'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

बांबी और मंतर / रांगेय राघव

रांगेय राघव 
‘अए हए लुंगाड़!’ नसीमन ने कहा और अपने कच्चे घर के दरवाजे से झुककर निकलते हुए वह सीधी जाकर नीम के पेड़ के नीचे बैठी, जहां पहले ही बुढ़िया चाची बैठी-बैठी सुपारी काट रही थी। उसने चाची से फिर अपनी चुंदी आंखें उठाते हुए कहा, ‘अए, कुछ तुमने भी सुना, वो है ना? वो बाबू की बीवी...’

‘अए वो हरामन!’ चाची ने चौंककर कहा और उनका झुर्रीदार मुंह खुला रह गया, जिसमें से मिस्सी-रंगे, चूना झड़े दांत दिखाई देने लगे।

‘उसी की तो कहती थी मैं!’ नसीमन ने अपने माथे पर हाथ रखकर कहा और फिर उसी हाथ को आसमान की ओर दिखाते हुए कहा, ‘हाय अल्ला, गजब!’

स्त्री का गजब स्त्री ही अधिक पहचानती है, पत्तन क्या पहचानता? अभी जुमा-जुमा सत्रहवां चल रहा है। जरा तड़क-भड़क के कपड़े पहन लेने से क्या अक्ल आ जाती है?

सो जब पांवों में पैंजनी पहने जरा लचककर बाबू की बहू निकली, पत्तन उसी वक्त नल के पास पानी भरता हुआ पाया गया और फिर नसीमन के पास चुगलखोरों ने संवाद पहुंचाया कि आज फिर वह कलमुंही, मुंहजली, उसकी लाश में कीड़े पड़ें, लौंडे को फुसला रही थी।

नसीमन को भविष्य का अज्ञात भय इस विषय में सताता क्योंकि वह स्वयं जानती थी, यह पुरुष नामक प्राणी, जब पत्नी जाती है, तब मां से दूर हो जाता है-इसलिए नहीं कि वह यह चाहता है; मगर इसलिए कि जिस खंभे से दो गधे बंधे रहते हैं, वह बहुत जल्द कमजोर हो जाता है। किंतु इस सब के पीछे उसे मन-ही-मन एक गर्व भी था कि यह जो आज चर्चा हो रही है, उसका केंद्र उसका पुत्र है। परंतु चाची इस स्नेह से शून्य, व्यावहारिक अधिक थीं और ज्यादा बात करने पर भी, दो-एक बात ठीक कह लिया करती थीं।

अपने खानदानी पेशे को नसीमन ने बार-बार चलाने की कोशिश की, मगर वह न चला। वर्ना एक जमाने में शहर के बड़े-बड़े रईस उसके मालिक के हाथ की बुनी हुई दरियां खरीदने आया करते थे। पड़ोस में बाबू के बाप की पुरानी दुकान थी। अब वह रंगसाजी की दुकान भी दरियों के रोजगार के साथ ही उठ गई। अब वह मुन्ना बाबू भी जूतियां चटकाता डोलता है। पहले रोने में तमाशबीनों को चाय पिलाया करता था। अब इधर वह भी नहीं रहा। मगर कुलच्छन ही बहू जो आई...नसीमन उसकी शक्ल देखकर कांप उठती...


2

जब पत्तन सोकर उठा तो नसीमन चक्की चला रही थी। वह पेड़ की छाया में आकर बीड़ी सुलगाकर पीने लगा। उधर मल पर औरतों की भीड़ हो रही थी। कुछ मर्द नहा रहे थे। सड़क पर बच्चे खेल रहे थे।

पत्तन उठा और चल दिया। चाची पान चबाती बैठी रही। जब पत्तन लौटकर आया, उसके शरीर पर पानी की बूंदे थीं। तहमद बंधा हुआ था। देह सुती और स्वच्छ थी। सिर के लंबे बाल माथे पर झूल रहे थे, जिनसे पानी की बूंदे टपक रही थीं। बाएं हाथ पर गिले कपड़े थे। वह खुशी में कोई सिनेमा का गीत गुनगुना रहा था। लपक कर भीतर गया। रंगीन चार खाने का तहमद पहन कर हरी चिलकती कमीज पहनी। गले में गंडा बंधा था। चुल्लू में खूब भरके सिर में तेल डाला और फिर काढ़ लिया। पैरों में जब चमकता जूता पहनकर निकला, नसीमन चौंकीं। बोली, ‘ऐ हो लौंडे। किधर?’

‘अभी आया’। उस ओर बिना देखे ही, एक अत्यंत संक्षिप्त सा उत्तर देकर जल्दी से पत्तन आनन-फानन ही निगाहों की ओट हो गया। बात आई-गई हो गई। नसीमन रोटी सेंकने उठी और चाची वहीं आधी धूप, आधी छांह में पेड़ के नीचे बैठी रही। सड़क वीरान हो चली।

उधर पत्तन जब नीचे पुलिया के पास पहुंचा, उसने मुंह में उंगली डालकर सीटी बजाई। किसी को कोई संदेह नहीं हुआ, क्योंकि वह चौधरी के घर के पिछवाड़े खड़ा था, जिसके आगे-पीछे, किनारे ईटों-मलबों के ढेर के सिवा कुछ न था। और दूर-दूर छतों पर लौंडे अपने-अपने कबूतरों को उड़ा रहे थे। कबूतर कभी आगे उड़ते, फिर एक लौट पड़ता और सब उधर ही टूटते। तब लौंडों की अजीब-अजीब आवाजें गूंजने लगतीं।

तभी ध्यान टूटा। एक सीटी फिर बजाई और वहीं झाड़ियों के पीछे हो गया। मैला बुर्का पहने एक लड़की आकर उन्हीं झाड़ियों में उसके पास छिप गई।

दो मिनट भी न बीते होंगे कि भारी कदम से भागता हुआ एक आदमी तीर की तरह सामने से दौड़ गया। पत्तन चौंक उठा।

लड़की ने कहा, ‘शायद वह घर आ गया है। अब ढूंढ रहा होगा। मैं जाती हूं, वर्ना आज वह मुझे मार डालेगा।’

पतन ने मुस्कराकर कहा, ‘छोड़ क्यों नहीं देती उसे? मैं क्या तुझे रोटी नहीं खिला सकता?’

लड़की ने मुस्कराकर देखा।

पत्तन ने कहा, ‘दो रुपए रोज की जमा है।’

लड़की की आंखों में जैसे कुछ चिंता घूम रही थी। क्या यह हो सकता है? उसने एक बार पत्तन की ओर देखा, जैसे उसे विश्वास नहीं हुआ था।

पत्तन पत्थर पर बैठ गया और उसने उसे खींचकर अपने पास बिठा लिया। लड़की बैठ गई।

दिन का उजाला अब पत्थरों के नीचे घूम रहा था। दोनों अपनी उम्र की आवश्यकता के अनुसार बेवकूफी से एक-दूसरे को घूरने लगे। लगता था, आंखों में समा जाएंगे। और दोनों एक-दूसरे की ओर झुकने लगी।

हठात् एक भयानक धक्का लगा। पत्तन देखता ही रह गया। उसकी प्रिया जोर से कंकड़ों पर गिरी। दोनों हक्के-बक्के हो गए। सामने मरियल पर इस वक्त बिफरे शेर की तरह बाबू खड़ा होठ चबा रहा था। उसने बढ़कर फिर अपनी बीवी पर कसके एक लात जड़ी, जिसमें क्षण-भर उसका मुंह धूल में पड़ा रहा। जब सिर उठाया, तो वह रो रही थी।

‘रोती है, छिनाल!’ बाबू ने फिर बढ़कर हाथ में पत्थर उठाते हुए कहा, ‘आज मैं तुझे...’

पत्तन का जी चाहता था, भाग जाए, पर अब बढ़कर हाथ पकड़ लिया। कहा, ‘क्या कर रिया है...सिड़ी, बावले।’

बाबू की बहू भाग चली। बाबू ने क्रोध से पत्थर फेंककर पत्तन की गर्दन पकड़ ली और खूनी आंखों से देखते हुए कहा, ‘आज साले, तेरी मैयत न मनवा दी।’


3

उसी समय एक गंभीर स्वर सुनाई दिया, ‘क्या है बे बाबू। पागल हो गया है?’

बाबू ने देखा, चौधरी था। कुंचित भ्रू। सिर पर मशीन फिरी हुई। मूंछें कटीं, पर छाती पर फैली हुई खिचड़ी दाढ़ी। पत्तन ने लपककर चौधरी के पांव पकड़ लिए। चौधरी ऊंची धोती पहने था। शरीर पर पतला-सा अधमैला कुर्ता, जिसमें से उसकी चौड़ी पर पुरानी हड्डियों की झलक दिखाई देती थी।

‘ठहर ना!’ बाबू ने क्रोध से पागल होकर कहा, ‘आज मैं इसका खून कर दूंगा। आज मैं इसे नहीं छोड़ने का।’

वह हांफ रहा था। चौधरी मुस्काया। उसने कहा, ‘आखिर हुआ क्या?’

बाबू ने कहना चाहा, पर जीभ में आंट पड़ गई।

‘यही तो बेटे,’ चौधरी ने कहा, ‘खून कर दे, ले। साले, मुर्दा गड़ा रहे, सो ही भला। जो कहीं फैल गई बात, तो कहीं मुंह छिपाने को जगह न मिलेगी। खून करेगा, वह फिर तिक्त हंसी हंसे। दाढ़ी पर हाथ फेरा। कहा, ‘पुलिस ले जाएगी। फांसी पर लटकेगा। समझा? अगर बिरादरी में फैल गई, तो दसियों रुपए अंटी से झड़ जाएंगे।’

बाबू रुआंसा हो गया। उसके आवेश में भारी बाधा अटक गई थी। उसने कहा, ‘तो फिर?’

‘यह तो बेटे’, चौधरी ने कहा, ‘किस्मत की बात है। ले क्यों आया था, जब संभलती न थी।’

‘चौधरी!’ बाबू ने फूत्कार किया।

‘अबे चौधरी के बच्चे!’ चौधरी ने पलटकर कहा, ‘बेवकूफ। सांप की तरह भन्नाया डोल रहा है।’ फिर कुछ रंगी गालियां, जो हवा में चिड़ियों की तरह चुहल करने लगीं। ‘औरत की तो पहचान ही यह है’, चौधरी का घुटा हुआ स्वर उठा। फिर कुछ स्त्री-पुरुष संबंध का प्राकृतिक और आदिम वर्णन हुआ और चौधरी ने कुटिलता से कहा, ‘अबे, यह तो दिक की बीमारी की तरह है, किसी-किसी घर में पलती ही है। भूल गया, तेरी भाभी अजमत की इंतजारी में रेल की पटड़ियों के पीछे...’ वे हंसे।

बाबू का सिर झुक गया। वह रोनेवाला था। शायद वह फफक उठेगा। एक ओर चुपचाप चल दिया। चौधरी ने पत्तन को एक लात दी और कहा, ‘साले, बिरादरी में सांड़ बनने चला है। हड्डियां तोड़ दूंगा। अगर ऐसा ही मरद था, तो ले आता किसी बाहर की लड़की को। सीना ठोककर कहता हूं, ले जाता जो कोई आकर कमीने। और एक लात और दी। पत्तन उठ खड़ा हुआ। कुत्ते की तरह खड़ा था।

हठात् चौधरी ने स्वर बदलकर कहा, ‘हिम्मत है तो कर दिखा।’

‘हुकम।’ पत्तन ने कहा, ‘एक बार कह कर तो देखो।’

चौधरी की पुरानी आंखों ने उस नए लड़के को देखा। जैसे बहुत दूर से बाज ने छोटे से पक्षी को देखा है और अब इस चक्कर में है कि किस तरह से झपटा मार के इसे पंजों में दबा ले, और चोंच से फिर उसे फाड़ दे।

चौधरी ने कहा, ‘बेटा! आज वह जूते पड़ते कि जी हलकान आ जाता। जिगर कलेजे से कहता कि अब तो मिलकर एक हो जा। और जो तेरी बुढ़िया सुनती, तो फिर वह कुहराम मचता...बचा दिया साले को। भला, और वो भी सुबह-सुबह...’

‘तुम्हारी दुआ है, चौधरी साहब!’ पत्तन ने नम्रता से कहा, ‘मैं क्या किसी लायक हूं? आज तो तुमने मौत के मुंह से निकाल लिया।’

‘अब दर्जी के यहां जाता कि नहीं?’

‘जाता हूं उस्ताद। कहीं दो रुपए रोज से हिलग रिया हूं।’

‘अब तो न जाएगा बाबू के घर?’

‘मैं तो अब भी न जाता था। वह मुझे खुद बुलाती थी।’

‘साले मैं दूंगा हाथ। एक तू ही युसुफ रह गया था। भटकैरी-सा तो चेहरा है...।’

पत्तन ने झेंपकर सिर झुका लिया। फिर चौधरी ने कहा, ‘कुछ काम करेगा?’

पत्तन ने सिर हिलाया। चौधरी ने समझाया।

लाला बंसनारायन के साथ चौधरी की दो आने की पत्ती है। सो कुछ रेल के बाबुओं के जरिए चोरी का माल आया है। उसे स्टेशन से उठवाकर पहुंचवाना है।

‘डरो मत बेटे!’ चौधरी ने कहा, ‘मैं तेरे पीछे हूं! समझा। घबराना मत। जेल तो क्या, मौत के मुंह से निकाल लाऊंगा।’

पत्तन को लगा, उसके पीछे फौलाद की दीवार थी। वह चला। चौधरी ने कहा, ‘सुन, ले यह ले जा।’ दस रुपए का नोट था।


4

दोपहर को जब धूप कुछ तेज हो गई थी और आसमान में कभी-कभी बादल का एक-आध टुकड़ा पिघलती धूप को अपने भीतर सोखने लगता, मुन्ना दौड़ता हुआ आया। वह हांफ रहा था। उसने जल्दी-जल्दी कहा, ‘चाची, ओ चाची।’

‘क्या है बे?’ नसीमन ने पूछा।

लड़का सहमा हुआ था।

‘ऐ क्या है मुए? मुंह में कांटे उगे हैं तेरे, जो सीधा बोल न निकले है? ऐ, देखो!’ फिर पुचकारकर कहा, ‘बोल बेटे!’ फिर हंसकर कहा, ‘ऐ, मरे का पसां सूंघ गिया दिक्खे है।’

‘अरी, पूछ लो।’ चाची ने भारी-सी आवाज में कहा, ‘क्या कै रिया है?’

और आश्वासन मिलने पर लड़के ने कहा, ‘पत्तन भाई को पुलिस पकड़ कर ले गई है।’

नसीमन के हाथ से सुराही छूटकर नीचे गिरी, फूट गई, पानी फैल गया। काई लगे खपड़े पड़े। वह देखती रही। दिल धक् से बैठ गया था।

चाची ने हिम्मत की। पूछा, ‘क्यों ले गई है?’

‘जे तो मुझे नीं खबर। मगर लोगबाग कै रए थे पत्तन भाई ने चोरी की थी।’

‘चोरी की थी?’ चाची का अंगार-स्वर भभक उठा, ‘हरामजादा...’

‘चौधरी ने भेजा था उन्हें किसी समान के साथ।’ लड़के का स्वर खिंच चला, ‘वो माल डकैती का था, सो बिलैक करना था...’

‘अए हऐ!’ नसीमन को होश आया, ‘कुत्ता शहंशाह बनने चला था। घर में नहीं दाने, अम्मां चलीं भुनाने। अए, तू मुंहजले अबके जरा अइयो मेरे सामने, मैंने तेरी चटनी करके न धर दी, कसम से चटनी करके...’

चाची ने कहा, ‘क्यों गाली देती है? ले-दे के घर में मरद के नाम पर वह लौंडा बच रहा है, सो दिन-रात कोसती है...’

‘मैं न कहती थी कुछ’, नसीमन ने कहा, ‘बाबू के घर के हजार चक्कर लगा लेगा। अरे, बाबू फिर भी अपना था, पर पुलिस से इश्क करने की इसे ही सूझी। भला था, इसी बाबू के घर से जूतियां खा लेता, कौन इज्जत चली जाती? सब लौंडे यही करते हैं, और सब नई लौंडियां, जिसे देखो चटक्को, मटक्को; पर इस हरामजादे कुत्ते को तो जेलों के टुकड़े तोड़ने थे। अव्वल नंबर का बदमास...!’

‘इसका’, चाची ने कहा, ‘बाप भी सीधा था, नसीमन। वह भी भोला ही था। उससे तो शेखजी ने उसका जमीन लिखा ली थी...है तो अपने बाप का बेटा...!’

नसीमन चिल्ला उठी, ‘आग लगे ऐसे मां-बाप में...।’

उसका हृदय फटा जा रहा था। चाची ने देखा, वह आपे में न थी। अपने आपको आदमी तब गाली देता है जब और कोई चारा नहीं होता। और, आज सचमुच वह असमर्थ-सी दिख रही थी।

चौधरी ने कहा, ‘चाची!’

चाची ने मुंह फाड़कर ऐसे देखा, जैसे वे जो बहुत-सी मक्ख्यिां इधर-उधर उड़ रही हैं, वे सब उन्हीं के मुंह में से निकल पड़ी हैं; क्योंकि उनके दांत ऐसे लग रहे थे, जैसे मुंह में अभी तक बहुत-सी मक्खियां चिपकी हुई थीं।

चौधरी कहते रहे, ‘घरबराने की कोई बात नहीं है। मैंने उसे भेजा था’, ‘एक अपने ही काम से। अब क्या मैं उसे छोड़ दूगा? कभी नहीं।’ उन्होनें सिर उठाकर हिलाया, ‘चाची! ये साले पुलिसवाले।’ और फिर वह दुंबे की पूंछ की तरह भारी-भारी गालियां, दुंबे की वह पूंछ जिसका मांस सबसे ज्यादा, जायकेदार होता है, और वह गालियां जो अंतःकरण से असमर्थता की नीवों को खोदने लगती हैं-समझीं चाची?

चाची ने उन गालियों पर तनिक भी ध्यान न दिया। गाली तो मरद का जेवर है। उन्होंने रुआंसी आवाज में कहा, ‘क्या होगा?’

‘होगा क्या?’ चौधरी ने कहा, ‘दो-चार हाथ खाएगा। इधर मैं लाला के पास जाता हूं। वे बुलाकर दारोगा को डांटेंगे कि साले हमने तनख्वाह बांध दी है, फिर भी तुम्हारी बदमाशी नहीं जाती...।’

और चाची के कानों में फिर कुछ भयानक गालियां गूंजने लगी, जीवन में जिनका इतना ही अर्थ है, जितना दूध में गिरे झींगूर का।

चौधरी अपनी भव्य आकृति से देखते हुए चले गए। चाची उदास-सी आकाश की ओर देख रही थी। कुछ समझ में नहीं आ रहा था, क्या करें? कहां जाएं? उन्हें चौधरी के प्रति अत्यंत घृणा हो रही थी, जैसे भेंड़ के दूध में ऊपर चिकनाहट गाढ़ापन, और उसकी हीक-हीक जिसे सहा नहीं जा सकता।

तभी रोने की आवाज आई। बाबू अपनी बहू को राह पर ला रहा था। इसके लिए उसने धौ की लकड़ी काटकर ‘बुद्धि सुधार’ नामक हथियार बनाया था। वह उसकी ठुकाई उड़ा रहा था।

इधर नसीमन चिल्ला रही थी, ‘मुए, तुझे कुछ भी अकिल होती तो आज ये हाल होता! भली कही। और तू मान गया कि बिल में हाथ तू दे, मैं पीछे से मंतर पढ़ता हूं।’

परंतु सुनता कौन? जिस पत्तन के लिए उसने ये शब्द कहे थे, वह तो चला गया था। नसीमन की आंखों से दो बूंद पानी ढुलक पड़ा। इस समय उसे बाबू की बहू पर दया आ रही थी, चौधरी घृणा की पर्त्तों में भी चमक रहा था।
अंगारे न बुझे
[ श्रेणी : कहानी। रांगेय राघव ]