग्या पैर।
पवन पवित्र अमृत बणकै, पर्बत पै गई थी ठहर।।
भागीरथ नै तप कर राख्या, खोद कै ले आया नहर।।।

साठ हज़ार सगर के बेटे, जो मुक्ति का पागे धाम।
अयोध्या कै गोरै आकै, गंगा जी धराया नाम।।
ब्रह्मा विष्णु शिवजी तीनो, पूजा करते सुबह शाम ।।।

सब दुनिया तेरे हेत मैं, किसी हो रही जय जयकार ... 
कन्हिया झूलते संग रुक्मण झूल रही...
गंगा जी तेरे खेत मैं री माई गडे सैं हिंडोळे चयार 
कन्हिया झूलते संग रुक्मण झूल रही ।

अष्ट वसु तन्नै पैदा किये, ऋषियों का उतार्या शाप।
शांतनु कै ब्याही आई, वसुओं का बनाया बाप।।
शील गंग छोड कै स्वर्ग मैं चली गई आप।।।

तीन चरण तेरे गए मोक्ष मैं, एक चरण तू बणकै आई।
नौसै मील इस पृथ्वी पै, अमृत रूप बणकै छाई।।
यजुर-अथर्व-साम च्यारों वेदों नै बड़ाई गाई।।।

शिवजी चढ़े थे जनेत मैं, किसी बरसी थी मूसलधार .... 
कन्हिया झूलते संग रुक्मण झूल रही...
गंगा जी तेरे खेत मैं री माई गडे सैं हिंडोळे चयार 
कन्हिया झूलते संग रुक्मण झूल रही ।

गौमुख, बद्रीनारायण, लछमन झूला देखि लहर।
हरिद्वार और ऋषिकेश कनखल मैं अमृत की नहर।।
गढ़मुक्तेश्वर, अलाहबाद और गया जी पवित्र शहर।।।

कलकत्ते तै सीधी होली, हावड़ा दिखाई शान।
समुन्द्र मैं जाकै मिलगी, सागर का घटाया मान।।
सूर्य जी नै अमृत पीकै अम्बोजल का किया बखान।।।

इक दिन गई थी सनेत मैं, जित अर्जुन कृष्ण मुरार .... 
कन्हिया झूलते संग रुक्मण झूल रही...
गंगा जी तेरे खेत मैं री माई गडे सैं हिंडोळे चयार 
कन्हिया झूलते संग रुक्मण झूल रही ।

मौसिनाथ तेरे अन्दर जाणकै मिले थे आप।
मानसिंह भी तेरे अन्दर छाण कै मिले थे आप।।
लख्मीचंद भी तेरे अन्दर आण कै मिले थे आप।।।

जै मुक्ति की सीधी राही तेरे बीच न्हाणे आल़ा।
पाणछि मैं वास करता, एक मामूली सा गाणे आल़ा।।
एक दिन तेरे बीच गंगे मांगेराम आणे आल़ा।।।

राळज्यागा तेरे रेत मैं कित टोहवैगा संसार .... 
कन्हिया झूलते संग रुक्मण झूल रही...
गंगा जी तेरे खेत मैं री माई गडे सैं हिंडोळे चयार 
कन्हिया झूलते संग रुक्मण झूल रही ।



मोटी सी साड़ी ल्या दै हो 

मोटी सी साड़ी ल्या दै हो
जिसकी चमक निराली...

जलियाँवाला बाग का जलसा
डायर फायर करता हो
भारत का बदला लेने को
लंदन में शेर विचरता हो
डायर मारया, खुद मरया
गया ना वार कती खाली
मोटी सी साड़ी ल्या दै हो
जिसकी चमक निराली....


ओ नये नाथ सुण मेरी बात

ओ नये नाथ सुण मेरी बात, 
या चन्द्रकिरण जोगी तनै तन-मन-धन तै चाव्है सै!
नीचे नै कंमन्द लटकार्ही चढ्ज्या क्यूँ वार लगावै सै !!

(मेरे कैसी नारी चहिये तेरे कैसे नर नै,
बात सुण ध्यान मैं धर कै ) - २

दया करकै नाचिये मोर, मोरणी दो आंसू चाव्है सै !
नीचे नै कंमन्द लटकार्ही चढ्ज्या क्यूँ वार लगावै सै !!


कात्तिक बदी अमावस थी और ...

रचनाकार: कवि नरसिंह 

कात्तिक बदी अमावस थी और दिन था खास दीवाळी का - 

आँख्याँ कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥

कितै बणैं थी खीर, कितै हलवे की खुशबू ऊठ रही - 
हाळी की बहू एक कूण मैं खड़ी बाजरा कूट रही । 
हाळी नै ली खाट बिछा, वा पैत्याँ कानी तैं टूट रही - 
भर कै हुक्का बैठ गया वो, चिलम तळे तैं फूट रही ॥ 

चाकी धोरै जर लाग्या डंडूक पड़्या एक फाहळी का - 
आँख्याँ कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥

सारे पड़ौसी बाळकाँ खातिर खील-खेलणे ल्यावैं थे - 
दो बाळक बैठे हाळी के उनकी ओड़ लखावैं थे । 
बची रात की जळी खीचड़ी घोळ सीत मैं खावैं थे - 
मगन हुए दो कुत्ते बैठे साहमी कान हलावैं थे ॥ 

एक बखोरा तीन कटोरे, काम नहीं था थाळी का - 
आँख्याँ कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥

दोनूँ बाळक खील-खेलणाँ का करकै विश्वास गये - 
माँ धोरै बिल पेश करया, वे ले-कै पूरी आस गये । 
माँ बोली बाप के जी नै रोवो, जिसके जाए नास गए - 
फिर माता की बाणी सुण वे झट बाबू कै पास गए । 

तुरत ऊठ-कै बाहर लिकड़ ग्या पति गौहाने आळी का - 
आँख्याँ कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥ 

ऊठ उड़े तैं बणिये कै गया, बिन दामाँ सौदा ना थ्याया - 
भूखी हालत देख जाट की, हुक्का तक बी ना प्याया ! 
देख चढी करड़ाई सिर पै, दुखिया का मन घबराया - 
छोड गाम नै चल्या गया वो, फेर बाहवड़ कै ना आया । 

कहै नरसिंह थारा बाग उजड़-ग्या भेद चल्या ना माळी का । 
आँख्याँ कै माँह आँसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥


तेरा मारिया ऐसे रोऊँ

तेरा मारिया ऎसा रोऊँ
जिसा झरता मोर बणी का
तेरे पाइयाँ माँ पायल बाजै
जिसा बाजे बीज सणीं का
थोड़ा-सा नीर पिला दै
प्यासा मरता दूर घणीं का

भावार्थ : 

'तेरे सौन्दर्य से घायल होकर मैं वन के मोर की तरह रोता हूँ । तेरे पैरों की पाजेब ऎसे बजती है, जैसे सन के बीज झंकार करते हैं । अरी ओ थोड़ा-सा जल पिला दे मुझे, दूर का पथिक हूँ मैं प्यास से व्याकुल ।'


जाट का मैं लाडला

जाट का मैं लाडला तिरखा लगी सरीर
अगन लगी बुझती नईं, बिना पिए जल-नीर
बिना पिए जल-नीर,--रस्ते में कुयाँ चुनाया
किस पापी ने यै जुल्म कमाया, उस पै डोल ना पाया!

भावार्थ :

'मैं जाट पिता का लाड़ला पुत्र हूँ, मुझे प्यास लगी है । मेरे मन में जो आग लगी है वह बिना पानी पिए नहीं बुझेगी । हालाँकि रास्ते में पक्का कुआँ बना हुआ है लेकिन न जाने किस पापी ने यह ज़ुल्म किया है कि उस पर डोल नहीं रखा है ।


थोड़ा-सा नीर पिला दै 

थोड़ा-सा नीर पिला दै, बाकी घाल मेरे लोटे मैं
अरे तूँ भले घराँ की दीखै, तन्ने जन्म लिया टोटे मैं
तू मेरे साथ होले गैल, दामण मढ़वा दिऊँ घोटै मैं !

भावार्थ :

'थोड़ा-सा पानी मुझे पिला दे, बाकी मेरे लोटे में डाल दे । अरी ओ, तू तो भले घर की लगती है, लेकिन ऎसा लगता है जैसे तेरा जन्म बड़े ग़रीब घर में हुआ है । चल, मेरे साथ चल । मैं तेरे लहंगे को गोटे से मढ़वा दूंगा।


रूप तेरा चन्दा-सा खिल रिया

रूप तेरा चन्दा-सा खिल रिया,
बे ने घढ़ी बैठ के ठाली
कर तावल वार भाजरी,
जिसी दारू माँ आग लाग री
कलियाँदार घाघरी,
पतली कम्मर लचकत चाली ।

भावार्थ :

'तेरा रूप चांद की तरह खिला-खिला-सा है । लगता है, भगवान ने तुझे फ़ुरसत में बैठ कर गढ़ा है । यह
सुनकर युवती वहाँ से भाग कर दूर चली गई । ऎसा लगा जैसे शराब में आग लग गई हो । कलीदार लहंगा पहने वह अपनी पतली कमर को लचकाती हुई वहाँ से चली गई ।'


मैं बैठ्या खेत के डोले पै 

मैं बैठ्या खेत कै डोले पै
कित जासै सिखर दुपहरै नै ?
मेरी जान कालजा खटकै
मत जाइए जी, जी भटकै
लिए देख चार घड़ी डटके
खसबू आरई फूल झारे मैं ।

भावार्थ :

'मैं खेत की मेंड़ पर बैठा हूँ, इस प्रखर दोपहरी में तू कहाँ जा रही है । प्रिय, मेरा हृदय धड़क रहा है । तू मत जा । मेरा मन भटकता है । चार क्षण के लिए यहाँ खड़ी हो जा । देख, फूल झर रहे हैं और उनकी सुगन्ध फैल रही है ।


बहुत सताई ईखड़े रै तैने 

बहुत सताई ईखड़े रै तैने बहुत सताई रे
बालक छाड़े रोमते रै, तैने बहुत सताई रे
डालड़ी मैं छाड्या पीसना
और छाड़ी सलागड़ गाय
नगोड़े ईखड़े, तैने बहुत सताई रे
कातनी मैं छाड्या कातना
और छाड़ेसें बाप और माय
नगोड़े ईखड़े तैने बहुत सताई रे
बहुत सताई ईखड़े रै, तैने बहुत सताई रे
बालक छाड़े रोमते रै, तैने बहुत सताई रे

भावार्थ :

' बहुत सताया है, ईख, तूने मुझे बहुत सताया है । मैं अपने पीछे घर में बच्चों को रोता हुआ छोड़कर आई हूँ । तूने मुझे बहुत दुखी किया है । डलिया में अनाज पड़ा है और दूध देने वाली गाय को भी मैं बिना दुहे हुए ही छोड़ आई हूँ । निगोड़ी ईख, तूने मुझे बहुत परेशान किया है । कतनी में पूनियाँ भी बिना काते हुए ही छोड़ आई हूँ । तेरे लिए मैं अपने माता-पिता को भी बिना देखभाल के ही छोड़ आई हूँ । देख तो ज़रा ईख, तूने मुझे कितना हैरान किया है । कितना परेशान किया है । पीछे घर में बालकों को रोता छोड़ आई हूँ । तूने बहुत सताया है मुझे।


बाजरा कहे मैं बड़ा अलबेला

बाजरा कहे मैं बड़ा अलबेला
दो मूसल से लड़ूँ अकेला
जो तेरी नाजो खीचड़ा खाय
फूल-फाल कोठी हो जाए ।

भावार्थ :

'बाजरा कहता है, मैं बड़ा अलबेला हूँ । दो मूसलियों से अकेला ही लड़ लेता हूँ । यदि तेरी कोमलांगी पत्नी मेरी खिचड़ी खाएगी तो वह भी फूल-फूल कर कोठरी सरीखी दिखाई देने लगेगी ।


कोई बरसन लागी काली बादली!

कोई बरसन लागी काली बादली !
"डौलै तै डौलै, हालीड़ा, मैं फिरी
मन्ने किते न पाया थारा खेत ।"
बरसन लागी काली बादली !

"कोई चार बुलदांका, हालीड़ा, नीरना
दोए जणिएँ की छाक !"
बरसन लागी काली बादली !

"कितरज बोया, हालीड़ा, बाजरा ?
कोई कितरज बोई जवार ?"
बरसन लागी काली बादली !

"थलियाँ तै बोया, गोरी धन, बाजरा,
कोई डेराँ बोई जवार"
बरसन लागी काली बादली !

भावार्थ :

'देखो, काली बदली बरसने लगी है । "अजी ओ किसान, मैं मेंड़-मेंड़ पर घूमी-फिरी, तुम्हारा खेत मुझे कहीं नहीं मिला ।" और काली बदली बरसने लगी है । " चार बैलों के लिए मैं भूसा लाई हूँ, दो आदमियों के पीने लायक छाछ ।" और काली बदली यह बरसने लगी है । --"गोरी धन, ज़रा किसी ऊँची मेड़ पर चढ़ कर निहारो, मेरे गोरे बैल के गले में बड़ी घंटी भी तो बज रही है ।" फिर काली बदली बरसने लगी है । --"अजी ओ किसान, किस तरफ़ तुमने बाजरा बोया है ? और कहाँ बोई है जवार ?" काली बदली बरसने लगी है । --"गोरी धन, ऊपर के खेत में बाजरा बोया है और्नीचे के खेत में जवार ।"और काली बदली बरसने रही है ।'


सामण आयो रंगलो कोई

सामण आयो रंगलो कोई आई रे हरियाली तीज !
सास म्हारी प्यारी, गजब कीमारी,
मोकै तौ खंडा दै पीहर को, म्हारी लाड सासुला, प्यारी !

नईं आया थारा नाईं बामण, न माँ-जाया वीर,
राजा की रानी, जहार की रानी,
तो कै आड़ै ई घड़ा देँ पालणो,
म्हारी लाड बहुरिया प्यारी !

बिगर बुलाय धन जाएगी, घट जाएगो आदर-भाव,
राजा की रानी, जहार की रानी,
तू आड़ै ई सामण मान, मेरी लाड बहुरिया प्यारी !

ऊँचै तै चढ़कै देख रइ, तोकै दिवर कहूँ कै जेठ ?
सुघड़ खाती कै, बगड़ खाती कै,
चन्नण को घड़ लियो पालनो, जामें झूले सरिहल रानी ।
अजी आठ खुराड़ा नौ जना, कोई दग-दग जाएँ बन को
राजा की रानी, जहार की रानी,

ऊँची पाल तलायो की, जिते खड़रिया चन्नण को पेड़ ।
खाती आता देख कें कोई रोया छाती पाड़
बिरछ को पौदा, चन्नण को पौदा
डाल-डाल म्हारी काट लै, रै मत काटे जड़ से पेड़ ।
पहलो खुराड़ो मारियो, कोई निकसी दूध की धार ।
राजा की रानी, जहार की रानी,

एकासे दूजो दियो, जासे निकसी खूना धार ।
हरी-हरी चुरियाँ, गोरी-गोरी बहियाँ, कुन पै कियो सिंगार ।
राजा की रानी, जहार की रानी,
थारो राजधन मर गयी, रै धरती माँ गयो समाय !

भावार्थ :

'रंग भरा सावन आ गया है, हरियाली तीज आ रही है, ओ मेरी प्यारी सास ! ओ गजब की मारी सास ! मुझे मायके भेज दो, ओ मेरी प्यारी लाडली सास !' --'न कोई नाई या न कोई ब्राह्मण तुझे लेने के लिए आया है, न तेरा सगा (माँ-जाया) भाई ही आया है, ऒ राजा की रानी ! ओ जहार की रानी ! मैं तेरे लिए यहीं पालना बनवा देती हूँ, ओ मेरी लाडली प्यारी बहू । बिना बुलाए जाने से तेरा आदर-भाव घट जाएगा, ओ राजा की रानी ! ओ जहार की रानी ! तू इसे ही सावन के उपहार मान, ओ मेरी प्यारी, लाडली बहू ! --'मैं ऊँची अटारी पर चढ़कर देख रही हूँ, तुझे देवर कहूँ या जेठ । ओ बढ़ई के सुघड़ बेटे, ओ बढ़ई के बड़े बेटे ! जाओ, और जाकर चन्दन का एक पालना बना लाओ, जिसमें सरिहल रानी झूला झूलेगी । अजी देखो न, आठ कुल्हाड़े लेकर नौ आदमी बड़ी तेज़ी से जंगल की ओर जा रहे हैं, ओ राजा की रानी ! ऒ जहार की रानी ! तालाब के ऊँचे तट पर चन्दन का वह पेड़ खड़ा है । जब उसने बढ़ई को अपनी ओर आते देखा तो वह छाती फाड़ कर रोने लगा । वह पौधे जैसा पेड़, वह चन्दन का नन्हा पेड़ । --'मेरी एक-एक डाल काट लो पर मुझे जड़ से मत काटो ।'--'जब कुल्हाड़े का पहला वार उस पर हुआ तो दूध की एक धार निकली, ओ राजा की रानी ! ओ जहार की रानी ! जब उस पर कुल्हाड़े के दूसरा वार पड़ा तो रक्त की धारा निकलने लगी । ये गोरी-गोरी बाहों में हरी-हरी चूड़ियाँ क्यों पहनी है तूने, क्यों यह सिंगार किया है तूने, ओ राजा की रानी ! ओ जहार की रानी ! तेरा राजधन तो मर गया, री ! धरती में समा गया वो ।'


कोई तौ दिन हाँड़ लै गलिएँ

कोई तौ दिन हाँड़ लै गलिएँ !
मालिक मेरे ने बाग लुआया,
खूब खिलीं कलिएँ !

कोई तौ दिन हाँड़ लै गलिएँ !
मौत-मलिन फिरै बाग मैं,
हात लई डलिए !

कोई तौ दिन हाँड़ लै गलिएँ !
कचे पाकाँ की सैर नै जानी,
तोड़ रई कलिएँ !
कोई तौ दिन हाँड़ लै गलिएँ

भावार्थ :

'जीवन की इन गलियों में कुछ दिन और बिता ले, रे जीव ! मालिक ने यह बाग लगाया है, ख़ूब कलियाँ खिली हैं इस बाग में । कुछ और दिन जी ले । अपने हाथ में टोकरी लिए मौत रूपी मालिन इस बाग में घूम रही है । जीवन, बस, कुछ ही दिन और शेष है । वह मौत रूपी मालिन कच्चे और पक्के में कोई भेद नहीं करती, खिली और अधखिली कली का अन्तर उसे पता नहीं है,वह तो वे सब कलियाँ तोड़ लेती है, जो उसके हाथ लगती हैं । कुछ और दिन घूम ले तू इन गलियों में, ओ जीव !'


भरती हो लै रे थारे बाहर खड़े रंगरूट

भरती हो लै रे थारे बाहर खड़े रंगरूट !
याँ ऎसा रखते मध्यम बाना
मिलता पटिया पुराना ;
वाँ मिलते हैं फुलबूट ।
भरती हो लै रे थारे बाहर खड़े रंगरूट !

भावार्थ :

'चलो भाइयो, चलो फ़ौज में भरती हो जाओ । देखो, तुम्हें लेने के लिए रंगरूट तुम्हारे दरवाज़े पर आए हैं । यहाँ तुम्हारा बाना(वेश)साधारण किस्म का है क्योंकि यहाँ तुम्हें पहनने को फटे-पुराने कपड़े ही मिलते हैं । जबकि वहाँ फ़ौज में तुम्हें नए कपड़ों के साथ-साथ फुलबूट भी पहनने को मिलेंगे । चलो भाइयो, चलो । फ़ौज में भरती हो जाओ ।


पिया, भरती मैं हो लै ने

पिया, भरती मैं हो लै ने,
पट जा छत्तरीपन का तोल !

जरमन मैं जाकर लड़िए,
अपने माँ-बाप का नाँ करिए ।
ओ तोपों के आगे उड़िए,
अपनी छाती मैं दे खोल ।

पिया, भरती मैं हो लै ने,
पट जा छत्तरीपन का तोल !

भावार्थ :

'प्रियतम ! जाओ, फ़ौज में भरती हो जाओ । मुझे भी तो पता लगे कि तुम कितने बड़े क्षत्रिय हो । जाओ और जाकर जर्मनों से लोहा लो । अपने मात-पिता का नाम उज्ज्वल करो । जाओ, तोपों के सामने जाकर अड़ जाओ । उनके सामने अपनी छाती खोल दो । फ़ौज में भरती हो जाओ, प्रियतम! ताकि यह मालूम हो जाए कि तुम वास्तव में सच्चे क्षत्रिय हो ।'


जरमन नैं गोला मारिया

जरमन नैं गोला मारिया,
ज फूट्या, था अम्बर मैं ।

गारद सें सिपाही भाजै
रोटी छोड़ गए लंगर मैं ।

अरे उन तिरिऊन का जीवै,
जिनके बालम छे नम्बर में ।

भावार्थ :

'जर्मन ने गोला मारा । आकाश में जाकर वह गोला फट गया । लंगर में रोटी खा रहे सिपाही अपनी-अपनी रोटी छोड़कर भाग गए । अब क्या पता उन औरतों में से किस-किस के पति जीवित बचे होंगे, जिनके पति छह नम्बर की पलटन में सिपाही हैं ?'


बस देख ली आजादी हामनै म्हारे हिन्दुस्तान की

रचनाकार: कवि नरसिंह 

बस देख ली आजादी हामनै म्हारे हिन्दुस्तान की । 
सबतैं बुरी हालत सै आज मजदूर और किसान की ।। 

न्यूं कहो थे हाळियाँ नै सब आराम हो ज्यांगे - 
खेतों में पानी के सब इंतजाम हो ज्यांगे । 
घणी कमाई होवैगी, थोड़े काम हो ज्यांगे - 
जितनी चीज मोल की, सस्ते दाम हो ज्यांगे । 

आज हार हो-गी थारी कही उलट जुबान की । 
सबतैं बुरी हालत सै आज मजदूर और किसान की ॥ 

जमींदार कै पैदा हो-ज्याँ, दुख विपदा में पड़-ज्याँ सैं - 
उस्सै दिन तैं कई तरहाँ का रास्सा छिड़-ज्या सै । 
लगते ही साल पन्द्रहवाँ, हाळी बणना पड़-ज्या सै - 
घी-दूध का सीच्या चेहरा कती काळा पड़-ज्या सै । 

तीस साल में बूढ़ी हो-ज्या आज उमर जवान की । 
सबतैं बुरी हालत सै आज मजदूर और किसान की ॥ 

पौह-माह के महीने में जाडा फूक दे छाती - 
पाणी देती हाणाँ माराँ चादर की गात्ती । 
चलैं जेठ में लू, गजब की लगती तात्ती - 
हाळी तै हळ जोड़ै, सच्चा देश का साथी । 

फिर भी भूखा मरता, देखो रै माया भगवान की । 
सबतैं बुरी हालत सै आज मजदूर और किसान की ॥ 

बेईमानी तै भाई आज धार ली म्हारे लीडर सारों नै - 
रिश्वत ले कै जगहां बतावैं आपणे मिन्तर प्यारों नै । 
कर दिया देश का नाश अरै इन सारे गद्दारों नै - 
आज कुछ अकल छोडी ना हाळी लोग बिचारों मैं । 

आज तो कुछ भी कद्र नहीं है एक मामूली इंसान की । 
सबतैं बुरी हालत सै आज मजदूर और किसान की ॥


जरमन तेरा जाइयो राज

जरमन तेरा जाइयो राज,
आज ना तडकै !

तन्ने मारे बिराने लाल
जहाज भर-भर के !

मैं किस पर करूँ सिंगार
कालजा धड़के!

भावार्थ :

'अरे जरमन ! तेरा राज ख़त्म हो जाए, आज ही या कल सुबह तक तू सत्ता में न रहे । अरे तूने कितने ही पराए बेटों को मार डाला । वे हमारे पति थे जो जहाजों में भर-भर कर मोरचों पर ले जाए गए थे । हाय ! मैं शृंगार करूँ भी तो कैसे ? मेरा तो कलेजा धड़क रहा है !'


मैं हूर परी बाँगर की 

मैं हूर परी बाँगर की, 
मन्ने फली खा लई सांगर की!

मेरी के बूझे भरतार
म्हने छोड़ न जइए, 
अपना कपटी दिल समझइए
ओ भर बुरा बनियाँ से प्यार
मैं हूर परी बाँगर की। 

भावार्थ :

' मैं बाँगर की हूर हूँ । एकदम परी सरीखी लगती हूँ । मैं सींगरे की फलियाँ खा- खा कर पली हूँ । प्रियतम, आख़िर मुझे क्या समझते हो तुम ? मुझे छोड़ कर न जाओ, प्रिय। इस कपटी दिल को अपने समझाओ, प्रिय ।ओ देखो न, तुम्हारे प्रति मेरे मन में बुरी तरह से प्यार जाग रहा है ।


मोरे क्यों गेरेस भूल

मोरे क्यों गेरेस भूल,
रूप खिल दिया सरसों का फूल
क्यों बोले से बात दरद की ।
मेरे चुभ से ऎणी रे करद की,
मालुम पट जा वीर मरद की,
पा पीटें हवालात में ।

भावार्थ :

(पत्नी अपने पति से मिलने के लिए सिपाही का रूप धर कर पलटन में पति के पास पहुँच गई है। वहीं पर दोनों के बीच यह वार्तालाप हो रहा है ।)--'अरी तू यह क्या भूल कर रही है । देख तो तेरा रूप सरसों के फूलों की तरह खिला हुआ है । तू ऎसी बात क्यों कहती है जिसे सुनकर पीड़ा होती है ? यदि दूसरों को यह भेद मालूम पड़ गया कि यह वीर मर्द कौन है तो पीट-पीट कर हवालात में बन्द कर देंगे ।


अरे निऊँ रौवै बूढ़ बैल

अरे निऊँ रौवे बूढ़ बैल,
म्हने मत बेचै रे, पापी!
तेरे कुल कोल्हू में चाल्या
नाज कमा कै तेरे घरां घाल्या
इब तन्ने कर ली है
बज्जर की छाती।
तेरा बज्जड़ खेत मन्ने तोड्या,
गडीते न मुँह मोड्या,
इब मेरी बेचै से माटी ।
मेरी रै क्यों बेचै से माटी?
अरे निऊँ रौवै बूढ़ बैल ।


भावार्थ :

अरे यूँ रो रहा है बूढ़ा बैल--'मुझे बेच मत, ओ पापी! मैं तेरे सारे परिवार के कोल्हू में जुता हूँ (यानी तेरे परिवार को पालने के लिए सारे काम मैंने किए हैं )। तेरे घर को मैंने अनाज से भर दिया और अब तूने अपना हृदय वज्र के सामान सख़्त बना लिया है । मैंने पूरी तरह से बंजर तेरे खेत को भी जोत-जोत कर उपजाऊ बना डाला । ड़ी (छकड़ा या बैलगाड़ी) में जुतने से भी मैंने तुझे कभी इंकार नहीं किया । और अब तू मेरी मिट्टी--मेरी यह वृद्ध देह--बेचने जा रहा है । अरे भाई, क्यों बेच रहा है तू मेरी यह मिट्टी ?' बूढ़ा बैल यह कह-कह  कर रो रहा है ।


निऊँ कह रही धौली गाय

निऊँ कह रही धौली गाय, मेरी कोई सुनता नईं ।
मेरे कित गए सिरी भगवान, मैं दुख पाय रई ।
मेरा दूध पीवे संसार, घी से खायँ खिचड़ी,
मेरे पूत कमावें नाज मैंघे भा की रूई ।
मेरी दहीए सुखी संसार, जब भी मेरे गल पै छुरी!

भावार्थ :

'यूँ कह रही है सफ़ेद गाय, मेरी बात कोई नहीं सुनता । मेरा भगवान कहाँ चला गया है ? मैं यहाँ दुख पा रही हूँ । यह सारी दुनिया मेरा दूध पीती है । मेरे दूध से बने घी को खिचड़ी में डाल कर खाती है । मेरे पुत्र (मेरे बछड़े ) ही तो अनाज पैदा करते हैं । उन्हीं के परिश्रम से महंगे भाव में बिकने वाली रुई भी उगती है । मेरे दूध से ही दही बनाकर खाता है यह संसार और सुखी रहता है । इसके बावजूद भी जब मैं बूढ़ी हो जाती हूँ तो छुरी मेरे ही गले पर चलती है ।'


मेरा कैहा मान पिया

मेरा कैहा मान पिया, बाड़ी मत बोइए;
सर पड़ेगी उघाई तेरे डंडा बाजै जाई,
पिया बाड़ी मत बोइए ।

भावार्थ :

' प्रियतम जी, मेरी बात मान लो, कपास मत बोओ । कर्ज सिर पर चढ़ जाएगा । सिर पर डंडे बजेंगे सो अलग । प्रिय, मेरी बात मान लो, कपास मत बोऒ ।' 


अरै मैं बुरी कंगाली धन बिन

अरै मैं बुरी कंगाली धन बिन कीसी रै मरोड़ ?
भोगा, बुरी रै कंगाली, धन बिन कीसी रै मरोड़!

धनवन्त घरां आणके कह जा
निरधन ऊँची-नीची सब सह जा
सर पर बंधा-बंधाया रह जा
माथे पर का रै मोड़ ।
अरै मैं बुरी कंगाली धन बिन कीसी रै मरोड़!

निरधन सारी उमर दुख पावे
भूखा नंग रहके हल बाहवे
भोगा, बिना घी के चूरमा
तेरी रहला कमर तै रै तोड़
अरै मैं बुरी कंगाली धन बिन कीसी रै मरोड़ !

भावार्थ :

'बुरी है ग़रीबी, धन के बिना कैसा नखरा? मैं सब भोग चुका हूँ, गरीबी बुरी बला है । धन के बिना कोई नखरा नहीं किया जा सकता । धनी ग़रीब के घर आकर, जो चाहता है कहकर चला जाता है । ग़रीब व्यक्ति उसकी हर ऊँची-नीची बात सह जाता है । धन के बिना तो सर पर बंधी पगड़ी का भी कोई मोल नहीं रह जाता । अरे मैं सब झेल चुका हूँ । बहुत बुरी है ये कंगाली । धन के बिना कोई सुख नहीं पाया जा सकता है । ग़रीब व्यक्ति सारी उमर दुख पाता है । वह भूखा-नंगा रह कर हल चलाता है और खेत जोतता है । अरे ओ भोगा, क्या किया तूने ? बिना घी की रोटी का जो चूरमा (चूरा) तूने कपड़े में बांध कर अपनी कमर पर लटका रखा है, वह तेरी कमर का बोझ बनकर उसे तोड़ रहा है । अरे, मैं यह बुरी कंगाली ख़ूब झेल चुका हूँ । पैसे के बिना जीवन में कोई सुख नहीं है ।'


हालत एक गरीब किसान की

रचनाकार : कवि नरसिंह

कात्तिक बदी अमावस थी और दिन था खास दीवाळी का
आंख्यां कै म्हां आंसू आ-गे घर देख्या जिब हाळी का ।

कितै बणैं थी खीर, कितै हलवे की खुशबू ऊठ रही
हाळी की बहू एक कूण मैं खड़ी बाजरा कूट रही ।
हाळी नै ली खाट बिछा, वा पैत्यां कानी तैं टूट रही
भर कै हुक्का बैठ गया वो, चिलम तळे तैं फूट रही ॥

चाकी धोरै जर लाग्या डंडूक पड़्या एक फाहळी का
आंख्यां कै म्हां आंसू आ-गे घर देख्या जिब हाळी का ॥

सारे पड़ौसी बाळकां खातिर खील-खेलणे ल्यावैं थे
दो बाळक बैठे हाळी के उनकी ओड़ लखावैं थे ।
बची रात की जळी खीचड़ी घोळ सीत मैं खावैं थे
मगन हुए दो कुत्ते बैठे साहमी कान हलावैं थे ॥

एक बखोरा तीन कटोरे, काम नहीं था थाळी का
आंख्यां कै म्हां आंसू आ-गे घर देख्या जिब हाळी का ॥

दोनूं बाळक खील-खेलणां का करकै विश्वास गये
मां धोरै बिल पेश करया, वे ले-कै पूरी आस गये ।
मां बोली बाप के जी नै रोवो, जिसके जाए नास गए
फिर माता की बाणी सुण वे झट बाबू कै पास गए ।

तुरत ऊठ-कै बाहर लिकड़ ग्या पति गौहाने आळी का
आंख्यां कै मांह आंसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥

ऊठ उड़े तैं बणिये कै गया, बिन दामां सौदा ना थ्याया
भूखी हालत देख जाट की, हुक्का तक बी ना प्याया !
देख चढी करड़ाई सिर पै, दुखिया का मन घबराया
छोड गाम नै चल्या गया वो, फेर बाहवड़ कै ना आया ।

कहै नरसिंह थारा बाग उजड़-ग्या भेद चल्या ना माळी का ।
आंख्यां कै मांह आंसू आ-गे घर देख्या जब हाळी का ॥

[ श्रेणी : हरियाणवी लोकगीत। रचनाकार : अज्ञात ]