'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

समुद्र के फेन / रांगेय राघव

रांगेय राघव

सांझ की सुहावनी बेला में आकाश स्वर्ण की भांति दमक रहा था। वायु अट्टहास करती हुई हाथ फैलाए हुए समुद्र की तरंगों पर दौड़ रही थी। जल हरहराता हुआ तीर पर वेग से चढ़ जाता। फेनों से बालू ढक जाता। अनेक युवक-युवतियां फेन से खेलते, उन्माद से ठहाके मारकर हंस उठते। लहरें झेंपती हुई पीछे लौट जातीं। आकाश की छवि छाया लहरों पर मुस्करा उठती, और वायु के थपड़ों से जल क्रुद्ध हो फुफकार उठता।

तंगवल्ली तट पर अकेली ही बैठी उंगली से बालू पर चित्र बना-बिगाड़ रही थी। ‘एक्वेरियम’ (चलचरी) का। भीड़ का हल्का शोर गूंजता हुआ धीरे-धीरे उसके कानों में टकरा रहा था। उधर रेस्तरां में लोग बैठे हुए, ‘मसाला दोशे’ और कॉफी खा-पी रहे थे। उनके लिए जैसे जीवन एक मौज मात्र था। पर तंगम् को उन्हें उस तरह खाते-पीते देखकर उनसे घृणा हो रही थी। उसके हृदय में एक क्षोभ-सा भर रहा था। सहसा वह उनके अज्ञान पर धीरे से मुस्करा उठी। उसके गालों में गढ़े पड़ गए, जैसे लहरें चक्कर मारकर ही स्थान पर दबती चली जाती हैं। जैसे जल का सारा वेग, समस्त गति का सौंदर्य एक ही केंद्र पर रहस्य बनकर कांप उठता है।

तंगम् आज बहुत दिनों के बाद इधर आई है। उसने इसी वर्ष बी. ए. किया है। अपने गेहुवें रंग के शरीर पर जब वह छपी हुई धानी साड़ी उत्तरी ढंग से बांध कर आईने के सामने जाती है, तो उस समय वह अपने आपको ही शीशे में देख कर मुग्ध हो जाती है। उसे अपने रूप पर गर्व हो जाता है।

उसकी बुआ ने उसे अतीव लाड़ से पाला और पोषित किया है। बुआ की एक छोटी सी जमींदारी है। एक काश्तकार को ही उन्होंने उसका मैनेजर बना दिया है। वही वक्त पर रुपए लाकर दे जाता है। उसी से सब कुछ होता है-निर्विघ्न, निर्विवाद।

तंगवल्ली देर तक वहीं बैठी रही। उसने देखा, उसके साथ हंसने-बोलने वाला कोई नहीं था। बुआ नहीं रहेंगी, तो संसार में वह नितांत निरावलंब हो जाएगी। 

तट पर अनेक युवक-युवतियां बालू पर दो-दो करके बैठे बातें कर रहे थे। तंगवल्ली ने उन्हें देखा, और उपेक्षा से मुंह फेर लिया। ये लोग और कुछ नहीं जानते, न जानना चाहते हैं, बस प्रेम की छलना में डूबे रहते हैं!

जब अंधेरा घिरने लगा, तो तंगवल्ली उठी, और सामने के कालेज के बाईं तरफ चल पड़ी। सड़क पर अनगिनती मोटरें खड़ी थीं-काली, नीली, लाल...

लेकिन उसने उधर ध्यान नहीं दिया। वह रुक गई, और ट्राम की प्रतीक्षा करने लगी।

बुआ का नाम था सुब्बलक्ष्मी। अधेड़ आयु थी। गालों पर झुर्रियां पड़ चुकी थीं। दो दांत टूट चुके थे। पर नयनों में एक ऐसे स्नेह की अभिव्यक्ति थी कि देख कर सहज ही माता की ममता की अनुभूति होने लगती थी।

तंगम् भीतर घुसी। देखा, बुआ छत से लटके झूले की ओर सतृष्ण, नयनों से देख रही थी। तंगम् पास जाकर बैठ गई। बुआ चौंक उठीं, देखकर मुस्कराई, और न जाने क्यों उनकी आंखों में अपने आप पानी छलक आया।

तंगम् ने कहा, ‘अत्तै! क्या हुआ?’

बुआ ने कुछ देर तक कुछ भी नहीं कहा, चुपचाप उसकी ओर देखती रहीं। तंगम् उस दृष्टि का अर्थ कुछ-कुछ समझती थी। जब किसी युवती कन्या की ओर घर की बड़ी-बूढ़ी स्नेह से आंख भरकर देखती हैं, तो उसका अर्थ होता है, ‘तेरा विवाह’ होना चाहिए!

तंगम् लजा गई, पर उसने अनजान बनकर अपनी लाज को छिपा लिया। बुआ ने कहा, ‘बेटी, तुझे मैंने अपनी बेटी करके पाला है। है न सच? तू भी मुझे मां की तरह प्यार करती है न?’

तंगम् ने सिर हिलाकर स्वीकार किया। एक कोने में कुत्तीवलक्क (एक प्रकार के दीपक) जल रहे थे, जिनके प्रकाश में चमकते हुए फर्श पर पुरा हुआ कोमल (चौक) झिलमिला रहा था। अलगनी पर बुआ की सफेद साड़ी टंगी हुई थी। इस घर में अठारह हाथ की ‘मड़शार’ (रंगीन) साडि़यां केवल दो हैं। एक, एक सौ पांच रुपए की है। उस पर मूल्यवान जरी का काम हुआ है। दूसरी तीस-पैंतीस रुपए की है। तंगम् अंग्रेजी पढ़ी युवती है। वह इतनी लंबी साड़ी का बोझ क्यों लादे फिरे?

बुआ के माथे पर विभूति लगी हुई थी। उसके ऊपर कैंची से कटे सफेद, काले छोटे-छोटे बाल थे, जिनको देख कोई भी स्त्री कांप उठ सकती है, क्योंकि विधवा होना एक भयानक बात है।

बुआ ने गद्गद होकर कहा, ‘बेटी, अब तू बी. ए. भी हो गई। आज तक मैंने कभी तेरी मर्जी के खिलाफ कोई काम नहीं किया। क्या अब भी तू मेरी बात नहीं मानेगी?’

तंगम समझ गई। उसने मुंह फेर लिया। इससे उसकी स्वीकृति थी, जिसकी पृष्ठभूमि में नारी की युगांतर की घर बसाकर रहने की प्रवृत्ति थी।

बाहर किसी के खांसने की आवाज सुनाई दी। अधेड़ आयु के, आबनूसी रंग के अलगप्पा ने भीतर प्रवेश किया। वह एक धोती पहने था, जिसके आगे के भाग में किसी समय अच्छी जरी का काम होने का अनुमान-मात्र ही अब आभासित हो सकता था। शरीर पर एक कमीज थी, और अधिकांश मदरासियों की भांति वह नंगे पैर ही था। सिर के पीछे मोटा चुट्टा था, और आगे से कुछ गंज आ जाने के कारण चौड़ी-चौड़ी विभूतियां लगी थीं, जिनको देखकर लगता था, जैसे गहरे आकाश में धुंधली स्वर्ग-गंगा प्रवाहित हो रही हो। उसके हाथों पर अत्यधिक बाल थे। नाटा होने के साथ ही वह स्थूल शरीर का था। उसकी आवाज मोटी थी, और वह बहुत जल्दी बोलता था। वही बुआ का काश्तकार और मैनेजर था।

बुआ ने प्रणाम-नमस्कार के बाद बैठने का इशारा किया। वह ऐसे बैठा, जैसे कोई भरा हुआ बोरा किसी ने लद्द से पटक दिया हो।

अलगप्पा बहुत बातूनी था। तंगम् को उसकी सूरत देखते ही कुछ बुरा-सा लगता था। वह उसे घोर मतलबी समझती थी। ये लोग कभी किसी के नहीं होते। अलगप्पा खेतों में काम करने वाले चमारों को अक्सर पिटवा देता था। तंगम् को उसकी यह आदत बिल्कुल पसंद नहीं थी।

अलगप्पा की पत्नी का नाम आन्डालम्मा था एक नंबर की लड़ाकू औरत थी। घर बरबाद करने की ही दीक्षा लेकर उसने ससुराल में पांव रक्खा था। जो जोर-जबर करके अलगप्पा घर में लाता था, उसे रईसी में आन्डालम्मा बरबाद कर देती थी। पर उसकी पुत्री भामा अतीव सुंदरी थी।

बुआ ने कहा, ‘कहो भैया, घर में तो सब ठीक ठाक हैं?’

अलगप्पा ने बात समाप्त होने के पहले ही कहना प्रारंभ कर दिया, ‘तुम मेरी अत्तै नहीं हो, दीक्षा लेकर उसने ससुराल में पांव रक्खा था। जो जोर-जबर करके अलगप्पा घर में लाता था, उसे रईसी में आन्डालम्मा बरबाद कर देती थी। पर उसकी पुत्री भामा अतीव सुंदरी थी।

चोट ठीक पड़ी। बुआ की स्मृतियां उभर आईं। उनकी आंखों में पानी आ गया। अलगप्पा कहता गया, ‘घर तो नहीं बनेगा, मां! वह जो डायन बैठी है, डायन!’

बुआ मुस्करा दीं। तंगम् हंस पड़ी।

‘सच कहता हूं’, उसने फिर कहा, ‘जो जैसे आता है, वैसे ही चला जाता है। अब भामा बड़ी हो गई है। वर की तालाश में हूं। कोई कुछ मांगता है, कोई कुछ। समझ में नहीं आता कि क्या करूं, न करूं। पास में एक धेला भी नहीं! और बहुत से तो कहते हैं, ‘लड़की कुछ पढ़ी नहीं है। कम से कम सेकंड फार्म तक पढ़ी होती?’

अलगप्पा ने एक लंबी सांस ली, और उत्तर की प्रतीक्षा करने लगा। कोई कुछ नहीं बोला। बुआ अपने ही विचारों में तल्लीन थी। उन्होंने थोड़ी देर बाद गंभीर स्वर में कहा, ‘अलगप्पा, तुम्हें तो सब मालूम है! नरसप्पा का पत्र आया है। रुपया मांगा है।’

तंगम् ने सुना। कुछ समझ में नहीं आया। उसने पूछा, ‘यह नरसप्पा कौन है?’

अलगप्पा ने कहा, ‘तुम नहीं जानतीं? अरे वह तो कभी इस घर का ऋण नहीं चुका पाएगा! तेरी बुआ ने ही उसे इतना बड़ा किया है।’

बुआ ने गर्व से तंगम् की ओर देखा, फिर कहा, ‘कुछ भी हो, अलगप्पा, पचास रुपए तो उसे भेज ही दो। वह भी तो अब अपना ही है।’

अलगप्पा ने पल भर अकचका कर आंखें उठाईं, जैसे वह कुछ विरोध करना चाहता था पर हठात् बुआ की ओर देखकर बोल उठा, ‘मालकिन, दिल तो आपने पाया है! एक आंडाल है, जो घर की होकर घर को नहीं समझती, और एक आप है! सचमुच आप देवी हैं।’

और उसने उठकर एक लंबा साष्टांग दंडवत किया। तंगम् कुछ उपेक्षा और तिरस्कार से देखती रही।

तंगम् के हृदय में भी उस अज्ञात युवक नरसप्पा के प्रति कौतूहल जाग उठा। कौन है वह, जिसे बुआ इतना मानती है? कैसा होगा वह?

जैसा प्रकृति का नियम है, वैसा ही हुआ। एक अनजान युवक का चित्र युवती की दृष्टि में उठकर अत्यंत सुंदर हो जाता है।

दूसरे दिन जब वह समुद्र-तट पर गई तो उसके शून्य हृदय में जो एक चित्र था, किसी काल्पनिक सुंदर युवक का, वह शीघ्र ही उसे भूल गई। उसकी उदास आंखें फिर बनती-बिगड़ती लहरों का खेल देखने लगीं। फेन से तट भर जाता था। फेन बिखर जाता या। फिर लहरें आकर उस पर छा जाती थीं।

उसने कालेज-जीवन में भी कभी किसी लड़के से मित्रता नहीं की। उसे अपने चरित्र पर गर्व था। उसकी शून्यता भीतर ही भीतर जब उसको कचोटने लगती थी, तो वह दुख के भार से व्यथित होकर उपनिषद पढ़ने लगती थी। पर कुछ देर बाद ही कोट्स की ‘एन्डिमियन की कड़ियां उसके कानों में गूंज उठती। चंद्रदेवी का उस गड़रिए के प्रति प्रेम उसकी निभृत वेदना पर लहरों के जाल की तरह छा जाता। वासना के उबलते फेन बनने-बिगड़ने लगते।’

द्वंद्व के इस विषाद की छलना हमारे समाज का बंधन है, व्यक्ति का दासत्व है।

कभी-कभी वह सोचती, ‘आज के साम्यवादी कहते हैं कि यह समाज आर्थिक बंधनों पर टिका है। शोषण इसकी शक्ति है, और बलात्कार इसका धर्म।’ फिर ये विचार चले जाते। उसका अपनापन सत्य के भार को न सह सकने के कारण पंगु-सा हो, लड़खड़ा कर दयनीय हो उठता मद्रास नगर का वह वैभव उसे ज्वाला के समान झुलसता हुआ लगता। वह चाहती थी ममता, स्नेह, प्यार।

घर आकर देखा, बुआ भामा को पास बैठाकर बातें कर रही थी। भामा ने तंगम् को देखा और धीरे से मुस्करा दी। तंगम् भीतर से ‘आनंद-विकटन’ (तमिल की एक पत्रिका) ले आई, और पास ही बैठकर तस्वीरें देखती हुई बातें करने लगी।

भामा ने कहा, ‘अतै! तंगम् का ब्याह कब करोगी?’

तंगम् हंस दी। उसने सिर उठाकर कहा, ‘ओहो! तुझे मेरी बड़ी चिंता हो गई! कभी अपने बारे में सोचा? तेरे पिता को तेरे पीछे पागल हुए जा रहे हैं!’

तंगम् के स्वर में था। भामा को लगा, जैसे वह उसकी दरिद्रता पर हमला कर रही है। उसके हृदय से क्रोध आया, जो विक्षोभ बनकर आंखों में मौन हो गया। तंगम् ने जो कहा है, इसीलिए न कि वह जमींदार है, घर भी उससे कहीं अच्छा है, उसका बाप उसी के यहां नौकर है, और खुद पढ़ी-लिखी है।

उसने कहा, ‘हमारा क्या, हम तो गरीब हैं। ब्याह नहीं कर सकते, क्योंकि हमारे पास दौलत नहीं है। किंतु तुम तो ऐसी नहीं हो। लोग कहते हैं, जब लक्ष्मी के रहते सरस्वती भी आ जाती है, तो वह स्थान ठीक नहीं रहता।’

‘क्या मतलब?’ तंगम् ने भौहें सिकोड़कर पूछा। उसका नीचे का होठ कुछ निकल आया।

भामा ने कहा, ‘यही कहती हूं कि हमारे यहां बड़ी उम्र तक ब्याह नहीं होते, तो लड़कियों के लोग नाम धरते हैं। तुम भी तो स्त्री ही हो। क्यों, अत्तै’, उसने मुड़कर कहा, ‘लोग क्या-क्या नहीं करते? मेरी तो बात ही और है। क्या तंगम् की कहीं बातचीत भी नहीं चली?’

तंगम् ने कुछ नहीं कहा। बुआ बोल उठीं, ‘हां-हां, चली क्यों नहीं? नहीं चली, तो अब चलेगी। चलाए से चलेगी कि अपने आप? तंगम् का ब्याह होगा तेरा भी होगा। तू क्या हमसे कुछ अलग है?’

भामा ने लज्जा से सिर झुका लिया। पुरुष के प्रति उसका इतना स्नेह देखकर तंगम् को अच्छा नहीं लगा। वह उठ गई।

संध्या जब समुद्र के ऊपर से अपना रंगीन आंचल हटाकर स्नान के लिए वस्त्र उतारने लगी, तो तंगम् उठ खड़ी हुई। जाकर वहीं समुद्र-तीर पर बैठ गई। सैकड़ों व्यक्ति वहां थे, पर तंगम् को जैसे उन सबसे कोई संबंध नहीं था। आज तक उसके पीछे किसी कालेज के लड़के ने चक्कर नहीं लगाए। वह सुंदर थी अवश्य, किंतु उसमें आकर्षण नहीं था। तंगम् सदा ही ऐसे समझती रही है।

धीरे-धीरे सूर्य समुद्र की उत्तंग लहरों को पकड़ने का अंतिम प्रयास करके विफल-सा खिसककर अंधकार में डूब गया। लहरें अधिक नील हो गईं। आकाश में तारे चमक उठे, जैसे मुंह खुलने पर उज्जवल दांत चमक उठते हैं। उस बढ़ती हुई नीरवता में समुद्र की एकांत लहर उसके अंतराल में एक महान संतोष बनकर व्याप्त होने लगी। वह विमुग्ध सी बैठी रही देर तक।

घर आने पर तंगम् ने देखा, दीपक जल रहे थे। काश, यहां बिजली होती! शहर में रहकर घर में बिजली का न रहना उसे बड़ा बुरा लगा। अब वह अवश्य बिजली लगाएगा। बी. ए. तक बुआ की ममता ने उसे पढ़ाया था, उनके विचारों ने नहीं। तंगम् के स्नेह ने समाज के सारे प्रतिरोधों के वाबजूद बुआ को उसे पढ़ाने के लिए विवश किया था।

भीतर झांककर देखा, बुआ चुपचाप सो रही थीं। उसे विस्मय हुआ। अभी तो रात प्रारंभ ही हुई है। चुपचाप भीतर जाकर वह कपड़े बदलने लगी। रसोई में जाकर देखा, केवल पौंगल (खिचड़ी) बनी रखी थी। वह खाने लगी।

बुआ का लेटा रहना अकारण नहीं था। उन्हें रोज शाम को धीमा-धीमा ज्वर आ जाता था। आज वह तीव्र हो गया था उनके शरीर में पीड़ा हो रही थी। वह बिस्तर पर पड़ी थीं। उनके नयन अधमुंदे से, थके-मांदे से कभी-कभी खुल जाते थे। उन्होंने तंगम् की ओर देखकर कहा, ‘तंगम् बेटी!’

तंगम्! ने पास आकर कहा, ‘सो रहो, अत्तै! तुम न जाने क्या-क्या सोचा करती हो?’

बुआ ने एक दीर्घ निःश्वास लेकर आंखें मीच लीं। उनके होंठ खदकते पानी की तरह कांप उठे, जैसे ममता का ताप बहुत बढ़ गया हो।

तंगम् ने उठकर देखा, घड़ी में एक बज रहा था। उसने अपने सिर को जैसे अनजान में ही हिलाया। उसी समय बुआ कराह उठीं।

बुआ के पास जाकर वह खड़ी हो गई, कहा, ‘अत्तै, वैद्य की दवाई खाते-खाते आज एक महीना हो गया, पर कोई लाभ नहीं हुआ। कहो तो किसी डॉक्टर को बुला लाऊं।’

बुआ के होंठ सिकुड़ गए। आंखें खोलकर उन्होंने एक बार स्थिर दृष्टि से तंगम् की ओर देखा। कहा, ‘बेटी, तू अंग्रेजी पढ़ी-लिखी है। मैं तो वही पुरानी गंवारिन हूं। जन्म से आज तक तो कभी अंग्रेजी दवा खाई नहीं। अब खाकर भी क्या करूंगी? एक तेरा ब्याह करना था। उसी के लिए जीवित रहने की इच्छा थी। अन्यथा इस अभागिन विधवा से संसार को लाभ ही क्या है?’

तंगम् झुंझला उठी, यह सोचकर कि उसके विवाह की समस्या न होती तो बुआ को जीवित रहने की वास्तव में कोई आवश्यकता न थी। फिर जैसे बुआ की अपने प्रति अगाध ममता से भरकर उसने कहा, ‘तुम बहुत अच्छी हो, अत्तै!’ 

अलगप्पा ने घर में प्रवेश करते हुए कहा, ‘अच्छी नहीं, देव कहो, बेटी, देवी!’ और पास आकर बैठते हुए कहने लगा, ‘अब तबीयत कैसी है? बेटी तंगम्, अब तो मालकिन कुछ अच्छी हैं न?’

तंगम् ने निराशा से सिर हिला दिया। अलगप्पा की आंखों के सामने जैसे एक काली छाया घूम गई। वह सोचने लगा, ‘बुढ़िया मर गई, तो? तंगम् अपना विवाह कर लेगी। फिर जमींदारी का क्या होगा?’ यह सोचकर उसके दिल में एक डर समा गया। सिर हिलाकर उसने कहा, ‘तो भी कोई चिंता नहीं! भगवान सब अच्छा करेंगे! घबराहट से काम नहीं चलेगा। दवा तो वैद्य की ही हो रही है न?’

तंगम् ने कहा, ‘हां, उससे कोई लाभ नहीं हो रहा है। मैं कहती हूं, डॉक्टर को बुला लें। पर अत्तै डांट देती हैं कि तू लड़की है, कुछ नहीं समझती!’

‘सो तो है ही!’ अलगप्पा ने कहा। तंगम् एकदम चौंक पड़ी। अलगप्पा अपने फटे स्वर से कहता ही क्या, ‘तुम क्या जानोगी, बेटी! रुपया क्या आसानी से आता है? आगा-पीछा सोचकर खर्च करना चाहिए। डॉक्टर का क्या है? वह सिल मिलते ही उस्तरा तेज करने बैठ जाएगा!’

तंगम् आवाक रह गई। बुआ ने करवट बदलकर कहा, ‘अलगप्पा, अभी तंगम् का ब्याह करना है। और कहीं मैं चल बसी, तो क्रिया कर्म के लिए रुपया चाहिए। घर में डॉक्टर आने-जाने लगे, तो क्या बच पाएगा उनसे?’

अलगप्पा ने हां में हां मिलाकर कहा, ‘बेटी तो अभी छोटी ही है, अत्तै! बी. ए. पास करके ही दुनियादारी हासिल हो सकती है? क्या करूं, कुछ समझ में नहीं आता। ऐसे समय भी यदि मालिक के कुछ काम न आया, तो नरक का ही अधिकारी हूं मैं! और मालिक भी साधारण मालिक नहीं! सचमुच यह पापी अलगप्पा तो नरक ही जाएगा। इसके लिए और कहीं कोई ठौर नहीं है। मन में बस मालकिन की ही लौ लगी रहती है। लेकिन वह जो घर में डायन है न! बस, जीवन है या...’

बुआ ने बीच में ही टोककर कहा, ‘ऐसा क्यों कहते हो, भैया? अपना-अपना स्वभाव और अपना-अपना भाग्य है। जो दूसरों को दुःख देता है, वह स्वयं भी कभी आराम से नहीं रहता।’

अलगप्पा चला गया। तंगम् दीपक जलाकर लक्ष्मी के सम्मुख बैठ, जोर-जोर से पाठ करने लगी। बुआ पड़ी-पड़ी सुन रही थी। तंगम् को इन बातों में तनिक भी विश्वास न था; पर आजकल उसके हृदय में एक भय की छाया समा गई थी, जिससे उसकी भावनाएं निःशक्त हो उठी थी।

दीपक के धुंधले प्रकाश में उसने देखा, बुआ के मुंह पर सूजन आ गई थी। वह जानती थी कि स्त्री के मुख पर बिमारी में सूजन आना कितनी भयानक बात है। वह कांप उठी। फिर एक बार हृदय की समस्त गति से शिव की प्रार्थना की।

उस सन्नाटे में तंगम् का मन डावांडोल हो रहा था। अपने आगे उसे अंधकार के अतिरिक्त कुछ भी दिखाई नहीं देता था। बुआ के बाद जो संबंधी आज तक उनके डर से चुप रहे हैं, उनकी जवान पर से ताला हट जाएगा। अब भी तो समाज में स्त्रियां उनकी ओर घूर कर देखती हैं। उनकी दृष्टि में एक विद्वेष की भावना रहती है। पुरुष उसकी ओर घोर घृणा की दृष्टि से देखते हैं, जैसे लड़कियों का कालेज में पढ़ना कोई पाप है। तो क्या वह विवाह करेगी? किंतु जाति वाले तो मुश्किल से उससे अपना संबंध करेंगे। फिर जब कोई सिर पर नहीं होगा, तो काम कैसे चलेगा? वह अपने आप अपना विवाह कैसे करेगी?

बुआ के मुंह से एक कराह निकली। तंगम् भय से कांप उठी। उसने बुआ का हाथ पकड़ लिया। देखा, उनकी आंखें मिच रही थीं। उन्हें पानी पिलाकर बड़ी देर तक देखती रही। उसी समय उसके हृदय में एक भीषण आंधी चल रही थी। बुआ के नयन खुले, जैसे अंधेरे कमरे में दीपक जल गए हों।

तंगम् ने कहा, ‘अत्तै!’

बुआ ने फिर आंखे बंद कर लीं। तंगम् और कुछ भी नहीं सोच सकी। रात के गहरे अंधकार में पड़ोस में रहने वाले वैद्य को बुलाने के लिए चल पड़ी, किंतु हृदय आशंका से कांप उठा। वह बुआ को अकेले छोड़कर कैसे जाए? यदि इसी बीच में सब समाप्त हो गया तो संसार कहेगा कि जब बुआ मर रही थी तब तंगम् सैर करने गई थी। कोई सच बात का विश्वास नहीं करेगा।

उठा हुआ पग रूक गया। मन में आया, न जाए। किंतु फिर हृदय में क्रोध ने सिर उठाया। कहने को तो यह संसार आ जाएगा, किंतु इस समय जब बुआ बिना औषधि के सांस तक नहीं ले पा रही हैं, क्यों नहीं आता है कोई उसकी मदद को?

वैद्य ने आकर कोई दवा पेट में उतार दी, और अपनी फीस लेकर चला गया। तंगम् सिरहाने बैठी रही।

आधी रात का अंधकार जब आकाश और पृथ्वी के बीच अजगर की भांति फुफकारने लगा, तो उसने देखा, बुआ, फिर हिल उठीं। फिर उन्होंने तंगम् की ओर देखकर कहा, ‘बेटी, एक काम करोगी?’

तंगम् ने कहा, ‘क्या अत्तै?’

बुआ ने कहा, ‘बेटी, मेरा अब कोई ठीक नहीं है। एक महीना भी जीवित रह सकती हूं, एक घंटा भी। और क्या जाने अभी...’ वह थककर हांफ गईं, और फिर धीरे-धीरे बोलीं, ‘बेटी, एक पत्र लिख दे। मैं बोलती हूं।’

तंगम् ने कहा, ‘कल लिखा लेना, अत्तै! ऐसी क्या जरूरी है?’

बुआ ने सिर हिलाकर कहा, ‘तू नहीं जानती, बेटी! तू अभी बच्ची है। चल उठ!’

तंगम् ने कोई विरोध नहीं किया। कलम-दवात लेकर बैठ गई। सोचने-विचारने की कोई आवश्यकता नहीं समझी। कहा, ‘अत्तै, तुम बोलती जाओ, मैं वैसे ही लिखती चलूंगी। हां, लिखवाओगी कैसे?’

बुआ ने कहा, ‘और कौन है बेटी? वही नरसप्पा है। अब मैं सचमुच नहीं बचूंगी। तू अकेली सब कैसे संभालोगी? नरसप्पा अनाथ बच्चा था। मैंने ही उसे पाला है। उसे रुपया भेजती रही हूं। वह क्या अब आकर घर नहीं संभालेगा?’

तंगम् ने कुछ नहीं कहा।

बुआ लिखाने लगीं-

‘बेटा नरसम्-बहुत दिन से तू मेरे पास नहीं आया। आज इस दुख की घड़ी में और हमारा कौन है। तंगम् तो लड़की है। वह क्या-क्या करेगी? जमींदारी है, उसको भी तो संभालना है। तू आ! सब कुछ तेरा ही है। मेरा क्या? मैं तो मरण-शैया पर पड़ी हूं। तभी तंगम् से यह लिखवा रही हूं। तंगम् का ब्याह कराना है। मेरे बाद तू ही उसकी देखरेख करेगा। तुझे मैंने अपना बेटा करके माना है। यदि तू भी नहीं आएगा तो और कौन हमारा है? मैं तो अब बहुत दिन तक नहीं जिऊंगी...’

तंगम् लिखती रही। बुआ ने अंत में कहा, ‘बेटी, इसे कल ही डाक में डलवा देना। अब मैं सुख से मरूंगी।’ कहकर उन्होंने आंखें मींच ली, जैसे बहुत थक गई हों।

दीपक की ज्योति धुंधली पड़ चली। तंगम् ऊंघ गई।

प्रातः काल तंगम् की आंखें खुलीं, तो पत्र उसने उसी समय उठकर बाहर सड़क के लेटर-बक्स में डाल दिया।

दिनभर बुआ निश्चल पड़ी रहीं। बहुत जोर देकर तंगम् ने उन्हें चार-पांच चम्मच कंजी पिलाई।

रात और भी भयानक होकर आई। बुआ की सांस जैसे किसी आशा पर अटकी हुई थी। अकेली तंगम् चुपचाप भयाक्रांत हो देखती रही। दूसरे दिन जब सूरज बीच आकाश में पहुंच गया, तो द्वार पर कोई पुकार उठा, ‘अत्तै!’

बुआ ने आंखें खोल दीं। नरसप्पा आ गया था। तंगम् उठकर खड़ी हो गई। उसने देखा, आगंतुक उससे आयु में कुछ अधिक था। गोरे रंग के साथ-साथ उसके मुख पर लावण्य भी था। वह बिल्कुल साधारण कपड़े पहने था।

बुआ ने आंखें खोल दीं, और प्रसन्नता के मारे उनका गला अवरूद्ध हो गया। 

तंगम् ने कहा, ‘अत्तै! मामा (दक्षिण भारत में लड़कियां अजनबी युवक को मामा कहकर संबोधित करती हैं। वहां मामा अपनी भांजी से ब्याह भी कर सकता है) आ गए!’

युवक पास बैठ गया। फिर मुड़कर तंगम् को देखकर बोला, ‘मालूम देता है, तुम कई रातों से जागी हो। जाओ, थोड़ा सो रहो। जरूरत होगी, तो बुला लूंगा।’

और कोई ऐसा कहता, तो तंगम् तुरंत अस्वीकार कर देती। किंतु नरसप्पा की बात वह न टाल सकी। कमरे में जाकर वह लेट गई और थोड़ी ही देर में सो गई।

रात के एक बजे के सन्नाटे में किसी ने उसे हिलाकर जगा दिया। देखा, भामा पास में खड़ी है। घबराकर तंगम् ने उससे पूछा, ‘क्या है?’

भामा ने कहा, ‘सोने को बहुत समय मिल जाएगा, तंगम् उठो!’

‘बात क्या है?’ तंगम् ने चिंतित होकर कहा। फिर जाकर बुआ के कमरे में देखा, नरसप्पा, आन्डालम्मा और अलगप्पा निश्चेष्ट से बैठे थे। बुआ बिस्तर पर चेतनाहीन-सी हाथ-पांव पटक रही थीं। दौड़कर तंगम् ने बुआ के पैर पकड़ लिए।

क्षणभर बाद ही एक भयानक कुहराम मच गया। आन्डालम्मा ने रो-रोकर छाती पीटना प्रारंभ कर दिया। नरसप्पा सिर पकड़कर बैठा रहा। अलगप्पा दाहक्रिया का प्रबंध करने में जुट गया। भामा अपनी मां के दुख से विचलित होकर उसे सांत्वना देने का प्रयत्न कर रही थी। तंगम् बुआ के पैरों पर सिर रखे रो रही थी। उसे कोई सांत्वना देने वाला न था।

समुद्र में भयानक तूफान उठा था। पोत डूब चुका था। भग्न खंडों का सहारा ले अनेक यात्री अपने-अपने प्राणों की चिंता कर उत्तुंग लहरों पर हाथ-पांव मार रहे थे।

पर तंगम् ने हाथ-पांव नहीं चलाए। उसे जैसे जीवन का कोई मोह नहीं था। उसने अपने को छोड़ दिया उन कठोर और निर्मम लहरों की दया पर, जिनके आघात से उसका पोत डूब चुका था, जिस पर उसके अमूल्य मणिमाणिक लदे हुए थे।

रात के सन्नाटे में रोने की वह दर्दनाक आवाज डरावनी बन पड़ोस में फैल गई।

क्रियाकर्म की विषाद-कालिमा जब होम-धूम्र के साथ घर से उड़ गई, तो तंगम् ने देखा कि अब वह पहले से भी अकेली थी। उसका अब वास्तव में कोई नहीं था, दिन हो या रात, अब वह कभी बाहर न निकलती, चुपचाप कमरे में पड़ी रहती। उसका हृदय भीतर ही भीतर कचोटता रहता। आंखों के सामने एक शून्यता छाई रहती, जिसमें प्रकाश की एक भी रेखा दिखाई न पड़ती।

नरसप्पा से उनकी कभी कोई बातचीत नहीं हुई, फिर भी वह उसे पसंद करने लगी थी। उसके हृदय के न जाने किस अनजान कोने में उसकी छाया का भी अस्तित्व आ बैठा था, जिसे वह अकेले में स्वीकार करने को कभी भी तत्पर न होती। पहले ही दिन जो उसने उसे स्वाभाविक रूप से ही मामा कह दिया था, कभी-कभी यही सोच उसे एक लाज सी हो आती।

अत्तै की स्मृति ने उसे भीतर ही भीतर खा लिया था। जब उसकी आंखों के सामने बुआ की मातृ-ममता से भीगी आंखें नाच उठतीं, तो वेदना से उसका हृदय अपने आप कराह उठता, उस सुनसान में घर की एक ईंट अत्तै की याद बन कर गूंज उठती।

बाहर कुछ खड़खड़ सुनाई पड़ी। देखा, नरसप्पा और भामा बातें कर रहे थे। न जाने क्यों उसे यह अच्छा नहीं लगा। उसने घूरकर देखा, और तुरंत संभल गई। भामा उसे देखकर जैसे कुछ सकपका गई, किंतु नरसप्पा वैसे ही खड़ा रहा।

तंगम् ने कहा, ‘कहो भामा, आज कैसे आई हो? इधर कई दिन से तो दर्शन ही नहीं दिए?’

भामा ने कहा, ‘क्या करूं, मालकिन? मां को तो आप जानती ही हैं। पिताजी आपके ही काम में फंसे रहते हैं। मुझे घर के कामों से ही फुरसत नहीं मिलती।’

‘मालकिन’ शब्द तंगम् के दिमाग में एक अपमान का व्यंग्य बनकर बज उठा। उसने घूरकर उसकी ओर देखा, और अपने आप उसकी दृष्टि नरसप्पा की ओर चली गई।

भामा ने फिर कहा, ‘पिताजी ने मामा को बुलाने के लिए कहा था। इसी से आ गई थी।’

क्षणभर तंगम् ने नरसप्पा की ओर देखा, फिर मुस्करा कर भीतर लौट गई, जैसे उससे कोई मतलब ही नहीं।

शाम को नरसप्पा ने जाकर अलगप्पा का द्वार खटखटा दिया। भीतर से आकर भामा ने द्वार खोला। पलभर के लिए दोनों के नयन मिले। भामा ने मुस्कराकर कहा, ‘आइए् पिताजी भीतर हैं।’

नरसप्पा भीतर जाकर बैठ गया। अलगप्पा देखते ही चिल्ला पड़ा, ‘ओहो! बड़ी प्रतीक्षा कराई, भैया! अरी, भामा, कॉफी तो ला!’

जब वे लोग कॉफी पी चुके, तो भामा उन्हें छोड़कर चली गई।

अलगप्पा ने उसकी ओर देखा। भविष्य की आशा उसकी आंखों में एक चमक बनकर खेल गई। उसने कहा, ‘तुम्हें यहां आने से तंगवल्ली ने रोका तो नहीं?’

नरसप्पा ने नदान बनकर पूछा, ‘क्यों, वह क्यों रोकती?’

अलगप्पा ने धीरे से कहा, ‘तुम नहीं जानते, नरसप्पा! वह लड़की अच्छी नहीं है। मैं तो कुछ नहीं समझ पाता कि अब वह क्या करेगी। बुआ की मौत का सोच तुमको नहीं हुआ कि मुझको नहीं हुआ? लेकिन वह तो ऐसी बनती है, जैसे उसके अतिरिक्त किसी को भी बुआ से कोई सहानुभूति नहीं थी। कैसे हो सकता है यह, भैया? तुम्हीं बताओ, अत्तै के चरणों पर कौन न्यौछावर नहीं है? बताओ, नरसप्पा! मैं उन्हीं के अन्न से पला हूं। तुम भी तो उन्हीं के पाले हुए हो। फिर क्या तुम यह सह सकते हो कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी आत्मा का अपमान किया जाए?’

नरसप्पा सोचने लगा। किंतु वह कुछ समझ नहीं सका। उसने कहा, ‘अपमान, कैसा अपमान? तंगम् का तो विवाह मुझे कराना है।’

‘कराना’ शब्द सुनकर अलगप्पा जैसे जीवित हो गया। उसने उसके हाथ पकड़ कर कहा, ‘तुम देवता हो नरसप्पा, देवता! मुझे तो अपनी भामा की चिंता पड़ी है। मेरे भगवान्! ऐसा क्यों कर दिया तुमने? अब तो कुछ नहीं हो सकेगा? बेटी के ब्याह के लिए रुपया देना तो दूर, तंगम् शायद अब मुझे भी न रखे!’

नरसप्पा ने चौंककर पूछा, ‘तुम्हें काम-काज के लिए नहीं रखेगी, तो कौन करेगा?’

अलगप्पा ने कानों पर हाथ रखकर कहा, ‘छिः छिः, भैया! वह बी. ए. पास है। अलगप्पा तो अंग्रेजी का एक फूटा अक्षर भी नहीं जानता। वह नए जमाने की लड़की है, उसे क्या हमलोग पसंद आएंगे? इसीलिए तो सोचता हूं भैया कि शादी का रुपया तो दूर, हमें पेट के लाले पड़ने लगेंगे।’

नरसप्पा ने अलगप्पा को घूरकर देखा, और कहा, ‘यह नहीं हो सकता, यह कभी नहीं हो सकता! पढ़-लिख गई है, तो क्या हमारी ही छाती पर मूंग दलेगी?’

अलगप्पा ने हाथ हिलाए, मानो यह बात तो यों ही कट गई। फिर उसने कहा, ‘अब हम किसके अपने हैं, भैया? अपना करके मानने वाली तो चली गई। अब वे बातें कहां रहीं?’

नरसप्पा बोला, ‘नहीं अलगप्प, मेरा कहना वह नहीं टालेगी, मैं तुम्हें रुपया दिलवा दूंगा।’

‘दिलवा दूंगा’, कहकर अलगप्पा जोर से हंसा। उसके व्यंग्य को देखकर नरसप्पा का सोया हुआ अभिमान प्रतिशोध बनकर जाग उठा। उसने उसका हाथ पकड़ लिया। अलगप्पा कह रहा था, ‘भैया! तुम अभी जवान हो, तुमने दुनिया नहीं देखी। क्रिया-कर्म के अवसर पर तुमने नहीं देखा, तंगम् ने क्या उसी श्रद्धा से काम लिया, जो हमारी जाति की स्त्रियों में होती है? हर बात में मुझसे सवाल-जबाव करती थी कि इतना खर्च क्यों हुआ! तुम्हीं बताओ, क्या मैं चोर था? भैया, स्त्रियों को अधिकार मिलना ही पाप का मूल है। मेरी स्त्री को ही देखो! क्या छोड़ा है घर में?’

नरसप्पा ने हाथ छोड़ दिया और कमरे में इधर-उधर टहलने लगा। उसकी गति में एक प्रश्न था, उसके अंगचालन में एक आतुरता थी। उसने एक बार बढ़कर अलगप्पा के कंधों को पकड़कर कहा, ‘तुम समझते हो कि वह मेरा कहना नहीं मानेगी?’

अलगप्पा जोर से हंस दिया। फिर उसने कहा, ‘जाने दो, नरसप्पा, जाने दो! मैं तो तुमसे कह ही चुका हूं। लेकिन यदि तुम्हें विश्वास न हो तो जाओ, पूछ लो! वह तुम्हें भी अपने घर से चले जाने को कहेगी!’

नरसप्पा पीछे हट गया, जैसे किसी ने कसकर एक चांटा जड़ दिया हो। अपमान से उसका मुंह स्याह हो गया। वह चिल्ला उठा, ‘वह यह साहस नहीं कर सकती, अय्यर! वह यह साहस नहीं कर सकती! मुझे उसी की बुआ ने पाला है! और अंतिम समय में अपना समझकर बुलाया था। तुम समझते हो, तंगम् मुझे निकाल देगी?’

‘निस्संदेह! मेरे साथ ही वह तुम्हें भी निकाल देगी!’ अलगप्पा ने दृढ़ता से कहा, ‘यों न जाओगे, तो धक्के मारकर निकाल देगी। निकाल देगी क्यों उसकी जमींदारी है। वह अंग्रेजी पढ़ी-लिखी है। उसको स्वतंत्र जीवन चाहिए। हमारे कायदे-कानून उसे पसंद नहीं। हमारे रहते अन्याय चलेगा कैसे? इसी से वह हमें अलग कर देगी कि न रहेगा बांस, न बजेगी बांसुरी!’

नरसप्पा उसकी बात सुनकर एकदम पागल-सा घूम गया। मुट्ठी बांधकर पल भर कुछ सोचता रहा। फिर एकाएक मुड़कर बोला, ‘अय्यर, वह तुम्हें निकाल देगी, तो क्या तुम भूखे मर जाओगे?’

‘और नहीं क्या करूंगा?’ अलगप्पा ने रुआंसा हो कहा, ‘मैं अब बूढ़ा हो गया हूं। तुम्हारी तरह जवान होता तो कुछ कर भी लेता; किंतु अब तो शक्ति ही नहीं रही! फिर तुम्हीं बताओ, क्या करूंगा?’

नरसप्पा ने उसका हाथ पकड़कर निश्चय से कहा, ‘डरते हो, अय्यर? मेरे रहते डरते हो? मैं तुम्हारी पुत्री से विवाह करके तुम्हारे बोझ को हल्का कर दूंगा और फिर तुम स्वतंत्र हो जाओगे!’

अलगप्पा ने गदगद होकर नरसप्पा के पैर पकड़ लिए, और उन पर अपना सिर भी टेक दिया।

‘हां-हां! यह क्या कहते हो, अय्यर?’ कहकर नरसप्पा ने उसे बड़ी कठिनाई से उठाया। अलगप्पा कह रहा था, ‘परमात्मा के आंख नहीं हैं! अत्तै के स्थान पर तुम्हें न रखकर उस बदतमीज लड़की को रखकर उसने कितना बड़ा आश्चर्य किया है, यह तो हमारा ही हृदय जान सकता है।’

नरसप्पा सोच में पड़ गया।

कमरे का सन्नाटा अपने आप ही में घुट रहा था। तंगवल्ली उदास सी लेटी थी। उसके दिमाग में कितनी ही बातें सागर की लहरों की तरह उठ-उठकर किसी अनंत तृष्णा से तट की ओर भाग रही थीं, कुछ पकड़ लेने, किंतु लहरें क्या तट को आलिंगन में बांध पाती हैं?

तंगम् का मन उचाट हो गया। आज बुआ होतीं, तो क्या उसे अकेलापन इतना खलता? नरसप्पा, जिससे उसका सब कुछ वह बांध गई हैं, उससे इतना उदासीन रहता?

इसी समय उसे किसी की पगध्वनि सुनाई पड़ी। थोड़ी देर बाद वह पदचाप रुक गई। तंगवल्ली उन्मादिनी सी प्रतीक्षा करती रही, किंतु कोई भीतर नहीं आया। वह कुछ देर चुपचाप पड़ी रही, फिर उठी। बाहर झांक कर देखा, नरसप्पा आकर चटाई पर लेट गया था। उसका मुख दीवार की ओर था। न जाने क्यों, हृदय में अपने आप कुछ कचोट उठी।

लौटने का पांव उठाया, किंतु हाथ की अभागिन चूड़ियां बज उठी। नरसप्पा ने मुड़कर देखा और बोल उठा, ‘तंगम्!’

तंगम् को लगा, जैसे आज नरसप्पा की दृष्टि में वह हीन थी। मन ही मन एक विद्वेष की आग सी दौड़ गई, फिर भी ऊपर से एक मुस्कराहट दौड़ गई, और गालों में गड्ढ़े पड़ गए।

नरसप्पा ने कुहनियां टेक कर हथेलियों पर अपने मुंह को टिका दिया, फिर कहा, ‘तंगवल्ली, मैं कल सदा के लिए यहां से चला जाऊंगा।’

कहना चाह कर भी तंगम् कुछ नहीं कर सकी। केवल निगाह भरकर देखती रही। सचमुच नरसप्पा सुंदर था, ऐसा सुंदर कि बिल्कुल उत्तरी लगता था। बी. ए. पास करके जो स्त्री के हृदय में संकुचित गर्व होता है, वही तंगम् को भीतर ही भीतर कुरेद उठा। इतने दिन से वह यहीं था, तंगम् ने कभी भी उसकी ओर नहीं देखा। आज जब वह जाने को कह रहा है, तब वह एकदम इतनी विह्वल क्यों हो गई?

नरसप्पा सन्नाटे से ऊब गया। उसने समझा कि तंगम् को कोई आपत्ति नहीं है। उसने फिर कहा, ‘कोई काम हो, तो मुझे बता दो। तुम्हारी बुआ बहुत अच्छी थीं। वह स्त्री नहीं देवी थीं। उन्होंने जीवन भर अपने लिए कुछ नहीं किया। तुम्हारे ही लिए वह सदा विकल रहीं। तुम उन्हें भूल न जाना!’

नरसप्पा तंगम् के नयन देखकर सहम गया। वह निश्चय नहीं कर सका कि वह भाव स्नेह का सुख था या घृणा का आत्म-संतोष। किंतु एकाएक वह हंस उठा। वह विजय की भावना की एक स्पष्ट गूंज थी।

तंगम् घृणा से अपने आप सिहर उठी। उसे याद आया, जब बुआ बीमार पड़ी थीं, उनका शरीर काला पड़ गया था, उस समय कोई आदमी ऐसा न था, जो वैद्य को बुला लाता। उस समय वह अकेली थी। रात को डरावनी अंधियारी में, जब बुआ का गला भर्रा उठता था, और वह भयानक रूप से कराहने लगती थीं, तब कहां था यह बुआ का संबंधी, जो अब उसका दूर का मामा बनने का अधिकार जता रहा है? आत्म-सम्मान का आघात जब मर्म पर पड़ता है, तो स्त्री में युगों का सोया हुआ गुलाम जाग उठता है।

उसने तीव्र स्वर में कहा, ‘बहुत कहा, मामा! कह चुके तुम, सुन चुकी मैं! किंतु जिसने तुम्हें रिश्ता न होने पर भी खिला-पिला कर बड़ा कर दिया, उसे तुमने बड़े होकर क्या दे दिया, जो मुझे संदेह से देख रहे हो?’

‘इसी की तो हविस रह गई है दिल में, तंगम्! इसी का तो पश्चाताप बचा रह गया है, जो हृदय को भीतर ही भीतर डस रहा है।’

तंगम् ने फिर प्रतिवाद किया, ‘गिरे दूध पर रोने से क्या होता है? जब समय था, तब तो तुम आए नहीं। अब वह मर गई, तो सब सगे बनने लगे हैं।’

‘पढ़ा कर उन्होंने तुम्हारा दिमाग खराब कर दिया, तंगवल्ली! किसने नहीं मना किया बुआ को? सबने कहा कि मत पढ़ाओ, मत पढ़ाओ। मगर बेटी को बिना बी. ए. पास कराए उन्हें सब्र कहां था? तुम्हें क्या अब किसी की बात सुहाएगी? अपना-अपना भाग्य है। आन्डालम्मा के घर में क्या न था? मगर आज कुछ हैं?’

तंगम् तड़प उठी। आन्डालम्मा से उसकी तुलना! वह क्रोध से चिल्ला उठी, ‘बुआ का नमक खाकर ऐसी बातें कहते तुम्हें शर्म नहीं आती?’

‘ओहो!’ कह कर नरसप्पा तनिक जोर से और किंचित् व्यंग्य से हंस उठा, ‘बड़ा दर्द हो रहा है अब? ऐसा ही था, तो बुआ के साथ ही क्यों नहीं चली गईं? अब तो छाती फट रही है, मैं क्या उसका मतलब नहीं जानता? इस जमींदारी के पीछे जो ऐंठ है, वह व्यर्थ है, तंगवल्ली। तुम कानून नहीं जानती शायद? कुटुम्ब में पुरुष के होते स्त्री को कुछ नहीं मिलता। जानती हो? बी. ए. पास करने से ही सब कुछ नहीं आ जाता। पढ़ी-लिखी सैकड़ों लड़कियां मैंने देखी हैं, जिन्हें न आचार आता है, न व्यवहार। फिर इसमें ऐंठ किस बात की? शहर में रहती हो, इसी से इतनी जीभ चलती है। किसी गांव में होती, तो जाति से भी निकाल दी गई होती! गांवों में लड़कियां घर संभालती हैं। मगर बुआ ममता के जाल में असलियत देखना भूल गईं। पर अब तो वह सब मैं नहीं होने दूंगा। तुम कहोगी कि तुम्हें किसी की चिंता नहीं, ‘क्योंकि तुम पढ़ी-लिखी हो, कोई नौकरी कर सकती हो, मास्टरनी बन सकती हो, किंतु संसार जानता है कि नौकरी-पेशा औरतों का चाल-चलन ठीक नहीं रह सकता! मैं देखूंगा कि कैसे दूध की धुली हुई रहती हो!’

तंगम् कुछ समझ न सकी। विक्षोभ के कुहरे में अव्यक्त स्नेह छिप गया। क्या कह रहा है यह व्यक्ति? कल तक अनजान था, आज अचानक कैसे एकदम मालिक बन गया? और अपने ही घर में तंगम् एकाएक पराई हो गई? केवल इसलिए कि वह स्त्री है! उसने विक्षोभ की आतुरता से नरसप्पा को देखा। वह निर्निमेष उसकी ओर घूर रहा था। तंगम् लकड़ी की तरह निर्जीव हो गई। समाज कानून की आरी लेकर उसे बीच से चीरता नजर आया। 

उसने अपना सिर एक निश्चय से हिलाया, और गंभीरता से बोली, ‘नरसप्पा, इस घर में तुम्हारा कोई अधिकार नहीं! समझे? इससे पहले कि मैं तुमसे निकल जाने को कहूं, यदि शर्मदार हो, तो अपने आप चले जाओ!’

नरसप्पा उठ खड़ा हुआ। उसने अपने अंगोछे को फटकार कर कंधे पर रख लिया, और दृढ़ता से बोला, ‘तंगवल्ली, मुझसे कहती हो कि घर से निकल जाओ। लेकिन तुम यह नहीं जानती कि घर का उत्तराधिकारी अपने घर से निकल कर नहीं जाता! जो उसकी करुणा पर पड़े रहते हैं, उन्हें ही जाना पड़ता है!’

तंगवल्ली की आंखों के सामने एक बार गहरा अंधेरा कांप उठा। फिर अचानक ही वह हंस उठी। उसने कहा, ‘तो यह घर तुम्हारा है? बुआ के घर के टुकड़े पर तुम पले हो कि मैं?’

नरसप्पा ने अविचलित स्वर में उत्तर दिया, ‘दोनों! किंतु तुम स्त्री हो, मैं पुरूष। मेरा अधिकार पहला है। तुम्हारा मैं दूर का मामा हूं, किंतु बुआ का मैं भानजा हूं।’

तंगवल्ली उठाकर हंस पड़ी। उसने उसी उन्माद में कहा, ‘नरसप्पा को नशा नहीं करना था! और अगर शराब ही पीनी थीं, तो पीकर भानजी के सामने नहीं आना था! समझे? तुम अपने को उनका भानजा कहते हो, लेकिन बुआ के भी कोई बहिन थी, ऐसा तो कोई नहीं जानता।’

नरसप्पा पीछे हट गया। उसने घूरकर कहा, ‘बेटी रानी की यह बात अजीब नहीं! उसकी मां ही तो तंजाऊर की थीं। तंजाऊर के लोगों को कौन नहीं जानता? लेकिन नरसप्पा ने घास खोदकर इतनी उमर नहीं गंवाई है! समझी?’

तंगम् क्षुब्ध हो उठी। कितना लोभी है यह युवक और वह अपने आप पर क्षण भर के लिए लज्जित हो गई। इसी का बाह्य रूप देखकर वह इतनी विह्वल हो गई थी, इसके प्रति उसके हृदय में सौहार्द जाग उठा था। एक पल के लिए उसने सोचा था, वे दोनों सदा के लिए बंध जाते।...किंतु आज? यह नहीं हो सकता, क्योंकि सब कुछ होने पर भी आन्डालम्मा की बेटी का मामा मौजूद है। अब समझ में आया कि भीतर ही भीतर कैसी यंत्रणा भरी कुचक्र की छाया डोल रही थी। ये लोग आज से नहीं बहुत पहले से भीतर ही भीतर षड्यंत्र रच रहे थे। और आज सब ओर से किलाबंदी करके वे उसे ही निकालना चाहते हैं। यह कभी नहीं होगा। इसी से नरसप्पा अब सदा के लिए यहां आना चाहता है। पापी! अब तंगम् कहां रहेगी?

भविष्य का अंधकार उसकी आंखों के सामने गाढ़ा होकर छा गया। एक-एक कर समस्त छलना उसके सामने स्पष्ट हो गईं। यह जो सुंदर दिखता है, वास्तव में भीतर से विषधर से भी अधिक भयानक है। अवरुद्ध क्रोध के कारण तंगम् की आंखों में आंसू छलक आए, जैसे किसी ने उसके अभिमान को मुट्ठी में भकरकर मसल दिया हो।

नरसप्पा इस परिवर्तन को देखकर बोला, ‘मेरे टुकड़े पर पड़ी रहो, तो किसी गरीब से ब्याह कर दूंगा! नहीं तो किसी स्कूल में जाकर इज्जत बेचो! मैं बुआ का उत्तराधिकारी हूं। समझी? यह देखो।’ कहकर नरसप्पा ने जनेऊ में बंधी चाबी से संदूक खोलकर एक कागज निकाला, और उसे खोलकर तंगम् की ओर उठा दिया। फिर कहा, ‘देखा, यह क्या है? यह मृत्युशैया पर पड़े-पड़े मेरी बुआ ने मुझे लिखवाया था। मालूम देता है, यह तुम्हारा ही लिखा हुआ है!’

तंगम् ने देखा। एक जोर का चक्कर आया। सिर पकड़ कर वह वहीं बैठ गई।

कमरे में नरसप्पा का वीभत्स अट्टहास दीवारों से टकरा कर गूंजने लगा। तंगम् अब सचमुच ही नरसप्पा की दया की भिखारिन थी। वह अट्टहासस्त्री के अधिकारों पर वज्राघात के कठोरवाद की भांति तड़प-तड़प कर फैल रहा था। उस पैशाचिक विजय की कलुषित छाया में नरसप्पा ने देखा, तंगवल्ली मूर्छित पड़ी थी। एक बार उसने गर्व से उसकी ओर देखा और कागज मोड़कर जेब में रख लिया। एक विषाक्त मुस्कराहट उसके होंठों पर कांप उठी। 
- 1947 से पूर्व
[ श्रेणी : कहानी। रांगेय राघव ]