'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

नई जिंदगी के लिए / रांगेय राघव

रांगेय राघव 
हम नौ लड़कियां थीं। मेरी उम्र उस समय करीब पंद्रह साल की थी। मैं समझदार थी। अब जब मैं स्वयं तीन बच्चों की मां हो चुकी हूं, मेरी दृष्टिकोण बहुत बदल गया। पर तब नई उमर थी। तब क्या मैं इतनी अकल रखती थी कि असलियत को समझ पाती। लेकिन तुम्हें उसी समय की बात सुनाती हूं। पंद्रह साल में ही मुझे काफी काम करना पड़ता था। मेरी मां को मुझसे बहुत अधिक स्नेह था।

मां के एक और प्रसव होने वाला था। उनके नौ बार लड़कियां हो चुकी थीं। और एक दूसरी बहिन में समय का इतना कम अंतर होता था कि उन्हें संभालना काफी कठिन हो गया था। कौन जाने घर में अब भी वही चार साल पुरानी हालत चल रही हो।

मुहल्ले में किसी-किसी के ही घर में नल था। हम सड़क से पानी भर लाया करती थीं। जब मैं नल पर पानी भरने लगी तो ठकुराइन ने पूछा-क्यों, तेरी मां के कुछ होने वाला है?

मैंने सिर हिलाकर स्वीकार कर लिया। ठकुराइन भला चुप होती! पूछ बैठी-कितने दिन रहे। मैंने दबी जबान से कहा-जल्दी ही।

ठकुराइन मुस्करा दी। मैं उससे डरती थी, क्योंकि उसको लड़ने का अच्छा अभ्यास था और चिल्ला-चिल्लाकर मुहल्ले को उठा लेती थी।

शायद सामने की खिड़की में बैठे हुए लड़के ने मेरी बात सुन ली, क्योंकि वह हंस रहा था। मुझे बस लाज लगी, हालांकि बात कोई नहीं हुई थी। मैंने झट से दरवाजा बंद कर लिया और भीतर आ बैठी।

मां खाट पर पड़ी सो रही थी। बच्चियों में कुछ सो रही थीं, कुछ खेल रही थीं।

सुखदा मुझसे दो बरस छोटी थी। वह कहीं गई हुई थी। उसके कपड़े आंगन में ही पड़े हुए थे।

बाबूजी दफ्तर में नौकरी कर रहे थे। उनकी तनख्वाह अस्सी रुपए से ज्यादा की नहीं थी। मैंने उन्हें कभी प्रसन्न नहीं देखा। उनके माथे पर गहरी लकीरें पड़ी रहती थीं। मूंछें काली और लंबी थीं। लोग कहते हैं, मैं उन्हीं पर गई हूं।

जब वे दफ्तर से लौटते तब भी वे थके-मांदे दिखाई देते, जब जाते तब भी उनमें फर्क दिखाई नहीं देता। उस थकान के कारण उनके होठों पर एक कालापन छाया रहता और उनकी आंखों में एक टिमटिमाती-सी चमक दिखाई देती थी। दफ्तर से आते ही वह हमें एकदम डांटने लगते। मैं रोने लगती।

हृदय भीतर से घुमड़-घुमड़कर आंखों की राह निकलने लगता, पर उन पर इस सबका कोई असर नहीं होता। छोटी-छोटी बच्चियां अपने छोटे-छोटे हाथों से मुझे सहलाकर सांत्वना देतीं। उनका मूक आश्वासन बहुत सहायक होता। सच, वे बहुत कठोर थे। मैं सोचती, हे भगवान! दिन भर काम करती हूं। सब घर संभालती हूं, पर ये नहीं ठीक रहते। मैं सखी-सहेलियों की ओर देखती, जिनके पिता उन्हें प्रेम करते थे। तब मुझे लगता कि मेरे पिता मनुष्य नहीं थे। शायद उनमें हृदय नहीं था। कभी-कभी क्रोध बढ़ने पर मार-मारकर वे बेहोश कर देते और बच्चियों की कोमल देहों पर नीले-नीले दाग पड़ जाते। जब उनका उठा हुआ हाथ चलता ही जाता और बच्चियों की आह से घर फटने लगता, घर में कुहराम मच जाता, तब पड़ोस की बुढ़िया दादी का स्वर सुनाई देता-कन्या पर हाथ उठा रहा है चिरंजी? यह तो कोई रीत नहीं है। अरे तेरे घर में जनम लिए हैं निठुर। निर्दयी बनकर क्यों हत्या कर रहा है?

उस स्वर को सुनकर पिता जैसे चौंक उठते और लौट पड़ते। उसका सिर झुक जाता और वे सूनी आंखों से देखने लगते।

इधर मां की हालत पहले से भी खराब हो गई थी। वे बाबूजी की मनोव्यथा से पूर्णतया परिचित थीं। आजकल कभी-कभी उन्हें उल्टी हो जाती, कभी जी मितलाने लगता। सिर का दर्द बढ़ गया था। हाथ-पांव पीले पड़ चले थे। और मैं जब उन्हें देखती, सदैव उनकी आंखों में एक भय ही दिखाई दिया करता था।

बाबूजी दिन-भर पूजा करते। दफ्तर में भी मुंह में हनुमान गुटका रखते जो बाबा सांवलदास ने उन्हें पुत्र होने के लिए दिया था। उन्होंने कहा था, ‘इस मंत्र से कुछ भी बढ़कर नहीं। अगर यह भी काम नहीं देता तो समझ ले तेरे भाग्य में आटे का लड़का भी नहीं लिखा है।’ पिताजी ने इसे देव-वाक्य समझकर मन में धारण कर लिया था।

शाम को जब पीपल की खड़खड़ाहट सुनाई देती, जब अंधरे में मंदिर का गंध-भरा धुआं गली में लौटने लगता है और घर के बाहर के उस तिकोने चबूतरे पर छा जाता, एक छोटे-से नीवाड़ के खटोले पर मैं बैठी अपनी आठवीं और नवीं बहिन को पुचकारती हुई खिलाया करती। कभी-कभी तो मुझे फुर्सत मिलती थी। बस उन्हें बुलाया नहीं कि एक छोटे-छोटे पैरों चलती हुई आती और दूसरी घुटनों के बल सरकने लगती। मुझे दोनों अत्यंत प्रिय मालूम देतीं। बेचारी! उन्हें कोई स्नेह तक देने वाला न था।

नींद मुझे इतनी गहरी आती कि जरा-सा लेटते ही सारी सुध-बुध खो जाती, फिर कोई कितनी ही आवाजें, दे सहज में नहीं उठती थी ‘ठकुराइन मुझसे कहती थी-क्यों पैदा हो गई हो कमबखतो! क्या बाबूजी को जिंदा ही मार डालोगी?

जब मैं यह सुनती तन-मन रुआंस होने लगता। इसमें हमारा क्या दोष था। पर जब मैं मां को देखती तो लगता वह सब झूठ था। मां की आंखों में दुख ही दुख था, पर जब मुझे देखतीं तब उसमें यह याचना होती। मैं उस दृष्टि की दयनीयता को देखकर मां की गोद में सिर रखकर उन्हें हंसाने लगती थी। मैं समझती तो थी, पर बात की असलियत को मुझे अभी तक तोलना नहीं आता था।

ठकुराइन कहती थी, मारता है? अरे मारेगा नहीं! नौ-नौ बाघ जिसे पालने पड़ें उसकी बुद्धि भ्रष्ट नहीं हो जाएगी? एक नहीं रहोगी। उमर आने पर सब चल दोगी। बेचार बूढ़े को कंगाल कर जाओगी और उसकी देख-रेख करनेवाला तक कोई न रहेगा। कहीं किसी ने उसका मुंह ही काला कर दिया तो बेचारे को डूबने तक की ठौर नहीं मिलेगी। राम-राम! एक हो, दो हो, पूरी फौज है। बाप रे, कन्यादान करते-करते ही बेचारे के घुटने टूट जाएंगे।

जब ठकुराइन मुझसे बातें करती तो मैं घर में आकर चुपचाप खाट पर पड़ जाती। तब क्या हमें मर जाना चाहिए?

सदा की भांति इस बार भी बुआ के घर से पहले ही से कुर्ता, टोपी आ गए; जिन्हें देखकर मैं समझी, निश्चय ही अबकी बार मेरे एक भाई पैदा होगा। मैंने मां को दिखाए। शाम को जब पिताजी घर आए तो मैंने खुशी-खुशी जाकर कहा-बाबूजी!

उन्होंने गरजकर कहा-क्या है? अब सुना है।

मां से बाबूजी की एक दिन रात की बात मैंने सुन ली।

बाबूजी कह रहे थे-अगर तुझ जैसी अभागिन मेरे घर न आती तो क्यों मेरी जिंदगी हराम होती। अब वह बुढ़िया तो जिंदा नहीं है, जिसने पहले दो बहुएं मरने पर हाय-हाय करके खा डाला था कि बेटा! ब्याह कर। वर्ना घर का दीप बुझा जाता है। अब जल रहे हैं न चिराग? दिन में भी नहीं बुझते!

उनके स्वर में क्रोध था। मां ने धीरे से कहा-यह तो किसी के बस की बात नहीं। जो भगवान देता है वह तो सब लेना ही पड़ता है। अगर ऐसा ही है तो दो-चार का गला घोंटकर अपने को आजाद कर लो। उनकी जिंदगी भी हराम करने से क्या मिल जाएगा?

बाबूजी कभी यहां दौड़ते, कभी वहां। वे हांफ रहे थे। उनका मन विकृत हो रहा था। मुझे उनको देखकर एक भय होने लगा। ऐसा लग रहा था कि आज वे किसी के चंग पर चढ़े हुए हैं। क्या होने वाला था, मेरी समझ में बिल्कुल नहीं आया। तभी पिता का स्वर सुनाई दिया। उन्होंने पुकारकर कहा-दाई आ गई।

एक बूढ़ी ने भीतर प्रवेश किया। मैं उसे जानती थी। वह हमारे घर अक्सर आती थी और हमारे परिवार की अच्छाइयों और बुराइयों से परिचित थी। बिना मेरी सहायता के ही उसने अपनी राह ढूंढ ली और भीतर के अंधेरे कमरे में चली गई जहां टिमटिमाता दीपक जल रहा था।

मैं कभी भीतर जाती, कभी बाहर। मेरा दिमाग बिल्कुल बेकार-सा हो गया। दाई ने मुझे देखा तो कहा-जा बेटी! थोड़ी देर जाकर सो रह। तुझे इतनी मेहनत की क्या जरूरत है। जब जरूरत होगी जगा लूंगी।

एकाएक घर में बड़े जोर का शोर हुआ। नींद में पहले तो मैं समझ नहीं सकी। पर जब कोई आकर मेरी खाट से टकराया और गिर पड़ा, हठात् मैं जाग उठी। एकदम आंख खोलने से पहले तो मुझे कुछ भी दिखाई नहीं दिया। पर धीरे-धीरे मैंने पहचाना। वह सुखदा थी। एक-एक करके सब बच्चियां मेरे पास इकट्ठी हो गई थीं।

मैंने फटी आंखों से देखा। जैसे अभी-अभी उन पर हमला हुआ था, सुखदा फूट-फूटकर रो रही थी। बाकी बच्चियों में से कोई सिसक रही थी, कोई डर से चुप हो गई थी। मेरे सिर में दर्द होने लगा। बड़ी कठिनता से मैंने उनको धीरज बंधाया। जब वे चुप हुईं तब मैं उठकर कमरे के बाहर आई। जो देखा उससे जैसे मुझ पर भयानक चोट हुई। हृदय टूक-टूक हो गया।

बाबूजी दहलीज पर सिर तोड़ रहे थे। मुझे लगा कि काटने पर भी अब मेरे शरीर से लहू नहीं निकलेगा। घर में एक भयानकता छा गई थी। मैंने मां के कमरे की ओर पग उठाया। दाई ने मुझे हेरा और दया से मेरी ओर देखा। मैं कुछ भी नहीं समझी। मैंने पूछा-क्या हुआ?

सुना, मेरी एक और बहिन हुई थी।

[ श्रेणी : कहानी। रांगेय राघव ]