'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

तबेले का धुंधलका / रांगेय राघव

रांगेय राघव 
जब हमको कहीं भी मकान नहीं मिला, तब सब लाचार होकर एक दूसरे का मुंह देखने लगे।

‘गए थे?’ मेरी स्त्री पूछती।

‘गया था। सब तरह की कोशिश की, लेकिन कोई सुनता ही नहीं। ये लोग अपने को हिंदू कहते हैं?’ मैंने गुस्से से अपने होंठ काट लिए।

‘क्या किया जाए?’ बहिन पूछती।

‘जहर खा ले’, मैंने तड़पकर उत्तर दिया।

उसके बाद स्टेशन के बाहर जो पेड़ों के नीचे का साया था, हम उसी में अपने चिथड़ों में जाकर सो रहते। सोते तो क्या, हां पड़े रहते।

कितने दिन हुए। उस सबको मैं भूल जाना चाहता हूं। जिसके पास जाता हूं, वही टाल बताता है। जिसके पास ताकत या पैसा है, उसके पास दिल नहीं है; जिनके पास दिल है, वे हमारी तरह शरणार्थी नहीं होते हुए भी कुछ ताकत नहीं रखते।

घर की परेशानी बढ़ती चली गई। आखिर कब तक इस तरह पेड़ों के नीचे काट सकते हैं। हमसे तो ये कंजर अच्छे हैं, जिनके पास तंबू तो है। हमारे पास तो वह भी नहीं। बच्चा सूखकर कांटा हो गया है। उसकी शायद तिल्ली बढ़ आई है। मां देखती है तो रोती है। कुछ ईंटें बटोकर कर एक चूल्हा बना लिया है। उसी पर बच्चे की मां खाना बना लेती है। मैं मेहनत मजदूरी करता हूं। जो मिलता है उसी से काम चल जाता है।

जहां मैं थक कर बैठता हूं, वहां बहुत से मुझ जैसे ही गंदे मजदूर बैठते हैं। शहर में सनसनी है। हिंदू मुसलिम दंगे का खतरा है। मुझसे रोज हमीद पूछता है, ‘कहां जाएं।’

‘पाकिस्तान जाओ, पाकिस्तान।’

‘वहां क्या मिलेगा?’ उसकी आवाज कांपती है।

‘जो हमें यहां मिल रहा है।’

हमीद चुप होकर चला गया। मैं सोचता हूं, क्या यह मैंने ठीक जवाब दिया है। पर मैं ज्यादा नहीं सोच पाता।

घर...।

सिर पर छत...।

एक आसरा...।

बच्चा रो रहा है। कमबख्त को कुछ समझ नहीं। मां उसे चुपचुपाती है, चुप कराती है। आखिर वह सोने लगता है।

मैंने कहा, ‘पगड़ी मांगते हैं। जैसे सबके सिर नंगे हो गए हैं।’

‘कितनी?’

‘पांच सौ, तीन सौ...।’

बहिन चुप, अब के स्त्री, ‘वैसे कोई ज्यादा किराए पर दे दे तो...।’

‘ऐसा रहम दिल कोई नहीं।’

‘पेड़ के नीचे ही रहेंगे’, बहिन कह उठी।

स्त्री ने विरोध किया, ‘जाड़ों में?’

बच्चा फिर रो उठता है। मैं खीझ उठता हूं। क्यों? यह मेरी मौत देखकर मानेगा।

बहिन उसे चुप करा लेता है। फिर बातें होती हैं।

‘अगर मालूम होता तो क्यों आते?’

‘अब तो लौट नहीं सकते।’ मेरे स्वर की ऊब से वे कांप उठती हैं।

बहिन कहती है, ‘आदमी आदमी नहीं रहे। किसी शरणार्थी से ही क्यों नहीं कहते?’

‘वे अपने बोझ से मर रहे हैं।’

‘नई इमारतें बन रही हैं?’

‘हूं।’

फिर रात की सनसनाहट। स्त्री फैलकर लेटकर बच्चे को दूध पिलाती है। सोचते-सोचते अब मेरा सिर दुखने लगा है।

स्त्री, बहिन, बच्चा सो गए हैं। आसमान में तारे बिखर गए हैं, ‘असंख्य। शहर की बत्तियां बुझ गईं। केवल कहीं-कहीं कुत्ते भौंक उठते हैं। मैं झपकने लगा हूं।’

जब मैं करवट बदलकर उठा, तब चूल्हे में से धुआं उठ रहा था। मैंने देखा भोर हो गई। रेल की पटरियों के पास पड़ा पिसा-सा कोयला और उसमें खड़े काले-काले मजदूर दिखाई देने लगे। वे कुदालें लिए कुछ खोद रहे थे।

मैं उठकर पुल के नीचे जा बैठा। यहां सदैव इक्के-तांगों का आना-जाना लगा रहता। पुल के ऊपर से भयानक चिंघार करती हुई रेल गुजरती थी। पुल पक्की ईंटों का बना था। दोनों दीवारों से सट कर बहुत से फल वाले, और छोटे-मोटे खोम्चे वाले बैठते थे। उनकी ‘हाय-हाय’ से ऐसा लगता, जैसे वह कोई रेल का स्टेशन हो। उन्हीं दीवारों के पास बाहर जरा-सी जमीन खुली पड़ी थी। फकीरों से वह जगह घिरी रहती। फटे-हाल गंदे भिखारियों की भीड़ को देखकर मेरा भी मन दहल जाता था। कितने गरीब, कितने नंगे और हारे हुए लोग थे। सच इनके मुकाबले हम कितने अच्छे हैं! वे हाथ उठाकर पड़े रहते। या फिर इधर-उधर चलते राहगीरों के पीछे-पीछे भागा करते। उन्हीं में से एक कंजरिया थी जो रात को वहीं सो जाती। एक बाबा उसे अपने पास से खिलाया करता था। सब उसे छेड़ते थे। पर कोई बात नहीं थी। मैं भी उससे नफरत करता था, क्योंकि इधर कुछ दिन से बाबा किसी भयानक बीमारी के कारण चिल्लाया करता था। पर उस पर अब सबने ध्यान देना छोड़ दिया था।

बातों ही बातों में जब मैं अपना दुखड़ा ले बैठा तो एक मक्खन-टिकिया के पेड़े बेचने वाले ने कहा, ‘क्यों, तुम्हारे पास पैसा नहीं? तुम कांग्रेस में भरती क्यों नहीं हो जाते?’

‘हो जाऊंगा। फिर मकान मिल जाएगा?’

मुझे उत्तर नहीं मिला। और फिर मुझे याद आया। शरणार्थियों की कमेटी में मंत्री हैं। कौन हैं? खैर, मैं उन जूतों की बड़ी दुकान वाले कांग्रेस नेता से मिला था। उन्होंने कहा था, ‘तुम शरणार्थी नहीं पुरुषार्थी हो।’

मैं पुरुषार्थी हूं! जिसके सिर पर छत नहीं पेट में दाना नहीं।

‘अमां तुम!’ एक आवाज सुनाई दी, ‘समझते हो यहां कुछ तसल्ली मिलेगी? नहीं, भाई नहीं, काम करो, खाओ। मुसीबत किस पर नहीं पड़ी?’

‘तुम्हारे भी बीस मकान थे?’ किसी ने व्यंग्य किया, ‘सभी पंजाबी शरणार्थी वहां लखपति थे। गरीब तो मिलता ही नहीं।’

ठीक कहा भाई, ठीक कहा। ‘हम तो वहां भी गरीब थे। यहां बैठे जो चाहे कह लो। क्या है? तुम पर भी जब मुसीबत आती न तब मालूम पड़ती।’ ठेले वाला पंजाबी हंसा। उसके स्वर में तिक्त क्रोध था।

‘तो फिर भाई’, नारंगीवला बोला, ‘वहां जैसे थे, यहां भी रहो। हमें कौन आराम है? महंगाई ने पीस रखा है। हमारा ही दिल जानता है। बच्चे मांगते हैं हम कुछ नहीं दे पाते।’

उसने निराशा से सिर हिलाया। फिर कहा, ‘गरीब तो भाई गरीब ही रहेगा।’

पंजाबी ठेला एक ओर ठेलकर हंसा। उसने साबुन एक हाथ से जमा करते कहा, ‘तो फिर मरेंगे।’

मैं सुनता रहा।

‘अब मेहनत-मजदूरी के दिन नहीं रहे’ किसी ने हंसकर कहा, ‘ब्लैक का जमाना है।’

‘सेठों की चढ़ बनी है। आजाद हो गए हैं।’

मैं सुन रहा हूं। स्वरों में आक्रोश है।

‘सालों की चरबी कैसी बढ़ गई है। पुलिस भी उनके ही...’

‘रिश्वत का जोर है भाई!’

‘आजादी है भाई, आजादी!’ पंजाबी ने अंतिम चोट की और अब ठेला आगे बढ़ गया था। पंजाबी का लंबा शरीर भीड़ में मिल गया। अब खोम्चे वालों की आवाजें गूंज रही हैं सब तरफ। रोटी बन गई, मुझे भूख लग गई है।

मैं चुपचाप लौटकर आ गया।

खाना खाने लगा। बहिन ने कहा, ‘भइया अब यों कितने दिन चलेगा?’

‘मैं ही तो मकान नहीं ढ़ूंढ़ता।’

‘तुम तो बस चिढ़ जाते हो।’

‘ढ़ोल बजाकर मकान मिल जाएगा?’

मैंने निश्चय कर लिया कल से मैं भी एक ठेला लगाऊंगा।

खाना खाकर मैं फिर चल पड़ा। स्त्री ने टोका, ‘अब तुम फिर जा रहे हो?’

‘कुछ काम देखूंगा।’

‘आज दिन ठीक नहीं है, दंगा हो सकता है।’ उसने डरते हुए कहा।

मैं क्षण भर चुप रहा। फिर कहा, ‘अब और क्या होना रह गया है?’



शहर तिरंगे से लद गया है। चारों ओर सुंदर-सुंदर झंडे लटक रहे हैं। बिना भेद-भाव के सब जगह छा गए हैं। पंद्रह अगस्त का दिन आ गया है। सब लोग भाग रहे हैं। एक हिंदुओं की भीड़ टूटकर मुसलमानों पर हमला कर रही है। पुलिस के सिपाही खड़े हैं। मैं चाहता हूं कि इन लुटेरों में मैं भी मिल जाऊंगा, पर अगर मारा गया तो? तो बीवी, बच्चा...बहिन? ठीक है पहले लड़ाई हो लेने दो। फिर लूट में जो मिलेगा उसी को लेकर भाग जाऊंगा।

जुलूस निकल रहा है। कितने सफेद टोपी वाले जा रहे हैं। अधिकतर मोटे-मोटे लाला हैं, दुकानदार। इनकी गर्दनें गर्व से कैसी टेढ़ी हो गई हैं। मुझे देखकर धिन हो रही है। मुझे अपने गंदे कपड़ों पर शर्म आ रही है। शहर में लूट हो रही है। मैं भी भाग चला। लेकिन हठात् ठिठक गया। गोली चलने की आवाज आ रही थी। भयानक ठांय! ठ्ठांय! एक गूंज! मैं डरकर लौट चला। कहीं मुझे भी गोली न मार दी जाए। गोली चल रही है। क्यों? आज आजादी का दिन है न?

मुसलमान परेशान हैं। कहां जाएं? क्या करें?

मैं जब मुसलमानों के मुहल्ले के चौराहे पर पहुंचा, सारी सड़क सुनसान पड़ी थी। सड़क पर फौजी ही खड़े थे। उनके भारी बूटों की आवाज आ रही थी, और कुछ नहीं। बंदूकों की नलियां चमक रही थीं।

किले के बाहर जो बहुत से तंबू पड़े थे, उनमें एक सरकस था। उस सरकस में एक मुसलमान औरत को वह भीड़ पकड़ ले गई है, क्योंकि वह मुसलमान थी। वह गजब की औरत थी। शेर की पीठ पर पांव रखकर खड़ी हो जाती थी और हाथियों पर नाचती थी। लोग कहते हैं उन्होंने उसे बेइज्जत करके मार डाला। मुझे अच्छा लगता है, पर मैं इस ख्याल से कांपता क्यों हूं? मुझे किस बात का डर लग रहा है?

जब मैं हांफता हुआ पेड़ के नीचे पहुंचा, पत्नी सन्नाटे में डरी हुई बैठी थी। बहिन बच्चे को लिए लेटी थी। दूर से देखा। सरकस को हिंदू मैंनेजर बड़ी कोशिश से भी नहीं बचा सका। वहां एक लुटी हुई दुनिया थी। चारों तरफ हवा सनसना रही थी।

बहिन कह उठी, ‘कहां गए थे?’

‘लूट में गया था।’

‘क्या लाए?’

‘वहां गोली चल रही थी।’

स्त्री के कान खड़े हो गए।

लेकिन मैं कांप रहा हूं। वह तीखी आवाज में कह रही है, ‘तुम गुंडे हो!’

‘मैं?’ मैंने अचकचा कर पूछा।

‘हां। लूट कौन करता है?’ वह मेरे निकट आ गई। उसने मुझे पकड़ कर कहा, ‘जानते हो, तुम्हारी बहिन को आज हिंदू उठा ले जाते।’

‘क्यों?’ मेरी आंखें फटी रह गई।

‘वे इसे मुसलमान समझ बैठे पाजामा पहने थी। फिर मैं चिल्लाने लगी। तब एक ने कहा, छोड़ो, यह तो सिंधी शरणार्थी है।’

तभी एक पुलिस का सिपाही आ खड़ा हुआ। वह बड़ा मजबूत था। मैं उसे देखकर छोटा हो गया। उसको देखकर एक और आदमी समीप आ गया। उसने कहा, ‘क्या बात है, जमादार?’

‘देखो सालों को’, सिपाही ने कहा, ‘सब जगह कर्फ्यू लगा है, और जनाब को देखो, मजे से औरतें लिए बैठे हैं।’ वह हंसा।

मैंने चिल्लाकर कहा, ‘घर नहीं मिलता।’

‘बेचारे शरणार्थी!’ दूसरे उस चर्बी बढ़े आदमी ने कहा, ‘गरीब मालूम देते हैं।’

‘अजी, सो न कहो। सबसे पास माल हैं, ले के आए हैं।’

‘यों न कहो जमादार! जो मिला सो ही ले भागे हैं।’ फिर वह आदमी मेरे परिवार पर निगाह डालकर कह उठा, ‘बस, ये ही लोग हैं तुम्हारे साथ और कोई नहीं?’

‘नहीं’ मेरी स्त्री ने कहा, ‘बाबू और कोई नहीं। भगवान तुम्हें सब कुछ देगा, हमारी नाव किनारे लगा दो।’

‘अरे तो रोती क्यों हो। सब होगा, सब होगा। यहां तो अपना राज है, फिर डर किसका?’

उस आदमी की बात में हमदर्दी थी, वह कह रहा था, ‘अब तक इतने शरणार्थी आए हैं। उनका कुछ न कुछ इंतजाम हो गया कि नहीं? कोई सदा आफत में थोड़े ही रहता है। सबका एक बखत होता है।’ वह बहिन को घूरने लगा। वह सहम गई। वह घूरता रहा। उसकी आंखों में जहर था। मुझे ताज्जुब हुआ। कैसा आदमी है जो जरा भी नहीं सकुचाता। मैंने देखा, बहिन सहम गई थी। वह आदमी कहने लगा, ‘तो जमादार बात क्या है?’

‘बात यही है कि यहां तो कर्फ्यू लग गया है। कोई रात को दो टुकड़े कर गया तो? फिर बेटा को सपने दिखने लगेंगे। यहां जम गया है, जैसे यह कोई मकान हो।’ आदमी हंस पड़ा और वह सिपाही कह रहा था, ‘उठो यहां से। चलो उठो भागो।’

‘तो कहां जाएं?’ स्त्री ने चिल्लाकर कहा।

सिपाही ने फोश गाली दी। मुझे लगा मेरी नसें फट जाएंगी।

‘ऐ ऐ’, मैंने हाथ उठाकर कहा, ‘कैसे बोलते हो?’

सिपाही ने कहा, ‘साले, चमड़ी उधेड़ दूंगा अभी। ले जा इन कुतियों को। आजकल कुत्ते बहुत हो गए हैं...।’

वह हंसा। उस आदमी ने कहा, ‘चलो मेरे साथ।’

हम उठकर उस आदमी के पीछे-पीछे चलने लगे। मेरा मन कह रहा था कि उस सिपाही के सिर पर कस के एक पत्थर मार दूं और भाग जाऊं, फिर स्त्री, बहिन, बच्चा...?

और वह आदमी कह रहा था, ‘सिपाही सब ऐसे ही होते हैं। बात यह है कि सरकार ने इन्हें छूट दे दी है। देनी पड़ती है, भाई, वर्ना लोग क्या मानेंगे? तुम बुरा न मानना...।’

मैं चुपचाप चलता रहा। किसी ने भी कुछ नहीं कहा। फिर हम सड़क की गलियों में चलने लगे।

किसी ने कहा, ‘रागो भैये, रंग है।’

हमारे साथ का आदमी दया से कहने लगा, ‘बेचारे सताए हुए हैं...।’

जिस जगह उसने हमें खड़ा किया, वह एक तंग-सी जगह थी। एक तरफ मकानों की ऊंची-ऊंची दीवारें थीं। सब पर तिरंगे झंडे लटके हुए थे। फिर भी मुझे और कोई चमक दिखाई नहीं दी, जो चेहरे पर होनी चाहिए थी।

‘यह तबेला है?’ मैंने पूछा, ‘यह?’

‘हां, हां यही मेरे भाई,’ उस आदमी ने कहा, ‘वह देखो, सड़क के पार नल है। वहां से पानी मिल जाएगा।’ फिर उसने मेरी बहिन की ओर देखकर कहा, ‘तुम चाहो तो हम अपने भीतर जो नल है न दालान में, वहां से इंतजाम करवा देंगे। उधर मैं ही रहता हूं। गोदाम है न? हां। वहां से पानी भर लेना, वहां भीड़ नहीं होगी। धक्कम-धुक्की भी नहीं होगी...।’

स्त्री हर्ष से चीख उठी। उसकी आंखें चमक रही थीं। स्त्री घर मिलने से कितनी खुश होती है! यह न होती तो काहे को मुझे इतनी परेशानी होती। मेरा क्या, चाहे जहां रह लेता। इस औरत ने मुझे कितना कमजोर कर दिया है। कोई सहारा नहीं। कोई मददगार नहीं।

स्त्री ने उल्लास से कहा, ‘भइया भगवान तुम्हें देगा। तुमने तो इतनी हमें मदद दी है, इसे क्या भुलाया जा सकता है?’

‘सेठ के यहां नौकरी करोगे?’ उसने मुझसे पूछा।

मैंने आश्चर्य से आंखें फाड़कर देखा। फिर कहा, ‘मैं ठेला लगाऊंगा।’

तब उस आदमी का स्वर बदल गया। उसने तबेले की ओर देखकर कहा, ‘कितना रुपया दोगे?’

‘रुपया? जो किराया हो?’

वह मुस्कराया, ‘सेठ को पगड़ी और हमको मेहनताना।’

‘तुम हिंदू हो?’ मैंने चौंक कर पूछा।

‘तो क्या तुम समझते हो पाकिस्तान में यह नहीं होता। वहां से भी मुसलमान भाग-भाग कर आ रहे हैं,’ उसने हंसकर कहा और वह बात भले ही मुझसे करता हो, पर घूर रहा था मेरी बहिन को-बुरी तरह, जैसे खा जाएगा। उसकी आंखें लाल हो चली थीं। बहिन मुंह फेरकर खड़ी थी। मैंने कहा, ‘इधर देखो!’

पर उसने वैसे ही कहा, ‘इतना भी एहसान नहीं मानते? सेठ को पगड़ी दोगे? पांच सौ रुपया लगेगा। समझे?’ वह कठोर हो गया, ‘पांच सौ। कल ही एक मुझसे साढ़े चार सौ कह गया था। पर उसके बहिन नहीं थी।’ फिर जैसे कुछ नहीं हुआ, वह मुड़कर बोला, ‘इसमें हर्ज ही क्या है? किसी को मालूम भी नहीं होगा।’

मैं सिर पकड़ कर बैठ गया। मेरी स्त्री और बच्चा सब आंखों में डोल गए। ऐसा तो सुना था कि जगह दे दी, फिर जोर-जबरन किसी तरह बाद में छिपा-चोरी काम निकाल लिया। पर यह जानवर मुझसे साफ-साफ कह रहा था। यह मेरी बहिन, जिसे मैं इतना साफ और पाक समझता था। आज यह मुझसे कह रहा है। इतनी हिम्मत क्यों की इसने, क्योंकि यह मेरी मजबूरी जानता है।

और जैसे-जैसे मेरा गुस्सा बढ़ रहा है, मुझे लगता है; मेरे हाथों की ताकत खोती जा रही है। सारी देह में झनझनाहट हो रही है, और लगता है हथेलियों में खून बिल्कुल नहीं रहा। मैं पथराई आंख से देख रहा हूं।

हृदय फट रहा था। मेरी बहिन! वह चुपचाप खड़ी उसे देख रही थी। उसकी आंखें फटी सी थीं-सूखी चमकदार। और वह आदमी निडर-सा उसे देख रहा था, जैसे उसे आंखों से निगल जाएगा।

स्त्री कभी उस आदमी को देखती, कभी अपनी ननद को, कभी मुझे और फिर उसकी दृष्टि तबेले पर जाकर अटक जाती। घृणा, आशंका, भय उसकी आंखों में कांप कर भाग जाते और घर पर दृष्टि पड़ते ही उसकी आंखों में एक चमक आ जाती। फिर वह बहिन को विवश दृष्टि से देखने लगी, जैसे कुछ भीख मांग रही हो। बहिन ने देखा। उसका सिर झुक गया। वह मेरी स्त्री से आंख न मिला सकी। पर रोया कोई नहीं। यह मौत नहीं थी। यहां कुछ और ही था। पर क्या वह सचमुच कुछ थी?

और मैंने कहा, ‘वह नहीं।’ अनजाने ही मेरी दृष्टि बहिन से हटकर अपनी स्त्री पर अटक गई। जैसे मैंने एक बदलाव पेश किया था। मैं समझता था कि स्त्री मेरी स्त्री है। उस पर मेरा अधिकार है। सच ही हुआ। स्त्री ने कोई विरोध नहीं किया। केवल मेरी ओर देखा, फिर बच्चे की ओर।

दुनिया खामोश हो गई थी। मन मिचलाने लगा। जैसे अब मैं सचमुच जमीन तोड़ दूंगा। क्या मैं पागल हूं?

मुझे ख्याल आ रहा है।

स्त्री ने हठात् उससे पूछा, ‘तुम अकेले आदमी हो?’

‘हां बिल्कुल।’

‘तो यहां रहेंगे। किराया बताओ।’

‘पंद्रह रुपया तो तुम क्या दोगे। जाओ साढ़े सात ही दे देना। इससे कम नहीं होगा। पैसा तो तुम्हारे पास भी होगा।’

और शरणार्थी पैसा लेकर भागे थे, लेकिन मैं तो वहां भी गरीब था, यहां भी गरीब हूं। मैं क्यों भाग आया?

यह मैं क्या देख रहा हूं। अब मेरी स्त्री के चेहरे पर वह भय नहीं है। वह सुस्थिर हो गई। मेरी बहिन उसे देखकर अब ठीक-सी लगती है। उसने आंखों से कुछ कहकर समझा देना चाहा है।

वह भी अपनी बात, असलियत और जिम्मेदारी समझती है। वह क्या तकलीफें पसंद करती हैं? कब तक चट्टान बनी रहे? या फिर मर जाए। मरना बहुत कठिन है। क्यों मरे?

मरना ही होता तो घर छोड़कर भागते? जहां बचपन से पले थे, जहां का एक-एक रास्ता याद था। यहां हम आदमी की शकल वाले जानवरों में घूमते हैं, जिनमें किसी को भी हम अपना नहीं कह सकते।

पर वह आदमी हंस रहा था। मैं चाहता हूं मैं उसका खून कर दूं। उसका गला घोंट दूं। उन आंखों को उंगली डालकर बाहर खींच लूं, जिनमें इतना बड़ा पाप जीवित जल रहा था और फिर उस जगह मिट्टी भर दूं। या सदा के लिए इस आदमी का सीना फाड़कर हृदय का रक्त पी जाऊं। नहीं, मुझे मंजूर नहीं है। मैं कभी भी नहीं रह सकूंगा। जैसे इतने दिन भटके हैं और दो दिन सही।

कल ही से मैं भी ठेला लगाऊंगा। उसी पर सोऊंगा। उसके नीचे मेरी गिरस्ती रहेगी। पर वह ठेला खड़ा कहां होगा? और कर्फ्यू के जमाने में...?

कांग्रेस के नेता से मिला था। वे बड़े-बड़े सवालों में अटके हैं। कश्मीर की लड़ाई है। मैं पूछने लगा, ‘बाबूजी यहां की महंगाई तो मारे डालती है।’

उन्होंने कहा था, ‘फिर आना।’

मैं चला आया था।

और वह आदमी खड़ा है। बहिन उससे कुछ कह रही है, धीरे-धीरे ही। मैं नहीं जानता, बहिन ने क्या कहा है। वह आदमी चला गया है। चलते वक्त वह खुश था। उसकी आंखें चमक रही थीं। फिर मैंने सुना, ‘इस तबेले के पीछे उसके सेठ उससे नाराज होंगे। यहां कभी-कभी गेहूं के बोरे छिपाए जाते थे-जब पुलिस का डर था, कंट्रोल था। अब तो डर नहीं। फिर भी उनके काम की जगह है। इसके चाहे वह हजार रुपए खड़े कर ले।’

फिर जैसे एक बात बिना कहे ही समझ ली गई। घर में बहिन का भी तो फर्ज था। बहिन कह उठी, ‘पगड़ी नहीं देनी होगी!’

‘कौन जाने?’ स्त्री ने भय से कहा कि कहीं मैं बुरा न मान जाऊं। फिर उसने धीरे से कहा, ‘आखिर को जगह मिली। तुम इस जगह को सरकार से लिखवा लो।’

स्त्री नादान है। वह क्या आसान काम है? इस सेठ के सामने।



मैं उठकर गली में आ गया। तीन आदमी बातें कर रहे हैं। मैं सुन रहा हूं। शायद पास-पड़ोस के नौकर-चाकर हैं।

‘कई आदमी मारे गए।’

‘कोई गिनती नहीं,’ स्वर भारी थी।

‘हिंदू एक नहीं मरा।’

‘लेकिन दंगा तो मुसलमानों ने शुरू किया था।’

‘वह क्या कोई रोक सकता है?’

फिर एक खामोशी। सबकी बात चुक गई।

‘शरणार्थी हो?’

‘हां।’ मैंने उत्तर दिया।

‘गेहूं का कंट्रोल होगा, भाई।’

‘सच?’ कोई स्त्री पूछती है।

‘भीतर सरक आओ, भाई वक्त नाजुक है। जाने किस वक्त क्या हो जाए।’

‘हूं! क्या हुआ?’

‘घर जाओ, अपने अपने घर। सिपाही आ जाएगा।’

तभी कोई वेग से भागा और चिल्लाता हुआ गायब हो गया, ‘भीतर भाग चलो। पुलिस आ रही है, साथ में फौज है। गोली चला देने का हुक्म हो गया। बाप रे।’

मैं सुन्न पड़ गया। आज आजादी का दिन था। कसूर किसी का था, आफत तो हमारी है। चारों ओर देखा, दरवाजे फटाफट बंद हो रहे थे। लोग भाग रहे थे। अंधेरा झुक गया था।

मैं कुछ भी नहीं सोच सका। घर की याद आ गई। आखिर मेरे भी घर था।

भारी-भारी गाड़ियां शहर में अमन फैलाने चल पड़ी हैं। उनके पहियों की हल्की घरघराहट कांप रही है। ऊपर बहुत से जवान खाकी वर्दी में चुस्त और तैयार खड़े हैं, चौकन्ने से। यह गुरखे हैं। एकदम कठोर। हाथों में बंदूकें हैं। मैं जानता हूं, यह न हमारी बोली समझते हैं, न दिल। बड़ी निर्दयता से गोरों की तरह गोली चला देते हैं। बिल्कुल दिमाग नहीं होता इनके।

घरों के भीतर से आवाजें गूंज उठीं, ‘आजाद हिंदुस्तान जिंदाबाद!’

मैं भाग चला। अंधेरा छा चला है। धुंधली छायाएं कांप उठी हैं। सड़कें सुनसान हैं। कुछ भी आवाज सुनाई नहीं देती। गर्व से तिरंगे सिर उठाए खड़े हैं। मुझे फिर एक विश्वास-सा होता है। उधर किसी मुहल्ले में बंदूकें चलने की आवाज सुनाई दे रही हैं।

सामने ही मेरा तबेला दिख रहा है।

लेकिन ज्यों ही मैं भीतर घुसने लगा, मेरा शरीर किसी से टकराया। मैं लड़खड़ा कर गिर गया। सामने वाला व्यक्ति भी गिर गया। उसके मुंह से एक हल्की-सी कराह निकली। मैंने धीरे-से उठकर देखा, हाथों का सहारा दिया। गिरने वाला व्यक्ति भी उठा। उसने कहा, ‘चोट तो नहीं लगी? अभी से कैसे आ गए?’

‘नहीं। भागा चला आ रहा था।’

यह मेरी स्त्री थी। पूछा, ‘क्यों क्या हुआ?’

‘कर्फ्यू लग गया। दरवाजा बंद कर ले!’

‘अभी नहीं ठहर जाओ। यहां पुलिस कुछ नहीं कहेगी इस वक्त। थोड़ी देर बाद बंद कर लेंगे।’

‘क्यों?’ मैं कुछ नहीं समझा, ‘भीतर अंधेरा क्यों है?’

वह कुछ सकते की सी हालत में रही। फिर उसने धीरे से कहा, ‘चुप, सेठ का आदमी आ गया है। उसके पास कर्फ्यू पास है।’

मैं समझ गया। मैं लेटा हूं, या गिर गया हूं। मेरी स्त्री कह रही है, ‘जानती हूं। तुम इसे नहीं सह सकते। पर...पर वह मुझे पसंद जो नहीं करता था...।’

मैं सुन रहा हूं। मेरा खून पानी हो गया है।

स्त्री कह रही है, ‘किसी को क्या मालूम? रहने को तो जगह मिल ही जाएगी।’ फिर जैसे उसने मुझे सांत्वना दी, ‘अब पगड़ी नहीं देनी होगी। परदेश में अपनी क्या इज्जत?’
मनोरंजन, दिसंबर 1948
[ श्रेणी : कहानी। रांगेय राघव ]