'भाषान्तर' पर आपका हार्दिक स्वागत है । रचनाएँ भेजने के लिए ईमेल - bhaashaantar@gmail.com या bhashantar.org@gmail.com । ...समाचार : कवि स्वप्निल श्रीवास्तव (फैज़ाबाद) को रूस का अन्तरराष्ट्रीय पूश्किन सम्मान। हिन्दी के वरिष्ठ कवि केदारनाथ सिंह को 49 वाँ ज्ञानपीठ पुरस्कार। भाषान्तर की हार्दिक बधाई और अनन्त शुभकामनाएँ।

जाति और पेशा

रांगेय राघव 

अब्दुल ने चिंता से सर हिलाया। नहीं, यह पट्टी उसी की है। वह रामदास को उस पर कभी भी कब्जा नहीं करने देगा श्यामा जब मरा था तब वह मुझसे कह गया था। रामदास तो उस वक्त वहां था भी नहीं। उसका क्या हक है? आया बड़ा हिन्दू बनकर। उस वक्त कहां चला गया था? जब देखो तो हाथ में लट्ठ उठा-उठाकर दिखाता है। मैं कचहरी में ले जाऊंगा इसको।



उसके शरीर पर एक मैली-सी मिरजई और कटि के नीचे घुटनों तक ऊंची धोती थी। वह बैठा-बैठा हुक्का गुड़गुड़ा रहा था। इधर जो नाज महंगा बिकता है, उसके पास कुछ रुपया जमा हो गया है। वह अब किसी से भी क्यों दबे? और उसने भौं सिकोड़कर गंभीरता से एक बार जोर का कश लगाया और फिर अपने कैंची से कटे बालों पर हाथ फेरा। जब मुंह से धुआं छोड़ा तो उसका हाथ दाढ़ी को सहला रहा था।

उसके बच्चे बाहर धूल से खेल रहे थे। उन्हें किसी की भी क्या फिक्र! साथ में ही रामदास के बच्चे भी थे। एक बच्चा धूल में पैर देकर ऊपर से मिट्टी थोपकर घर बनाने की कोशिश कर रहा था। जब चिलम बुझ गई, वह उठा। पत्नी को आवाज दी और कह दिया कि संभवतः देर से लौटेगा। पत्नी कुछ नहीं समझ सकी। अपने इन्हीं विचारों में मग्न वह शहर चल दिया।

दो मील चलकर जब वह वकील साहब के यहां पहुंचा तो उसने देखा, वकील साहब को एक मिनट की भी फुर्सत नहीं। किंतु जब वह पास सलाम करके बैठ गया तो उसे पता चला कि वह सिर्फ गवाहों की भीड़ थी जिन्हें वकील साहब कल का बयान रटा रहे थे। वह चुपचाप प्रतीक्षा करता रहा। जब बयान खत्म हो गया, उन्होंने एक गवाह से उसे सुना। उसकी गलतियों को ठीक किया और फिर संतुष्ट होकर कहा, ‘ठाकुरों को उस गांव में कोई नहीं हरा सकता। अब जाओ।’

वकील साहब की आंखों में एक तीक्ष्णता थी जिससे उन्होंने शीघ्र ही अब्दुल को भांप लिया। उनका काम ही यह था। उन्होंने उससे कहा, ‘अरे बहुत दिन बाद दिखाई दिए। इधर तो आना ही छोड़ दिया था।’ फिर हंसकर कहा, ‘वकील और डॉक्टर दूर रहें यही अच्छा है।’

वे धार्मिक आदमी थे। सुबह अंधेरे ही उठकर भजन-पूजन समाप्त कर लेते और फिर सांसारिक कामों में लग जाते। छुआछूत का पूरा ख्याल रखते। जब बच्चे सुबह पढ़ने लगते वे अपने मुवक्किलों से बात करते हुए उन पर भी नजर रखते कि कोई बेकार ही पेंसिल छील-छीलकर तो समय नष्ट नहीं कर रहा है। पड़ोस के खां साहब से उसके पिता के समय में बहुत मेलजोल था। किंतु अब आना-जाना तो है नहीं, बच्चे अलबत्ता साथ खेलते हैं। उनका सिर्फ सलाम-दुआ का रिश्ता है, और कुछ नहीं। वे मुसलमान, ये हिंदू। अब पड़ोस से सब व्यवहार बंद हो चुका था। वकील साहब की सदा यही कोशिश रहती कि जैसे भी हो खां साहब यहां से उखड़ें तो मैं मध्यस्थ बनकर वह मकान किसी शरणार्थी को दिला दूं, और बीच में जो अपना हो, उसे प्राप्त करूं।

श्यामा की भूमि पर अब्दुल का यह हक जमाना कतई नापसंद रहा। पर उनको क्या? उन्हें तो पैसा मिलना चाहिए।

उन्होंने कागज पर बहुत कुछ लिखा और कहा, ‘केस पेचीदा है। जबानी किसी ने कुछ कह दिया, उसे साबित करना कठिन काम है। और कोई लिखी-पढ़ी है?’

‘होती तो क्या बात थी।’ उन्होंने स्वयं कहा; क्योंकि अब्दुल खाली आंखों से देख रहा था। उन्होंने जोर देते हुए कहा, ‘और तुम्हारी अड़ पड़ गई है।’

अब्दुल ने सिर हिलाकर स्वीकार किया, ‘हां, अड़ पड़ गई है। जमीन तो ऐसी कोई बहुत नहीं है, पर रामदास जीत गया तो अब्दुल सदा के लिए दबकर रहेगा।’

वकील साहब समझ गए। वे समझदार आदमी थे।

‘कौन से डिप्टी को कोरट में जाएगा?’ अब्दुल ने पूछा, ‘ऐसी जगह पहुंचवाओ जहां काम हो जाए।’

वकील हंसे। कहा, ‘तकवी के यहां ले जाता, पर वैसे सुंदरभान ठीक रहेगा। क्यों? आदमी तो वह ठीक हैं?’

अब्दुल ने कहा, ‘आप जानें।’

वकील साहब ने कहा, ‘अरे भाई, तुम्हारी भी तो राय लेनी चाहिए। मैं और वकीलों की तरह नहीं हूं।’

उन्होंने उसे कुछ और समझाया। रुपए गिन लिए। आश्वासन दिया। वह प्रसन्न सा लौट आया। वकील साहब खुश हुए। सुंदरभान से उनकी अदावत थी। वहां यह मुसलमान कभी नहीं जीतेगा। हिंदू की जमीन हिंदू को ही मिलेगी। एक पंथ दो काज सिद्ध होंगे। तकवी दोस्त तो है, लेकिन क्या ठीक? किंतु अब्दुल कुछ और ही सोच रहा था। वकील को रुपए देते ही बोझ उतर गया। जिस समय वह गांव पहुंचा उसे लगा उसने रामदास को हटा दिया था। मामूली नहीं है यह वकील। कितने गवाहों को साथ पढ़ा रहा था। जब उस झूठे मामले को वह यों ही सुलझा गया तो फिर उसका तो एक ही सहारा भी है। वह जरूर जीत कर रहेगा।

तभी किसी ने कहा, ‘कहो तो अब्दुल अच्छे तो हो? बहुत दिन बाद दिखाई दिए।’

गरगलाती आवाज में एक भारीपन था जिसमें अधिकार, स्नेह और चातुर्य्य की भावना थी। अब्दुल ने देखा, मौलवी साहब थे। वह खुशी से अपना किस्सा सुना गया।

उसकी बात सुनकर वे उसे ऐसे देखते रहे, जैसे किसी बेवकूफ को आज जिंदा पकड़ लिया था। अत्यंत गंभीर मुद्रा बनाकर उन्होंने कहा, ‘अब्दुल तू सचमुच बच्चा है।’

अब्दुल चौंक उठा। उसने पूछा, ‘क्यों? क्या बात है?’

लंबा चोगा पहनने वाले मौलवी साहब की उंगलियां उनकी खिचड़ी दाढ़ी में उलझ गई। वे चुप खड़े रहे। उनके उस मौन को देखकर अब्दुल को भय होने लगा। यह हल और जमीन का मोटा काम करने वाला किसान अल्लाह के सूक्ष्म तत्वों को समझने वाले मौलवी को इस तरह खामोश देखकर सिहर उठा।

उन्होंने मुस्कराकर कहा, ‘अभी वह शायद तुमने सुना नहीं। हिंदू अब मुसलमानों पर खार खाए बैठे हैं। यह वह बोला हिंदू नहीं है जो हमारा गुलाम बनकर रहता था, अब वह हमें गुलाम बनाकर रखना चाहता है।’

अब्दुल कांप उठा। मौलवी साहब भारी आवाज में कहते रहे, ‘सूबेदार तलवार लगाकर घूमता है, वह कहता है इन्हें सूई की नोक बराबर जमीन पर भी नहीं रहने दिया जाएगा। कोई रोकने वाला है उसे? कोई नहीं। क्योंकि सुंदरभान सबसे बड़ा अफसर है। उसके सामने कौन बोल सकता है?’

उन्होंने हाथ फैलाकर समझाते हुए कहा, ‘आज हल्के में सब मुसलमान हैं। अपना दरोगा है, अपना तहसीलदार, मगर सुंदरभान अकेला हिंदू डिप्टी है। मुसलमानों को दबाकर रखना चाहता है। तकवी है-अपनी बातें सुनता है, तरफदारी करता है, ठीक है, मगर डरता है। जहां हिंदू-मुसलमान का सवाल आया फौरन अपने आपको ईमानदार साबित करने के लिए हिंदू की तरफ हो जाएगा, अगर ऐसे लोग न होते तो क्या मुसलमान इतना दबकर रहता?

अब्दुल संकट की सी हालत में पड़ गया। अब वह क्या करें? कुछ भी हो, आखिर जब वह दीन भाई है तो क्या कुछ भी ख्याल नहीं करेगा? तकवी ही ठीक रहेगा।

अब्दुल दूसरे दिन जब वकील साहब के यहां पहुंचा वकील साहब अकेले बैठे थे। उनकी स्त्री पर्दे के पीछे खड़ी उनसे कुछ बातें कर रही थी। अब्दुल को देखकर वह भीतर चली गई।

‘आओ, आओ अब्दुल’ वकील साहब ने आरामकुर्सी पर लेटते से बैठते हुए कहा। अब्दुल जाकर बगल में जमीन पर बैठ गया। काफी तकलीफ के साथ उसने अपनी बात को छिपाकर उनसे कह दिया।

वकील साहब ने अधमुंदी आंखों से देखा। तकवी के यहां मामला पहुंचाना उनके बस की बात है, लेकिन उसमें यही खतरा है। मुसलमान कैसा भी दोस्त हो, आखिर मुसलमान है। वह जब देखेगा कि जमीन का मामला है, फौरन मुसलमान की तरफ हो जाएगा, दोस्ती धरी रह जाएगी। केस तो शायद वे जिता दें, पर हिंदुओं का इसमें नुकसान होगा। मुसलमान को जमीन दिलाने का मतलब है इनके यहां पट्टा कर देना। उन्होंने अब्दुल की बात पर पहलू से विचार किया।

वे समझ गए। इससे किसी ने कहा है कि तकवी मेरा दोस्त है। वहां काम जल्दी होगा। और मुसलमान मुसलमान की ही तरफ झुकता है। इस विचार से उन्हें कोफ्त होने लगी। उन्होंने सोचा, वे खुद ही केस कमजोर रखेंगे कि तकवी उल्टा फैसला देगा। उन पर क्या चोट आएगी। वह तो मुसलमान हैं।

उन्होंने कहा, ‘अब तो खर्चा बढ़ेगा अब्दुल। मैं जितना गहरा जाता हूं उतना ही मामला पेचीदा होता जाता है। तकवी से कुछ नहीं कहूंगा। सुंदरभान से कह देता। केस मैं तकवी की कोर्ट में करवा दूंगा।’

यह झूठ बोलते वे तनिक भी न हिचके। सुदंरभान उन्हें दूर रखते थे।

परिणामस्वरूप कुछ रुपए अंटी में से फिर झड़ गए। हृदय फिर हल्का हुआ। अब्दुल जब लौटा तो फिर उसके पांव जमीन पर पड़ने से इंकार कर रहे थे, जैसे उड़ रहा था। अब क्या है? अगर तकवी भी उसकी मदद नहीं कर सकता, तो फिर खुदा भी नहीं कर सकता। मौलवी साहब कुछ भी हो, उन्हें मुकदमा करने का हक थोड़े ही है। रास्ते में देखा, सब बच्चे इधर-उधर खेल में भाग गए थे। एक घुटनों पर चलने वाला रह गया था। उसने रामदास के बच्चे को गोद में उठा लिया। धूल में सना हुआ बच्चा रो रहा था। उसने उसे पुचकार कर चुप किया और उससे बातें करने लगा। उसका मन प्रसन्न हो रहा था। कैसा मजे का है! बड़ी-बड़ी आंखों से घूर रहा है।

तभी रामदास ने पुकार कर कहा, ‘इसे तो रहने दो। दोस्ती करने को मैं काफी हूं।’ वह सामने से आ रहा था। अब्दुल ने बच्चे को उतार दिया। बात लग गई थी।

अब घरों के बीच की भीत और ठोस हो गई, अभेद्य हो गई। रामदास ने बच्चे की हिफाजत के लिए कुछ टोटका किया था। अब्दुल ने सुना तो उसका हृदय कसक उठा। मुझे इतना कमीना समझता है। और प्रतिशोध के शोले भीतर भड़क उठे। बीवी से उसने दृढ़ता से कहा, ‘आज से रामदास हमारा बैरी है। समझती हो?’ स्त्री ने देखा। वह कुछ नहीं समझ सकी।

कई दिन बीत गए।

अब्दुल हार चुका था। तकवी ने उसके खिलाफ फैसला सुनाया था। उसके सब-डिवीजन में कुछ हिंदू-मुस्लिम तनातनी थी। सरकार ने उस पर कड़ी डांट लगाई थी। उसकी नौकरी का चक्कर था। वकील साहब दोस्त थे। उनके मुवक्किल होने में ही हानि थी और मुसलमान होना तो गजब था। सब सुनकर मौलवी साहब ने कहा, ‘मैंने पहले कहा था कि वह हिंदुओं का देवता है। वकील नरोत्तम बड़ा घाघ आदमी है। जब तुम कोरट बदलने गए, जरा न हिचका। वह जानता था कि तकवी पोच आदमी है, उससे हिंदू का कभी नुकसान नहीं हो सकता।’

‘लेकिन डिप्टी तो अपना ही था।’ अब्दुल ने प्रतिवाद किया, ‘मुसलमान तो बेकार है, हिंदू तो अलग है ही। फिर भी करता भी क्या? अपना तो कोई नहीं निकला!’

मौलवी साहब सुनकर परास्त हुए। किंतु हार कैसे जाते। कहा, ‘तू तो सीधा आदमी है अब्दुल! इस मामले में बड़े-बड़े चक्कर खा जाते हैं। अंग्रेजी के ये कानून तो ऐसे हैं कि अच्छा वकील हो तो एक के चार मतलब निकाल ले। तू मेरी राय में एक काम कर। किसी मुसलमान वकील के पास जा। मुकदमे की जीत-हार की कुंजी डिप्टी नहीं वकील है, वकील। समझा?’

अब्दुल फिर विचारमग्न हो गया। मौलवी साहब का कहना ठीक है। पेशकार ने भी उससे अकेले में भी कहा था कि केस ही जब इतना कमजोर है तब तकवी क्या खाक कर लेता? और पेशकार से सुनी यह चार रुपए कीमत की बात उसके कानों में गूंज उठी।

जब वह घर पहुंचा उसकी स्त्री चूल्हे पर खाना पका रही थी। वह बैठा-बैठा सोचता रहा। स्त्री घर की मालिकन थी। उसके क्षेत्र में अब्दुल को बोलने का कोई अधिकार नहीं था, इसीलिए वह उसके मामलों में अधिक दिलचस्पी नहीं लेती। अब्दुल की राय में औरत का दिमाग छोटा बनाया गया था। वह खा-पीकर लेट गया और अपनी चिंता में मग्न हो गया।

दूसरे दिन वह फिर वकील साहब के यहां पहुंचा। उस समय उसके हृदय में एक विक्षोभ था। उसने तीखी दृष्टि से देखकर आंखें फिरा लीं, जैसे उनसे उसे घृणा हो गई थी, जैसे वह किसी अद्भुत पशु के सामने खड़ा था। जिसमें मनुष्यता के कोई भी लक्षण उसे दिखाई नहीं देते थे।

वकील साहब मुकदमा हारे हुए की प्रवृत्ति को खूब जानते थे। अब्दुल को उन्होंने गमगीन देखा तो मुस्कराए। कहा, ‘क्यों?’ मैंने कहा नहीं था? सुंदरभान के यहां मामला ठीक रहता। लेकिन तुम नहीं माने। मैं तभी समझ गया था कि किसी ने तुम्हें बहकाया जरूर है, वर्ना तुम मेरे पुराने मुवक्किल ठहरे। आज तक कभी मेरी बहस से तुम हारे हो? कभी नहीं। फिर अब की क्या हुआ?

अब्दुल सिर झुकाए बैठा रहा।

वकील साहब ने फिर कहा, ‘भाई, यह मामला तो उलझ गया है। अब तो तुम कब्जा ले लो। मैं दूसरा केस डालूंगा। समझ गए? कहो कि जमीन मेरी है। कई साल से मैं जोत रहा हूं। अब उस पर किसी का कैसे चल सकता है? मुकदमा किया था, उस पर अपील चल सकती है। पहले जाकर दारोगा से मिलो। कुछ रुपया जरूर खर्च करना पड़ेगा। कब्जा सच्चा, झगड़ा झूठा!’

वह उठा। सीधे दारोगाजी के पास गया। थाने में उस वक्त भीड़ थी। कई आदमी पकड़े गए थे। कोई चोरी का मामला था। वह बैठकर इंतजार करने लगा। वह मन ही मन प्रसन्न हुआ। दूसरों को फंसा देखकर उसे खुशी हुई, क्योंकि उसका नुकसान नहीं था। कुछ देर बाद उसने देखा कि दारोगाजी अंदर चले गए और वे आदमी भी एक-एक करके उनके पास बुलवा लिए गए।

बाहर बैठा-बैठा वह ऊंघ गया। गांव के थानेदार बादशाह आदमी थे। उनके सामने सिर उठाना कोई साधारण बात नहीं थी। अब शाम हो गई थी। कुछ देर बाद उसने देखा कि गांव के लोग राम-राम करके चले गए। सब छूट गए थे। उसे दारोगा के खुले दिल पर विश्वास हुआ। एकांत में अपनी कहानी सुनाई। दीन का महत्त्व समझाया पर काम मुफ्त नहीं हुआ। और वह भी सिर्फ कोशिश करेंगे।

खाली होकर जब वह घर लौटा तो खटोले पर बैठकर पांव फैला दिए। आज वह कुछ अधिक थका हुआ था। उसने एक लंबी सांस छोड़ी और सिर से पगड़ी उतारकर धर दी। फिर अपनी कैंची फिरी खोपड़ी पर हाथ फेरा। और फिर उठकर खाट पर लेट गया, जिस पर से उसके पांव बाहर निकल रहे थे।

बीवी सामने आ गई। उसने मुस्कराकर कहा, ‘आज बड़ी देर कर दी। कहां गए थे?’

उसे कुछ-कुछ मालूम था कि उसके पति का रामदास से मुकदमा चल रहा था, जिसमें उसका पति हार गया था। अब वह इसी की झेंप में बैठा है। अपना अधिकार दिखाने को जो उसने प्रश्न पूछा, वह ठीक निशाने पर बैठा। अब्दुल का सिर झुक गया।

पहले तो उसकी हिम्मत ही न पड़ी, किंतु उसके बार-बार पूछने पर लाचार होकर सब सुनाना पड़ा। वह चुपचाप उसकी ओर देखती रही। उसके चुप होते ही स्त्री का चातुर्य्य अब खुल पड़ा, ‘मैं कहती थी न कि पहले मेरी बात सुन लो। अब हो गया!’

उसका व्यंग्य सुनकर अब्दुल ने कहा, ‘तो मैं करता भी क्या?’

स्त्री ने उसे घूरकर देखा। अब्दुल सहम उठा। तब स्त्री ने अपने दोनों हाथ चलाकर कहा, ‘वह सब बड़े लोगों के खेल हैं। वकील से कहो, डिप्टी के यहां जाकर चपरासी से कहो। वह डिप्टी का भी बाप है। सीधे मुंह बोल नहीं कढ़ता। एक है थानेदार, वाह...वाह...’ उसने मुंह बनाया जिसको देखकर अब्दुल हंस दिया। उस स्त्री के मुंह पर दो झुर्रियां पड़ गई थीं। वह बकबक करती रही, ‘ये लोग सब ऐसे ही हैं। अपना तो यही रामदास है। उसकी बहू से मैं कह देती। घर का मामला था, घर में ही सुधर जाता। पर तुम क्यों मानने लगे? दो पैसे मिले बस चले कचहरी। कुछ और भी ख्याल रहता है? चले आए बड़े अकलमंद! वकील को दे आया हूं, पेशकार को दे आया हूं, और थानेदार को दे आया हूं। जमाना कहेगा, इसके बड़े-बड़े साले हैं...’ वह हंस दी।

अब्दुल अधीर-सा देखता रहा। उसकी समझ में कुछ भी नहीं आया। औरत की अक्ल ही कितनी! यह क्या बह रही है? वे सब और हैं। स्त्री ने फिर कहा, ‘उन्हें नहीं है हिंदू-मुसलमान की जात। वे तो बेईमान हैं, बेईमान!’ अब्दुल चौंक उठा : लेकिन वह खुद तो मुसलमान है! उसने कहा, ‘वाह! यहां शहर-गांव का चक्कर लगाते टांगें टूट गईं। और तू है कि अपनी रट लगाए जाती है। अरे आखिर इतने लोग हैं। वे कुछ भी नहीं समझते? एक तू ही दुनिया में अकलमंद बाकी है!’

स्त्री इसके लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी। उसने कहा, ‘जिसने घरवाली की नहीं मानी उसका काम कभी ठीक नहीं चलता।’

अब्दुल ने हाथ उठाकर कहा, ‘रहने दे। कल मैं किसी बिरादरी के वकील से राय लूंगा, फिर देखना क्या होता है...’

स्त्री ने चेतकर सिर झुका लिया।

दूसरे दिन वह हामिद खां वकील के पास गया। हामिद खां आगा पेशकारों की ‘जय हिंद’ सुनकर मुवक्किलों से रिश्वत दिलवाने वाले आदमियों में थे। पहले मुस्लिम लीगी थे, अब राज-भक्तों में थे, कांग्रेस वालों के पीछे-पीछे लगे डोलते थे। स्वयं उन्हें अपने ऊपर कभी-कभी आश्चर्य होने लगता था। इस समय वे पान चबाते हुए आरामकुर्सी पर बगल में रखा हुक्का गुड़गुड़ा रहे थे। कभी-कभी बढ़े हुए पेट पर हाथ फेर लेते।

अब्दुल ने इधर-उधर की बातों के बाद अपनी बात कहनी शुरू की। हामिद खां ने चौंककर पूछा, ‘क्या कहा? सुंदरभान के कोर्ट से मामला तुमने हटवाकर तकवी के कोर्ट में करवा दिया?’

अब्दुल ने कहा, ‘जी हां, बदलवा लिया, नरोत्तम वकील ने यही कहा था।’

उन्होंने काटकर कहा, ‘बड़े अजीब आदमी हो, तुमने निहायत गलती की। तुम्हें उसके सिवा कोई वकील नहीं मिला। मुसलमानों में से कोई नहीं ठीक जंचा तुम्हें? वह बड़ा तास्सुबी हिंदू है। उसी की गड़बड़ी से सब कुछ बिगड़ गया है। और तकवी से उसकी दांत-काटी रोटी है। तकवी उसके जरिए खूब खाता है। डिप्टी सुंदरभान ठीक थे। मुझसे क्यों न कहा? मैं उनसे जो चाहे करा सकता हूं...’

अब्दुल ने शंका की, ‘वह तो हिंदू है...’

‘हां, हामिद खां ने कहा, ‘मेरा दोस्त है। इन मामलों में वह फर्क नहीं करता।’

और चार रुपए देकर जब वह लौटा उसका मन ग्लानि से फट रहा था। बीवी की बात सच थी। वे लोग वास्तव में और थे। उसका अपना तो वही रामदास था, और कोई नहीं।

खेत पर रामदास को देखकर, उसने पुकारकर कहा, ‘राम-राम भैया!’

रामदास ने उसे गर्व से देखा और व्यंग्य से हंसा। खाली जेब वाले अब्दुल ने उस अपमान को पी लिया। आज उसे लग रहा था कि जो सत्य उसने पहचान लिया है। रामदास अभी उससे बहुत दूर है। लेकिन जब वह घर पहुंचा उसने पत्नी से कहा, ‘कल मैं रामदास पर अपील दायर करूंगा...’
- अंगारे न बुझे
[ श्रेणी : कहानी। रांगेय राघव ]