'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

कठपुतले / रांगेय राघव

रांगेय राघव

शहर के राजा कलक्टर के बंगले पर पहुंचकर उन्होंने देखा कि उस विशाल मैदान और हरियाली के बीचोबीच जो अट्टालिका खड़ी है उसी में समस्त नगर की सूइयों का केंद्र है। ये जो टिक-टिक करके घड़ी चल रही है, यहीं से उसको गति मिलती है। इस घड़ी को ऊपर से आकर कोई चाबी देता है। बहुत दिन चलकर जब यह घड़ी रुकने लगी, तब इसमें तेल डाल दिया गया है, और यह फिर उसी भांति चल पड़ी है।

उन दिनों जेल में कुछ लोग हड़ताल कर रहे थे। मामला यह था कि एक मजदूर और एक किसान को राजनीतिक बंदी नहीं समझा गया था। मजदूर के ऊपर इल्जाम था कि उसने मालिक को लूटने की कोशिश की थी। किसान पर इल्जाम था कि उसने जमींदार के खिलाफ रैयत को भड़काया था। और न्याय में ये दोनों काम जुर्म थे। यह राजनीतिक कार्य नहीं थे, लिहाजा उन्हें साधारण कैदियों की भांति रखा गया था।

जब ये चारों बंगले के द्वार पर पहुंचे, उन्होंने देखा, अनेक आदमी कुर्सियों पर बैठे इंतजार कर रहे थे। वे भी जाकर बैठ गए। वे लेखक थे। उनके पास न ओहदा था, न कोई और तमगा। वे उन आदमियों में थे जिन्हें अभी देश में ज्यादा कीमती नहीं समझा जाता।

पहले नुकीली सफेद टोपी लगानेवाले लोग बुलाए गए। उनका काम उनके देखते ही जल्दी-जल्दी समाप्त हो गया। वे प्रायः दुकानदार और व्यापारी लोग थे। उनके ऊपर से नीचे तक खद्दर के कपड़े झकाझक थे। वे लोग बिजली के गर्व से चलते थे, हंसते थे, और बोलते वक्त उनकी गर्दन कुछ और टेढ़ी हो जाती थी। आजाद सभी हो गए थे, पर पहले जैसे ही मजबूर और परेशान थे, लेकिन ये लोग अब बड़ी चमकीली मोटरों पर सर्र से निकल जाते थे।

‘श्श्...एक आवाज हुई।’

चपरासी ने आकर एक सफेद टोपी वाले के सामने सर झुकाया। वह एक मोटा आदमी था, गोरा और उसकी आंखें नीचे नहीं देखती थीं। सुभाष मात्र लेखक था। उसने देखा, चपरासी और नम्र हो गया था। उस गोरे आदमी ने कहा, ‘कलक्टर साहब हैं?’

‘जी हां’, चपरासी ने कहा। जैसे वह नए मालिक को पहचानता था। उसने दुम हिलाई और टांगों में उसे दाब कर कूं-कूं की।

‘बोल दो जाकर, हम मिनिस्टर साहब का खत लेकर आए हैं।’

‘जी हुजूर।’

चपरासी भीतर गया। तुरंत लौटकर आया और बोला, ‘चलिए हुजूर! सरकार आपका इंतजार कर रहे हैं।’

गोरा और मोटा आदमी बिना इधर-उधर देखे हुए भीतर चला गया। सुभाष उधर ही देख रहा था। तभी उसने चपरासी की आवाज सुनी, ‘ठहरिए। आपका नंबर आएगा तब आप जाएंगे या यों ही। यह कोई बाजार है?’

सुनने वाला एक मामूली आदमी था। उसने झेंपकर दांत निकाल लिए। चेहरे पर कुछ क्रोध सा था, वह आंखों की लाचारी में चाक हो चुका था। उसने इधर-उधर देखा, जैसे वह जानना चाहता था कि किसी की आंखों ने तो बेइज्जती नहीं देखी, जैसे साइकल से गिरने वाला अपनी चोट बाद में देखता है, उसकी निगाह तलाश करती है, किसी ने देखा तो नहीं?

उसके पास बैठा आदमी उठ खड़ा हुआ। उसने चपरासी से कहा, ‘सुनना जरा।’

चपरासी उसकी बात सुनने को जैसे लालायित ही था। उठकर उसके साथ चला गया। उसकी जगह अब दूसरा चपरासी बैठा ही था। कुछ ही देर में वह चपरासी उसी आदमी के साथ लौटा और कह रहा था, ‘बस जरा हुजूर को एक मिनट की फुर्सत तो मिले...’

मोटा और गोरा आदमी बाहर निकल आया। चपरासियों ने उसे सलाम किया। उसे शायद मालूम भी नहीं हुआ। अंदाज शायद हो गया कि वह जिधर से निकला है, उधर कुछ लोग झुक गए हैं।

चारों लेखक उठ खड़े हुए। उनके चेहरों पर कुछ खतरनाक-सी चीज थी। चपरासी उसे पहचानते थे, क्योंकि पहले कांग्रेस वालों के चेहरों पर यही चीज होती थी। जब वे साहब कलक्टर बहादुर से मिलने आया करते थे।

सुभाष ने कहा, ‘काफी देर हो गई।’

इसी समय चपरासी ने कहा, ‘आइए, आप लोग आइए...।’

चारों जिस कमरे में घुसे वह एक साधारण दफ्तर था। उसमें गांधी जी का एक कलेंडर टंगा था और सामने एक कुर्सी पर एक अधेड़ आयु का सावंला-सा आदमी बैठा था, जिसके चेहरे पर कोई खास भाव नहीं था। वही इस शहर का कलक्टर था। तबादलों का जो चक्र घूमता है, वह रुक कर। यह व्यक्ति उसी लपेट में आ गया था, कल यह कहीं और था, परसों कहीं और होगा। उसने दायां हाथ उठाकर अंग्रेजी में कहा, ‘बैठिए।’

चारों बैठ गए।

‘तो आपलोग राजनीतिक बंदियों के बारे में मिलने आए हैं?’ उसने झुककर कहा।

‘जी हां,’ कहानी लेखक खास्तगीर ने उत्तर दिया।

अब जो बातें हुईं, उनमें नाम देने की आवश्यकता नहीं। चारों लेखक एक हैं। उनकी राय एक है। मांग एक है। अब दो बातें करने वाले हैं। लेखक और कलक्टर।

‘तो’, कलेक्टर ने कहा, ‘मैं आपका मतलब समझा नहीं। राजनीतिक बंदी? आप किसके बारे में कह रहे हैं?’

‘एक किसान और एक मजदूर को गिरफ्तार किया है। किसान पर बगावत और मजदूर पर लूट का जुर्म लगाया गया है। उन्हें राजनीतिक बंदी नहीं माना गया। उनके साथ जेल में अच्छा बर्ताव नहीं किया जाता। उन्हें तकलीफ दी जा रही है। एक मुस्लिम संपादक जो हिंदू-मुस्लिम एकता का पुराना प्रचारक है, उसे आपने मुस्लिम लीगी कहकर गिरफ्तार कर लिया है। किसी पर भी मुकदमे नहीं चलाए हैं। उनके घरों की हालत बहुत खराब हो गई है। कोई कमाने वाला नहीं है। जुर्म साबित कीजिए या छोड़ दीजिए? उनकी भूख हड़ताल टूटनी चाहिए?’

खास्तगीर एक सांस में कहता चला गया। लेकिन उसका स्वर संयत था, उसमें तनिक भी आवेश न था। वह जैसे एक पैना चाकू था जो फल पर से छिलका उतारता चला जा रहा था। उसका हाथ जैसे कहीं भी नहीं कांपा।

सुभाष, कलक्टर के मुख को गौर से देख रहा था। उसके मुख पर कोई विकार नहीं था, परिवर्तन नहीं था। उसने दोनों हाथ फैलाकर कहा, ‘मैं उस कानून को मानता हूं जो मेरे सामने है। उन्हें बदल दीजिए, मैं बदल जाऊंगा। पुलिस संदेह पर गिरफ्तार कर सकती है। मुकदमा चलाने की कोई अवधि नियत नहीं है। भूख हड़ताल की इजाजत न दी गई थी, न हमें उससे कुछ मतलब है।’

एक तलवार उठी थी, दूसरी उसके सामने आकर अड़ गई थी?

खास्तगीर ने घूरा और कहा, ‘इसी को आप आजादी कहते हैं? जिसको चाहें, जेल में बिना सबूत डालकर आप जनता के नागरिक अधिकारों पर हाथ डाल रहे हैं। यह कांग्रेस का राज है...’

कलक्टर हंसा, उसने कहा, ‘मेरे दोस्त! अंग्रेज हो या कांग्रेस। शासन शासन है। और जब तक दुनिया में शासन रहेगा, तब तक यही होता रहेगा। तुम सब कुछ कह सकते हो, जैसे कल कांग्रेस कहती थी। मगर जिम्मेदारी बहुत बड़ी चीज है। कुर्सी पर बैठकर जो उत्तरदायित्व अनुभव होता है, वह तुम कैसे समझ सकते हो?’

बात करना बेकार हो चुका था। सुभाष चिढ़ गया। उसने कहा, ‘और राजनीति किसे कहते हैं?’

‘उसको समझना मेरा काम नहीं है।’ कलक्टर ने बात समाप्त कर दी।

लेखकों ने एक-दूसरे की ओर देखा और सब कुर्सियां खिसकाकर उठ खड़े हुए। उस नितांत हृदयहीन व्यवहार से वे विक्षुब्ध थे। अफसोस यह था कि उन्होंने ऐसी जगह की खोज की थी, जहां सिर्फ घड़ी के चक्रों के दांत थे, जो एक-दूसरे को ठेलकर गति पैदा करते थे। वे लौटकर प्रस्ताव और परचा लिखने लगे।

धीरे-धीरे खबर फैलने लगी। दैनिक पत्रों में अधिकारियों की कहानी छपी। दूसरे दिन संपादक को डांट लगाई गई है कि तुम देश के विरुद्ध जा रहे हो। संपादक चतुर आदमी था। उसने दूसरे ही दिन गालियां छाप दीं और तीसरे दिन फिर तारीफ छाप दी। अधिकारी क्रुद्ध हुए; पर तब तक शहर में काफी लोगों पर राज खुल चुका था। विद्यार्थी शहर में प्रचार कर रहे थे! लोगों को समझ में नहीं आ रहा था। कुछ ने राय दी कि एक सभा बुलाई जाए। मालूम हुआ, नगर में दफा 144 लगी है, सभा नहीं हो सकती। पर्चे नहीं छप सकते। कल जो लड़के दीवारों पर इश्तहार चिपका रहे थे, उनमें से एक गिरफ्तार कर लिया गया था। और जेल में बंदियों को भूख हड़ताल करते हुए 22 दिन हो चुके थे। संवाद आया था कि जबरदस्ती नाक में नलियां डालकर दूध पिलाया जाता था। न्याय की वेदी पर, ब्लैकमार्केट की बेदी पर, जेल में सत्य और न्याय के पहरुए, तिल-तिल कर घुल रहे थे, रह-रह कर मिट रहे थे, लेकिन उनके होठों की मुस्कराहट जेल से बाहर दिखाई दे रही थी। जैसे पानी में पत्थर गिरने से लहरियां फैलती चली जाती हैं। उनकी आंखों का निश्चय जो मौत को चुनौती दे रहा था, जो कभी ऐंठन, कभी खून के थूक, कभी आंखों के नीचे छाए अंधेरे में घुमड़ रहा था, बाहर सब तक आता था। और निश्चय एक विश्वास था कि एक दिन यह घूर कर देखने वाले, यह होठ काटने वाले, यह सफेद और खाकी कपड़े पहन कर चिल्ला-चिल्ला कर डांटने वाले, काले दिलों के पाप को खद्दर में छिपाकर शरीफ बनने वाले, उस लहराती हुई लौह की मुस्कराहट से कट जाएंगे, क्योंकि वह इंसान की, दुख और दर्द झेले मनुष्य की, मुस्कराहट ठोस है, उसके किनारे सत्य ने पैने कर दिए हैं।



सुभाष ने हंसकर कहा, ‘लो भाई, मुस्लिम लीगी संपादक तो छूट गया।’

‘छूट गया?’ खास्तगीर ने चौंक कर पूछा, ‘कैसे?’

‘हैवियस कार्पस (अर्थात् व्यक्तिगत स्वतंत्रता) की अर्जी दी थी सो हाईकोर्ट ने फैसला दिया है। लो देखो, जरा अखबार देखो!’

खास्तगीर अखबार पढ़ने लगा। पढ़कर उसने संतोष से कहा, ‘वाह! कहां है; कलक्टर का काम गैरकानूनी था। वाह! वाह।’

खास्तगीर का स्वर उठ गया। उसने फिर झुककर आंखें चमकाकर कहा, ‘अब कलक्टर को सजा मिलनी चाहिए।’

सुभाष हंसा। इसी समय किसी ने दरवाजे पर आवाज दी।

‘कौन है? भीतर आ जाओ,’ सुभाष पुकार उठा।

भीतर आने वाला एक सूखा-साखा नौजवान था। उसकी पलकों पर धूल जमी थी। वह आकर धम से कुर्सी पर बैठ गया।’

‘तुम!’ दोनों लेखक उसे देख चौंक उठे। ‘तुम? जेल से बाहर? कब छुटे? कैसे?’

इस नए आने वाले व्यक्ति के चेहरे पर मुस्कराहट खेल गई, ‘जादू, जादू हो गया!’

‘जादू!’ खास्तगीर ने अचरज से पूछा, ‘मक्खी बनकर निकल आए?’

‘अरे नहीं यार, मुकदमा हो गया। हम छूट गए।’

‘यह कैसे?’ सुभाष ने कहा, ‘कुछ बताओ भी तो?’

‘बताता हूं, बताता हूं’, उसने रुककर कहा, ‘भाई भूख हड़ताल करने से ज्यादा ताकत आ गई है न, जल्दी नहीं बोल पाता।’

सुभाष और खास्तगीर ने उसे सहानभूति से देखा। उसके चेहरे पर थकान व्यक्त थी, जैसे कई दिनों से वह सोया नहीं था। कुछ देर वे सब खामोश रहे। फिर कहना शुरू किया : ‘मेरा मुकदमा जेल में ही किया गया। एक मजिस्ट्रेट, तहसीलदार, दरोगा तथा अमले साथ आए। मुझे जुर्म सुनाए गए। कहा गया कि तुमने रैयत को भड़काया। मैंने कहा : ‘मैंने क्या किया?’

‘तुमने भाषण दिया और गर्म भाषण दिया’, दरोगा ने कहा।

‘दिया?’ मजिस्ट्रेट ने पूछा।

‘दिया, और फिर दूंगा। लेकिन मैंने गर्म भाषण में क्या कहा? मजिस्ट्रेट साहब के पास नकल है?’

‘मजिस्ट्रेट ने तहसीलदार की ओर देखा। तहसीलदार ने कहा : चूंकि मैंने नहीं, बल्कि दरोगा जी ने गिरफ्तार किया था, आप ही से पूछिए।’

‘जी हां हुंजूर’, दरोगा जी ने कहा, ‘मुजरिम ने कहा कि महंगाई बहुत ज्यादा है, सरकार सेठों का फायदा करती है, किसानों पर जमींदार अभी तक बैठे-बैठे उनकी खाल उधेड़ रहे हैं, परती धरती और चरागाहों पर कब्जा कर रहे हैं, सरकार की पुलिस, और उन्हीं की मदद करती है।’

‘बस?’ मजिस्ट्रेट ने पूछा, ‘और कुछ?’

‘और हुजूर’, दरोगा ने कहा, ‘सरकारी अफसरों के बारे में ये गालियां देते थे, जिससे सरकार की बदनामी होती थी।’

‘क्या मतलब?’ मैजिस्ट्रेट ने कहा, ‘और फिर मुझसे पूछा-क्या यह ठीक है?’

मैंने कहा, ‘जी हां, बिल्कुल ठीक है। लेकिन मैं सुनना चाहता हूं कि मैंने क्या कहा?’

‘हां, दरोगा जी, इन्होंने क्या कहा?’ मजिस्ट्रेट ने फिर पूछा।

‘दरोगा कुछ परेशान-सा दिखाई दिया। माथे को उंगली से दबाकर, फिर रुककर कहा, ‘अब हुजूर मुझे इतना तो याद नहीं रहा।’

‘लेकिन मुझको याद है’, मैंने टोका, ‘मुझे सब याद है। मेरा इस दरोगा से पुरानी तनातनी है। मैं इनके बारे में पहले भी दो बार शिकायत कर चुका हूं कि यह रिश्वत बहुत लेते हैं। बताइए, मैंने कहा था कि यह अंगरेजी जमाने के गुलाम तबीयत सरकारी नौकर, पुलिस, जिनका दिल अब भी नहीं बदला है, कैसे काम ठीक चला सकते हैं? इन्हें दरोगा जी का आज बीस हजार रुपया बैंक में जमा है, इनके पास कहां से आया? क्या मिलती है इनको तनख्वाह? कोई पैसेवाले घराने के आदमी भी नहीं। फकत। मैंने बस इतना ही कहा था? पूछ लीजिए।’

‘मजिस्ट्रेट के होंठों पर कुछ झेंप-भरी मुस्कराहट थी। उसने मुंह फिराकर जैसे रुमाल से अपने माथे का पसीना पोंछा। दरोगा मुझे घूर रहा था, जैसे कच्चा चबा जाएगा। मोटे तहसीलदार साहब इस समय जैसे चिंता में डूब गए थे और दीवान जी तथा सिपाही बुत बने खड़े थे। कठोर, हृदयहीन, नीरव।

‘मैंने फिर कहा, ‘मैं आपके न्याय पर विश्वास नहीं करता। आप अगर आदमी को बेबात जेल में डाल सकते हैं तो मैं आप पर यकीन कैसे कर सकता हूं। आजादी मिली है। लेकिन वह सिर्फ वह चोरबाजारी करने के लिए मिली है। हमको नहीं मिली, जो खेतों में काम करते हैं। दरोगा जी को मिली है, जो अब तिरंगा ओढ़कर रिश्वत लेते हैं।’

वह थककर रुक गया था। खास्तगीर की आंखें गौर से सुनने के कारण मंदी हो गई थी। कमरे में एक भभक-सी घुमड़ रही थी। सुभाष उठकर खड़ा हो गया था। वह हाथ में पेंसिल उठाकर कुछ सोच रहा था। बाहर धूप छिप गई थी। शायद बंजारा बादल का टुकड़ा अब उस धूप के नीचे भुन रहा था। इस बादल का बरसना जरूरी है। वह दुनिया की गर्मी मिटाने के लिए है। सूरज सोखकर जला देना चाहता है, हवा ठोकर मारकर इधर बहा देती है। लेकिन एक दिन जब ये बूंदे इकट्ठा हो जाएंगी, तब वह बादल धड़धड़ाकर बरस जाएंगे और धरती फिर हरियाली से लहलहा उठेगी।

‘फिर?’ खास्तगीर ने पूछा।

‘फिर? उन्होंने मुझे छोड़ दिया। वे मेरे जुर्म को साबित नहीं कर सके।’

‘दरोगा का क्या हुआ?’

‘कुछ नहीं। होता क्या’, उसके स्वर में एक आक्रोश था। वह फिर कुर्सी से पीठ लगाकर बैठ गया। पांव उठाकर मेज पर रख लिए।

खास्तगीर हंसा! उसने कहा, ‘एक राजा था, जिसने एक आदमी को फांसी की सजा दी थी। पर फंदा उस आदमी के गले के लिए ढ़ीला था। तो उसने कहा था, ‘यह फंदा जिसके ठीक आए, उसी के डाल दो। तुम तो उससे निकल आए?’

‘मेरी गर्दन’, उसने कहा, ‘दुबली है! जिनकी गर्दनें मोटी हो गई हैं वे ही उसमें आएंगी।’

‘यही हुआ था’, खास्तगीर ने कहा, ‘राजा को ही आखिर चढ़ना पड़ा। फंदा उसी के ठीक था।’

वे लोग खामोश हो गए। यह फिर कहने लगा, ‘जो जेल में भूख हड़ताल कर रहे हैं, भूखे नहीं हैं। माना कि अखबार उनकी खबरों को बड़े-बड़े हर्फों में नहीं छापते, जैसे वे छाप देते हैं कि फलाने सेठ ने आज कौन-सी मोटर खरीदी, माना कि उनकी आवाज अभी बुलंद नहीं है, लेकिन वह फैल रही है...और वह दिन दूर नहीं है, जब वह सबको सुनाई देगी, सबके भीतर बोलने लगेगी। धीरे-धीरे शरीर धुल रहा है। चौथे दिन के बाद से भूख की तेज बर्छी की-सी मार नहीं रहती, हाथ-पांव, शरीर में दर्द होता है, आंखों के सामने सब कुछ घूमता हुआ लगता है, फिर मन जीत लेता है। यह सच है कि मन अकेला ही काफी नहीं है, शरीर गिजा चाहता है। हमें भावुक होने की जरूरत नहीं है...फिर भी वे मनुष्य हैं, वे जीते हैं और मरते हैं, क्योंकि उनके विश्वास मनुष्य के सुख-दुख पर आश्रित हैं, वे बुद्धि से काम लेते हैं...’

उसकी आवाज कमरे में गूंजकर हृदय में उतरती थी और फिर खिड़की से निकल-निकल हवा पर भाग रही थी। सुभाष और खास्तगीर सुन रहे थे। उस दिन कलक्टर बोल रहा था। उसके मुख पर एक चंचल और कुटिल मुस्कराहट थी जो सब कुछ छीनकर अपने पास रख लेना चाहती थी। आज यह एक किसान कार्यकर्ता बोल रहा था। इसके मुख पर एक दृढ़ विश्वास था, या प्रकट और सीधी-साधी वेदना थी जो सब कुछ उनको बांट देना चाहती थी, जो दुखी थे, लुटे हुए थे, पिसे हुए थे...

सुभाष ने देखा, यह एक मनुष्य था, और वह जो उस दिन कुर्सी पर बैठा था वह एक कठपुतला था, उसके जैसे अनेक थे...नाच रहे थे...ताक धिना धिन...
- लगभग, 1948
[ श्रेणी : कहानी। रांगेय राघव ]